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धर्म की बेड़ियाँ खोल रही है औरत

निर्झरी मेहता, वड़ोदरा

श्रीमती नीलम कुलश्रेष्ठ द्वारा संपादित इस किताब का शीर्षक, जो कि थोड़ा-सा लंबा महसूस हो सकता है लेकिन यह पुस्तक एक विभावना विशेष की लौ से आलोकित विशिष्ट अनुभूति को हमारे सम्मुख प्रगट कर रही है। यह विभावना की लौ का प्रागट्य कैसे हुआ यह भी अनूठी साहित्य घटना कही जा सकती है ।

इस पुस्तक के सम्पादन की मैं गवाह हूँ क्योंकि मैं भी उन दिनों अस्मिता, महिला बहुभाषी साहित्यिक मंच, वड़ोदरा, गुजरात की सदस्य थी। अस्मिता की मासिक गोष्ठियां तब अरविन्द आश्रम, दांडिया बाज़ार के लॉन में हुआ करतीं थीं। तब वहां सीता, गांधारी व द्रौपदी व अन्य स्त्री मिथक पात्रों पर कवितायें पढ़ी जातीं थीं। अस्मिता की सदस्यायों की ऐसी कविताओं से प्रेरित होकर नीलम जी ने इस पुस्तक सम्पादन की योजना बनाई थी। कुछ कवितायें उन्होंने मिथक स्त्री चरित्रों पर लिखवाईं थीं। हम सब बैठकर उनका संशोधन करते थे। उन्होंने देश की सुपरिचित लेखिकाओं की ऐसी रचनाओं को भी शामिल करने की योजना बनाई थी।

प्राचीन महाकाव्य महाभारत-रामायण और अन्य प्राचीन ग्रंथ जैसे कि वेद, पुराण, उपनिषद् कथाएँ इन सब में स्त्री चरित्रों को निश्चित किये गये नियमों के विधान से गुजरने में काफी त्रासदी से गुजरना पड़ा है । आधुनिक नारी जो कि नारी देह की सीमा रेखा से बाहर निकलकर मानव संवेदना के स्तर पर जीना चाहती है, उन सभी परिस्थितियों जिनमें से प्राचीन नारी-चरित्रों को गुजरना पड़ा, उसी कारण आधुनिक नारी छटपटाहट महसूस करती है । छटपटाहट की तीव्र सर्जकसंवेदना में से अनायास ही बड़ोदरा की ‘अस्मिता’(अस्मिता महिला साहित्यिक मंच) की सदस्यों की रचनाएँ उभरीं । इस साहित्य पुरुषार्थ में मल्लिका साराभाई, प्रीति सेनगुप्ता, नमिता सिंह, कार्तिक साराभाई, अनामिका, रमणिका गुप्ता, अर्चना वर्मा और अन्य अनेक ख्यातनाम अतिथि सर्जकों का सहयोग प्राप्त हुआ । ‘अस्मिता’ को समर्पित यह पुस्तक चार खंडों में विभाजित है ।

प्रथम खंड में समाविष्ट है अस्मिता की सर्जक सदस्यों की रचनाएँ । इस चौपाल में देखते हैं, कौन-कौन से प्राचीन नारी चरित्र उतर आये हैं । यहाँ है तारामती, सीता, उर्मिला, अहिल्या, सत्यवती, गांधारी, कुंती, द्रौपदी, यशोधरा, अनसूया, मेनका, पूर्णिमा आदि । हर संवेदन अपने आप में अनूठा है । डॉ. उमा देशपांडे आदि कवि वाल्मिकी की रामायण में सीता की अग्नि परीक्षा और पूर्ण गर्भावस्था में किये गये त्याग की घटना के समय के मूल श्लोकों का उल्लेख कर कहती हैं कि ये दृश्य राम की मर्यादा पर ही नहीं उस समय के उन सारे पुरुषों की मर्यादा पर प्रश्न चिह्न लगाता है कि सीता को बचाने एक भी पुरुष आगे नही आया (पृ.22) । डॉ. रानू मुखर्जी कहती हैं – मैं भी बन सकती हूँ सीता, पर नहीं बनूँगी । अब की बार राम से भी वह विश्वास का वरदान माँगेगी।‘धोबी की बातों से फिर कभी सीता का न हो अपमान’ (पृ. 30)

मधुमालती चौकसी की तारामती कहती है कि हरिश्चंद्र ने सप्तपदी के मंत्रो को भी हास्यास्पद बना दिया है । डॉ. रचना निगम की अहिल्या को सुनते हैं, ‘यदि तुम पाषाण हृदय गौतम को सहृदय न बना सको तो उस पत्थर को पत्थर बना दो ।’(पृ. 30) निर्झरी मेहता की ‘परिपूर्णमना’ स्त्री के अस्तित्व के अलग ही परिमाण को उजागर करती है । नारी देह को सौंदर्य, देह ही लज्जा, नारी देह की सीमा में सदियों से आज दिन तक बँधी नारी का इन परिधि से अपने आप को ऊपर उठाना, परिपूर्ण मनुष्यत्व पाने की इच्छा को चरितार्थ करके यहाँ उजागर किया है । (पृ.45) ‘नारी आत्मा भई अनावृत, अनमयी भयी प्रसन्न मना, दिकवसना भयी परिपूर्णमना।’ उन्हीं की दूसरी कविता ‘सत्यवती की आह’(पृ. 35) में सत्यवती कहती है कि ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ के पद से विभूषित अमर भीष्म-आप तो शब्द अर्थ के दास थे । भारत वर्ष ने झेला वह महाभारत, आप के प्रतिज्ञा के अर्थ के जड़ दासत्व की वजह से जन्मा था ।

‘भिक्षा यशोधरा की’ में वंदना भट्ट कहती है -‘मैं स्वयं मिट्टी हूँ, आग हूँ, हवा हूँ, पानी हूँ, मुझसे ही तो बने हैं आप ।’पृ. 43 और भी कई अनूठी संवेदना इस विभाग में हम काव्य-कहानी लेख के रूप में पाते हैं । इस किताब की यही तो है जन्मस्थली ।

दूसरे खंड में है अतिथि सर्जकों की रचनाएँ । इस खंड में प्राचीन स्त्री चरित्रों को नवीन संवेदना के परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्त करती हुई कहानियाँ, नाटक, कविताएँ हैं । इस भाग में कविता की बजाय कहानियाँ और लेख प्रभावी हैं ।

डॉ. नमिता सिंह की कहानी ‘कोख’ में पांडु और धृतराष्ट्र की जन्मदात्रियों की छटपटाहट व्यक्त होती है । नियोग से पांडुकुल की विधवाओं को पुत्र प्राप्ति करना है । जैसा तय होता है उस के लिये वह कहती है ‘और यहाँ एक नई जंगलगाथा हो रही है ।’(पृ. 95) इस कहानी के अंत में लेखिका की नौकरानी की इस कथा पर टिप्पणी तो पढ़िए, ‘औरत जात तो मादा है । चाहे अंबिका, अंबालिका या उन जैसी और रही हों, या अब ये हमारी गाय-भैंसे । सब एक बरोबर ।’ (पृ.97) रमणिका गुप्ता की कहानी ‘अप्सरा मेनका’ में अप्सरा मेनका अपने समय को ‘मेनका-युग’ कहती है । आधुनिक समय और ‘मेनका युग’ का अनुसंधान ये बार-बार बखूबी करती रहती हैं ।

‘स्वयंवर मेरा था, निर्णय मेरे पिता का था । मेरे हाथों का फूलहार दिखावा था, मैं स्वयं फूलहार थी ।’ (पृ.71) मल्लिका साराभाई के भाई कार्तिकेय साराभाई की कविता इन पंक्ति में निहित अर्थ को स्पष्ट कर रोंगटे खड़े कर देती है।

डॉ. अर्चना वर्मा की कहानी ‘नेपथ्य’ विषय-वस्तु की संरचना में एक अलग, विलक्षण प्रयोग है । ‘अभिज्ञान शाकुंतल’ नाटक के समय मंच पर ही नटी विद्रोह करती है। अपने तरीके से कहानी गढ़ती है । ‘असली किस्सा’ नामक नाटक में यही पात्र नामाभिधान पर आधुनिक समय के परिवेश, चरित्र रचना का विनियोग करता है । परित्यक्त शकुंतला डाकूरानी और पुत्र भरत सिंह डाकू में परिवर्तित है, और दुष्यंत के राज्य को वह दुत्कार देती है । अंत में नटी का नट के प्रति व्यंग्य कहानी की सिरमौर चोट है, ‘सच कहना, यह सारा दर्द कालिदास और उनकी शकुंतला के लिये है या इसलिये कि आज का खेल तुम्हारा नहीं, मेरा था ।’ (पृ.87)

गिरा भट्ट ‘उर्मिला’ काव्य में कहती है- ‘उर्मिला देहलीज पर खड़े रहने से तुम्हें क्या मिला, हो जा थोड़ी सयानी ।’(पृ.104)

इस खंड की रचनाएँ काफी ध्यानाकर्षक और सशक्त हैं । नवीन विभावना, नवीन आकृति विधान इस खंड में सराहनीय है ।

तीसरा खंड है-‘धर्म’ । धर्म की बेड़ियाँ जब औरतें खोल रही हैं, तो धर्म में स्त्री का स्थान कहाँ था यह जानना भी अत्यंत आवश्यक है । इस खंड में पारसी धर्म, इस्लाम धर्म, स्वामीनारायण संप्रदाय की शिक्षापत्री, ईसाई, सिख धर्म आदि में स्त्री के स्थान, कर्तव्य के बारे में क्या-क्या निर्देश हैं, उन मुद्दों पर आधारित शोधलेख हैं। अधितर लेखों का नीलम जी ने स्वयं अंग्रेज़ी से अनुवाद कर ये दिखाने की चेष्टा की है कि स्त्रियों को पीछे धकलने में सभी धर्मों में एक समानता रही है। इस पुस्तक के केन्द्रवर्ती अभिगम को इन तक शोधलेख तथा इस खंड की लघुकथाएँ कविताएँ सुदृढता प्रदान करते हैं ।

गुजरात की निवासी नीलम जी इस खंड का आरंभ गुजरात में गरबा के एक साथ घूम रहे स्त्री-पुरुषों के उल्लेख से करती हैं । गुजरात में स्त्री का स्थान भारत की औसत स्त्री के मुकाबले कम दयनीय है । ऐसा वह महसूस करती हैं । किरण बेदी की समझ में यह बात नहीं आती कि कुछ पाने के लिए भगवान के सामने स्त्रियाँ गिड़गिड़ाती हैं, इसमें क्या तुक है ।

इस खंड का ध्यानाकर्षक शोध लेख है अनामिका का -‘समन्वित नारीवाद और भारतीय देवियाँ’ (पृ.105) सीता, सावित्री, पार्वती, शूर्पणखा, सरस्वती, अहिल्या आदि प्राचीन नारी चरित्रों के जीवन में घटी निर्णायक घटनाओं में उन सबका बर्ताव कठपुतली-सा नहीं था, परिस्थिति की माँग के अनुसार वे मौलिक निर्णय, अभिगम लेती हैं । सती का पिता के सामने विद्रोह और आतिथ्य-धर्म की आवश्यकता जानकर सीता का लक्ष्मण-रेखा को लांघना, सरस्वती का पिता के द्वारा ही की गई ज़बरदस्ती के बाद भी गौरवशाली व्यक्तित्व बनाये रखना उनकी राय में विशिष्ट व्यक्तिमत्ता को प्रकट करता है । पूरे लेख में काफी नवीन अभिगम से विचारणा हुई है । बुद्धिमती स्त्री मध्ययुग में डायन ठहरायी जाती थीं । उसी को याद करते हुए वह अंत में कहती हैं, ‘आज भी स्थिति बहुत बदली नहीं है । पढ़ी-लिखी, तेजस्वी स्त्रियाँ बहुत-सी आजीवन अकेली रह जाती हैं । लोग उनसे खार खाते हैं और उनके साथ कटखनी कटुता का जो मिथ जोड़ दिया जाता है, वह डायनपन के आरोप से बहुत भिन्न तो नहीं ।’ (पृ. 112)

नीलम जी की लघुकथा ‘अवतार’ में आये दिन कामकाज और पति की जोरतलबी के बीच फँसी अँगूठा छाप औरत कमलाबाई नवरात्रि में माता का अवतार आने पर पति को चाँटा भी लगा देती है और वी.आई.पी. सेवा भी पाती हैं । पाकिस्तानी लेखिका किश्वर नाहीद की आत्मकथा- ‘एक बुरी औरत की कथा’से लिये गये अंश ‘पहला सजदा’ में उनकी किताब की काफी भर्त्सना हुई थी । खुद की मर्ज़ी से हुई उन की शादी पर उनको लताड़ा गया था । वह कहती हैं -‘बचपन की यादों में परियों की कहानियाँ या अलिफ़ लैला, शाहज़ादियों के किस्से कम और खौफ़ के ताजियाने (कोड़े) ज्यादा हैं ।’(पृ.118)

आशारानी व्होरा भारतीय संस्कृति में ‘अर्धनारीश्वर की अवधारणा’ नामक शोध लेख में कहती हैं कि इस दृष्टि से स्त्री न पुरुष की अनुगामी है न उसकी समकक्ष, वह पूरक है । स्त्री और पुरुष मिलकर एक महत्वपूर्ण इकाई बनाते हैं । (पृ.125)

उनकी राय में यह परिकल्पना समाज के परिष्कार व उन्नयन की झलक है ।

पुस्तक का चतुर्थ खंड छोटा सा है । पर वह ‘आज’ को उजागर करता है । पुस्तक में अस्मिता से शुरूआत हुई । समापन में भी अस्मिता के सर्जक द्वारा ‘आधुनिक स्त्री की परिभाषा’ में हमें सरसरी निगाहों से ली गई झलक पाते हैं । तीन कविताएँ और एक लघुकथा इसमें है ।

‘प्रश्नचिह्न लग गया था मेरी उस भूल पर जहाँ मैं भी एक मनुष्य थी ।’ नलिनी पुरोहित (पृ.171)

‘आप यह भूल गये हैं कि, आप जहाँ खड़े हो, आपके पैरों तले जमीं, हमारे कंधे हैं....हमें आपसे कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ हमारा कंधा खाली करो।’ वंदना भट्ट (पृ.172)

नीलम जी की लघुकथा ‘रचयिता’ में एक कॉलेज कन्या कहती है- ‘आप हमें द्रौपदी जैसी कमज़ोर स्त्री बनाना चाहते हैं । कोई हमारा चीरहरण करने की चेष्टा करे और हम कृष्ण को पुकारें ।’(पृ. 174)

नये ज़माने की आधुनिक नारी-नवीन नारी के मानस की यहाँ झाँकी हम देख सकते हैं । इस विषय और द्रौपदी का चरित्र तो शायद अलग स्वतंत्र पुस्तक के काबिल है ।

यह पुस्तक, उसकी केन्द्रवर्ती ‘सोच’ की विशिष्ट मिसाल है । यहाँ पूरे प्राचीन भारत और विदेश की भी ‘आधी दुनिया’ जिसके अस्तित्व के ‘मानव’ अंश को नकारा गया है.... सदियों से, इस पुस्तक के पन्नों पर उसकी नयी विभावना, संवेदना, सोच से सनी अभिव्यक्ति हुई है । समाज की सोच में, व्यवहार में लग गयी जंग या समाज के रक्त में, धमनियों में जम रहे क्ल़ॉट का इसी तरह सामना किया जा सकता है । अन्यथा नवयुग, इक्कसवीं सदी भी Old Wine in New Bottle की परिस्थिति में ही ठिठुरकर रह जायेगा । सहस्त्राब्दि की गिनती से हम कुछ हासिल नहीं कर पायेंगे । उसके सूखे पत्ते, पेड़ को झिंझोड़कर गिराने होंगे । इस दौर में संपादक का यत्न सही यत्न है । उसे प्रशंसनीय साहित्यिक यज्ञ आहुति कह सकते हैं ।

इस सशक्त पुस्तक ‘धर्म की बेड़ियाँ खोल रही है औरत’ के आकलन के बाद नीलम जी से ऐसी ही अन्य सशक्त, सक्षम पुस्तक की चाह है ।

 

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पुस्तक- `धर्म की बेड़ियाँ खोल रही है औरत `

सम्पादक -नीलम कुलश्रेष्ठ

मूल्य -२०० रु

प्रकाशक -नवचेतन प्रकाशन [ शिल्पायन प्रकाशन, डेल्ही ]

समीक्षक -निर्झरी मेहता, वड़ोदरा

[ नोट ; निर्झरी बेन की इच्छा नीलम कुलश्रेष्ठ से ऐसी एक और पुस्तक के सम्पादन की थी किन्तु नीलम ने दो पुस्तकों का सम्पादन किया -१.`धर्म के आर पार औरत `[ किताबघर, देल्ही ]२. `धर्म की बेड़ियाँ खोल रही हैं औरत` -खंड -२ ]