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तक़दीर की खोटी

देहली के एक बडे हॉल में अगले माह मेरे चित्रों की एक एकल प्रदर्शनी आयोजित की जा रही थी ।

उस शाम मैं एक महत्वपूर्ण चित्र पर काम कर रहा था । एक टूटे दर्पण में एक साबुत मानवी चेहरे के विभिन्न खण्ड उतार कर ।

तत्पर घोड़ों की मानिन्द मेरे हाथ मेरे कैनवस पर दौड़ रहे थे ।

सरपट ।

फिर अचीते ही वह बिदक लिए ।

मैंने उन्हें लाख एड़ी देनी चाही किन्तु उनकी दुलकी ने रफ्तार पकड़ने से साफ इनकार कर दिया ।

बिगड़ैल घोड़ों की मानिन्द ।

क्या उन्हें बाबूजी ने एड़ी लगाई थी ?

अथवा जिज्जी ने ?

काम रोककर मैं अपने स्कूटर पर बैठा लिया ।

साधन सम्पन्न मेरे एक मित्र ने विशाल अपने बंगले के एक कमरे को मुझे मेरे स्टूडियो के लिए दे रखा था और पिछले कुछ महीनों की अपनी अतिव्यस्तता के कारण रात में भी मेरा अपने घर जाना बहुत कम हो गया था ।

अजीब और अटपटा तो जरूर लगता था कि एक ही शहर में अरे-परे एक भरी-पूरी रौनकी सड़क पर मेरे पास मंगलप्रद एवं सुविधाजनक अपना यह अस्थाई ठौर था और सरासर बोझिल एक संकरी रेलवे कालोनी में रेल की धमक और धुएँ से शापित एवं कष्टप्रद वह स्थाई ठिकाना । एक आवास में प्रतापी और प्रतिष्ठित मेरे मित्र थे, सावकाश और मिलनसार उनकी पत्नी थी प्रफुल्लित और स्फूर्तिगत, उनकी दो बेटियाँ थीं- सलोनी और दूसरे निवास पर व्यग्र और रूग्ण बाबूजी थे तथा विषाद प्रवण और अन्तर्ग्रस्त जिज्जी !

और यह बात भी कम हैरत की नहीं थी जो इस छोर से गुजरती हुई हवा उधर मेरे स्टिडियो में अक्सर आ धमकती थी और इस घर की धड़कनें मुझे अपने स्टूडियो में साफ सुनाई दे जाती थीं और बिना किसी दूर-भाष अथवा दूर-संचार के बाबूजी और जिज्जी के दूर-संवेदी संदेश मुझ तक हमेशा पहुंच लेते थे और मैं इधर की तरफ उड़ आता था ।

हमेशा की तरह उस शाम भी सोलह सीढ़ियों पर बैठे मेरे घर ने मुझे देखते ही अपना ज्वारनदमुख खोल दिया ।

’किशोरी लाल जी आए हैं ?’ मेरे स्कूटर की आवाज सुनते ही बाबूजी उसके मुहाने पर आ खड़े हुए ।

इधर अपनी सेवा-निवृत्ति के बाद से मेरे संग बाबूजी अपने व्यवहार में औपचारिक बाह्याचार बरतने लगे थे ।

’हाँ’, यथा नियम मैंने भी हाजिरी भरी, ’मैं, किशोरीलाल ।’

’इन्दु बीमार है,’ सीढ़ियाँ पार कर जैसे ही मैं बाबूजी के पास पहुँचा बाबूजी ने मुझे चेताया, ’अच्छा किया जो आज आप इधर चले आए...बेचारी तीन दिन से मुँह औंधे बिस्तर पर पड़ी है...अपने काम पर नहीं जा रही...’

पिछले पाँच वर्षों से जिज्जी रेलवे स्टेशन पर उद्घोषक का काम कर रही थीं ।

अपनी सेवा-निवृत्ति से एक साल पहले ही जिज्जी को बाबूजी ने यह नौकरी दिला दी थी । अपने रेलवे क्वार्टर को अपने अधिकार में रखने हेतु ।

’मलेरिया न हो ?’ दो कमरों के उस मकान में रसोई की बगल वाले कमरे में जिज्जी अपनी चारपाई पर लेटी रहीं ।

’हो सकता है,’ बाबूजी की आवाज उनके हाथों के संग-संग कांपी-इधर कुछ समय से वे पारकिनसनज़ डिज़ीज़ के तेजी से शिकार हो रहे थे । ’बुखार के साथ-साथ कँपकँपी रहती है...’

’क्या बात है जिज्जी ?’ मैंने जिज्जी का कंधा हिलाया, ’डॉक्टर बुलाऊँ क्या ?’’

जिज्जी ने सिर हिलाया ।

तिरछी दिशा में ।

किसी कठपुतली की एठन के साथ ।

अल्पभाषी जिज्जी बीमारी में अपनी जुबान पर ताला लगा लिया करतीं ।

’मैं डॉक्टर ला रहा हूँ’ मैंने कहा ।

जिज्जी की आँखों में आँसू तैर आए ।

इस रेलवे कालोनी का दूसरा सिरा गोटे बाजार में खुलता था ।

उधर गए मुझे एक अरसा बीत चला था और उस शाम मैंने उसी तरफ अपना स्कूटर बढ़ाया ।

गोटे बाजार के बाद की गली चूड़ियों की रही और उससे अगली जेवरात की । उसके बाद एक तिराहा आया जिसका एक रास्ता प्लास्टिक की बालटियों से भरा रहा और दूसरा स्टोव आदि की मरम्मत करने वाली दुकानों से ।

मैं तीसरे दुकान परचून की थी, दूसरी अचार-मुरब्बे की और तीसरी एक डॉक्टर की ।

बोर्ड पर डॉक्टर का नाम सूर्यपाल वशिष्ठ लिखा था और नीचे मिलने के घन्टे दर्ज थे, सुबह आठ से दोपहर एक बजे तथा शाम पाँच से आठ बजे ।

उस समय मेरी घड़ी पौने छः बजा रही थी ।

मैंने अपना स्कूटर उसी दुकान पर रोक लिया ।

’आप रजिस्टर्ड डॉक्टर हैं क्या ?’ डॉक्टर की कुरसी पर बैठा युवक मुश्किल से चौबीस का रहा होगा । लगभग मेरी ही उम्र का ।

’नहीं मैं अभी पढ़ रहा हूँ । मेडिकल कालेज के फोर्थ ईयर में । यह दुकान मेरे पिता की है । इधर कुछ महीनों से वे अस्वस्थ चल रहे हैं और मैं उनके मरीजों को देखने चला जाता हूँ ।’

’आपको अपने घर ले जाना चाहता हूँ,’ मैंने कहा, ’मेरी बहन बीमार है...’

घर जाने की हम दुगुनी फीस लेते हैं, अस्सी रूपया...’

’आइए, मेरे पास स्कूटर है....’

युवक ने मेज की दराज से स्टेथोस्कोप निकाला, आलमारी से कुछ दवाइयाँ लीं और अचार-मुरब्बे वाली दुकान के काउंटर पर बैठे अधेड़ व्यक्ति को आवाज दी ’चाचा कोई आए तो उसे बैठा लीजिएगा, मैं जल्दी ही लौट आऊँगा ।’

’ठीक है,’ अधेड़ ने मुँह छिपाकर अपनी हँसी दबाने का प्रयत्न किया, ’बिल्कुल ठीक ।’

’ये आपकी बहन हैं ?’ जिज्जी पर आँख पड़ते ही युवक ने अपनी आँखें फैला लीं ।

निस्संदेह जिज्जी की दयनीय अवस्था न्यायतः किसी भी अजनबी की आँखों में चुभ सकती थी । जिस पर उस समय की उनकी रोगजनक अस्तव्यस्तता मेरे बढ़िया परिधान के कारण हमारे बीच के अन्यत्व को कुछ ज्यादा ही उजागर कर रही थीं ।

’आप अपनी सिगरेट बन्द कीजिए,’ अपने स्टेथोस्कोप से जिज्जी की जाँच करने के बाद युवक ने मुझसे कहा, ’मरीज की हालत अच्छी नहीं । इनके नाक से लहू टपक रहा है । चमड़ी के नीचे गाँठें बंध रही हैं, बुखार बहुत तेज है और इनका दिल जोर से कलकला रहा है ।’

’अब क्या करना होगा ?’ मैंने अपनी सिगरेट तत्काल बुझा दी ।

’मुझे बर्फ ला दीजिए । मरीज का बुखार उतरना बेहद जरूरी है ।’

बर्फ की सभी पट्टियों का हिसाब युवक ने स्वयं रखा ।

माथे की पट्टियाँ.....

पेट की पट्टियाँ...

पैर की पट्टियाँ.....

सभी पट्टियाँ युवक ने स्वयं भिगोयीं, लगाईं और हटायीं । बाबूजी और मैं पेशेवर उसकी ऊर्जस्विता को ताकते रहे ।

निःशब्द ।

बीच में दो एक बार जब भी मैंने अपनी सिगरेट सुलगाने की चेष्टा की तो युवक ने इशारे से मुझे रोक दिया ।

अंततः जिज्जी ने अपनी आँखे खोलीं ।

युवक उस समय उनके पेट की पट्टियाँ बदल डाली ।

त्रल एक उत्सुकता ने अनवरत उनकी टकटकी को विराम देकर उनकी आँखें मिचका दीं....

बारहमासी उनकी त्यौरी के बल उनके माथे से उतार दिए...

और दबी हुई एक हँसी उनकी गालों के गड्ढों को गुदगुदा गई ।

मानो उनकी तरूणाई के मूक आवेग ने चिहुँक कर उन्हें अन्दर तक झकझोर दिया ।

’हाँ’, युवक प्रेमभाव से मुसकराया ।

’आप जिज्जी को जानते हैं ?’

’ये मेरी दुकान पर आ चुकी हैं...’

युवक मुझे बाहर सीढ़ियों पर ले आया ।

’ये बीमार हैं...ज्यादा बीमार हैं...बहुत ज्यादा बीमार है...’

’ऐसी क्या बीमार हैं ?’

’इनके दिल के अन्दर लहू रिसता रहता है । बराबर । लगातार । डॉक्टरी भाषा में इसे रिगरजिटेशन कहते हैं । इन्हें आपरेशन की सख्त जरूरत है...’

’दिल के आपरेशन की ?’

’हाँ । इनके दिल की जो वाल्व इनके लहू को इनके दिल के अन्दर उल्टा बहा रहा है, आपरेशन से वह वाल्व दुरूस्त की जा सकती है ।’

’महंगा आपरेशन है ?’ मैंने अपनी अपनी सिगरेट सुलगा ली ।

’शहर के एक बड़े सर्जन मेरे गुरू हैं,’ युवक ने अपनी थूक निगली, ’मेरा कहना वे टाल नहीं सकते । मैं उन्हें कहूँगा तो वे इस आपरेशन की फीस न लेंगे...’

जिज्जी के साथ इतनी रियायत ?

यह रियायत आनुषंगिक थी अथवा दैवकृत ?

जिज्जी उसकी सहानुभूति का  पात्र थीं ? अथवा कौतूहल का विषय ?

’आपरेशन के लिए दो एक महीने रूका जा सकता है क्या ? इधर मैं बहुत वयस्त हूँ...’’

’रूकना चाहिए तो नहीं...’

’ठीक है । आप आपरेशन की व्यवस्था कीजिए । जो भी बाबूजी से बन पड़ेगा वे आप को जरूर दे देंगे....’

जिज्जी के आपरेशन के दिन मैं देहली में था ।

मेरी एकल प्रदर्शनी सफल रही थी और आज-कल-परसों की मेरी वापसी यात्रा डेढ़ महीने तक निरन्तर टलती चली गई थी ।

अपनी वापसी पर स्टेशन से मैं सीधा अपने स्टूडियो ही गया ।

कमरा खोलते ही सामने लगे कैलेन्डर के एक पुराने महीने की किसी एक तारीख पर मेरे हाथ से बने गोले के अन्दर ’जिज्जी’ लिखा देखकर मुझे ध्यान आया उनका आपरेशन हो चुका होगा ।

मगर अभी मैं थोड़ा आराम करना चाहता था । देहली से लाई कीमती सिगरेट के जायके का लुत्फ उठाना चाहता था ।

निर्विघ्न ।

’ठक-’ मेरी तीसरी सिगरेट पर मेरे दरवाजे पर दस्तक हुई ।

’ठक...ठक...’

’आइए,’ दरवाजे पर मेरे मित्र की पत्नी रहीं ।

’कैसे कहूँ ?’ अपनी किशोर बेटियों की तरह बात करते समय अपना नाक सिकोड़ने की उन्हें आदत रही, ’अच्छा ठीक है । पहले तो आपको बधाई ही दे दूँ । पिछले दिनों की कई अखबारों में आप की पेंटिंग्ज की समीखाएं देखने को मिलीं....बहुत अच्छा लगा....’

’जी हाँ,’ मैं हँसा, ’इक्कीस में से मेरी अठारह पेंटिंग्ज तो बिक ही गई हैं....और वे भी अच्छी कीमत पर ।’

’अब दूसरी बात पर आती हूँ’, वे गम्भीर हो गईं, ’आपको शायद मालूम नहीं आपकी बहन बहुत बुरी किस्मत लेकर आई रहीं...’

’कैसे ?’ मैं काँपने लगा ।

’आप एकदम कुछ नहीं जानते क्या ? आपके पिता आपको ढूँढ़ते हुए तीन बार यहाँ आए । पहली बार वे आपकी बहन के आपरेशन के परचे के साथ आए । फिर दूसरी बार उनकी मृत्यु की सूचना के साथ और फिर तीसरी बार किसी मकान के ऋणपत्र के साथ....’

’हँ...हँ...’ मेरा गला सूखने लगा ।

’आप कलाकार लोग भी अजीब मिट्टी के बने होते हैं । आप देहली जा रहे हैं यह तो आप बताकर गए लेकिन आप देहली में कहाँ मिलेंगे यह आपने बताया ही नहीं...’

’ऊँह,’ मैंने आह भरी ।

’मैं आपको फिर बाद में मिलती हूँ ।’

’ठीक है, धन्यवाद,’ दरवाजे की सिटकिनी चढ़ाते समय सहसा मेरी ।रूलाई छूट गई ।

जिज्जी ।

बेचारी जिज्जी ।

मेरी प्यारी जिज्जी ।

अट्ठाइस साल क्या किसी के मरने की उम्र है ?

लपक कर अपने पुराने सामान से मैं वे कापियाँ खोजने लगा जिनमें मैंने अपने बचपन और कैशोर की जिज्जी दर्ज कर रखी थी । मृदुल और चंचल । हँसमुख और तन्दुरूस्त ।

कब और कैसे और क्यों जिज्जी का लवण शोरे के तेजाब की मानिन्द खारा हो गया था और जिज्जी की मिठास कास्टिक सोडे की मानिन्द खट्टी ?

कब और कैसे और क्यों जिज्जी के दिल के कपाट उनके रिसते लहू को सम्भालने में असमर्थ रहे थे ?

कारण क्या माँ की कैन्सर से मृत्यु रही ? बाबूजी का बिगड़ता स्वास्थ्य रहा ? अथवा मेरा यह नया ठिकाना ?

या फिर जिज्जी को दई लग गई ?

दई की दंड-संहिता ?

असमय और अकारण !

यादृच्छिक, मगर अनर्जित !!

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