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गुणा- भाग और शेष

गुणा - भाग और शेष

लघु कथा

‘ कुमार। ’

‘ ?’
‘ ऐसे कब तक घुटते रहोगे? ’
‘ जब तक समय का तकाज़ा रहेगा।’
‘ जि़न्दगी की तन्हाइयों में यूँ अकेले रिस-रिसकर क्यों अपने जीवन की खुदकशी कर रहे हो?’
‘ तुम शायद यह भूल रहे हो कि जो लोग मर जाया करते हैं, वे दोबारा फिर कभी नहीं मरा करते हैं। और मैं भी एक जीवित लाश हूं। मेरे लिये जब जीवन और मृत्यु का कोई अर्थ नहीं रहा है तो ऐसी दशा में, मैं कैसे अपनी आत्महत्या कर सकता हूं?’
‘ जीवन बहुत बड़ा और मूल्यवान होता है कुमार। यदि तुम्हारे समान सब बोझ से दबे और थके-हारे इस प्रकार से सोचने लगें तो संसार का स्वरूप बहुत छोटा हो जाता। क्यों नहीं तुम अपने जीवन की शुरूआत पुनः कर लेते हो?’
‘ ?’
‘ मेरी सलाह मानकर तुम एक बार यह करके तो देखो। फिर देखना कि तुम स्वंय ही यह पाओगे कि जीवन कितना सुन्दर और गौरवशाली होता है। ये बार-बार नहीं मिला करता है। यह तो परमेश्वर की दी हुई तुमको एक निधि है। इसका उचित उपयोग करने में ही तुम्हारा धर्म है। ’
‘ तुम तो सदा से ही ऐसी बातें कहते आये हो? यदि तुम्हारे साथ भी वही होता जो मेरे साथ हुआ है तो शायद तुम ये भाषण मुझे कभी भी नहीं देते।’
‘ तुम्हारे साथ हुई बेइंसाफी का मुझे सख्त अफसोस है। फिर भी इतना तो तुम भी जानते हो कि मनुष्य एक बार गिरने के पश्चात पुनः गिरने की भूल कभी नहीं करता है। प्यार में एक लड़की से धोखा खाने के पश्चात संसार की समस्त लड़कियों को इतना गलत मत समझो कि वे तुमको ही गलत समझने लगे। मेरी मानो और कोई अच्छी सी लड़की देखकर अपना घर बसा लो।’
‘ क्यों? क्या विवाह के बिना मनुष्य के जीवन की पूर्ति नहीं होती?
‘ नहीं। लेकिन इसके अभाव में मनुष्य अधूरा अवश्य हो जाता है। ये तुम अभी नहीं सोचोगे। जब उम्र ढलने लगेगी तो तुम्हारी रिक्तता स्वयं तुमको महसूस हो जायेगी।’
‘ मिन्टो! तुम्हारे कथनानुसार मैंने बार-बार अपनी जिन्दगी का गुणा-भाग किया है और हर बार शेष में इकाई बचती है। केवल एक अकेली इकाई। एक टूटा हुआ अंक। शादी के बाद भी ये इकाई केवल इकाई ही रहेगी. आज के बाद मुझसे ऐसी बातें कभी मत करना कि तुम्हारी ये एक अकेली इकाई भी एक दिन न रहे। प्यार की मंडी में खरीदा गया इंसान कभी भी खरीदार नहीं बना है. यह एक कटु सत्य है. दूसरों को तसल्ली बार-बार दी जा सकती है परन्तु स्वयं को मनुष्य कभी समझा नहीं पाता है।’
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मिन्टो सुनकर ही रह गया। उसने कुमार को देखा। देखा तो तड़प कर ही रह गया। प्यार-मुहब्बत की कुछ आस भरी बूंदों से स्वयं की तृप्ति की लालसा में कुमार शायद जीवन भर के लिए अतृप्त रह गया है? इस बात की पुष्टि उसकी आंखों की वह मूक शैली कह रही थी कि, जहां पर एक सूनी आस के सिवा और कुछ भी नहीं था। मिन्टो से अधिक देखा नहीं गया तो वह कुमार के पास से चला गया। बाहर। निराश, हताश; एकांत में बैठकर वह डूबती हुई सांझ के धुंघलके में छिटकती हुई सूर्य की उस लालिमा को निहारने लगा जहां से पिघला हुआ सोना झील के पानी में कुमार के दिल की हालत के समान ही अबरी बना रहा था. मनुष्य का जीवन कभी-कभी निरुद्देश्य पथ की राहों पर चलते हुए न जाने कहाँ जाकर ठहर जाना चाहता है? कौन जाने? किसको यह भेद पता है? मिन्टो केवल सोचता ही रह गया।
- समाप्त.