Ishq a Bismil - 5 in Hindi Fiction Stories by Tasneem Kauser books and stories PDF | इश्क़ ए बिस्मिल - 5

Featured Books
  • The Mystery of the Blue Eye's - 6

    दरवाजा एक बुजुर्ग आदमी खोलता है और अपने चौखट के सामने नौजवान...

  • पागल - भाग 40

    भाग–४० मिहिर और निशी भी जल्दी राजीव के घर पहुंच गए । सभी राज...

  • जादुई मन - 15

    जैसे जाते हुए किसी व्यक्ति की गर्दन पर नजर जमाकर भावना करना...

  • द्वारावती - 34

    34घर से जब गुल निकली तो रात्रि का अंतिम प्रहर अपने अंतकाल मे...

  • डेविल सीईओ की मोहब्बत - भाग 6

    अब आगे, आराध्या की बात सुन, जानवी के चेहरे पर एक मुस्कान आ ज...

Categories
Share

इश्क़ ए बिस्मिल - 5

वो राह मेरी मंज़िल को जाती ना थी,

तेरी रामगिरी ने मेरे क़दम उठा दिए।

"तुम ने ड्राइविंग नहीं सीखी?" हदीद ने कार स्टार्ट करते हुए उससे पूछा था।

"सीखी है, मगर आपी ने चलाने कि इजाज़त नहीं दी है।" अज़ीन को इस बात का काफ़ी मलाल था।

"ओह! भाभी अभी भी तुम्हें लेकर उतनी ही फ़िक्र मन्द रहती है?" उसने हंसकर कहा।

थोड़ी देर दोनों ख़ामोश रहे थे और यह ख़ामोशी अज़ीन को बहुत खल रही थी इसलिए उसने पूछा था।

"तुम बताओ, तुम्हारा क्या प्लान है, जाब करोगे या भाईजान के साथ बिज़नेस जोइन?"

"फ़िलहाल तो आराम करुंगा, मौज-मस्ती करुंगा, जब तक कोई काम के लिए नहीं बोलता कुछ भी नहीं करुंगा।" उसने अपने दिल की बात कही थी और अज़ीन ख़ुद को हंसने से नहीं रोक पायी थी।

"तुम्हें मज़ाक लग रहा है? अरे! मैं सीरियस हूं।" हदीद ने भी हंसकर कहा था।

"अरे यार! पूरी ज़िन्दगी तो यही करना है, इसलिए जब तक मौका मिलेगा बैठकर ऐश करुंगा, लेकिन मुझे पता है भाई मेरी यह नवाबी ज़्यादा दिनों तक बर्दाश्त नहीं करेंगें, मुझे खींच कर काम पर ले आयेंगे।" वह कह रहा था और अज़ीन उसे देखे जा रही थी, वह सब कुछ सुन कर भी जैसे वह कुछ सुन नहीं रही थी, वह उसे कहां लेकर जा रहा था, वह रास्ता उसके कालेज तक जा भी रहा था या नहीं उसे इस बात की भी परवाह नहीं थी। उसका दिल चाह रहा था यह सफ़र कभी ना ख़त्म हो, हदीद ऐसे ही बोलता जाए और वह उसे ऐसे ही देखती जाए।

यकायक हदीद ने कार एक रेस्टोरेंट के सामने रोकी थी। वह होश से बेगाना अभी भी उसी कैफियत में थी। हदीद सीट बेल्ट खोल चुका था।

"क्या हुआ? उतरना नहीं है क्या?" उसे एक ही पोज़िशन में देखकर उसके चेहरे के सामने चुटकी बजाकर हदीद ने उससे कहा। तिलिस्म (जादू) टूटा था और वह होश में आई थी।

"मुझे तो कालेज जाना था।" कार के बाहर अपने कालेज को ना पाकर उसे अचानक से ख़्याल आया था।

"हां कालेज भी चलेंगे, मगर उससे पहले कुछ खा-पी लेते हैं। मैं नाश्ता करने बैठा ही था के भाई ने उठा दिया, मुझे बहुत ज़ोरों की भूख लगी है और तुम ने भी कुछ नहीं खाया है।" वह गाड़ी से उतरते हुए उसे बता रहा था।

वह दोनों रेस्टोरेंट के अन्दर जा रहे थे और अज़ीन दिल ही दिल में ख़ुश हो रही थी। आज उसका दिन बन गया था।

हल्की-फुल्की बातों के साथ दोनों नाश्ता कर रहे थे तब ही साहिर हसन की नज़र उन दोनों पर पड़ी थी। वह अपने कुछ साथियों के साथ वहां आया हुआ था। अज़ीन को किसी दूसरे लड़के के साथ बैठा देख उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। वह अपने साथियों को छोड़कर सीधा उन दोनों के टेबल के सामने आ खड़ा हुआ था इस से पहले की हदीद और अज़ीन उसे देखते, साहिर ने एक ज़ोर दार हाथ टेबल पर मारा था, यह सब इतना अचानक से हुआ के हदीद हैरान हो गया और अज़ीन को कुछ समझ में नहीं आया के अभी जो हुआ वह क्या था।

"कौन हो तुम? यह क्या तरीका है?" उसकी हरकत पर हदीद को गुस्सा आ गया था। वह झटके से खड़ा हुआ था और साहिर की शर्ट की कॉलर पकड़ कर उस से पूछा था। बदले में साहिर ने उसके शर्ट की कॉलर पकड़ ली थी ।

दोनों एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाल कर एक दूसरे को खा जाने वाली नज़रों से देख रहे थे तब ही अज़ीन ने कहा था।

"साहिर छोड़ो उसे, क्या कर रहे हो?" अज़ीन दोनों को तैश में देखकर काफ़ी डर गई थी।

अज़ीन की बात पर हदीद के हाथ की गिरफ़्त ढीली पड़ गई थी, अज़ीन ने उस लड़के का नाम लिया था इसका मतलब था वह दोनों एक दूसरे को जानते थे। उसने साहिर का गीरेबान छोड़ दिया था और बदले में साहिर ने भी उसे छोड़ दिया था।

"क्या कर रही हो यहां? कौन है यह लड़का?" अब हदीद को नज़र अंदाज़ कर साहिर ने अज़ीन से सवाल किया था, उस की आंखों में जैसे ख़ून उतर आया था।

"तुम कौन होते हो मुझे से यह सब पूछने वाले?" अज़ीन को भी उसकी बातों से गुस्सा आ गया था।

"मैं कौन होता हूं? क्या तुम नहीं जानती हो? उसकी जुनूनी कैफ़ियत से अज़ीन को डर लग रहा था। दुसरी तरफ़ हदीद तमाशबीन की तरह तमाशा देख रहा था। उसे आसिफ़ा बेगम की बातें याद आ रही थी और वह उन सारी बातों को सच मानने पर मजबूर हो गया था। अगर अज़ीन और साहिर एक दूसरे को जानते थे, या फिर रिलेशनशिप में थे तो फिर हदीद कौन होता था साहिर को रोकने वाला। किस हक़ से वह साहिर से सवाल पूछता के वह कौन होता है अज़ीन को टोकने वाला? कि वह किसके साथ घूम फिर रही है?

और अगर अज़ीन के बदले साहिर ही हदीद से पूछ बैठता तो फिर वह क्या जवाब देता?

वह अज़ीन का क्या लगता है? उसका और अज़ीन का क्या रिश्ता था? सिर्फ़ यह की वह उसकी भाभी की बहन है और पिछले १२ सालों से उसके घर में रह रही है।

इसके अलावा और क्या रिश्ता था उन दोनों का?.... दोस्ती का? मगर ६ साल की अलहदगी में दोस्ती कहां बची थी? कैलिफोर्निया जाने के दो सालों तक थोड़ी बहुत ही बातें हुई थीं दोनों के दरमियान मगर पिछले चार सालों में तो एक बार भी नहीं। आसिफ़ा बेगम ने ऐसी-ऐसी बातें बताई थी अज़ीन के बारे में कि उसका दिल ही नहीं हुआ अज़ीन से राब्ता रखने का और दूसरी तरफ़ आसिफ़ा बेगम ने भी हदीद को सख़्ती से मना किया था अज़ीन से बात करने से।

"तुम से मोहब्बत करता हूं और हर्ग़िज़ बर्दाश्त नहीं कर सकता के तुम दूसरों के साथ घूमों फिरो।" साहिर ने अपनी उंगली उठा कर अज़ीन को जताते हुए कहा था।

यह सुनने के बाद हदीद से वहां रुका नहीं गया। उसने अपने वालेट से चंद नोटें निकल कर टेबल पर रखी थी और अज़ीन को वहीं छोड़कर तेज़ क़दमों से वहां से निकल गया था।

अज़ीन साहिर को छोड़कर हदीद को आवाजें देती उसके पीछे भागी थी, मगर वह अनसुनी करता गाड़ी लेकर वहां से चलते बना था।

अज़ीन की आंखें आंसुओ से भर गई थी, सब उसे देख रहे थे, मगर वह अपने इर्द-गिर्द से लापरवाह, अपनी हालत पर हारकर वहीं फ़र्श पर बैठ कर रोने लगी थी।

साहिर भी दौड़ता हुआ उसके पीछे आया था और अब उसके पास ही खड़े हो कर कुछ लम्हें उसे देखता रहा फिर झुक कर अपने दोनों हाथों से अज़ीन का बाज़ू पकड़ कर उसे उठाना चाहा था मगर अज़ीन ने उसका हाथ झटक दिया था।