donation in Hindi Moral Stories by दिनेश कुमार कीर books and stories PDF | कन्यादान

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कन्यादान

 
"अरे वधू के माता - पिता कहाँ हैं भाई ? उनको भी तो बुलाओ स्टेज पर । सभी के फोटो हो गए हैं सिर्फ वधू के माता - पिता ही रहे हैं । "
 
मैं फोटो वाला था, वरमाला स्टेज पर सभी के फोटो ले रहा था । जितना सुन्दर वर उससे कहीं गुणा सुन्दर वधू लग रही थी ।
 
नजरें नीचे झुकाए उस दुल्हन को देख कोई नहीं कह सकता कि वो एक गरीब घर की बेटी है जिसके पिता ने अपने आँगन का चाँद तोड़कर कन्यादान में दे दिया,
 
ऐसा लग रहा था मानों किसी अमीर घराने की गुड़िया को दुल्हन बनाकर बैठाया गया है । जबकि यह चाँद तो उस बूढ़े गरीब माता - पिता की अमानत थी ।
 
पंडित जी के द्वारा उच्च स्वर से कहने पर सभी की दृष्टि वधू के माता - पिता को खोजने लगीं ।
 
वधू के पिता अतिथियों के आगे हाथ जोड़ कर खड़े - खड़े सभी से जवाब मांग रहे थे कि भैया खाना कैसा बना ? कोई गलती हो तो क्षमा कर देना ।
 
वधू वाले हैं न, बिरादरी कहती है कि वधू वाले का पूरी शादी के समय सर झुका रहना चाहिए इसलिए सभी से पूछ - पूछ कर खाना खिला रहे हैं, कोई रह न जाये ।
 
पिता को वर के दोस्त आराम से कंधे पर हाथ रखकर अंकल जी चलिए फोटो खिंचानी हैं कहते हुए स्टेज पर लाये तो उधर अगले कार्यक्रम की तैयारी में लगी, माँ को वर की बहन स्टेज पर लेकर आई ।
 
जैसे ही मैंने कैमरा आंख पर लगाया फोटो क्लिक करने के लिए तो मेरी नजर उस पिता पर पड़ी जिससे वधू की माँ कुछ पैसे स्टेज पर चढ़कर मांग रही थी उस रिवाज को पूरा करने के लिए जो दोनों के ऊपर पैसे की वारने के रूप में दिए जाते हैं ।
 
नंगे पैर, भद्दी सी पैंट और पुराने से कोट पहने पिता के गले में पुराना पसीना पूछा हुआ गमछा पड़ा था, अपनी पत्नी की बात सुनकर हड़बड़ाए और पैंट की जेब से दो सो - सो के नोट निकाले, एक अपने हाथ में पकड़ा एक अपनी पत्नी को दे दिया । वधू की माँ दामाद के पीछे खड़ी थीं और पिता बेटी के पीछे ।
 
जरा मुस्कान लाईये... और क्लिक करके मैंने जैसे ही कैमरा हटाया तो देखा पसीने से तर - बता, भीगे चेहरे पर दाहिनी आंख से आँसू टपक रहे थे पिता के ।
 
हाथ भी कपकपा रहे थे और नजरें बियाईजी पर थीं और काँपते हुए दोनों हाथ जोड़कर कोशिशे थीं बियाईजी से कह देने की कि मेरी बेटी से कोई गलती हो जाये तो क्षमा करते रहना, फूल सी बच्ची है मेरी।
 
उम्र लगभग सत्तावन की होगी बूढ़े बाप की और माँ की उम्र लगभग पचपन की । घर की इकलौती वजह लाडली बेटी से आज पराई हो गयी भाग्यवान, यह आवाज मेरे कानों में जैसे ही पड़ी मेरी आँख से उसी पल आँसू टपक पड़े ।
 
आखिर कैसी किस्मत है एक बेटी के माता - पिता की कि औलाद होते हुए भी आगे की जिंदगी अब अकेले ही गुजारेगें ।
 
जिस व्यक्ति ने स्टेज पर चढ़ते हुए अपनी चप्पलें उतार दी हो, जेब में रखे पैसों के बचे दो टुकड़े भी वापस कर दिए हों और जिसने शादी में खुद के लिए छोड़ो खुद की पत्नी के लिए कपड़े तक खरीद के न दे पाये हो तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितनी भयानक गरीबी होगी उनकी ।
 
जब खोज बीन किया मैंने तो जानकारी लगी कि तीन बीघा जमीन है जो मोटरसाइकिल देने के लिए तीन साल के लिए ठेके पर दे दी उन्होंने । ताकि बेटी को आने - जाने में दिक्कत न हो और दामाद खुश रखे बेटी को ।
 
अपनी तो जीवन कट ही गया है क्या करना, इस लिए बेटी के आभूषण बनवाने के लिए माँ ने कुछ उधार पैसे लेकर और अपने आभूषण को मिलाकर बनवाए ।
 
सम्पूर्ण बारात नाचती - गाती - मुस्कराती सुबह तक बैठी रही, मगर किसी ने ध्यान दिया हो ।
 
जब रात में वर - वधू, एक साथ खाना खाने बैठते हैं तब बेटी ने पिता को पास बुलाकर कहा कि " पिताजी आपने खाना नहीं खाया होगा आओ बैठो पास खा लो ",
 
तब जो शाम से रूका उस पिता का गला फूटा है रुधन से उसको लिख नहीं सकता मैं और शायद ही वहां खड़ा कोई भावुक न हुआ हो ।
 
आज तो पूछ लिया बेटी ने, कल से उस आंगन में वो कली भी नहीं होगी । एक तरफ पिता पड़ा रहेगा तो दूसरे कोने में माँ अपनी गुड़िया की बचपन की उछल कूद की याद में ।
 
सबके लिए सामान्य सी बारात है, बहुत बड़ा त्योहार है किसी का, लेकिन उस पिता के लिए क्या है मुझे नहीं जानकारी ।
 
जब वो शादी तय करके आये थे बेटी की तो पूरे मोहल्ले में मोतीचूर के लड्डू बांटे थे । और उसी दिन से पैसे जुटाने में लग गए । बेटी की पसन्द की साड़ियां लाये, दामाद की पसन्द की गाड़ी लाये लेकिन अब बुढापा कैसे कटेगा उनका ?
 
तो इस सवाल पर जमाना कहता है कि बेटी को तो जाना ही था एक न एक दिन । समय काटेगा उनकी जिंदगी... और न जाने क्या - क्या... ।
 
मुझे आज भी दिखाई देते हैं वो काँपते हाथ, वरमाला स्टेज पर उस बुजुर्ग के । लाल गमछे से जब उन्होंने दो बार आँसू पोंछ लिए फिर भी आंख से आँसू निकलना बंद नहीं हुए तो चेहरा कई बार कैमरों से छुपाने की कोशिश की उन्होंने, लेकिन हम तो देख ही रहे थे न ।
 
खैर कुछ महीने बाद जब पता चला कि दामाद और गुड़िया उन्हें अपने साथ ले गए और उस घर को खाली छोड़ गए तब मैं एक बार और गया वहां ।
 
जहां एक खूंटी पर तीन साल की लड़कीं की फ्रॉक लटकी हुई थी । वो शायद उस लड़की की ही थी, जिसे देख - देख कर शादी के बाद माँ - बाप ने कुछ महीने गुजारे होंगे और आज फ्रॉक को अपने खाली घर के हवाले कर गुड़िया की खुशियों के लिए प्रदेश चले गए ।