Prem Gali ati Sankari - 56 books and stories free download online pdf in Hindi

प्रेम गली अति साँकरी - 56

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थोड़ी देर में झुँझलाते हुए श्रेष्ठ ने रेस्टोरेंट में प्रवेश किया | उनके चेहरे पर कुछ अनमनाहट सी पसरी हुई थी लेकिन मेरे चेहरे पर मुस्कान व सुकून तथा आँखों में खुशी की चमक देखकर शायद उन्हें थोड़ी तसल्ली हुई और वह उस मेज़ की ओर आए जहाँ मैं बैठी थी | 

अंदर सब अच्छा ही था लेकिन उनके मन में तो फ़ाइव स्टार से नीचे की बात गले से उतर ही नहीं रही थी फिर से थोड़ा सा मूड ऐसा ही लगा मुझे श्रेष्ठ का! 

“आखिर इसमें ऐसा क्या है ?” उसने मेरे सामने बैठते हुए पूछा | 

उसे इस बात का कष्ट था कि वह मुझे पहली बार लेकर आया था और वह भी इतनी साधारण जगह पर! 

“मेरा मन था मैं तुम्हें अपने पसंद के होटल में लेकर जाऊँ---”मन बुझा सा था उसका | 

“मेरे लिए यह जगह बहुत महत्वपूर्ण है, वैरी प्रैशस----”

“आखिर क्यों ?” उसने मुझसे पूछा | 

“आप अंदाज़ा लगाइए और सोचिए क्यों होगी?”मैंने मुस्कुराकर कहा और खुद बीते दिनों के चित्र मेरी आँखों में तैरने लगे | 

बैरा हम दोनों के सामने  मेनू कार्ड  रख गया था और मेरे चहरे पर कुछ सोचकर धीमे-धीमे मुस्कुराहट पसरने लगी थी | मैं श्रेष्ठ के चेहरे पर देखती भी जा रही थी कि वह आखिर क्या अंदाज़ा लगा सकेंगे?

पापा हम बच्चों और दादी को भी अम्मा के साथ लेकर कितनी बार यहाँ आए थे और जितनी बार भी आते थे उतनी बार उसी मेज़ पर बैठते थे जिस पर वे लोग पहली बार मिले थे---फिर उनकी उस दिन की कमैंट्री शुरू हो जाती जब वे अम्मा से सालों बाद अचानक इस रेस्टोरेंट में मिले थे | पापा के चेहरे का नूर और उत्साह देखने लायक होता और अम्मा की शर्मोहया से हुई नीची सलज आँखें और कानों तक लाल हुआ चेहरा! हम सब के ठहाके पूरे रेस्टोरेंट में पसर जाते | काफ़ी लोग इस कहानी से परिचित थे और वे नए लोगों से  सब बातें शेयर करते जिनके चेहरे पर मुस्कान थिरकने लगती | 

“आखिर ये ही रेस्टोरेंट क्यों ?”श्रेष्ठ ने फिर से पूछा | 

“आपने कोई अंदाज़ा लगाया---?”

“समझ में नहीं आ सका, तुम ही बता दो----”श्रेष्ठ कभी मुझे आप कहते और कभी तुम ! जैसे मुझसे बहुत करीब हो, पुराने दोस्त हों, ऐसा महसूस करवाने लगते | 

मालूम नहीं क्यों मैं चाहती थी कि वह कुछ तो गैस करें, आखिर पता तो चले वह कहाँ तक सोच सकते हैं?वैसे यह एक तरह से यह मेरा बचपना सा ही तो था | कोई इस प्रकार कैसे सोच सकता है भला ! 

“ओह ! यहाँ अपने कॉलेज टाइम में फ्रैंडस के साथ आते होंगे आप लोग?” श्रेष्ठ ने बड़े कॉन्फिडेंस से कहा | 

मैं बैठी मुस्कुराती रही;

“राइट----?”

“ऊँहूँ---”मैंने ‘न’ में गर्दन हिला दी | 

“तब क्या हो सकता है?”श्रेष्ठ ने धीरे से कहा और कुछ सोचते हुए वहाँ के वातावरण का निरीक्षण करने लगे थे | अभी भी वहाँ युवाओं के ग्रुप्स कई मेज़ों को घेरे बैठे हुए थे | शायद यही देखकर श्रेष्ठ के दिमाग में ख्याल आया होगा | 

“नहीं—नहीं –इसलिए नहीं ---शायद आप वहाँ तक न पहुँच सकें ---” मैंने सोचा, भला बेचारे को कैसे पता चलेगा ?पत्ते खोल ही दिए जाएँ | 

“तो भी, अब तो बता दो न---”श्रेष्ठ जैसे अपनी हार कुबूल कर रहे थे | 

“हाँ, अब तो बताना पड़ेगा ----”मैंने कहा और अम्मा-पापा की कहानी शॉर्ट में बयान कर दी | 

“वाऊ---दिस इज़ वैरी इंटेरेस्टिंग----” मेरी बात सुनकर श्रेष्ठ का उदास सा चेहरा कुछ खिल सा गया | 

“ऐसा बुरा भी नहीं है लेकिन मैं----खैर---हम फिर कभी चले जाएंगे किसी और जगह, यह तो बहुत बढ़िया बात शेयर की तुमने ---सो रोमेन्टिक---! ! ” उसने मेरे सामने कम से कम फिर से फ़ाइव स्टार का नाम तो नहीं लिया | 

“क्या लेना पसंद करोगी ?” श्रेष्ठ ने मेनू कार्ड की ओर इशारा करते हुए पूछा | 

सच बात तो यह थी कि अब खाने की इच्छा मर सी गई थी | उस समय कितनी ज़ोर से भूख लगी थी और अब इतनी देर बाद जैसे उदर में जाने क्यों शांति सी हो गई थी | मेरे साथ ऐसा अक्सर होता है जब भूख लगती है तब इतनी जबरदस्त कि जो सामने हो, बस खा लें लेकिन अगर मन कहीं और चला गया या कुछ देर हो गई तो इतनी देर में उदर महाराज भी शांत हो जाते हैं | 

“कुछ भी थोड़ा हल्का ----”मैंने मेनू एक ओर सरकाते हुए कहा | 

“अरे! अभी तो इतनी ज़ोर से भूख लगी थी, क्या हुआ ?” श्रेष्ठ ने मेनू पर नज़र मारते हुए पूछा | 

“और ---वो क्या कह रही थी ---कौन कुछ खेल रहा है?” अचानक श्रेष्ठ को ध्यान हो आया | 

“हाँ, मैं कह रही थी कि मूषक महाराज कबड्डी खेल रहे हैं, मतलब चूहे पेट में उछल रहे हैं---लेकिन अब वो उछलकर शांत हो गए हैं न तो अब मन नहीं है | मैं लस्सी लूँगी, बहुत दिन हो गए यहाँ की लस्सी पीए | वह भी इतनी हैवी होती है कि पूरी पी नहीं जाती | ”मैंने कहा | 

“ओ! मूषक--यानि चूहा?” वह इतनी ज़ोर से हँसा और उसने ऐसा मुँह बनाया जैसे कोई बहुत आश्चर्यजनक  शब्द सुन लिया हो | फिर मुझे देखकर चुप हो गया | 

लड़का आकर काफ़ी देर से खड़ा ऑर्डर की प्रतीक्षा कर रहा था | श्रेष्ठ ने दो लस्सी का ऑर्डर किया;

“कुछ और भी ले लो----”

“नहीं, आप लीजिए, लस्सी ही बहुत हैवी हो जाती है---”

“मैं भी यही लूँगा, बस----”श्रेष्ठ ने कहा तो मैंने भी उसे कुछ अधिक नहीं कहा | पाँच मिनिट में लस्सी सामने थी | 

“प्लीज़----” उसने लस्सी की ओर इशारा किया और अपना ग्लास उठा लिया | 

मेरे भी हाथों में लस्सी थी, मैं धीरे-धीरे सिप लेने लगी थी | श्रेष्ठ कुछ बात करना चाहते थे लेकिन मुझे अब  वापिस जाने की जल्दी पड़ी थी | मैं शीला दीदी और रतनी की बातें जल्दी से जल्दी जानना चाहती थी | 

“व्हाय----सो अरली---हमने तो कुछ बात भी नहीं की ---”

“मैं शीला दीदी और रतनी से मिलना चाहती हूँ | वैसे ही काफ़ी देर हो गई---आई होप वो मिल जाएँ --- हम फिर मिलते हैं न –जल्दी ! ” मैंने श्रेष्ठ को दिलासा देने की कोशिश की | 

“बड़ी मुश्किल से तो आज मिल सकी हो, फिर मुझे एक टूर काम के सिलसिले में सिंगापुर का भी मारना है | ”उसने चेहरे पर निराशा की परत ओढ़ ली थी | 

“नहीं, जल्दी मिलते हैं ---पक्का---पहले टाइम सैट कर लेंगे न ! ”मैंने कहा | 

“इसी वीक---और मेरी पसंद के होटल में ! ” उसने इस बात पर ज़ोर दिया | 

“ओके, स्योर----”लस्सी खत्म करके हम लोग उठ गए | 

मैं जानती थी वह बहुत खुश नहीं था लेकिन ---ठीक है न ! घर पहुँचने में भी अभी आधा-पौना बल्कि ज़्यादा ही समय लगना था | अनमने से मूड में वह पार्किंग से गाड़ी निकालकर ले आया और हम घर की ओर चल दिए | 

मैंने महसूस किया था, उसने कई बार मेरे कंधे, हाथों को छूकर अपनत्व दिखाने की चेष्टा की थी लेकिन मैं एवॉयड कर गई थी | पता नहीं मुझे क्यों लगा कि मेरी उससे दोस्ती हो पाएगी या नहीं ?दोस्ती जो किसी भी रिश्ते का पहला कदम थी | 

रास्ते में हम दोनों के बीच में चुप्पी पसरी रही, जाने क्यों? वह मुझे घर छोड़कर बाहर से ही निकलने लगा | मैंने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की---

“बाय---” मैंने हाथ हिला दिया |