जंगल की काली रात books and stories free download online pdf in Hindi

जंगल की काली रात

रात के अंधेरे में मैकू अपनी कार को दौड़ाए जा रहा था। मैकू को खुद कार चलाना और दूर-दूर की यात्राएँ करना बहुत ही पसंद था। मैकू की बगल वाली सीट पर उसका दोस्त रमेश बैठा था। वे दोनों मुंबई से मैहर भगवती के दर्शन के लिए जा रहे थे। मैकू के माता-पिता ने लाख समझाया था कि बेटे इतनी लंबी दूरी तुम लोग ट्रेन से सफर करो पर मैकू माना नहीं और अपने दोस्त के साथ कार से ही हो लिया। रात के करीब 2 बजे होंगे। कार सड़क पर भागी जा रही थी। रह-रहकर इक्के-दुक्के ट्रक आदि भी गुजर जाते थे।


अचानक कार में कुछ गड़बड़ी मालूम हुई और मैकू ने सड़क किनारे कार रोक दी। मैकू कार से नीचे उतरकर बोनट खोला और जाँच-पड़ताल करने लगा। उसका दोस्त रमेश कार में ही बैठा रहा था। काफी कुछ इधर-उधर करने के बाद मैकू ने रमेश से कार को चालू करने के लिए कहा।

पर यह क्या रमेश तो बार-बार चाभियाँ घुमा रहा था पर अब कार स्टार्ट होने का नाम ही नहीं ले रही थी। इतनी रात को वे दोनों क्या करें, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अचानक रमेश के दिमाग में एक ख्याल आया और वह सड़क पर खड़ें होकर इक्की-दुक्की आने-जानेवाली गाड़ियों को रोकने के लिए हाथ से इशारा करने लगा। पर कोई गाड़ी रुकने को तैयार नहीं थी। ऐसा भी हो सकता है कि रात का समय और सुनसान इलाका होने के कारण कोई रिस्क लेना न चाहता हो। क्योंकि हाइवे आदि पर रात को लूट-पाट आम बात थी।

अचानक उन्हें एक कार उनके पास आकर रूकती हुई दिखाई दी। बाबा आदम के समय की कार लग रही थी या यूं कहें जैसे किसी राजा-महराजा की कार हो। कार के रूकते ही मैकू भागकर उस कार के पास गया। उस कार में ड्राइवर के अलावा 3 लोग और बैठे थे। इन 3 में से एक महिला और एक किशोरी थी। मैकू ने कार में बैठे लोगों से कहना शुरु किया कि मेरी कार खराब हो गई है। कहीं अगर आस-पास में कोई बस्ती हो या गैराज हो तो वहाँ तक उसे पहुँचा दिया जाए। उसकी बात को सुनते ही उस कार का ड्राइवर नीचे उतरा और अपनी कार की डिग्गी में से एक पतला वायर निकाला। मैकू कुछ समझ पाता तबतक वह ड्राइवर अपनी कार से मैकू की कार को बाँध दिया था। कार को बाँधने के बाद उस ड्राइवर ने इशारे से मैकू को अपनी स्टेरिंग सीट पर बैठने का इशारा किया। मैकू के स्टेरिंग पर बैठते ही रमेश भी मैकू की बगल वाली सीट पर बैठ गया। अब उनकी कार को खींचते हुए वह पुरानी कार एक कच्चे रास्ते से आगे बढ़ने लगी। मैकू और रमेश निश्चिंत लग रहे थे, उन्हें किसी भी प्रकार का डर नहीं लग रहा था क्योंकि इस पुरानी कार के यात्री समृद्ध घराने से लग रहे थे।

लगभग 15-20 मिनट के बाद उनकी कार एक पुरानी हवेली के सामने खड़ी थी। मैकू और रमेश अपनी कार से उतर चुके थे। दूसरे कार से उनका ड्राइवर निकला और रोबदार आवाज में बोला कि आप लोग अंदर चलें। अभी मैकेनिक बुलाकर आपके कार को ठीक करा दिया जाएगा और उसके बाद आप लोग अपने रास्ते पर निकल जाइएगा। मैकू और रमेश कुछ कहे बिना उस ड्राइवर के साथ उस पुरानी हवेली में प्रवेश कर गए। हवेली बहुत ही बड़ी थी और बहुत ही पुरानी लग रही थी और, एक बात मैकू और रमेश को चौंकाने वाली थी कि इतने समृद्ध लोगों के रहते हुए यह हवेली इतनी गंदी क्यों लग रही है। जगह-जगह झाले लटके हुए थे। अजीब प्रकार की बू भी आ रही थी। मैकू और रमेश कसकर एक दूसरे का हाथ पकड़े उस बूढ़े ड्राइवर के पीछे-पीछे हवेली में अंदर ही अंदर बढ़े जा रहे थे। अचानक हाथ में चिराग लिए एक अधेड़ महिला आई जो थोड़ी सी डरावनी लग रही थी उसने इशारे ही इशारे में उस ड्राइवर से कुछ कहा। वह ड्राइवर मैकू और रमेश को उस अधेड़ महिला के पीछे जाने का इशारा करते हुए खुद ही दूसरी तरफ चला गया। वह अधेंड़ महिला उन दोनों को लेकर एक बड़े कमरे में दाखिल हुई। यह कमरा काफी अच्छा था पर यह चौंकाने वाली बात लग रही थी कि इस पुरानी, गंदी हवेली में इतना सुन्दर, सुसज्जित कमरा कैसे हो सकता है। वह कमरा दुधिया प्रकाश से भरा था पर यह प्रकाश कहाँ से आ रहा था, कुछ पता नहीं चल पा रहा था। मैकू और रमेश उस कमरे में लगी आलिशान कुर्सियों पर बैठ गए। उनकी आव-भगत शुरु हो गई थी पर अब उन दोनों को बहुत सारी बातें अजीब लग रही थीं।

अब उस बड़े कमरे में कम से कम 12-15 लोग जमा हो गए थे। कहीं स्वादिष्ट भोजन की खुशबू थी तो कहीं पैगों का दौर चलना शुरु हो गया था। मैकू तो आए दिन दूर-दूर की यात्राएँ करता था। रात-बिरात वह कहीं भी चला जाता था। उसे भूत-प्रेत पर विश्वास तो था पर वह एकदम निडर स्वभाव का था। वह अपने आप को माँ मैहरवाली का बहुत बड़ा भक्त मानता था और वर्ष में कम से कम दो बार माँ के दर्शन अवश्य करता था। उसके गले में माँ की माला हमेशा लटकी रहती थी और साथ ही उसके शर्ट की ऊपरी जेब में एक छोटा-सा दुर्गा चालीसा। उसे जब भी थोड़ा समय मिलता, इस चालीसा को निकालकर पढ़ लिया करता था। पर आज निडर मैकू को लगने लगा था कि वह और उसका दोस्त किसी बहुत बड़ी मुसीबत में फँस गए हैं। उसके आस-पास के लोगों का व्यवहार कभी-कभी अजीब चौंकाने वाला होता लग रहा था। मैकू फिर भी डरा नहीं और हिम्मत से काम लिया। उसने अपने दोस्त को उठने का इशारा किया और पास में लगे एक सोफे पर बैठने का इशारा किया और इशारे में यह भी कहा कि तुम कसकर मेरा हाथ पकड़े रहना और डरना तो बिलकुल नहीं। अच्छा तो यह बात थी, अब मैकू और रमेश जिस सोफे पर बैठे थे, वहाँ पास में ही एक आलीशान शीशा (दर्पण) लगा था। मैकू कनखी आँखों से रह-रहकर उस शीशे में देख ले रहा था। रमेश को अजीब लगा कि मैकू उन कुर्सियों पर से उठकर इस सोफे पर क्यों बैठा। शायद मैकू रमेश के जेहन में उठनेवाली बात को समझ लिया था। उसने उसे शीशे में देखने के लिए इशारा किया। अरे यह क्या, ज्योंही रमेश ने शीशे में देखा, उसकी तो सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई। भय से उसका चेहरा पीला पड़ गया। दरअसल उस कक्ष में चलते-फिरते अच्छे लोग, इस शीशे में बहुत ही भयानक लग रहे थे।

इतने भयानक की रमेश का कलेजा उसके मुँह को आ गया। वह पसीने से पूरी तरह भीग गया। शीशे में उसने यह भी देखा कि यह लोग जो पानी या मदिरा पी रहे हैं वह खून जैसा लग रहा है। यह लोग जो खा रहे हैं वह किसी की माँस या हड्डियाँ लग रही हैं। वह तो अब पूरी तरह से परेशान था, क्योंकि उसे लग रहा था कि अब उन दोनों का बचना असंभव है। अभी वे आपस में कुछ बात कर पाते तभी एक बूढ़ा, बड़ी-बड़ी मूँछों वाला उनके पास उपस्थित हुआ। वह लोई ओढ़े हुए था और उसके पीछे-पीछे 2-3 सेवक टाइप के लोग (भूत) थे। वह बुढ़ा मुस्कुराते हुए मैकू से कहा कि आज उसकी पोती का जन्मदिन है। अच्छा हुआ कि आप लोग भी आ गए। हमारी पोती का जन्मदिन धूम-धाम से मनाया जाएगा और इसमें शामिल होने वाले सभी लोगों को राजसी कपड़े पहनने होंगे। अस्तु आप लोगों से गुजारिश है कि पास के कमरे में जाकर अपने पहनावे बदल लें। यह बात कहते हुए वह बूढ़ा बार-बार मैकू के गले में लटकती हुई माला को देख रहा था। उस माला के तरफ जब भी उसकी नजर जाती वह थोड़ा भयभीत लगने लगता। अरे तभी अचानक एक खूबसूरत किशोरी वहाँ आ गई और उस बूढ़े की ओर देखकर बोली कि दादाजी, इस अवसर पर आप मुझे क्या उपहार देने वाले हैं। वह बुढ़ा हँसा और मैकू तथा रमेश की ओर देखते हुए बोला कि बेटी तूझे मैं ऐसा उपहार दूँगा कि तूँ खुशी के मारे झूम जाएगी। इतना कहकर बूढ़े ने जोर का अट्टहास किया। ऐसा लगा कि उसकी अट्टहास में पूरी हवेली अट्टहास करने लगी है। अब माहौल और भी डरावना होता जा रहा था। खैर मैकू ने अपना विवेक नहीं खोया और रमेश का हाथ पकड़कर पहनावा बदलने के लिए पास के बताए कमरे में तेजी से चला गया। कमरे में पहुँचकर जब रमेश डर के मारे अपने कपड़े उतारने लगा तो मैकू ने उसे रोका और कहा, बेवकूफी मतकर। अपने कपड़े को पहनकर रख और साथ ही उसने अपने जेब से दुर्गा चालीसा को निकालकर रमेश की जेब में रख दिया और कहा, डर मत। देखा नहीं कि मेरे गले की माला को देखकर वह बूढ़ा कैसा भयभीत लग रहा था। अब उन दोनों ने वहाँ रखे कीमती राजसी कपड़ों को अपने पहने हुए कपड़ों के ऊपर ही पहन लिए।

कपड़ें पहनने के बाद मैकू ने रमेश का हाथ कसकर पकड़ते हुए कहा कि तुम डरना मत। हम लोगों के साथ माँ मैहरवाली हैं और उनके रहते ये भूत-प्रेत हम दोनों का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। इसके बाद वे दोनों कमरे से निकलकर फिर उस बड़े कक्ष में आकर सोफे पर बैठ गए। देखते ही देखते पार्टी शुरु हो गई। उस बूढ़े की पोती किसी राजकुमारी से कम नहीं लग रही थी पर उसी को शीशे में देखने पर वह एक महा कुरूप, डरावनी साया के रूप में तब्दील हो जा रही थी। वह किशोरी प्रसन्न मन से मैकू के पास आई और उसके कंधे पर एक हाथ रख दी। अरे यह क्या कंधे पर हाथ रखते ही ऐसा लगा कि जैसे उस किशोरी को ४४० बोल्ट का करेंट लगा हो, अभी कोई कुछ समझ पाता, तबतक वह बहुत दूर जाकर गिर गई। अब तो वहाँ हड़कंप मच गया। मैकू सब समझ रहा था, उसे लगा कि यह जरूर उसके गले की माले के कारण हुआ है। उस किशोरी के दूर गिरते ही कई भूत-प्रेत उसे उठाने में लग गए जबकि वह बूढ़ा दौड़कर मैकू के पास आया और थोड़ा तेज आवाज में पर डरते हुए बोला कि मैंने आपसे कहा था न कि आप अपने कपड़े उतारकर हमारे यहाँ के कपड़े पहने। पर आपने नहीं माना। आप अपने गले में जो माला पहने हैं, उसे भी उतारकर रख दीजिए, यही हमारे यहाँ की प्रथा है। मैकू ने ना में सिर हिलाते हुए कहा कि वह किसी भी हालत में इस माले को नहीं उतारेगा और इतना कहते ही वह रमेश का हाथ और कसके पकड़ते हुए खड़ा हो गया। अब तो उस कमरे का हाल पूरी तरह से भयावह हो गया था। जो लोग सीधे-साधे लग रहे थे। अब वे भयानक हो गए थे। कुछ के तो बड़े-बड़े दाँत बाहर निकल आए थे तो कुछ अजीब हरकत करते हुए मैकू और रमेश को डराने की कोशिश कर रहे थे। पर किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि इन दोनों के पास आएँ। मैकू ने रमेश से कहा कि लगभग सुबह होने वाली है और सुबह होते ही यह भूतिया माया दूर हो जाएगी।

इसलिए हमें कुछ समय और निडरता के साथ इनका सामना करना है। इसके बाद वे दोनों फिर से वहीं सोफे पर बैठकर आँख बंद करके माँ मैहरवाली भगवती को गोहराने लगे। उनके अगल-बगल में बहुत सारी आवाजें, चीख-पुकार आ रही थी पर वे इन सबसे बेखबर होकर बस माँ का नाम ही लिए जा रहे थे। कुछ समय के बाद अचानक आवाजें आनी बंद हो गईं। मैकू और रमेश ने अब अपनी आँखें खोल दीं। अब वहाँ इन दोनों के अलावा कोई नहीं था। अरे हवेली भी तो नहीं थी तो क्या ये दोनों सपना देख रहे थे। खैर वे दोनों उठे और वहाँ से चलने को तैयार हुए। सुबह होने वाली थी और सूरज की आभा उस जंगल में धीरे-धीरे फैलना शुरु हो गई थी। अचानक मैकू कार के पास गया और दरवाजा खोलकर बैठ गया। उसने कार को स्टार्ट की तो वह बिना देर किए चालू हो गई। अब उसके बगल में रमेश भी बैठ चुका था। वे जंगल से बाहर निकलकर एक कच्चे रास्ते पर हो लिए। कुछ दूर आगे चलने पर उन्हें एक चाय की टपरी दिखाई दी। मैकू ने वहीं अपनी कार रोक दी और कार से उतरकर उस टपरी में आ गया।

टपरी में आते ही दुकानदार थोड़ा डर से मैकू की तरफ देखकर बोला, साहब, आप लोग सुबह-सुबह इस जंगल में से कहाँ से आ रहे हैं? कहीं आप लोग रात को ही नहीं तो ।
मैकू एक टूटी बेंच पर बैठते हुए अब तक की सारी घटना सुना दी। दुकानदार ने एक लंबी साँस लेकर कहा कि अच्छा हुआ कि आप लोग सही सलामत बच गए। नहीं तो कई सारे लोग इन भूतों के ऐसे शिकार हुए हैं कि या तो वे पागल हो गए या किसी बड़ी बीमारी के शिकार। इसके बाद उस दुकानदार ने सहमते हुए अपनी आपबीती उनको सुना दी।


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