Mere Ghar aana Jindagi - 10 in Hindi Fiction Stories by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | मेरे घर आना ज़िंदगी - 10

मेरे घर आना ज़िंदगी - 10


(10)

अमृता इंतज़ार कर रही थी कि समीर कुछ कहे। समीर पशोपश में था। इस बात से अमृता की चिंता बढ़ गई थी। उसने कहा,
"समीर इस तरह सोच में पड़े हो। बात क्या है ? खुलकर बताओ।"
समीर ने सोच लिया था कि वह सही बात नहीं बताएगा। उसके मन में एक बात आई थी। नमित के साथ उसका झगड़ा जिस वजह से हुआ था उसने वही बता दिया। उसने कहा,
"मम्मी मेरी एक लड़के के साथ कहासुनी हो गई थी। वह मुझे परेशान कर रहा था।‌ मुझसे कह रहा था कि मैं आगे चलकर नाच गाना करके लोगों से पैसे मांगूँगा। मैंने उससे फैशन डिज़ाइनर बनने की बात कही थी। शायद इसीलिए बुखार में बड़बड़ा रहा था।"
"तुमने उसकी शिकायत क्यों नहीं की ? मैं तुम्हारे साथ स्कूल चलूँगी। प्रिंसिपल से उस लड़के की शिकायत करूँगी।"
यह सुनकर समीर बोला,
"मैंने साथ गए टीचर्स से उसकी शिकायत की थी। उन्होंने उसे खूब डांटा था।‌ उसने माफी भी मांगी थी। अब प्रिंसिपल सर के पास जाने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
अमृता उसकी बात से संतुष्ट नहीं हो पाई थी। उसने कहा,
"कल से तुम बहुत उदास लग रहे हो।‌ पहले मुझे लगा था कि शायद थकान होगी। अब तुमने यह बात बताई। तुम अभी भी मुझसे कुछ छुपा तो नहीं रहे हो।"
"नहीं मम्मी....मैं आपसे क्यों छुपाऊँगा। पर अब बात खत्म हो गई है। तो फिर उसे बढ़ाने से क्या मतलब।"
"ठीक है बेटा। लेकिन अभी भी कह रही हूँ। कभी कुछ भी हो मुझसे छुपाना नहीं। अब आराम करो। किसी की ऊंटपटांग बात को दिल से मत लगाया करो। जो तुम करना चाहते हो उसके लिए मेहनत करो। जब तुम अपने काम में सफल हो जाओगे तो सब चुप हो जाएंगे।"
जाते हुए अमृता ने उसके सर पर हाथ फेरा। समीर को अपनी मम्मी का समझाना बहुत अच्छा लगा था। उनकी बातों से ऐसा लग रहा था कि जैसे उन्होंने उसे उस तरह स्वीकार कर लिया है जैसा वह है। पर अपनी मम्मी से बात छुपाना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। अभी भी उसके मन में बताने और ना बताने के बीच रस्साकशी चल रही थी। वह इस विषय में किसी से बात करना चाहता था। उसके ज़ेहन में अजित परेरा का नाम उभरा। उसने अपने सोशल अकाउंट पर लॉग इन किया। अजित ऑनलाइन नहीं था। पर समीर ने उसे मैसेज भेजा कि उसे बहुत ज़रूरी बात करनी है।

योगेश अस्पताल में भर्ती हो गए थे। सिस्टक्टोमी से पहले उनकी कीमियोथैरिपी होनी थी। उसकी तैयारियां चल रही थीं। योगेश जानते थे कि कीमियोथैरिपी के बाद उनके शरीर पर इसका प्रभाव पड़ेगा। वह अपने सामान्य काम भी पहले की तरह नहीं कर पाएंगे। उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। इसलिए उन्होंने अस्पताल में इसकी व्यवस्था कर ली थी। सुदर्शन ने कहा था कि वह अपनी तरफ से जो भी मदद कर सकेगा अवश्य करेगा।
अस्पताल के बिस्तर पर बैठे हुए उनकी आँखों के सामने उर्मिला का चेहरा आ रहा था। कल शाम वह उन्हें संस्था की देखभाल में छोड़ने के लिए गए थे। पता नहीं उर्मिला को कुछ एहसास हो गया था या यूं ही पर वह अलग तरह का बर्ताव कर रही थीं। अक्सर वह उनका हाथ पकड़े रहते थे। पर कल कैब से उतर कर जब उर्मिला संस्था के अंदर जा रही थीं तब उन्होंने उनकी बांह को कसकर पकड़ रखा था।
योगेश उन्हें उस कमरे में ले गए जहाँ उनके ठहरने की व्यवस्था थी। उर्मिला वहाँ भी उनका हाथ कसकर पकड़े हुए थीं। योगेश के लिए अपना हाथ छुड़ाकर चले आना बहुत कठिन हो रहा था। वह बहुत असहाय सा महसूस कर रहे थे। इधर उधर देख रहे थे। वहाँ काम करने वाले एक हेल्पर ने उनकी दुविधा समझ ली। वह उर्मिला के पास आया। उनसे कुछ बातें कीं। फिर उनका दूसरा हाथ पकड़ कर उन्हें अपने साथ आने को कहा। एक छोटी बच्ची की तरह उर्मिला उसके साथ चली गईं। वह हेल्पर उन्हें खिड़की तक ले गया और बाहर कुछ दिखाने लगा।
यही समय था जब योगेश चुपचाप वहाँ से निकल जाते। लेकिन उनके पैर जाने के लिए उठ ही नहीं रहे थे। बार बार उनके मन में आ रहा था कि अपना इलाज स्थगित कर दो। अभी उर्मिला का हाथ पकड़ो और उसे घर ले चलो। जब तक शरीर चले उसकी देखभाल खुद ही करो। उन्होंने खिड़की की तरफ कदम बढ़ाने के बारे में सोचा ही था कि मन से एक आवाज़ आई। कितने दिन उर्मिला की देखभाल कर पाओगे। कैंसर धीरे धीरे तुम्हारे शरीर को कमज़ोर कर रहा है। कुछ ही दिनों में इस स्तिथि में आ जाओगे कि ना अपना भला कर पाओगे और ना उर्मिला का। अच्छा होगा कि अपना इलाज कराओ। सही हो गए तो उर्मिला के साथ बाकी की ज़िंदगी बिताना। नहीं तो जो ईश्वर की इच्छा हो। यह बात दिमाग में आते ही वह बिना देरी किए वहाँ से निकल गए।
वह सोच रहे थे कि उनके छोड़कर आने के बाद क्या उर्मिला उन्हें वहाँ ना पाकर परेशान हुई होंगी। क्या उन्हें खोजने के लिए बाहर भागी होंगी। उसकी निगाहें क्या अभी भी उन्हें तलाश कर रही होंगी। या फिर जैसा उसके साथ होता है वह सबकुछ भूल गई होंगी। वह मना रहे थे कि दूसरी बात ही सच हो। उर्मिला उन्हें लेकर परेशान ना हों।
योगेश यही सब सोच रहे थे जब नर्स ने आकर सूचना दी कि सारी तैयारी हो गई है।

समीर ने एकबार फिर लॉग इन करके देखा। अजित का मैसेज था। उसने लिखा था कि बहुत ज़रूरी है तो क्या हम बात कर सकते हैं। मैसेंजर के ज़रिए कॉल लगाओ। मैं तुम्हारे फोन का इंतज़ार कर रहा हूँ। अजित ऑनलाइन था। समीर ने अपने कमरे से बाहर झांककर देखा। उसकी मम्मी अपने कमरे में थीं। उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और अजित को कॉल लगाई।
एक दूसरे का हालचाल जानने के बाद समीर ने अजित को अपने साथ घटी सारी घटना खुलकर बता दी। साथ ही अपने टीचर्स द्वारा दी गई धमकी के बारे में भी बता दिया। उसके टीचर्स ने धमकी दी थी कि वह ‌उसकी स्तिथि के बारे में सबको बता देंगे। तब वह किसी को मुंह नहीं दिखा पाएगा। उसकी मम्मी को भी मुंह छुपाना पड़ेगा। उसकी मम्मी के साथ और भी बहुत कुछ हो सकता है।
सारी बात जानने के बाद अजित ने उसे सलाह दी कि उसे यह बात अपनी मम्मी को बतानी चाहिए। उन टीचर्स के खिलाफ शिकायत की जानी आवश्यक है। नहीं तो उनकी हिम्मत बढ़ जाएगी। वह आगे भी उसके साथ या किसी और के साथ गलत हरकत कर सकते हैं। वह उनकी धमकियों से ना डरे और ना ही उनकी कही हुई बातों पर ध्यान दे। उसके जैसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने अपनी मेहनत से सफलता पाई है। समाज में अपने लिए जगह बनाई है।
अजित से बात करने के बाद समीर ने इंटरनेट पर ट्रांसजेंडर लोगों के बारे में खोज की। उसे जानकर अच्छा लगा कि उनमें से बहुत से लोगों ने अपने जीवन में सफलता प्राप्त की है। उसे बहुत हौसला मिला। लेकिन उसके साथ घटी घटना के बारे में अपनी मम्मी को बताने के लिए वह अभी भी तैयार नहीं हो पाया था।

कीमियोथैरेपी के बाद योगेश बहुत कमज़ोर हो गए थे। उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती थी। सुस्ती सी छाई रहती थी। पेट भी ठीक नहीं था। अपने रोजमर्रा के काम भी उन पर भारी पड़ रहे थे। वह सोचते थे कि अच्छा किया कि उन्होंने समय रहते उर्मिला की देखभाल की व्यवस्था कर दी थी। नहीं तो इस हालत में वह अपने आप को ही संभाल नहीं पा रहे हैं। उर्मिला को कैसे संभालते।
उन्हें रह रह कर उर्मिला की याद आती थी। यह सोचकर परेशान हो जाते थे कि पता नहीं उनका क्या हाल होगा। एकबार वह संस्था की हेड ईशा सचान से फोन पर उर्मिला का हालचाल ले चुके थे। उन्होंने बताया था कि वह निश्चिंत रहें। उर्मिला ठीक हैं। उनकी बहुत अच्छी तरह देखभाल हो रही है। फिर भी अपनी आँखों से देखे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ रहा था। लेकिन अभी इस हालत में नहीं थे कि जाकर उनसे मिल लें। वह मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि जब कष्ट दिया है तो उसे सहने की ताकत भी दें।
सुदर्शन दो बार उनसे मिलने आ चुका था। वह आज फिर आने का वादा करके गया था। उन्हें सुदर्शन का मिलने आना अच्छा लगता था। उसके अलावा ऐसा कोई था भी नहीं जो उनसे मिलने आता। दोस्तों और रिस्तेदारों ने बहुत पहले ही किनारा कर लिया था। उनके जीवन में अपना कहा जा सके ऐसी केवल उर्मिला थीं। वह अपनी बीमारी के कारण उनसे दूर थीं।
वह सुदर्शन का इंतज़ार कर रहे थे ताकी उसे घर भेजकर कुछ ज़रूरी सामान मंगाया सकें। इसके अलावा वह चाहते थे कि उसे उर्मिला से मिलने के लिए भेजें। वह अपनी आँखों से उनका हाल देखकर आए।

नंदिता और मकरंद इधर अक़्सर एक दूसरे के साथ वक्त बिताते थे। इस समय दोनों डिनर के बाद सोसाइटी के पार्क में टहलने आए थे। टहलते हुए दोनों बात कर रहे थे। बातचीत का रुख पति पत्नी के रिश्ते की तरफ चला गया। नंदिता ने कहा,
"वैसे तो मेरे मम्मी पापा के बीच भी बहुत अच्छा रिश्ता है। लेकिन योगेश अंकल जैसा जीवनसाथी मिलना किस्मत की बात है।"

उसकी बात का समर्थन करते हुए मकरंद ने कहा,
"सच कह रही हो। आंटी को तो बीमारी के कारण अपना ही होश नहीं रहता है। पर अंकल उनका पूरी तरह से साथ निभा रहे हैं।"
नंदिता कुछ सोचते हुए बोली,
"इधर हम दोनों कई दिनों से पार्क में टहलने आ रहे हैं। लेकिन अंकल दिखाई नहीं दिए। नहीं तो आंटी को लेकर पार्क में आते थे।"
"हो सकता है कोई समस्या हो।"
"मुझे भी यही लगता है। इधर जब भी अंकल मिले थे तो परेशान दिखे थे।"
नंदिता यह कहकर सोच में पड़ गई।

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