Virasat - 3 in Hindi Short Stories by Neelam Kulshreshtha books and stories PDF | विरासत - भाग 3

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विरासत - भाग 3

विरासत – 3

सन 2002 के गुजरात दंगों के बाद

नीलम कुलश्रेष्ठ

 

लाल होली

इस वर्ष स्कूल का मैनेजमेन्ट पशोपेश में है, जो प्रदेश खून की होली से गुज़रा है, वहाँ होली मनाना उचित है या नहीं। बाद में सोचा जाता है जो धर्मों के बीच दूरी आ गई है, होली का गुलाल उस दूरी को कम करेगा।

प्रत्येक वर्ष की तरह नर्सरी कक्षा में टीचर प्लेट में भरा गुलाल मेज़ पर रखकर होली का महत्त्व बताते हुए भक्त प्रहलाद की कहानी सुनाती है। सब बच्चों से कहती है, “आप सब अपने पास बैठे बच्चे के साथ यहाँ आकर एक-दूसरे के माथे पर गुलाल का टीका लगाइये। उसके बाद हम होली की मिठाई गुजिया खाएंगे।”

दो दो बच्चे एक दूसरे का हाथ पकड़े मेज़ के पास आकर एक दूसरे के माथे पर टीका लगाने लगते हैं।। तीसरी पंक्ति के एक डेस्क पर मोहन हाथ बाँधे बैठा रहता है। टीचर नाराज़ होकर पूछती है, “तुम अपने पास वाले बच्चे को टीका क्यों नहीं लगा रहे?”

वह हाथ बाँधे अकड़कर खड़ा हो जाता है, “मैडम ! मैं इस अकरम को टीका क्यों लगाऊँ? ये मुसलमान है।”

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विभाजन

उसके घर के आऊट हाऊस (सेवक का कमरा) में रहने वाली बाई का छःवर्ष का लड़का रक्षाबंधन से एक दिन पहले स्कूल से प्रसन्न लौटता है। उसका दायाँ हाथ राखी से भरा हुआ है।

वह पूछती है, “वाह! आज तो तुम्हारे ठाठ हो गये। इतनी सारी राखी स्कूल की बहिनों ने बाँधी है?”

वह खुश होकर बताने लगता है,"क्लास की लड़कियों ने हमारे राखी बाँधी व टीचर ने हमें गुलाब जामुन खिलाया था, हाँ।"

"अरे वाह !"

“एक राखी तो इसमें कम है।”

“क्यों?”

“हमारे क्लास की रज़िया भी मेरे पीछे पड़ रही थी, मैं भी राखी बाँधूँगी। मैंने उसे डाँट दिया कि हम गुजराती हैं। गुजराती लोग मुसलमान से राखी नहीं बँधवाते।”

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भय

दंगे हुए, शांत हुए महीनों हो चुके हैं, गुजरात के गोधरा स्टेशन पर ज़ायकेदार भजिये (पकौड़े)तली हुई हरी मिर्च के साथ कुछ मुस्लिम, कुछ हिन्दू आवाज़ लगाते बेचने लगे, “भजिये...गरम गरम भजिये...” जो इस रेलवे स्टेशन की पहचान है।

देल्ही जाने वाली पश्चिम एक्सप्रेस(डीलक्स) में सफ़र करती मैं, बेचैन होने लगी हूँ, गोधरा आने वाला है, स्टेशन आने से पहले खिड़की के पार अँधेरे में आँखें गढ़ाये बायीं तरफ़ खाली पड़े मैदान, पेड़-पौधों के बीच ढूँढ़ने की कोशिश कर रही हूँ..., कहाँ खड़ी होगी हाथों में पत्थर लिये वह उन्मादी भीड़ ? हमारी ही तरह ऐसे ही तो कुछ लोग गोधरा पहुँचने वाली गाड़ी में बैठे होंगे...कब उस गाड़ी के दो डिब्बे आग में झुलसने लगे होंगे...इन्हीं रेल की पटरियों पर आग से झुलसते शरीरों की तड़पती चीखें.... उनकी कराहें.... उनकी तड़प रेंगती ख़ामोश हो गयी होंगी, लगता है वो ज़िन्दा जिस्म आग लगे...मेरे चारों तरफ़ जलने से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, मेरी रूह सनसना रही है, शरीर बेचैन हो रहा है।

तभी कोई कहता है, “गोधरा आने वाला है।”

सामने की बर्थ पर बैठा छोटा बच्चा थर-थर काँपने लगता है, चीखती आवाज़ में कहता है, “मम्मी! मम्मी! खिड़कियाँ बन्द कर लो, नहीं तो लोग पत्थर मारकर हमें जला देंगे... खिड़कियाँ बन्द करो ना।.. तुम सुनती क्यों नहीं हो?”

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नीलम कुलश्रेष्ठ

e-mail—kneeli@rediffmail.com