Gunehgaar - 1 in Hindi Love Stories by किशनलाल शर्मा books and stories PDF | गुनहगार (पार्ट 1)

गुनहगार (पार्ट 1)

अंततः माया मर गयी।उसकी लाश दो दिन तक अस्पताल में लावारिस पड़ी रही। लेकिन उसे लेने के लिए कोई नही आया।आखिर अस्पताल वालों को ही उसके क्रियाकर्म की व्यस्था करनी पड़ी।
माया अनाथ नही थी।उसके माता पिता,पति और बच्चे भी थे।फिर भी आ अंतिम समय मे कोई उसके पास नही था।उसकी मौत अस्पताल में लावारिस की तरह हुई थी।जिसके लिए कोई और नही वह स्वंय ही जिम्मेदार थी।
माया का जन्म एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था।माया के पिता रामलाल टीचर थे।माँ कलावंती ज्यादा पढ़ी लिखी नही थी।परंतु समझदार औरत थी।वह शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह समझती थी।वह जानती थी कि शिक्षा औरत को गुणी ही नही बनाती वरन उसका सर्वागीण विकास भी करती है।इसलिए उसने अपनी बेटी माया को हमेशा पढ़ने के लिए प्रेरित किया था।यह मां की प्रेरणा का ही असर था कि रामलाल के खानदान में एम ए तक शिक्षा प्राप्त करने वाली माया पहली लड़की थी।
माया की पढ़ाई पूरी होते ही रामलाल ने अपनी बेटी के लिए वर की तलाश शुरू कर दी।कुछ प्रयासों के बाद उन्हें सु धीर मिल गया था।
रामलाल ने अपनी बेटी माया की शादी सुधीर से कर दी।बेटी को विदा करते समय कलावती ने बेटी को समझाया था,"पति को अपना सर्वस्व समझना और पति की खुशी में ही अपनी खुशी समझना।
माया,सुधीर की पत्नी बनकर मुम्बई आ गयी।सुधीर के माता पिता एक दुर्घटना में पहले ही गुज़र गए थे।भाई बहन थे नही।इसलिय वह घर मे अकेला था।माया के साथ वह आने घर पहुंचकर बोला,"आज से इस घर की मालकिन तुम हो।"
हर कुंवारी1 लड़की के न जाने कितने रंग बिरंगे सपने होते है।अरमान होते है।खवाहिश होती है।माया ने भी सपना देखा था कि उसे कोई डॉक्टर,इंजीनियर या बड़ा अफसर पति रूप में मिले।जो उसे प्यार करे।उसके रंग रूप पर फिदा रहे।उसका ख्याल रखे।उसे घुमाए और नए नए उपहार लाये।
जब उसकी कोई नवब्याहता सहेली अपनी जिंदगी के किस्से चटकारे लेकर सुनाती तब उसके दिल मे भी हसीन ख्वाब मचलने लगते।माया की कुछ सहेलियां डॉक्टर,इंजीनियर या अफसरों को ब्याही थी।वे जब भी माया से मिलती तो अपने वैवाहिक जीवन के किस्से बढ़ा चढ़ाकर सुनाती।सहलियो के किस्से सुन सुनकर माया ने भी अपने दिल मे एक धारणा बना ली थी।उसने सोचा था।उसका पति केवल उसका होकर रहेगा।जैसा वह कहेगी वैसा ही वह करेगा।लेकिन ऐसा नही हुआ।
सुधीर का मुम्बई के भिंडी बाज़ार में रेस्ट्रॉन्ट था।वह रोज सुबह घर से जल्दी निकलता और रात को देर से घर लौटता। पति के चले जाने के बाद वह घर मे बिल्कुल अकेली रह जाती।माया चाहती थी उसका पति कभी उसके लिए भी समय निकालें।सुधीर के पास पत्नी को देने के लिए सब कुछ था लेकिन समय नही था।माया ने पति को आकर्षित करने के लिए अपनी सुंदरता का सहारा लिया।उसे अपनी अदाओं से रिझाने का प्रयास किया।लेकिन सुधीर ने कभी भी पत्नी के रूप यौवन की प्रशंसा नही की।
जब पति पर उसके रूप का जादू नही चला तब एक दिन माया पति का रास्ता रोककर खड़ी हो गयी।वह इठलाकर पति से बोली,"आज मत जाओ।'
",क्यो?"सुधीर पत्नी की बात सुनकर बोला।
"अकेले मन नही लगता।दिन भर पड़े पड़े बोर हो जाती हूँ।"

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