Ishq a Bismil - 2 in Hindi Fiction Stories by Tasneem Kauser books and stories PDF | इश्क़ ए बिस्मिल - 2

इश्क़ ए बिस्मिल - 2

बहुत मसरूफ़ हूं मैं,

जाने किस इल्हाम में हूं?

मुझे ख़बर ही नहीं,

के मैं किस मक़ाम पे हूं,

वह नाश्ता कर रहा था जब अज़ीन कालेज के लिए तैयार हो कर नाश्ता करने डाइनिंग रूम में दाखिल हो रही थी, मगर आधी दूरी पर ही उसके कदम ठहर गए थे। हदीद की पीठ उसकी तरफ़ थी और वह अपने आस पास से बेगाना उसकी पीठ को एक टुक तके जा रही थी, उसे होश तब आया जब आसिफ़ा बेगम की नागवार आवाज़ उसकी कानों तक पहुंची “तुम वहां खड़ी क्या तक रही हो? अगर नाश्ता नहीं करना है तो कालेज जाओ”

मां की आवाज़ पर हदीद ने अपने पीछे मुड़कर देखा था और कुछ लम्हें सरके थे मगर उसे एहसास नहीं हुआ था। अज़ीन ने बेबी पिंक कलर की कुर्ती के साथ सफ़ेद रंग की सलवार और सफ़ेद रंग का ही दुपट्टा लिया हुआ था। वह अज़ीन ही थी मगर वैसी नहीं जैसा वह ६ साल पहले छोड़ कर गया था और ना वैसी जैसा उसने ४ साल पहले देखा था। बड़ी बड़ी आंखें घबराहट के मारे फटी हुई थी, मर्मरी सा नाज़ुक हाथ सख़्ती से हैंडबैग को थामे हुए था, वह मुजरिमों की तरह अपनी चोरी पकड़े जाने पर शर्मिन्दा थी और अब आसिफ़ा बेगम के सामने हदीद को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी यह जानते हुए भी, कि वह इतनी देर से उसे ही देख रहा है।

“अज़ीन तुमने हदीद को सलाम किया?” अरीज ने बात का रुख बदल दिया था जो आसिफ़ा बेगम को बिल्कुल पसंद नहीं आया था।

” अस्सलामोअल्यकुम” नज़र मिली थी मगर ठहर ना सकी थी। अज़ीन के पूरे जिस्म में जैसे दिल ने शोर माचाया था। हर जगह धक-धक महसूस हो रहा था, वह बेइंतहा नर्वस हो रही थी, कैसे ना होती, वह उसे ही देख रहा था, और अज़ीन चाह कर भी उसे देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। छह फ़ीट लम्बा कद, खड़ी नाक, गहरी काली आंखें, काले घने बाल, गुलाबी रंगत, यूं मिल मीलाकर वह बेहद ख़ूबसूरत था। ब्लू जींस के साथ उसने व्हाइट कलर की टी-शर्ट पहन रखी थी।

“वालेकुम अस्सलाम” जवाब दिया था और नज़रें भी डटी थी तभी आसिफ़ा बेगम ने नज़रों कि डोर को काटा था।

“हदीद यह परांठे तो तुम ने खाएं ही नहीं... ठन्डी हो चुकी है” वह आलरेडी दो परांठे का चुका था, लेकिन आसिफ़ा बेगम को बहाना चाहिए था उन दोनों का ध्यान बंटाने को।

अज़ीन हदीद से दो कुर्सी छोड़कर बैठी थी, फिर भी आसिफ़ा बेगम को अच्छा नहीं लगा था, और गजब तो तब हुआ था जब हदीद ने उससे बात कि शुरुआत की थी। बस यूं ही हल्की-फुल्की बातें, कोई पुरानी यादें या किस्सा नहीं छेड़ा था। उसके हल्के-फुल्के रवैय्ये ने अज़ीन को खासा रिलैक्स किया था वरना वह आसिफा बेगम के टोकने की वजह से काफी शर्मिंदा हुई थी।

टेबल पर सिर्फ वह चारों ही मौजूद थे। उमैर ऑफिस जा चुका था, सोनिया सो रही थी और दामाद बाबू अपने घर जा चुके थे। आसिफा बेगम का नाश्ता हो गया था मगर वह टेबल छोड़ने को तैयार नहीं थी उन्हें अपनी पूरी नज़र हदीद और अज़ीन पर रखनी थी, और वह रख भी रही थी, उन दोनों के बातों के दरमियान कभी टोक देतीं तो कभी नौकरों को ज़ोर से आवाजें देने लगती ताकि दोनों के दरमियान बातों में ख़लल पहुंच सके। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वह और क्या करें, अपनी गुस्से और परेशानी में वह कभी अज़ीन को खा जाने वाली नज़रों से देखती तो कभी अरीज को।

जब अज़ीन नाश्ता करके कॉलेज के लिए निकल गई तब उन्हें थोड़ा इत्मीनान हुआ था।

नाश्ता करके हदीद भी कहीं बाहर जाना चाहता था मगर आसिफ़ा बेगम ने कुछ ज़रूरी बातें करने के लिए उसे रोक लिया और अपने कमरे में ले आई।

"मैंने तुम्हें पहले ही फ़ोन पर सब कुछ बता दिया था फिर भी तुम ने उससे बातें करनी शुरू कर दी?" आसिफ़ा बेगम झुंझलाई हुई थीं।

"तब मैं और क्या करता? वह मेरे सामने बैठी थी, इतने सालों के बाद हम मिले थे, मैं उसे कैसे नज़र अंदाज़ कर सकता था। इस तरह किसी को नज़र अंदाज़ करना अच्छा नहीं लगता मोम।" हदीद ने सफ़ाई देनी चाही।

"एक बात बताओ? इतने सालों के बाद वापसी किसकी हुई है? उसकी या तुम्हारी? रस्मन तो उसे तुमसे मिलना चाहिए था तुम्हारा हाल पुछना चाहिए था, मगर सच यह है कि कल से वह तुम्हें नज़र अंदाज़ कर रही है।" हदीद को मां की बात सही लगी थी मगर वह क्या बोलता, वह उनकी हां में हां मिलाकर इस छोटी सी बात को बढ़ावा नहीं देना चाहता था।

"कोई बात नहीं, आप माइन्ड मत किजिए.... मैंने भी माइन्ड नहीं किया है"। वह बात यहीं पर ख़त्म करना चाह रहा था।

"कैसे न माइन्ड करुं ? उसे चाहिए था कि वह हमारे साथ तुम्हें रिसीव करने एयरपोर्ट जाती मगर उसने अपने दोस्तों के साथ आवारा गर्दी करना ज़्यादा मुनासिब समझा। हदीद उस से बच कर रहना, वह लड़की बिल्कुल वैसी नहीं रही जैसी तुम्हारे कैलिफोर्निया जाने से पहले हुआ करती थी, आये दिन उसका अफ़ैर किसी न किसी लड़के के साथ चलता रहता है, घर में किसी की नहीं सुनती, जब, जाहां पाती है चली जाती है। और झूठ तो इतना बोलती है क्या बताऊं, बहन को कुछ समझती नहीं है अरीज की रोक-टोक उसे ज़हर लगती है, सब उमैर की ढील का नतीजा है, सर पर चढ़ा रखा है अपनी साली को, हमारे घर में रहती हैं, कल को अगर कुछ हो गया तो हमारी ही इज़्ज़त जाएगी, लेकिन उमैर को कुछ समझ नहीं आता, कैसी पट्टी लगी है आंखों पर, बीवी और साली की मुहब्बत का।"

एक अजीब सी लहर हदीद के तन- बदन से होकर गुजरी थी, कैसा एहसास था वो?.... कोई अफ़सोस?..... या कोई गिला?.... जो भी था आसिफ़ा बेगम की बातों ने उसे चुप करा दिया था। उसने एक गहरी सांस ली थी और कमरे से निकल गया था।

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इश्क को हल्के में ना लो साहेब,

यह ख़्वाब दिखा कर निंद उड़ा लेती है।

एक ख़ुबसूरत सी मुस्कान उसके ख़ूबसूरत होंठों को और ख़ूबसूरत बना रही थी। एक अलग से एहसास में वह ख़ुद को घिरा हुआ महसूस कर रही थी। कल तक वह जितनी बेचैन थी आज उतनी ही पुरसुकून थी।

"मुझे तुम्हारी इतनी ज़्यादा ख़ुशी की वजह समझ नहीं आ रही है अज़ीन? उसने तुमसे ऐसा क्या कह दिया है? ना उसने यह कहा के वह तुम्हें बहुत मिस करता था, ना ही ये कहा कि इतने सालों के बाद मिले हैं तो चलो कहीं बाहर चलते हैं ढेर सारी बातें करनी हैं तुम से।" नेहा का गुस्सा आख़िरकार उबल पड़ा था। अज़ीन जब से कौलेज आई थी इसी कैफ़ियत में घिरी हुई थीं जैसे उसके उपर फुलों की बारिश हो रही हो, कोई ख़ुबसूरत धुन उसके कानों में रस घोल रहें हों, जैसे सर्दी की नर्म धूप उसके नाज़ुक वजूद को सहला रही हो, सारा समा गुलाबी गुलाबी हो रहा हो। जबकि हक़ीक़त में ऐसा कुछ नहीं था। कुछ था तो बस वह थी और उसके ख़्याल थें

"अरे! कैसे कुछ नहीं कहा उसने? इतनी सारी बातें तो की उसने मुझसे" अज़ीन न वज़ाहत पेश की।

"हां बहुत बड़ा एहसान कर दिया उसने तुम पर और तुम ने मुझ पर जो यह बकवास मुझे सुनाई। मेरे कान तरस गये थे कि मैं कुछ अच्छा सुनूं और तुम ने क्या सुनाया मुझे? ....कैसी हो अज़ीन?.... पढ़ाई कैसी चल रही है तुम्हारी?..... अच्छा economics... great!.... तो आगे क्या सोचा है तुमने?..... फिर लम्बी ख़ामोशी.... यह भी कोई बात हुई भला, atleast तुम्हारे इतने ज़्यादा ख़ुश होने वाली तो कोई बात नहीं थी मगर तुम ना जाने किस हवा में उड़ रही हो? नेहा ने अपने दिल का सारा ग़ुबार बाहर निकाला था।

"तुम नहीं समझोगी नेहा.... मुहब्बत ख़्वाब दिखा कर निंद उड़ा देती .... अब जिसकी निंद ही उड़ गई हो वह ख़ुद कैसे ना उड़े।" अज़ीन ने एक अदा से कहा था और फिर ख़ुद ही हंसने लगी थी।

उसकी आवाज़ की खनक ने किसी के दिल के तारों को छेड़े थे जो कैंटीन में अज़ीन और नेहा की टेबल से दूर बैठा हुआ था और कब से अज़ीन को देखे जा रहा था। भले ही उन दोनों की बातें उसके कानों तक नहीं पहुंच पा रही थी, मगर वह अज़ीन को बड़ी आसानी से देख सकता था और वह देख भी रहा था।

यह साहिर हसन की रोज़ की ड्यूटी थी, अज़ीन के आस-पास भटकना, उसे घंटों बिना थके तके जाना। दुसरी तरफ़ अज़ीन थी जो उसे घास तक नहीं डालती थी। जब भी अज़ीन की नज़रें उस पर पड़ती, उसे ख़ुद को ताकते हुए पाती, उसकी इस हरकत पर कभी उसे बेइंतहा गुस्सा आता तो कभी उस पर तरस आता। वह बेशक बहुत हैन्डसम था, कालेज की अक्सर लड़कियां उस पर फ़िदा थी मगर अज़ीन ने उस में कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी, उसके दिल के सिंहासन पर तो हदीद जाने कब से बिराजमान था।

साहिर हसन अज़ीन का क्लास फ़ेल्लो था, वह अज़ीन और नेहा तीनों ही एम.बी.ए. के स्टूडेंट्स थे। अज़ीन से मुहब्बत उसे पहली ही नज़र में हुई थी और उसने इज़हारे मुहब्बत में बिल्कुल भी देर नहीं की थी मगर अज़ीन ने इनकार करने में उस से भी ज़्यादा जल्दी दिखाई थी। अज़ीन की ना सुनने के बाद भी वह पीछे नहीं हटा था,वह करता भी क्या, आख़िर वह अपने दिल के हाथों मजबूर जो था।