Mere Ghar aana Jindagi - 9 in Hindi Fiction Stories by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | मेरे घर आना ज़िंदगी - 9

मेरे घर आना ज़िंदगी - 9


(9)

जयपुर ट्रिप से लौटकर समीर ने अमृता को वहाँ के अनुभव के बारे में बताया। उसने कहा कि ट्रिप पर उसे अच्छा लगा। चार दिन उसने अपने दम पर परिस्थितियों का सामना किया यह उसके लिए आत्मविश्वास को बढ़ाने वाली बात थी। अमृता खुश थी कि जो वह चाहती थी वही हुआ।
समीर अपने कमरे में आराम कर रहा था। वह पूरी कोशिश कर रहा था कि ट्रिप से लौटने से एक रात पहले जो कुछ भी उसके साथ हुआ उसे दिमाग से निकाल दे। लेकिन बार बार उसे अपने शरीर पर उस स्पर्श का अनुभव हो रहा था। वह अनुभव उसे बीमार किए दे रहा था। उसके कानों में ज़हर घोलते शब्द गूंज रहे थे,
"तुम जैसे लोगो के लिए यही काम ठीक है।‌ अभी से आदत डाल लो। अंत में यही काम करना है।"
वह उठकर बैठ गया। इस समय वह खुलकर रो सकने की स्थिति में भी नही था। वह नहीं चाहता था कि जो कुछ उसके साथ हुआ वह उसकी मम्मी को पता चले। लेकिन अपने भविष्य को लेकर उसके मन में एक डर बैठ गया था। दरवाज़े पर दस्तक हुई। अमृता ने आवाज़ लगाकर उसे खाना खाने के लिए बुलाया। इस समय वह बस अपने कमरे में बंद रहना चाहता था। अपनी मम्मी का सामना अधिक नहीं करना चाहता था। उसे डर था कि उनके सामने वह कमज़ोर ना पड़ जाए। उसने आवाज़ लगाकर कहा कि उसे भूख नहीं है। थकावट महसूस हो रही है इसलिए वह सोना चाहता है।
ट्रिप में उसके अतिरिक्त पंद्रह लड़के और थे। इसके अलावा दो टीचर थे। इनमें एक हरीश गुप्ता और दूसरे मंजीत सिंह थे। लड़कों के ठहरने की व्यवस्था दो बड़े कमरों में की गई थी। हर कमरे में आठ लड़के थे। कमरे में दोनों तरफ चार चार बेड थे और बीच में खाली जगह। समीर ने अपने लिए कोने वाला बिस्तर चुना था। उसके पास खिड़की थी। दोनों टीचर्स के लिए अलग एक कमरा लिया गया था।
चार दिन की ट्रिप में पहले दो दिन बहुत अच्छे बीते थे। जैसा उसने अपनी मम्मी से कहा था कि अपने दम पर सबकुछ मैनेज करने के कारण उसका आत्मविश्वास बढ़ा था। उसके साथियों ने उससे एक दूरी बनाकर रखी थी। यह बात भी उसके मन के अनुकुल थी। वह किसी के साथ भी घुलना मिलना नहीं चाहता था। तीसरे दिन सब लोग शाम को जब घूमकर लौटे तो उसकी कहासुनी अपने साथ ठहरे एक लड़के नमित से हो गई। बाकी लड़कों ने नमित का साथ दिया। वह अकेला पड़ गया। उसने अपने टीचर्स से शिकायत की। मंजीत ने सलाह दी कि आज रात की ही बात है। कल सुबह वापसी है। इसलिए रात में वह टीचर्स के कमरे में सो जाए। समीर इस बात के लिए तैयार हो गया। टीचर्स के कमरे में उसके लिए व्यवस्था कर दी गई।
अगले दिन सुबह जल्दी निकलना था इसलिए सब सो गए थे। समीर भी टीचर्स के कमरे में अपने लिए लगाए गए बिस्तर पर जाकर लेट गया। वह थका हुआ था।‌ उसे जल्दी ही नींद आ गई। सोते हुए उसे अपने शरीर पर कुछ चलते हुए महसूस हुआ। उसकी आँख खुली तो एक हाथ उसके शरीर से छेड़छाड़ कर रहा था। वह हड़बड़ा कर बैठ गया। उसने देखा कि उसके बगल मे मंजीत सिंह लेटा है। पास ही हरीश गुप्ता भी बैठा मुस्कुरा रहा है। समीर फुर्ती से बिस्तर से उतर कर खड़ा हो गया।‌ उसने कहा,
"क्या कर रहे थे आप ?"
मंजीत सिंह ने कहा,
"कुछ भी तो नहीं। मुझे लगा कि तुम डरो ना इसलिए तुम्हारे पास लेट गया था।"
समीर ने गुस्से में कहा,
"मेरे साथ ऐसा करने की हिम्मत कैसे हुई।"
हरीश ने हंसते हुए कहा,
"क्या हुआ ? इतना चिल्ला क्यों रहे हो ? तुम उस तरह के हो ना। नमित ने नाच गाकर मांगने की बात कही थी। मैं तो कहता हूँ कि तुम जैसे लोगो के लिए यही काम ठीक है।‌ अभी से आदत डाल लो। अंत में यही करना होगा।"
समीर डरा हुआ था। लेकिन जानता था कि अगर हिम्मत नहीं दिखाई तो उसके साथ गलत हो सकता है। उसने ज़ोर ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया। हरीश और मंजीत डर गए। समीर ने फुर्ती से दरवाज़ा खोल दिया। बाहर से स्टाफ का आदमी गुज़र रहा था। उसने समीर से पूछा कि बात क्या है। हरीश और मंजीत ने उसे बताया कि इस लड़के को मेंटल प्रॉब्लम है जिसके कारण ऐसा करता है। उन लोगों ने मामले को दबा दिया। दोबारा कुछ करने की हिम्मत तो नहीं हुई पर समीर को बुरी तरह डरा दिया कि इस विषय में किसी से कहा तो अंजाम बुरा होगा। लौटते समय रास्ते में भी कई बार उसे धमकी दी कि किसी से कुछ ना कहे।
जो कुछ हुआ था उसका समीर के दिल पर गहरा असर पड़ा था। उसने धमकी के डर से अपनी मम्मी को कुछ नहीं बताया था। उनसे कहा था कि सब बहुत अच्छा रहा। लेकिन अब वह डर रहा था। उसे कल से स्कूल जाना था। वहाँ हरीश और मंजीत से उसका सामना होना था। दोनों स्कूल में उसके साथ कुछ भी कर सकते थे। वह डरा हुआ था। उसकी स्कूल जाने की बिल्कुल भी इच्छा नहीं थी। लेटे हुए उसे लग रहा था कि जैसे उसका शरीर जल रहा है। उसने खुद अपना माथा छुआ तो तवे की तरह गर्म था। उसने सोचा कि उठकर टम्प्रेचर नाप लेता है। लेकिन उसकी उठने की हिम्मत ही नहीं पड़ी।
समीर ने खाना खाने से मना कर दिया था। तब अमृता ने सोचा था कि आज दिनभर ट्रैवेल करने के कारण थका होगा। कुछ देर आराम कर लेने दे। अब करीब दो घंटे बीत गए थे।‌ उसने एकबार फिर समीर के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया। दो तीन बार दस्तक देने पर भी कोई जवाब नहीं मिला। उसे लगा कि शायद वह सो गया है। वह जाने के लिए घूम रही थी तभी उसे लगा जैसे कि उसने समीर के कराहने की आवाज़ सुनी है। वह दरवाज़े पर कान लगाकर सुनने लगी। उसका शक सही था। समीर अंदर कराह रहा था। वह घबरा गई। वह भागकर उसके कमरे की चाभी ले आई। दरवाज़ा खोलकर अंदर गई तो समीर बिस्तर पर पड़ा कराह रहा था। उसने माथे पर हाथ लगाया तो जल रहा था। बुखार नापा तो एक सौ चार था।
अमृता ठंडा पानी और एक कपड़ा लेकर आई। उसके सर पर पानी से भीगी पट्टियां रखने लगी। उसने महसूस किया कि बुखार में तपता समीर कुछ बड़बड़ा रहा है। उसने ध्यान से सुना। समीर कह रहा था कि मेरे साथ ऐसा करने की हिम्मत कैसे हुई.....मैं यह नहीं करूँगा...मैं फैशन डिज़ाइनर बनूँगा। अमृता उसकी कही बातों का मतलब नहीं समझ पा रही थी। लेकिन इतना समझ गई थी कि उसके साथ कुछ हुआ है।
पट्टियां रखने से बुखार कम हो गया था। उसने दोबारा नापा तो एक सौ एक बुखार था। उसे कुछ तसल्ली हुई। उसने समय देखा। रात के साढ़े दस बजे थे। इस समय समीर को किसी डॉक्टर को नहीं दिखाया जा सकता था। उसे अपनी सोसाइटी में रहने वाले डॉ. संतोष त्रिवेदी की याद आई। एकबार पहले भी वह उनसे सलाह ले चुकी थी। उसने अपने फोन पर नंबर खोजा तो मिल गया। डॉ. संतोष से बात हुई तो उन्होंने एक दवा बताकर कहा कि अभी इसे खिला दीजिए। अगर कल भी बुखार चढ़े तो क्लीनिक पर लाकर दिखा दीजिएगा।
अमृता ने दवा का नाम नोट कर लिया। सोसाइटी के पास ही एक मेडिकल शॉप थी। पर समस्या यह थी कि वह समीर को अकेला छोड़कर कैसे जाए। बहुत सोचकर उसने नंदिता को फोन करके सारी बात बताई। नंदिता और मकरंद कुछ ही देर में उसके घर आ गए। मकरंद ने उससे दवा का नाम पूछा और लेने के लिए चला गया। दवा से समीर को आराम हुआ। उसका बुखार कुछ ही देर में उतर गया।
अगले दिन अमृता ने समीर को स्कूल नहीं भेजा। खुद भी ऑफिस से छुट्टी ले ली। समीर को बुखार तो नहीं था पर वह बहुत बुझा बुझा सा था। अमृता के दिमाग में वह बातें चल रही थीं जो उसने बुखार की हालात में समीर को बड़बड़ाते सुनी थीं। वह समीर के पास जाकर बैठ गई। उसने पूछा,
"अब तबीयत कैसी है ?"
"अच्छी है मम्मी। बुखार नहीं है।"
"कल तो तुम्हें बहुत तेज़ बुखार था। मैं घबरा गई थी।"
समीर ने उसकी तरफ देखकर कहा,
"थकान की वजह से ऐसा हो गया होगा मम्मी।"
अमृता ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"थकावट के कारण हुआ या कुछ और बात है।"
अमृता की बात सुनकर समीर परेशान हो गया। उसने कहा,
"क्या मतलब है मम्मी ?"
अमृता ने उसका हाथ थाम कर प्यार से कहा,
"सच बताना किसी ने तुम्हें कुछ उल्टा सीधा कहा। तुम्हारे साथ कुछ गलत किया।"
यह सुनकर समीर को लगा कि कहीं मम्मी को कुछ पता तो नहीं चल गया है। फिर भी उसने असली बात छुपाते हुए कहा,
"बताया था ना मम्मी कि ट्रिप पर सब सही रहा।"
समीर ने यह कहते हुए अपनी निगाहें दूसरी तरफ घुमा लीं। अमृता को कुछ सही नहीं लगा। उसने कहा,
"अगर ऐसा है तो तुम बुखार में बड़बड़ा क्यों रहे थे।"
अमृता ने उसे वह बताया जो वह बड़बड़ा रहा था। सुनकर समीर सर झुका कर बैठ गया। अमृता ने कहा,

"बेटा मुझे लग रहा है कि कुछ हुआ है जो तुम मुझसे छुपा रहे हो। ऐसा मत करो। जो भी बात है मुझे खुलकर बता दो।"
समीर समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। एक तरफ उसे लग रहा था कि अपनी मम्मी को सारी बात बता दे। उसके लिए सब बर्दाश्त करना मुश्किल हो रहा था। लेकिन वह हरीश और मंजीत द्वारा दी गई धमकी से भी डर रहा था। असमंजस की स्थिति में वह चुप बैठा था। उसकी चुप्पी अमृता को परेशान कर रही थी।