soi takdeer ki malikayen - 59 in Hindi Fiction Stories by Sneh Goswami books and stories PDF | सोई तकदीर की मलिकाएँ - 59

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सोई तकदीर की मलिकाएँ - 59

 

59

 

जयकौर को जब तक बस अड्डे पर खङा सुभाष दिखाई देता रहा , वह उसे देखती रही पर जलदी ही वह धुंधला दिखने लगा और फिर आँख से ओझल हो गया । मोटरसाइकिल ऊँची नीची सङक पर बल खाती आगे बढती रही । लङके ने मौन तोङने के लिए पूछा –
चाची , आप कहीं गयी थी क्या ?
हाँ , मायके गयी थी परसों सुबह ।
चाचा नहीं गया आपके साथ ? आप अकेली गई थी ?
उसके मुँह से निकलने वाला था कि अकेली क्यों , मेरा सुभाष गया था न मेरे साथ पर तुरंत संभली –
उन्हें बहुत काम था यहाँ ।
समझ गया चाची । आजकल नई फसल के लिए खेत तैयार करने हैं न ।
पाँच मिनट में ही मोटरसाइकिल हवेली के दरवाजे पर आ लगी । जयकौर को वहाँ उतार कर लङके ने बाईक मोङी और वह जा यह जा । जयकौर उसे हवेली में आने और चाय लस्सी पीने का न्योता देने के बारे में सोचती ही रह गयी और लङका गली का मोङ पार कर गया । जयकौर उसे जाते हुए देखती रही फिर एक लंबी सांस लेकर उसने माथे का आँचल सही किया । दो मिनट इधर उधर देखा । सुभाष दूर दूर तक कहीं दिखाई नहीं दे रहा था । जयकौर ने हवेली में प्रवेश किया । तब तक सुबह का सारा काम निपटा कर बसंतकौर ऊपर चौबारे में आराम करने जा चुकी थी । केसर बरामदे में बैठी चरखा कात रही थी । उसके सामने चंगेर में चार गलोटे कते पङे थे । दूसरी चंगेर में पाव भर पूनियां धरी थी । जयकौर को देख केसर ने यह जानते बूझते भी कि इतने सालों में वह आज तक रसोई या चौंके में कभी नहीं गई , सुलह मारी – आ गयी छोटी । वहाँ सब ठीक है न । खैर सुख है सब । आ , बैठ । चा पिएगी के रोटी खानी है ।
सब ठीक हैं बीबी । अभी तो न चा , न रोटी । बाहर से आई हूँ । बस लस्सी पी लेती हूँ – कहते कहते जयकौर ने नलके पर जाकर अपना हाथ मुँह धोया और चौंके में जाकर बिलौने में से लोटे में लस्सी उडेली । उसमें नमक और भुना हुआ जीरा चुटकी भर कर डाला और लोटा व बाटी ले बरामदे में आ गई और पीढा खींच कर केसर के पास ही बैठ गई । दो बाटी भर के लस्सी पीकर उसे संतुष्टि हुई ।
अब मैं थोङी देर आराम करूंगी तब तक सरदारनी भी उठ जाएंगी तब चाय पिएंगे ।
ठीक है । आप थके हुए आए हो , थोङा आराम कर लो । बरतन यहीं छोङ दो । मैं उठूंगी तो उठा ले जाऊंगी ।
जयकौर भीतर जाकर सुभाष के बिस्तर पर ही आँखें बंद किये लेट गई पर कान दरवाजे पर लगे थे । सुभाष अभी तक नहीं आया था । दस मिनट , बीस मिनट , तीस मिनट , एक घंटा , समय अपनी रफ्तार से बीतता रहा । यह सुभाष रह कहाँ गया । कहीं खेत तो नहीं चला गया । पक्का खेत ही चला गया होगा वरना अभी तक तो कब का हवेली आ जाता । सोचते सोचते उसे नींद आ गई । नींद तब खुली जब सरदारनी बसंत कौर केसर से कह रही थी – जा , उसे भी उठा दे । चाय बन गई है । वह भी पी लेगी ।
आवाज सुन कर जयकौर ने एक भरपूर अंगङाई ली और उठ बैठी । बाहर आंगन में आकर वहाँ बिछी खाट पर बैठते हुए उसने बसंत कौर को सिर झुका कर कहा -
सतश्री अकाल बहनजी ।
सतश्री अकाल । आ गई जयकौरे । वहाँ सब कैसे हैं ? तेरे भाई भतीजे भाभी सब ?
सब बिल्कुल ठीक हैं । भतीजे भतीजियां देख कर बहुत खुश हो गये । आने नहीं दे रहे थे ।
वे तो बाप दादा के अंस हैं न , तो खुश तो होंगे ही । आखिर रक्त मांस का रिश्ता है ।
हाँ जी वह तो है । उसने इधर उधर निगाह घुमाई । सुभाष अभी तक लौटा न था । यदि आया होता तो उसका थैला यही किसी खूंटी से लटक रहा होता । इसका मतलब अभी दो घंटे कम से कम इंतजार और करना पङेगा । भोला सिंह अक्सर साढे सात तक ही खेत से लौटता है । चाय की बाटी उसने पकङ कर केसर को थमाई । एक बाटी में चाय लेकर वह पीने लगी । इतने में बसंत कौर भीतर से बेसन की पिन्नियां ले आई – लो रोटी बनने तक यह खा लो ।
जयकौर ने दो पिन्नियां पकङ ली और खाने लगी । चाय पीकर उसने बरतन नलके के पास इकट्ठे किए और खुद हारी तपा कर मूंग साबुत की दाल चढा दी । तङके के लिए लहसुन , हरी मिर्च और प्याज काटकर एक ओर रखे तथा आटा गूंधने लगी । आटा गुध गया तो पोना गीला करके उसने आटा ढक दिया । इतने में निक्का और उसके साथ तीन चार खेत में काम करने वाले लङके आते दिखाई दिए । जयकौर से अब रहा न गया । वह तुरंत उनके पास जा पहुँची – वह सुभाष , वह कहाँ रह गया ? वह नहीं आया तुम्हारे साथ खेत से ?
सुभाष , वह खेत में कहाँ था ? वह तो परसों से अपने घर गया है न । माँ और भाई से मिलने । सच आप भी तो गई थी अपने गाँव उसी के साथ । आप कब वापस आई ?
दोपहर में । वह मेरे साथ ही लौटा था । मुझे तो एक लङका बस स्टैंड से अपने मोटरसाइकिल पर बिठा कर हवेली छोङ गया । वह बस अड्डे से पैदल आ रहा था । अब तक हवेली नहीं आया । मुझे लगा कि सीधा खेत की ओर ही निकल गया होगा ।
निक्का ठहाका लगा कर हँस पङा – आ जाएगा फिर । यूं ही कहीं गप्पें मारने लग पङा होगा । मिल गया होगा गाँव का ही कोई वेहला अफीमची या नशेङी मानुस ।
जयकौर ने मन में सोचा – सुबह के साढे ग्यारह या बारह बज रहे होंगे जब वे बस से उतरे थे तब से अब रात के सात , साढे सात बज रहे हैं , अभी तक गप्पे लगा रहा है , ऐसा कैसे हो सकता है । पर प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं बोली । चुपचाप चौंके में जाकर लाल मिरचों की चटनी रगङने लगी । अपने भीतर का सारा डर , सहम और गुस्सा उसने घोटना चला कर मिर्चें रगङने में लगा दिया । बसंत कौर ने देखा तो टोका – संभल कर जयकौर , जिस तरह तू रगङ रही है , कूंडा टूट जाएगा । मिट्टी का है भाई । थोङा धीरे हाथ चला ।
जयकौर झेंप गई । उसने धीरे धीरे रगङना शुरु कर दिया । जल्दी ही चटनी बन कर तौयार हो गई । तो उसने थाल से कूंडा ढक दिया और चूल्हे पर तवा चढा कर रोटियां सेकने लगी ।

 

बाकी फिर ...