Mere Ghar aana Jindagi - 7 in Hindi Fiction Stories by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | मेरे घर आना ज़िंदगी - 7

मेरे घर आना ज़िंदगी - 7


(7)

पोस्टर को बेडरूम की दीवार पर लगाने के बाद नंदिता ने उसे ध्यान से देखा। दो नन्हें बच्चों के मनमोहक चित्र थे। एक चित्र लड़के का था और दूसरा लड़की का। वह अपनी सहेली भावना को लेकर पोस्टर लेने गई थी। कई पोस्टर देखने के बाद उसने यह पोस्टर पसंद किया था। भावना को भी पोस्टर अच्छा लगा था। पर उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि नंदिता ने यही पोस्टर क्यों पसंद किया। नंदिता ने उसे समझाया कि जब तक बच्चा पैदा नहीं होता है तब तक वह नहीं कह सकती है कि लड़का होगा या लड़की। इसलिए उसने ऐसा पोस्टर खरीदा है जिसमें दोनों की तस्वीर है।
मकरंद अभी ऑफिस से लौटकर आया था। वह वॉशरूम में फ्रेश हो रहा था। नंदिता को लगा था कि बेडरूम में घुसते ही मकरंद की नज़र उस पर पड़ेगी। वह खुश होकर तारीफ करेगा। लेकिन मकरंद ने कोई ध्यान नहीं दिया। कपड़े बदल कर वह वॉशरूम में चला गया। अब नंदिता इंतज़ार कर रही थी कि वह बाहर आए तो उसे पोस्टर दिखाए।
बाहर निकल कर मकरंद बिस्तर पर लेट गया। वह किसी सोच में था। नंदिता ने उससे पूछा,
"चाय बना लाऊँ...."
मकरंद ने मना कर दिया। नंदिता ने उसका ध्यान पोस्टर की तरफ करते हुए कहा,
"उस दीवार पर देखो।"
मकरंद ने दीवार पर लगे पोस्टर पर नज़र डाली। बहुत धीरे से कहा,
"अच्छा है....."
उसके बोलने के तरीके से नंदिता संतुष्ट नहीं हुई। उसने कहा,
"कितनी मुश्किल से खोजकर लाई थी। तुमने तो ठीक से देखा तक नहीं।"
उसकी बात सुनकर मकरंद चिढ़कर बोला,
"कहा तो कि अच्छा है। अब और क्या कहूँ।"
नंदिता को उसका इस तरह जवाब देना अच्छा नहीं लगा। मकरंद को भी समझ आ गया कि उसने कुछ अधिक ही रुखाई दिखाई है। उसने एकबार फिर पोस्टर को देता। उसके बाद मुस्कुरा कर बोला,
"सचमुच बहुत सुंदर है। दोनों बच्चे कितने प्यारे लग रहे हैं। तुम्हारी पसंद अच्छी है।"
नंदिता को अच्छा लगा। मकरंद की परेशानी को भांपते हुए उसने कहा,
"बात क्या है मकरंद ? उदास दिख रहे हो।"
मकरंद ने कहा,
"आज नया एग्रीमेंट साइन हो गया। इस महीने से बढ़ा हुआ किराया देना है। उसके बाद साइट पर जाकर पता किया। काम जहाँ था वहीं है। शुरू होने की कोई सूरत भी नहीं दिख रही है।"
उसकी बात सुनकर नंदिता सोच में पड़ गई। उसने कहा,
"मैं समझती हूंँ कि इस समय मुश्किल दौर चस रहा है। लेकिन उदास रहने से तो समस्याएं नहीं सुलझ जाएंगी। कठिनाइयों से लड़ने के लिए ज़रूरी है कि छोटी छोटी चीज़ों से खुशियां लेना सीखें।"
मकरंद अपनी उलझनों से परेशान था। उसे यह बात अच्छी नहीं लगी। उसने कहा,
"खुश रहना मुझे भी अच्छा लगता है। लेकिन सामने जो सच्चाई है उसे नकारा नहीं जा सकता है। जितना हम लोन की किश्त और किराया मिलाकर दे रहे हैं उतने में अच्छा बड़ा फ्लैट किराए पर लेकर रह सकते थे। अब आगे खर्च और बढ़ने वाले हैं। उनके बारे में भी सोचना पड़ेगा।"
"तुम्हें क्या लगता है कि मैं इन सब बातों के बारे में नहीं सोचती हूँ। मैं भी परेशान रहती हूँ। फिर लगता है कि हर समय दिमाग को परेशान रखने की जगह ध्यान बटाया जाए। इसलिए कुछ ना कुछ ऐसा करती हूँ जिससे खुशी मिले।"
मकरंद कुछ पल उसके चेहरे को देखता रहा। उसके बाद बोला,
"नंदिता तुम्हारी और मेरी परवरिश में फर्क रहा है। तुम अपने मम्मी पापा के साए में पली हो। समस्याएं होती थीं तो वह निपट लेते थे। तुम तक बात नहीं आती थी। इसलिए तुम बेफिक्र हो सकती हो। पर मैं मौसी के घर पला हूँ। हर चीज़ आसानी से उपलब्ध नहीं थी। कॉलेज में आने के बाद तो मौसा और मौसी ने भी सहयोग करना बंद कर दिया था। इसलिए मैं अपनी ज़िंदगी को लेकर इतना सोचता हूँ। कल की चिंता मुझे आज निश्चिंत नहीं होने देती है।"
नंदिता को उसकी बात अच्छी नहीं लगी। वह बेडरूम से बाहर निकल गई। बाहर आकर वह सोच रही थी कि उसके पापा ने भी मकरंद के साथ शादी के लिए तैयार ना होने के लिए यही दलील दी थी। उनका कहना था कि तुम और मकरंद दो अलग अलग माहौल में पले हैं। यह बात बाद में चलकर दिक्कत पैदा कर सकती है। लेकिन नंदिता मकरंद के प्यार में डूबी हुई थी। उसे तब इस बात में कोई दम नज़र नहीं आया था।‌ आज परवरिश के फर्क वाली बात खुद मकरंद ने कही थी।
वह सोच रही थी कि पापा सिर्फ एकबार ही मकरंद से मिले थे। उस एक मुलाकात में उन्होंने उसकी सोच को अच्छी तरह समझ लिया था। जबकी वह इस बात को समझ नहीं पाई थी। उसके मन में सवाल उठने लगा कि क्या अपने मम्मी पापा के खिलाफ जाकर मकरंद से शादी करने का उसका फैसला गलत था।
लेकिन जल्दी ही उसने इस सवाल को खारिज कर दिया। वह मकरंद को प्यार करती थी। वह जानती थी कि मकरंद एक सच्चे दिल का इंसान है। उसने सोचा कि वह धीरे धीरे अपने प्यार और सहयोग से उसकी सोच को बदल देगी। उसे सिखा देगी कि आगे की चिंता में वर्तमान को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं है।

कल स्कूल की तरफ से जयपुर ट्रिप पर जाना था। समीर ने सारी तैयारियां कर ली थीं लेकिन फिर भी मन में एक डर था। ट्रिप में उसके साथियों का व्यवहार उसके साथ ना जाने कैसा होगा। बहुत दोस्ताना व्यवहार की चाह उसे थी भी नहीं। वह तो बस चाहता था कि उसके साथी उसे परेशान ना करें। उसे उसके हाल पर छोड़ दें। अपने टीचर्स से भी उसे बहुत उम्मीद नहीं थी। खासकर हरीश गुप्ता सर से जो इस ट्रिप के हेड थे। उन्होंने कभी उसे डांटा तो नहीं था। पर उसने महसूस किया था कि वह उसे पसंद नहीं करते हैं। क्लास में उसकी अनदेखी करते हैं।
अमृता ने उसे जाने के लिए ज़ोर दिया था।‌ उसे लगता था कि समीर के लिए आवश्यक है कि वह बाहर निकले। लोगों से मिले जुले। यह उसके आत्मविश्वास को मज़बूत करेगा। नहीं तो वह अपने ही दायरे में बंधा रहेगा। जीवन में कुछ नहीं कर पाएगा। वह समीर के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित थी। उसने समीर को अपने पास बुलाकर समझाया,
"बेटा मैं जानती हूँ कि तुम इस ट्रिप पर जाना नहीं चाहते हो। लेकिन इस ट्रिप पर जाना तुम्हारे लिए बहुत ज़रूरी है। तुम चाहते हो कि एकदिन सफल व्यक्ति बनो। उसके लिए तुम्हें लोगों से भागने की जगह उनका सामना करना सीखना होगा। तुम दबोगे तो लोग तुम्हें और दबाएंगे। तुम्हारा मनोबल कमज़ोर हो जाएगा। अपने मनोबल को ऊंँचा रखने के लिए तुम्हारा लोगों से मिलना जुलना ज़रूरी है।"
समीर ने अपनी मम्मी की बात ध्यान से सुनी लेकिन कुछ बोला नहीं। अमृता उसकी झिझक को समझ रही थी। उसने कहा,
"सिर्फ चार दिन का टूर है। जाओ और तुम्हारे मन में जो भी झिझक है खत्म कर दो। एकबार यह झिझक खत्म हो गई तो तुम्हारे लिए पूरी ज़िंदगी आसान हो जाएगी।"
समीर भी चाहता था कि वह एक कामयाब ज़िंदगी जिए। जिसके लिए ज़रूरी था कि वह अपनी मम्मी की सलाह को माने। उसने कहा,
"ठीक है मम्मी। मैं आपकी बात मानने की पूरी कोशिश करूँगा।"
अमृता उसकी बात सुनकर निश्चिंत हो गई। उसने कहा,
"अगर तुम्हें कोई दिक्कत आती है तो अपने टीचर्स से कहना। मुझे भी फोन करके सब बता देना।"
अपनी मम्मी से बात करके समीर का मन हल्का हो गया। वह अपने कमरे में चला गया। कमरे में जाकर उसने सबसे पहले अपने सोशल अकाउंट पर लॉग इन किया। उसका एक नया दोस्त बना था। उसका नाम अजित परेरा था। अजित श्रीलंका का रहने वाला था। उसकी उम्र समीर को मालूम नहीं थी पर प्रोफाइल में लगी तस्वीर से इतना तय था कि वह उम्र में उससे कुछ साल बड़ा है। अाभासी दुनिया में जब दोनों ने पहली बार एक दूसरे से बातचीत की तो समीर को ना जाने क्यों उसके साथ एक अपनापन महसूस हुआ। बाद में बातचीत से पता चला कि उसकी तरह वह भी अकेलेपन का शिकार है।
अजित को बोलने मे समस्या थी। वह अटक अटक कर बोलता था। जिसके कारण उसके भी वास्तविक दुनिया में अधिक दोस्त नहीं थे। समीर ने उसे अपने बारे में बताते हुए मैसेज किया था। तब अजित ऑफलाइन था। समीर जानना चाहता था कि अजित ने उसके मैसेज का कोई जवाब भेजा है या नहीं।
अजित का मैसेज आया था। समीर ने उसका मैसेज पढ़ा।
'समीर.....तुमने अपने बारे में मुझे खुलकर बताया.....मुझ पर विश्वास जताया उसका धन्यवाद....मुझे इससे पहले इस विषय में अधिक जानकारी नहीं थी....मैंने इंटरनेट पर इस विषय में पता किया.....ईश्वर हर एक को अलग तरह से बनाता है.....जैसे मुझे थोड़ा अलग बनाया है....तुम्हें भी अलग बनाया है....मैं अपने अनुभव से समझ सकता हूँ कि लोगों के व्यवहार से तुम कैसा महसूस करते होगे....मेरी सहानुभूति तुम्हारे साथ है...'
अजित का मैसेज पढ़कर समीर को अच्छा लगा। उसने जवाब लिखा,
'अजित तुमने मेरी समस्या को समझा....दूसरों की तरह उसका मज़ाक नहीं बनाया....इसके लिए तुम्हारा धन्यवाद....'
समीर ने मैसेज भेज दिया। अजित उस समय ऑनलाइन नहीं था। समीर ने अपने अकाउंट से लॉग आउट किया। वह अपने बिस्तर पर लेटकर खुद को मानसिक रूप से ट्रिप पर जाने के लिए तैयारी करने लगा। वह अजित के मैसेज के बारे में सोच रहा था।‌ उसने लिखा था कि ईश्वर ने हर किसी को अलग तरीके से बनाया है। उसे भी अलग बनाया है। पर उसकी भिन्नता को समाज आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रहा है। उसे बहुत मेहनत करनी होगी ताकी लोग उसे उसकी इस भिन्नता के साथ स्वीकार कर सकें।

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