Nakshatra of Kailash - 4 in Hindi Travel stories by Madhavi Marathe books and stories PDF | नक्षत्र कैलाश के - 4

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नक्षत्र कैलाश के - 4

                                                                                                  4.

ओम नमः शिवाय की गुंजती हुई जयजयकार से 10.30 बजे गाडीयाँ छूट गई। हर यात्री जैसे अपने रिश्ते के बंधन से अब बाहर आने की कोशिश कर, वास्तविकता में आना चाह रहा था। विदाई में हिल रहे हाथों के साथ मन भी दोलायमान हो रहा थे, लेकिन धीरे धीरे वह दुनिया पिछे छुटती गई। दृश्य के कमी के कारण उसकी तीव्रता भी कम होती गई। इस बॅच में हम 38 लोग थे। सफर तो चालू हो गया अंत भला होने वाला हैं या नही यह ताश का पत्ता ईश्वर के हाथ में था। जो नीचे डालने के बाद ही पता चलने वाला था। सिर्फ खेल का आनन्द लेना यह हमारे हाथ में था।
एक दो घंटे बीत गये होंगे। अभी दिल्ली से दूर निकल चूके थे। सिमेंट के जंगल और मानवी शोरगूल थोडा पिछे छूट गया। अब हरियाली और वृक्ष साथ देने लगे। बीच में एक जगह बस रूक गई। वहाँ सब उतरते ही गर्म चाय और अपनापन भरे हास्य से हमारा स्वागत किया गया। ओम नमः शिवाय के ज़ागर ने सबको एक धागे में बाँध रखा था। वहाँ कैलाश यात्री को आदरभाव से देखा जाता हैं। चाय पीकर थोडा टहेलने के बाद सब बस में बैठ गये।
काठगोदाम, हल्दानी, कसौनी ऐसा सफर करते करते हम लोग बागेश्वर पहुँचने वाले थे। दिल्ली से काठगोदाम यह सफर, घाटीयों से गुजरते 275 कि.मी. की दूरी पर था।
अभी तक सबकी ज़ान पहचान ठीक से नही हुई थी। धीरे धीरे ग्रूप तैयार होने लगे, नाविन्यतापूर्ण से भरी चाह सबको अच्छी लगती हैं। नई मित्रता, निसर्ग का नया रूप इससे सब प्रभावित हो गये। सफर का मज़ा लेने का प्रभावी तरीका मतलब गाना। सबने एक साथ इस लिए रज़ामंदी दी। गानों के सुरों के साथ अब बस दौड़ने लगी। भजन के रंग में मन भीगने लगे। तालियों की गुँज में, बेसुरे भी सूर पकड़ने लगे। गाना गाते गाते खिड़की से दिख रही झाँकियों का आनन्द लेना भी चालू था। किसी ने नमकिन की बॅग निकाली और पूरे बस में वह घूमने लगी, उसका आस्वाद लेते लेते सफर आगे बढने लगा। दिल्ली से निकलने में देर होने के कारण बिना कही रूके गाडी काठगोदाम पहूँच गई।

काठगोदाम में कुमाउँ विकास निगम के गेस्ट हाऊस पर भोजन व्यवस्था की गई थी। सब धीरे धीरे उतर गये। यहाँ तक आते हिमालय का दुर से ही आभास होने लगता हैं लेकिन काठगोदाम से, हिमालयीन शिवालीक रेंज चालू हो ज़ाती हैं। इस पर्वत श्रेणी से भारतीय पठार और हिमालय एक दुसरे से जुड़ गये हैं। इस पठार के कारण, नानाविध वृक्षलताओंने अपना संसार यहाँ बसाया हैं। हरेभरे रंगों से आप्लवित हिमालय, यहाँ से दृष्टीगोचर होता हैं। इस पर्वत श्रेणी के पहाड़ लगभग 3000 फीट की उँचाई तक हैं। अभी बाल्यावस्था के पहाडों का बादमें 16-17 हज़ार फीट ऊँचाई तक रूपांतरण होता हैं। यह देखने के लिए बहुत आगे जाने की जरूरत होती हैं।
हिमालय ऐसा होता हैं, यह सब सुना हुआ ज्ञान था। अब वह दृश्य रूप में सामने था। बहिरंग अवस्था होती हैं इसमें चेतन मन अपना काम करता हैं। सुना या पढा हुआ ज्ञान वह दृश्य रूप में अनुभव करता हैं। इस में व्यक्ति को आनन्द मिलता हैं लेकिन दुसरी अंतरंग अवस्था वह अनुभव से परे हैं। दृश्य के पार की अनुभूती भी अर्धचेतन मन में समा ज़ाती हैं। किसी को बताते समय अच्छा था, सुंदर था। इस शब्दप्रयोग इस्तमाल से हम वही दृश्य का वर्णन तो कर सकते हैं, लेकिन उस समय जो अनुभव किया वह सिर्फ हम महसूस कर सकते हैं बता नही सकते। बहुत सारी बाते कभी कभी बाद में याद आती हैं वह अर्धचेतन मन ने ग्रहण की हुई होती हैं। तब हमें इसका ज्ञान नही होता हैं की यह भी हमने देखा हैं। अर्धचेतन मन में सब घटनाएँ रेकॉर्ड हो ज़ाती हैं। बहिरंग मन सिर्फ हमे चाहिए वही बाते याद करते हुए उसका फल पाता हैं और बाकी बाते अचेतन मन में समा ज़ाती हैं। एक संस्कार बन ज़ाती हैं इसलिए जब ध्यान में बैठते हैं तो यह संस्कार बाहर आने लगते हैं। जितने यह बह ज़ाए उतना अच्छा हैं। ध्यान में बैठते ही बहुत विचार आने लगते हैं और इसी बात की तकलीफ होने लगती हैं और व्यक्ति ध्यान करना छोड़ देता हैं। किसी के आवाज से मेरी तंद्रा भंग हो गई।

ज्योस्त्ना की आवाज से मैं वास्तविकता में आ गई और उसके पास पहूँची। मनोहारी बगीचे का दर्शन उस गेस्ट हाऊस के सामने था। जहाँ हम खाना खाने के लिए बैठे थे वहाँ से भी वह नज़ारा बहुतही सुंदर दिख रहा था। गर्म फुलके, चावल और दाल, सब्जी खाते हुए स्वादिष्ट भोजन अच्छा लगा या भूख के कारण अच्छा लगा यह पता नही। क्योंकी भुख सच में क्या होती हैं वह हम जैसे लोग समझ ही नही सकते इसलिए भोजन के असली स्वाद के हम अधिकारी नही हैं। खाना खाने के बाद अब नींद आने लगी, लेकिन यहाँ से थोडी देर में निकलना था। काठगोदाम से बागेश्वर यह पुरा सफर घाटीयों से गुजरते हुए जाता हैं, इसलिए दो अलग अलग मिनी बस का इंतज़ाम किया था। यहाँ पर सामान का उतारना चढाना हो गया। दो बस के कारण फिरसे दो ग्रूप हो गये। उसमें भी प्रांत, जवान, बूढे, ऐसा विभाजन भी हो गया। हमारे समन्वयक की बहन मेरे ही उम्र की थी तो हम लोग, साथ में बैठ गए। काठगोदाम से बागेश्वर 182 कि.मी. का सफर था।
अब गाडी में गपशप लगाने का माहोल बन गया था। सब अपने अपने सफर के अनुभव एक दुसरे के साथ बाँटने लगे।
खिड़की से बाहर नजर गई और देखा तो एक तरफ पहाड़ और दुसरी तरफ घाटीयों का मनोहर दृश्य चालू हो गया था। ऊँची उँची वृक्षाच्छादित हरी भरी वनराई। वृक्षों की जडों के रास्ते से निकली हुई गाडी, मोड़ लेते लेते उसी वृक्षों के उपर वाले हिस्से को भी पार कर गई। पहाडों का वह अचल धीरोदात्त अस्तित्व और मानवी क्षणभंगुरता का आभास दिखानेवाली घाटी, इनके साक्षी भाव से सिर्फ अपनी मंजिल की तरफ आगे बढो ऐसा संकेत देनेवाले क्षितिज की तरफ हम ज़ा रहे थे।

हिमालय की पर्वत श्रृंखला सबसे बडी हैं, फिर भी सह्याद्री और अरवली पर्वत श्रृंखला की तुलना से यह अभी नयी हैं। पृथ्वी की उत्पत्ती काल के बाद हिमालय की जगह वहाँ पर एक महासागर था। उसके चारों और विशाल भूखंड़ की रचना थी। भुमध्य सागर उस महासागर का अवशिष्ट भाग हुआ करता था। दोनो भूखंड़ से मिट्टी और कचरा टेथिस सागर में बहकर आने के कारण लक्षावधी सालों के बाद सागर के तल में  जमा हुए मिट्टी के स्तर बनते गये। एक दुसरे के उपर जमा होते हुए स्तर के अभेद्य खड़क बनते गये। कालांतरण में यह पर्वतराजी उपर आ गई और उससे बन गये भव्य हिमालय और तिबेटियन पठार। जैसे जैसे हम उँचाई पर ज़ाते हैं, वैसे वैसे वहाँ समुद्री जीवों और वनस्पतीयों के जीवाश्म देखने मिलते हैं। कॅल्शियम भारी मात्रा में वहाँ पर मौजूद हैं।
गाडीयाँ अपने गती से चल रही थी। कुछ देर बाद दूर से एक सरोवर की छाया दिखने लगी। मन तो कब का वहाँ पर पहूँच गया। मन का रूपहरी धागा अपने शरीर से जुडा रहता हैं, इसिलिए वह जिस जगत में जाता हैं उसे हम कल्पना से महसूस कर सकते हैं इसी कारण भगवान से भी हम जूडे रह सकते हैं। गाडी सरोवर के सामने पहूँच गई। इस सफर का यह पहला सरोवर दर्शन था। उसे देख के सब की चित्तवृत्ती उल्हासित हो गई। किसी ने बताया यह भीमताल सरोवर हैं। पौराणिक पार्श्वभुमी के उपर महाभारत कालीन पांडूपूत्र भीम के कथानक से जोड़ते हुए इस सरोवर का भीमताल नामकरण हुआ। पर्वत राजीं से घेरे हुए वनराई में यह सरोवर नीलवर्ण में चमक रहा था। उसे छायाचित्रण की सहाय्यता से यादों की दुनिया में बंदिस्त कर दिया और हम लोग आगे निकल गए।

गाडी मोड़ लेते लेते आगे ज़ा रही थी। रास्ते में दिख रहे सुचिपर्णी वृक्षों के साथ बस बागेश्वर पहूँच गई। वहाँ पर भगवान शिवजी का मंदिर था। मंदिर के पास बहुत बडी हनूमानजी की मूर्ति थी। इतना बडा हनूमानजी, की उसके पैरो तले ही हम पहूँच पाते हैं। भगवान के महानता के साथ वह मूर्ति तैयार करनेवाले के महानता को भी प्रणाम किया।
सायंकालीन प्रभा पूरे वातावरण में फैली हुई थी। शरयू गोमती नदियों का संगम यहाँ पर होता हैं। बडी प्रसन्न लहरे हवाओं में बिखरी हुई थी। कलकल बहते नदी के पानी से एक मधूर ध्वनी उत्पन्न होते हुए भी उसमें शांति थी। पानी में पैर रखते ही एक अतीव मुलायम स्पर्श से काया रोमांचित हो गई। व्यक्ति जितना नैसर्गिक क्षमताओंका अनुभव करता हैं उतना सांसारिक कष्टसे दूर रहता हैं।
(क्रमशः)