Skirt in Hindi Short Stories by Reshu Sachan books and stories PDF | स्कर्ट

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स्कर्ट

दिसम्बर का महीना उसपर से दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड और  सुबह के छः बजे अचानक फ़ोन की घंटी बजे तो मिहित ही क्या किसी का भी मूड ख़राब हो जायेगा। आँखें खोले बिना, हाथ बढाकर फ़ोन उठाने से पहले मन में यही ख़याल आया, “अरे यार अभी चार बजे तो सोया था किसको आफ़त आन पड़ी”। ख़ैर फ़ोन उठाना तो था  ही, सो उठा लिया| इससे पहले कि मिहित कुछ बोल पाता, दूसरी तरफ से एक रूँधी हुई सी आवाज़ आयी, “ बेटा मैं मधु का पापा बोल रहा हूँ, मैं इस वक्त नवजीवन अस्पताल, ग़ाज़ियाबाद में हूँ, मधु की हालत बेहद ख़राब है क्या आप इसी वक्त यहाँ आ सकते हो?” वह आवाज़ इतनी दर्दभरी थी कि बिना कुछ सोंचे मिहित ने “हाँ अंकल, एक घंटे में पहुँच रहा हूँ” ,बोल दिया। उसकी तो मानो नींद ही कही उड़ सी गयी थी। रह रह कर बस मधु का ही ख़याल ज़ेहन में आ रहा था। अभी तो मधु का हाईस्कूल है, कितनी बार समझाया था माधव को कि दोस्त जो तुम कर रहे मधु के साथ, ठीक नही कर रहे । पर जवानी के जोश में लोगों को कुछ समझना ही कहाँ होता है।

        वर्ष २००५ की बात है, मिहित दिल्ली यूनिवर्सिटी में ग्रैजूएशन की पढ़ाई करने के लिए गया था। मिहित मुखर्जी नगर में अपने दो दोस्तों के साथ रहता था । मिहित के दोस्त मध्य प्रदेश के रहने वाले थे ।मिहित के उन्ही दोस्तों का दोस्त माधव था जो इंदौर  का रहने वाला था और सिविल सर्विसेज़ की तैयारी कर रहा था ।माधव एक मध्यम वर्गीय परिवार का एकलौता लड़का था , उसके बहुत बड़े ख़्वाब थे जिसके लिए वो जी जान से पढ़ रहा था। माधव जब भी दिल्ली आता मिहित और अपने दोस्तों के साथ ही फ़्लैट में रुकता था । बातों ही बातों में पता लगा कि माधव दिल्ली में अपनी गर्लफ़्रेंड मधु से ही मिलने आता था।उस समय आर्कुट का जमाना हुआ करता था, हर युवा वर्ग मौजमस्ती के लिए आर्कुट में नए दोस्त बनाने में लगा था। बस ऐसे ही किसी तरह माधव और मधु दोनों मिल गए थे एक दूसरे से। नाम से ही लगता था दोनों को जैसे एक दूजे के लिए ही बने हों। मधु हाईस्कूल की छात्रा थी उस वक्त। जब भी माधव दिल्ली आता वह मिहित का फ़ोन उपयोग करता था क्यूँकि उस वक्त रोमिंग भी लगने का जमाना था। इस प्रकार मिहित का नम्बर भी मधु के पास उपलब्ध था। हालाँकि कभी खुद से उसने मिहित को काल नहीं किया था , जब माधव आता था तब दोनों घंटों बातें करते थे एक दूसरे से ।मिलते थे बाहर कभी होटेल में तो कभी पार्क में , साथ घूमते थे  और फ़िल्म देखते वग़ैरह। माधव अब अक्सर ही आने लगा था क्यूँकि रहने की कोई दिक़्क़त तो थी नही ।

           मिहित को ना जाने क्यूँ लगता था कि माधव ठीक नही कर रहा यह, एक तो अपने सपने से दूर होता जा रहा दूसरी ओर एक बहुत छोटी सी बच्ची है मधु जिसे माधव भटका रहा है। एक  दो बार समझाने की कोशिश भी की पर माधव ने एक ना सुनी। माधव और मधु की प्रेमकहानी किसी अनजान सी मंज़िल की ओर बढ़ती जा रही थी। बाँकी सब भी अपने सपनों को पूरा करने में लगे हुए थे । कुछ दिनों बाद मधु का फ़ोन आया था मिहित के पास यह कहते हुए कि माधव से बात करना है कृपया उसकी बात करा दो । मिहित ने कहा वह यहाँ नही है , जब आता है तभी बात करता है वह मेरे नम्बर से । तब मधु ने कहा माधव मेरा फ़ोन नही उठा रहा ना ही कोई जवाब दे रहा और यह कहके खूब रोने लगी । मधु की उस परिस्थिति को देखते हुए मिहित ने मधु से कहा ठीक है मैं बात करके बताता हूँ तुम्हें ज़रा रुको। माधव से बात करने पर मिहित को पता लगा कि वह अब मधु के साथ अपना रिश्ता आगे नहीं चलाना चाहता , उसका अपना खुद का भविष्य है वो मधु के चक्कर में अपने सपने नहीं तोड़ सकता । मिहित ने वजह जाननी चाही तो माधव ने कहा भाई पागल हो गयी वह लड़की , मुझसे शादी करना चाहती है । भाई मुझे इन सब चक्करों में नही पड़ना । मैं तो बस ज़िंदगी के मज़े लूट रहा था । पता है उसने मेरे घर में भी कार्ड , चिट्ठियाँ भेजना शुरू कर दिया था , कभी लैंडलाइन तो कभी घर में दूसरे नम्बर में । कई बार तो अस्पताल में भर्ती होना पड़ा उसे यार । इतनी सीरीयस रिलेशनशिप में मैं तो नही रह सकता ।भाई बेहतर होगा तुम भी उससे बात ना करो । मिहित, जो कुछ भी घटित हुआ वह तो मधु को नही ही बता सकता था, क्यूँकि माधव से बात करके इतना तो पता लग ही गया था कि मधु दिल से टूट चुकी है पूरी तरह से। उसे और तकलीफ़ नही दे सकता था सब बताकर। मिहित ने मधु से कहा , आप अभी बहुत छोटे हो, अपनी पढ़ाई के बारे में सोंचों बस । यह व्यर्थ में किसी के पीछे भागकर अपनी ज़िंदगी ना ख़राब करो  और फ़ोन रख दिया । यह सब गुजरे अभी मात्र चार ही दिन तो हुए थे , जब उसने आख़िरी बार मधु से बात की थी और फिर आज अचानक क्या हो गया उसे , यही सब मिहित के दिमाग़ में बहुत तेज़ी से चल रहा था, और यह सब सोंचते हुए मिहित कब अस्पताल पहुँच गया पता ही नही चला।

            मिहित ने अस्पताल पहुँचकर मधु के पापा से बात की, तो उन्होंने बताया कि मधु को किसी चीज़ का कोई सदमा सा लगा है, वो चीख रही , चिल्ला रही , पागलों की तरह अपने हाँथ पैर दीवार में , ज़मीन में पटक रही और कह रही पापा - माँ उसे वापस ले आओ , मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ , वो जो कहेगा मैं करूँगी,  उससे  कह दो मुझसे बात कर ले, वो जैसे चाहेगा मैं उसके साथ रह लूँगी पर  वो मुझे छोड़कर ना जाएँ और यह सब चिल्लाते चिल्लाते कब होश में आती है कब बेहोश होती है मालूम नही । हम कुछ समझ नही पा रहे बेटा , वो तो तुम्हारा नम्बर मधु के मोबाइल में रीसेंट लिस्ट में था बात हुई होगी शायद उससे तुम्हारी तो तुमको कॉल कर दिया मैंने, कि शायद कुछ पता चले तुमसे| मेरी इकलौती बेटी है मधु , पता नहीं क्या कह रही किसकी बात कर रही है|माधव का नंबर उठ नहीं रहा| एक लाचार पिता की यह हालत मिहित से देखी ना गयी और उसने मधु और माधव की सारी कहानी मधु के पापा को बता दिया। सब सुनके मधु के पापा तो मानों पत्थर से हो गए थे। उन्हें फिर अब कुछ समझ नही आ रहा था कि आख़िर उनके प्यार में कौन सी कमी रह गयी थी जो यह सब हुआ और अब आख़िर क्या करें । तब मिहित ने उनका हाँथ अपने हांथों में थामकर कहा आप परेशान ना हो , सब ठीक हो जाएगा। मधु के पापा के साथ मिहित मधु से मिलने उसके कमरे में गया, मधु जब तक होश में आ चुकी थी। मिहित को देखते ही मधु की आँखों से बस आंसुओं का सैलाब बहा जा रहा था , मिहित भी कुछ नही कह पा रहा था क्या कहके तसल्ली दिलाता उसे तो पहले से ही सब ग़लत लग रहा था जो कुछ भी हो रहा था। वो शायद ऐसे ही अंजाम से भयभीत था। उसने मधु के सिर पर हाँथ फेरते हुए बस इतना ही कहा, तुम तो बहुत स्ट्रॉंग हो ना, देखो तुम्हारे पापा तुम्हें इस हालत में बिल्कुल भी नहीं देख पा रहे , क्या हाल है उनका , देखो ज़रा। सब ठीक हो जाएगा मत कुछ सोंचों और यही कहके वहाँ से चला आया था वो।

        मिहित की उन बातों का असर शायद मधु पर नज़र आने लगा और वह थोड़ा ठीक होने लगी थी । कभी मधु के पापा , कभी मधु फ़ोन पर बात करने लगे थे मिहित से । मिहित भी हाल चाल लेता और मधु को उसके और परिवार के लिए उसकी पढ़ाई के लिए प्रेरित करता था । मानो मधु को उसकी दुनियाँ वापस लौटाने से ज़्यादा कुछ भी ज़रूरी ना था उसके लिए। मिहित के साथ उसका भाई भी रहने लगा था अब, उसे यह सब ठीक नही लग रहा था ।अक्सर कहता था , भाई तुम कही अपनी राह से ना भटक जाना , पढ़ने आये हो , यह किन चक्करों में पड़ गए हो , जैसे तुमने कुछ ग़लत किया हो और उसे सही कर रहे । मिहित बस हंसके टाल देता उसकी बात । अब मिहित का मधु के घर आना जाना उसे पढ़ाना सब शुरू हो गया था । मिहित को मधु के बोर्ड इग्ज़ाम की फ़िकर थी बस कि एक बार बस मधु का कॉन्फ़िडेन्स वापस लाने में मैं सफल हो जाऊँ फिर वह अपनी लड़ायी खुद से लड़ लेगी। मधु भी बहुत मन लगाकर पढ़ने लगी थी , मिहित अपनी कोशिश को कामयाब होता देख मानो कोई अनदेखा सा पुरस्कार पा रहा था | मधु के बोर्ड इग्ज़ाम शुरू हो गए थे , हर दिन फ़ोन करके वह सारे पेपर और पढ़ाई की बातें साझा करती थी।

आख़िरी पेपर की एक शाम पहले मधु का फ़ोन आया था मिहित के पास एक निवेदन के साथ कि कल मेरा आख़िरी पेपर है , मैं आपसे मिलना चाहती हूँ , कल घर आइए ना प्लीज़। मिहित ने भी सोंचा ठीक है इतना निवेदन कर रही है , पेपर भी ख़त्म हो ही रहे मिल लेते हैं आगे की पढ़ाई के बारे में भी डिस्कस कर लेंगे इसी  बहाने। उसे एक नयी दिशा देना भी ज़रूरी है ।

           दोपहर के लगभग एक बजे मिहित घर पहुँचा तो मधु के छोटे भाई ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा दीदी ऊपर हैं । मिहित ने कहा और पापा मम्मी सब ऊपर हैं ना तो उसने बोला नही वो लोग बाहर गए हैं , शाम तक लौटेंगे । कुछ और समझ पाता मिहित जब तक मधु ने ऊपर से आवाज़ दी , यहीं आ जाइए। ऐसा पहली बार हुआ था कि बिना मधु के पापा मम्मी के वो उनके घर में दाखिल हुआ था । अगर उसे ज़रा सा भी इस बात का अंदाज़ा होता तो शायद वह पहले ही सुनिश्चित कर लेता । पर अब ऊपर जाने के अलावा कोई विकल्प नही नज़र आ रहा था । वह ऊपर कमरे में गया , मधु अब तक स्कूल की यूनिफ़ार्म में थी , सफ़ेद रंग की शर्ट और नीले रंग का स्कर्ट। वो बहुत ही सुंदर और प्यारी लग रही थी , स्कूल यूनिफ़ार्म में तो और भी ज़्यादा मासूम सी बच्ची। मिहित को देखकर उसने अभिवादन किया और पास पड़े सोफ़े में बैठने का इशारा किया। मिहित ने भी इशारे में सिर झुकाकर जैसे हाँ बोलकर बैठ गया । मधु किचन में जाकर उसके लिए एक ग्लास पानी लेके आयी और मिहित के हांथों में थमा दिया। फिर मधु ने बात करते करते अपना एक पैर सोफ़े पर ठीक मिहित के बग़ल में रख दिया, जिससे उसके घुटने से ऊपर का हिस्सा दिखने लगा। मिहित उस समय कुछ समझ नहीं पा रहा था , जब तक मधु ने कहा ,” आप मेरे लिए कितना कुछ किए हो आज तक , मुझे उस हालत में सम्भाला है आपने , मेरे माँ - बाप को उनकी बेटी वापस लौटायी है , मुझे एक तरह से नयी ज़िन्दगी दी है आपने, एक लड़की किसी को क्या दे सकती है अधिकतम, मैं आपको अपना सब कुछ समर्पित करना चाहती हूँ “, कुछ और कहती इससे पहले मिहित ने मधु से सामने पड़े सोफ़े में बैठने का इशारा करते हुए कहा, “देखो बेटा, तुम मेरे लिए एक बहुत छोटी सी गुड़िया जैसे हो, , मैं तुम्हें जिस स्थिति से बाहर निकाल कर लाया हूँ , तुम फिर वही जाना चाहती हो । तुम्हें मेरी किस बात या बर्ताव से ऐसा लगा कि मुझे तुमसे वही चाहिए जो माधव को चाहिए था । फिर भी मेरी तरफ़ से तुम कुछ अगर महसूस कर रहे हो तो मैं माफ़ी चाहता हूँ । और हाँ एक बात और अगर आगे कभी भी तुमने किसी के लिए भी यह सब करने की सोंची भी तो पिटायी करूँगा मैं तुम्हारी “।

        मिहित मन में तो श्रद्धा भाव से अभिभूत था मधु के लिए , कि इतनी छोटी सी बच्ची क्या कुछ सह चुकी है फिर भी वह जो अपना सर्वस्व दे सकती है उसे देना चाहती है , पर मिहित ने अपनी माँ से हमेशा एक सीख ली थी कि बेटा कहीं भी रहो , कुछ भी करो हमेशा महिलाओं की इज्जत करो, उनकी इज्जत ही नहीं उनके आत्मसम्मान की भी रक्षा करना । आज उनकी यह शिक्षा , उनके संस्कार एक लड़की की अस्मिता की रक्षा करने में काम आए थे । मधु  बस रोए जा रही थी शायद उसे भी अपनी गलती का अहसास हो चुका था , और समझ चुकी थी कि हर कोई माधव नही होता है । मिहित अब  अपने घर वापस आ गया था । मधु बहुत अच्छे नम्बर से पास हुई थी I, अब मिहित से उसकी बातचीत ना के बराबर थी । बस हाल ख़बर लेते रहते थे दोनों एक दूसरे का । धीरे धीरे मधु ने अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की और एक सोफ्टवेयर कम्पनी में नौकरी पा गयी , वही के एक सहकर्मी से उसने शादी कर ली । आज एक सुखद ज़िंदगी जी रही है अपने एक बेटे के साथ ।

आज माधव एक आइएएस है । मिहित भी बहुत प्रतिष्ठित कम्पनी में उच्च पद पर है । हमारे समाज में मधु भी हैं , माधव भी और मिहित भी । एक तरफ माधव है जो मधु के स्कर्ट उतारने  को ही प्यार मानता है  और उसे मरने के लिए प्यार में पागल बनाकर छोड़कर चला गया , दूसरी ओर मिहित है जिसने  एक असल आदमी वाला काम किया , जिसका काम एक औरत की अस्मिता का रक्षा की , उसका फ़ायदानहीं उठाया और प्यार के नाम पर ठगी करने वालों के सामने स्कर्ट ना उतारने का पाठ पढ़ाया। इन सबके बीच मधु जैसी ना जाने कितनी बच्चियाँ अभी दुनियाँ की से नासमझ माधव जैसे लोगों के चक्कर में आकर अपने मान सम्मान ही नहीं अपने असल ज़िंदगी में देखे हुए सपनों का भी सौदा कर लेती हैं । एक महिला ही महिला की रक्षक बन सकती है , हम अगर अपने बेटों को मिहित की माँ जैसे संस्कार दें तो शायद किसी भी मधु के पापा को शर्मिंदा ना होना पड़े।।।।॥