Tamacha - 26 in Hindi Fiction Stories by नन्दलाल सुथार राही books and stories PDF | तमाचा - 26 (हीरोपंती)

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तमाचा - 26 (हीरोपंती)

कुछ दिनों तक राकेश दिव्या के करीब नहीं गया। कॉलेज इलेक्शन की तैयारियां जोरों पर थी। एक दिन बाद ही नामांकन दाखिल करने की तारीख़ थी। दिव्या इलेक्शन में उलझी हुई थी। फिर भी उसके मन में बार-बार राकेश की याद आ जाती । वह सोचती आखिर क्या बात हो गई? वह आखिर कहाँ गायब हो गया? फिर किसी तरह उसके मोबाइल नंबर लेकर उसे कॉल करती है।
"हेलो"
"हेल्लो, हाँ कौन?"
"अरे वाह! तुम तो बड़े जल्दी भूल गए।"
"दिव्या मैडम!" राकेश ने दिव्या की आवाज को पहचान कर आश्चर्य के साथ बोला।
"कहाँ गायब हो गए तुम आज कल? जल्दी से आकर मिलो मुझसे पार्टी ऑफिस में। तुमसे कोई जरूरी काम है। और यह दिव्या मैडम क्या है? तुम्हें बोला हुआ है ना कि मुझे मैडम कह के नहीं केवल दिव्या कहकर ही बुलाया करो।" दिव्या ने कुछ नाराज़गी भरे स्वर में बोला।
"दरसअल अभी मैं नहीं आ सकता हूँ। मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही है।" राकेश ने वहाँ जाने से बचने के लिए झूठ का सहारा लेते हुए बोला। लेकिन उसने एक ऐसा जूठ बोल दिया जो जूठ साबित होने में बहुत आसान था। तबियत की बात सुनते ही दिव्या कुछ चिंता के स्वर में बोली। "अच्छा ! क्या हो गया। कोई बात नहीं , तुम घर पर ही रुकना मैं तुम्हारे घर आ जाती हूँ। अपने घर का ऐड्रेस मुझे भेज दो।"
"नहीं , ऐसी खास कोई बात नहीं , तुम भला क्यों अपना समय खराब कर रही हो। मैं कल आ जाऊँगा वहाँ।" राकेश ने अपने जूठ को सच साबित न होने के डर से बोला।
"अरे नहीं.. नहीं ऐसी कोई बात नहीं , समय की। मैं थोड़ी देर बाद घर जाते टाइम तुमसे मिलकर जाऊँगी। तुम बस एड्रेस भेज दो। ओके फिर रखती हूँ अभी। "
"रुको! ज़रा। एक बात करनी है तुमसे।" राकेश ने सही बात बताना ही उसको उचित समझा।
"हाँ बोलो।"
" चलो तुम जब आ ही रही हो, तो एक बात का ध्यान रखना, तुम्हें कोई देखे नहीं यहाँ आते हुए। अथवा तुम जब अकेली होवो तब मुझे कॉल कर लेना। मैं सारी बात बता दूँगा।" राकेश ने कुछ सोच-विचार कर बोला।
"अच्छा! चलो ठीक है। फिर बाद में बात करते है।"
"ओके।"

कुछ व्यस्तता के पश्चात दिव्या ने संध्या के बाद घर जाकर राकेश को कॉल लगाया। राकेश ने अपने घर में तेजसिंह द्वारा किया गया सारा हंगामा उसे बता दिया।
"अच्छा ! तो यह सब तेजसिंह का काम है। वह वैसे भी हमें परेशान करने में ही लगा है। इस बार वह खुद अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने वाला था। पर पापा ने मुझे खड़ा कर दिया। हमें पता चला है कि वह अंदर ही अंदर कुछ प्लान बना रहा है।" दिव्या ने सारी जानकारी राकेश को बताते हुए कहा।
"अच्छा।" राकेश ने केवल इतना कहकर अपना जवाब दे दिया इससे आगे कुछ कहने की उसकी हिम्मत नहीं थी।
"उसको हम सबक सिखा देंगे। तुम कल आ जाना । पार्टी ऑफिस में मिलते है।" दिव्या ने कहा और कॉल कट करने लगी तभी राकेश बोल पड़ा।
"मेरा आना जरूरी है?"
"अच्छा ! लगता है तुम बहुत डर गए हो। उस दिन कॉलेज में तो बड़े हीरो बन रहे थे। अब कहाँ गयी तुम्हारी हीरोगिरी? बस उड़ गए होश?" दिव्या ने राकेश को आश्चर्य और चिढ़ाने के सम्मिलित स्वर में बोला।
"अरे ऐसी बात नहीं है। मुझे तो बस मम्मी-पापा ने रोककर रखा है , इसलिए नहीं आया। वरना उस तेजसिंह से तो क्या ? उसका बाप भी आ जाये तो नहीं डरूँ।" राकेश अबकी बार कुछ ज्यादा ही हीरोपंती में बोल दिया और इसका जवाब दिव्या ने ऐसा दिया कि उसके होश ही उड़ गए।
"अच्छा ! हीरो । अगर इतनी ही आग है अंदर तो कल नामांकन की आखिरी तारीख है। पार्टी की तरफ़ से मुझे प्रेसीडेंट और तेजसिंह को वॉइस प्रेसीडेंट के लिए फॉर्म भरना है। कल तुम अपने सारे डॉक्यूमेंट लेके आ जाना कॉलेज। वॉइस प्रेसीडेंट के लिए तेजसिंह को हटाकर तुम्हारा नाम रखते है। अगर नहीं आये तो फिर कभी अपनी खोखली हीरोपंती नहीं बताना।"
दिव्या के इस जवाब की राकेश को बिलकुल आशा न थी वह चारों खाने चित हो गया। अक्सर हम बेहोशी में क्या-क्या बोल देते है। जिसका हमें तब पता चलता है जब कोई गहरे धक्के से हमें होश आये। वैसा ही हुआ राकेश के साथ । अब कल की चिंता में उसकी आज की नींद तो हराम होनी ही थी।

क्रमशः.....