Ishq a Bismil - 10 in Hindi Fiction Stories by Tasneem Kauser books and stories PDF | इश्क़ ए बिस्मिल - 10

इश्क़ ए बिस्मिल - 10

उदासी मेरे दिल में आ,

देख यहां है क्या क्या बसा,

कुछ किरचियां हैं उम्मीदों की,

कुछ यादें हैं तस्वीरों सी,

यहां सुकून का गुज़र तक नहीं,

मुझे तोड़ने वाले को ख़बर तक नहीं,

उदासी मेरे दिल में आ

देख यहां है क्या क्या बसा।।

ब्लू सूट में वह ग़ज़ब का डैशिंग लग रहा था। पूरी महफ़िल में सबसे नुमाया दिख रहा था। उसके साथ खड़ी वह लड़की जो अपने पहनावे से काफ़ी मोडर्न लग रही थी उसपर जैसे बिछी जा रही थी और वह भी उसे ख़ूब लिफ़्ट करा रहा था।

अज़ीन उसके पास पहुंची थी। मगर वह बहुत मग्न दिखाई दे रहा था। वह उसके बिल्कुल सामने खड़ी थी, ऐसा कैसे हो सकता था के उसे दिखाई ना दे रही हो। इसका साफ़ मतलब था कि वह उसे इग्नोर कर रहा था। अज़ीन के दिल में एक टीस सी उठी थी। वह उस लड़की के साथ कुछ ज़्यादा ही घुल-मिल रहा था जैसे बरसों की पहचान हो। अज़ीन ने अपने जज़्बात को सम्भालते हुए कहा था "एक्सक्यूज़ मी! हदीद मुझे तुम से एक ज़रूरी बात करनी है।"

हदीद ने उसे कुछ नागवार नज़रों से देखा था, जैसे वह कोई ज़रूरी काम कर रहा था और अज़ीन ने उसके काम में ख़लल मचा दी हो।

"बोलो"। उसे कुछ लम्हें घूरने के बाद उसने कहा था।

"ऐसे नहीं, मेरा मतलब है थोड़ा अकेले में"। उसने थोड़ा हिचकिचा कर कहा था। हदीद के साथ खड़ी वह लड़की उसे नागवार नज़रों से देख रही थी।

"ना तुम कहीं जा रही हो, ना मैं। पार्टी ख़त्म हो जाने के बाद भी हम दोनों इसी घर में होंगे, तो जो भी कहना है बाद में कह लेना।" उसने अज़ीन से थोड़ा झिड़कते हुए कहा था। अज़ीन के दिल में जैसे घूंसा पड़ा था। वह उसका मुंह देखती रह गई थी। दुसरी तरफ़ हदीद ने उसे गुस्से में सब के सामने झिड़क तो दिया था मगर ख़ुद शर्मिंदा भी हो रहा था। उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए था इसका एहसास उसे कुछ लम्हों में ही हो गया था। मगर अब कर भी क्या सकता था कमान से निकला तीर और मुंह से निकली बात कभी वापस नहीं ली जाती। अलबत्ता वह sorry कह सकता था मगर वह यह कहना नहीं चाहता था। वह अगर कुछ कर सकता था तो बस इतना कि वहां से हट जाता और उसने बस यही किया था। अज़ीन वहां बुत बनी खड़ी रह गई थी। जाने कितनी देर वह वैसी ही खड़ी रही थी। फिर एहसास होने पर खुद को जैसे जबरन घसीटते हुए वह अपने कमरे में आई थी।

आइने के सामने खड़े हो कर उसने खुद को देखा था।

"बहुत ख़ुबसूरत लग रही हो तुम। तुम्हें पता होगा फिर भी मैं बता देता हूं। ख़ुबसूरती की तारीफ़ करना ख़ुबसूरती को बढ़ावा देने जैसा होता है। और मैं मानता हूं हर ख़ुबसूरत चीज़ की बढ़ चढ़ कर तारीफ़ करनी चाहिए ताकि वह और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत हो जाए।" किसी की कहीं हुई बात उसे याद आई थी। उसने नफ़रत से पागलों की तरह अपनी एक एक सजावट को ख़ुद से नोच कर फेंका था फिर रोते हुए अपने बेड पर ढेर हो गई थी। वह काफ़ी exhaust feel कर रही थी। काफ़ी देर यूंही बेड पर पड़ी रही थी। नीचे चल रही पार्टी की हलचल धीरे धीरे कम होते-होते अब बिल्कुल ख़त्म हो गई थी। उसकी नज़र टिक-टिक करती घड़ी के कांटों पर जमी हुई थी। रात के देढ़ बज रहे थे। वह लेटी लेटी भी अब थक चुकी थी, उसे घुटन सी महसूस हो रही थी जबहि वह उठी थी और चहलकदमी के इरादे से निचे लाॅन में निकल आई थी।

अचानक से उसके कानों में कहीं से क़हक़हों की आवाजें आई थी। रात के सन्नाटे में आवाजें गूंज रही थी। वह उनका पिछा करते करते घर के पीछे वाले हिस्से में पहुंच गई थी। वहां हदीद के साथ उसके कुछ पुराने स्कूल के दोस्त थे, जिन्हें वह भी बड़े अच्छे से जानती थी क्योंकि वह और हदीद दोनों एक ही स्कूल में पढ़ें थे। साहिर ने आते ही उसे ऐसा परेशान किया था कि उसने ज़्यादा ध्यान ही नहीं दिया था के पार्टी में कौन कौन शामिल हुए थे। वह उन सब से अभी मिलना चाहती थी लेकिन हदीद के आज के रवैए से काफ़ी डर गई थी के कहीं वह बुरा ना मान जाए। वह उनसे दूर दीवार से लग कर खड़ी थी और उससे थोड़ी दूरी पर एक घना सायादार दरख़्त भी था जिसकी वजह से उसे हदीद या उसके कोई दोस्त देख नहीं सकते थे।

वह इसी कशमकश में खड़ी थी के वह आगे बढ़े या वापस पीछे मुड़ जाऐ जबहि अंश ने हदीद से कहा था " वह लड़की तेरे साथ कौन थी जिसकी वजह से तू हमें भूल गया था?"

"अब इतना झूठ भी मत बोलो यार के मैंने तूम लोगों को वक़्त ही नहीं दिया।" हदीद ने आंखें बड़ी करके हंसते हुए कहा था।

"हां, बहुत ज़्यादा दिया था तब ही तो हम सारे पागल रात गए तक यहां बैठे हैं क्योंकि उस लड़की के वजह से हमारी ज़्यादा बात ही ना हो सकी थी।" जुनैद ने भी तानें दिए थे।

"वैसे कौन थी वोह?" अंश की सूई वहीं अटकी हुई थी।

"है एक मोम कि दोस्त की बेटी, अलीना नाम है उसका।" हदीद ने एक लम्बी सांस खींचते हुए कहा। "मैं जब कैलिफोर्निया में था तब से मोम चाह रहीं थीं की मैं उस से बातें कर लूं, atleast video call में ही उसे देख लूं, मगर मैं उनकी बातें टालता रहा मगर आज उससे और उसकी फ़ैमिली से मिलने के बाद मुझे लग रहा है जैसे मोम ने शायद यह पार्टी ही उन्हें इन्वाइट करने के लिए ही रखी थी।" वह कह कर हंस पड़ा था, उसकी बातों से ऐसा लग रहा था कि अलीना की उससे मुलाकात काफ़ी अच्छी रही थी।

अज़ीन सब सुन कर अब सिकते के आलम में जहां की वहीं खड़ी रह गई थी। उसके सभी दोस्त उसे ग़ौर से सुन रहे थे जैसे इस से ज़्यादा ज़रूरी दुनिया में और कोई बात ही नहीं थी। जब हदीद कह कर चुप हुआ तो अंश ने अपने पहलू बदले थे, रोहन ने एक लम्बी सांस हवा के सुपुर्द की थी, अयान ने सर हिलाया था लेकिन जुनैद से रहा नहीं गया तो उसने पूछ लिया "अगर तुम्हारी लाइफ़ में अलीना आ गई है तो फिर यह बताओ के अब अज़ीन का क्या होगा?"

"मतलब?" हदीद ने ना समझी में उस से पूछा था।

"मतलब साफ़ है, मुझे लगा था कि इस बार तुम आए हो तो तुम्हारी और अज़ीन की शादी की बिरयानी खाने को मिलेगी हमें।" उसका जुमला मज़ाक वाला था लेकिन उसके आव-भाव काफ़ी संजीदा थे।

उन सब से दूर खड़ी अज़ीन के दिल को कुछ हुआ था, बातों का रूख अब उसकी ज़ात से जुड़ चुका था।

"What?... तुम्हें ऐसा क्यों लगा?" हदीद ने जुनैद की बात पर लगभग चिल्लाते हुए पूछा था। किसी को भी उसके ऐसे रिएक्शन की उम्मीद नहीं थी। हंसता हुआ माहौल अचानक से सिरीयस हो गया था।

"तुम जिस तरह से उसके साथ स्कूल में रहते थे...." जुनैद अभी कह ही रहा था कि हदीद गुस्से में उस से पूछ बैठा।

"किस तरह उसके साथ स्कूल में रहता था? ऐसा क्या देख लिया तुमने? जो तुम्हारे दिमाग़ में यह सब चल रहा है।

"मेरा मतलब है जिस तरह तुम उसकी care करते थे। उसका इतना ख़्याल रखते थे और तो और...."।

हदीद को काफ़ी गुस्सा आ गया था फिर भी उसने खुद पर बहुत काबू किया हुआ था तभी उसने एक बार फिर से जुनैद की बातों को काटते हुए कहा था " तब और क्या करता? वह बिन मां-बाप की बच्ची हमारे घर में रह रही थी, डरी-सहमी सी हमारे घर आई थी। बाबा ने मुझे उसका ख़ास ख़्याल रखने को कहा था। घर पर भाई, भाभी, बाबा सब उसका ख़्याल रखते थे, लेकिन स्कूल में मेरे सिवा उसका ख़्याल रखने वाला कोई नहीं था। बस इतनी सी बात है, और तुमने उसे क्या रंग दे कर रख दिया है।"

अज़ीन की आंखों से बेआवाज़ मोतियां एक के बाद एक टूटते जा रहे थे।

"यार तू इतना गुस्सा क्यों हो रहा है? बस एक बात उसके दिल में आई तो उसने कह दिया।" रोहन ने उसे शांत करने की कोशिश की जबकि जुनैद चुप हो गया था, उसे हदीद से इस तरह के रवैए की उम्मीद नहीं थी।

"वैसे अगर जुनैद ने ऐसा सोच भी लिया था तो कुछ ग़लत नहीं था। एक बार किसी के भी दिल में यह ख़्याल आ सकता था और उसमें मैं भी शामिल हूं।" अंश indirectly जुनैद की वकालत में खड़ा हुआ था।

हदीद ने तेज़ नज़रों से उसे भी देखा था जिसकी अंश ने बिल्कुल भी परवाह नहीं की थी और आगे कहा था " अगर घर पर इतनी अच्छी लड़की मौजूद हो जिसके बारे में हर कुछ पता है तो फिर शादी क्यों नहीं हो सकती? उमैर भाई को देख लो बिना भाभी को देखे उन्होंने शादी कर ली थी, तुम्हें तो फिर भी बहुत मौका मिला है उसे जानने का और अक्सर ऐसा देखा भी गया है कि भाभी की बहन से शादी हुई है....।" हदीद आज किसी को भी अपनी बात पूरी करने का मौका नहीं दे रहा था, वह बीच में ही सबकी बातों को काट रहा था।

"अक्सर ऐसा होता होगा, लेकिन यहां ऐसा कोई मामला नहीं है। भाई की शादी अरीज भाभी से किन मजबूरियों में हुई थी यह तुम सब नहीं जानते लेकिन मैं इतना मजबूर नहीं हूं और ना ही मुझे कोई मजबूर कर सकता है उस से शादी पर और क्या हम दोनों भाईयों ने ही ठेका ले रखा है उन पर एहसान और नेकीयां करने का।" गुस्से और ताव की वजह से हदीद का चेहरा और आंखें दोनों ही सुर्ख़ हो गये थे।

उसके चुप होते ही ख़ामोशी छा गई थी, उसकी बात पर अब किसी ने कुछ भी नहीं कहा था बस सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे थे। वह सब इतने सालों के बाद इक्ट्ठा हुए थे, कुछ हंसी मज़ाक करने के लिए, इस लम्हें को यादगार बनाने के लिए लेकिन एक मामूली सी बात पर बात निकलती चली गई और क्या से क्या हो गया? यह किसी ने सोचा नहीं था जुनैद ने भी नहीं और अज़ीन ने तो हर्ग़िज नहीं। उसके तो दिल पर जैसे किसी ने ताबड़तोड़ घूंसा मारा था। उसके ज़ात की तौहीन की थी। वह आसमानों पर उड़ती हुई सीधा ज़मीन पर गिरा दी गई थी और पूरा वजूद जैसे लहूलुहान हो गया था। दर्द की शिद्दत थी वह चीखें मार मारकर रोना चाहती थी मगर अफ़सोस वह रो भी नहीं सकती थी। सामने दिखाई देता मंज़र बस धुंधला हो रहा था और उसके अश्क़ उसके आरीज़ (गाल) को धो रहे थे।

माहौल काफ़ी सिरियस हो गया था हदीद का मूड सबसे ज़्यादा ख़राब हुआ था इसलिए अयान ने माहौल को हल्का-फुल्का करने के लिए सबसे कहा था " यारों इसी बात पर एक शेर अर्ज़ कर रहा हूं,सब इरशाद फ़रमाओ, किसी ने क्या खूब लिखा था के...."

अंश और रोहन ने एक साथ "इरशाद, इरशाद" कहा था। जबकि हदीद और जुनैद चुप बैठे थे।

"ये दुनिया है यहां पर तमाशा हो भी सकता है,"

"वाह, वाह" अंश और रोहन ने एक साथ कहा था।

"ये दुनिया है यहां पर तमाशा हो भी सकता है"

"अभी जो दर्द हमारा है, तुम्हारा हो भी सकता है,

ये मत समझना कि तुम मेरी आख़री मुहब्बत हो,

ये मत समझना कि तुम मेरी आख़री मुहब्बत हो,"

"वाह वाह"

"मुहब्बत जुर्म है

मुहब्बत जुर्म है

हमसे दुबारा हो भी सकता है"

"वाह वाह वाह वाह" रोहन और अंश काफ़ी जोश में दिख रहे थे तो दूसरी तरफ़ जुनैद का मूड भी हल्का-फुल्का हो गया था, और अब उसके चेहरे पर मुस्कराहट सज गई थी।

"मेरी तरफ़ से भी मुलाहिज़ा फ़रमायें"। अंश को भी एक ज़माने में शेरों शायरी का बुखार चढ़ा था, मगर अब यह बुखार फिलहाल उतर चुका था लेकिन अयान को सुनकर उसे भी कुछ शेर सुनाने का मन करने लगा।

"इरशाद इरशाद" हदीद को छोड़ कर सब ने कहा था।

"हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले," अंश को सुनकर सबको जोश आ गया था, यह उन सबका favourite शेर था, हदीद के अलावा सब उसके साथ chorus में शेर पढ़ रहे थे।

"बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले,

निकलना ख़ुल्द (जन्नत) से आदम का सुनते आए थे लेकिन,

बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।"

सब ने शेर पढ़कर ज़ोरदार क़हक़हा(हंसना) लगाया था। हदीद सिर्फ़ मुस्कुरा कर रह गया था।

"वाह मिर्ज़ा ग़ालिब वाह "! अंश ने मिर्ज़ा ग़ालिब को दाद दी थी।

तो दूर खड़ी अज़ीन के लबों ने बेआवाज़ यह लाईन दोहराई थी। वह जैसे अपने होश में नहीं थी।

"बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले"। उसके होंठ यह लाईन दोहराते जा रहे थे और वह उल्टे क़दम पीछे चलती जा रही थी। जब मंज़र नज़रों से ओझल हुआ तब उसे होश आया था। वह सीधे भागती हुई अन्दर की तरफ चली गई थी।

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