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नाजायज़

कहानी/शरोवन
**नाज़ायज़*

'पापा जी, थोड़ा बहुत तो खा लीजिये। ऐसे कब तक रहेंगे आप। दो दिन तो हो गये हैं, और आपने कुछ भी नहीं खाया है। मेरा दिल कहता है कि, मम्मी जरूर ही वापस आ जयेंगी, मैं रोज़ ही खुदा से दुआ कर रही हूं।”

बदली ने खाने की प्लेट और पानी का गिलास अपने पिता सनी के सामने पड़ी छोटी सी मेज पर रख कर कहा तो गंभीर बैठे हुये उसके विचारों की श्रृंखला अपने आप ही बिखर गई। उसने उदास मुद्रा में अपनी युवा पुत्री बदली को एक बार देखा, फिर थोड़ा संभलकर बैठते हुये वह उससे बोला कि,

'देखो बेटी, मनुष्य का जीवन एक ऐसा तमाशा है, जो कभी तो बहुत अच्छा लगता है और कभी बिल्कुल भी नहीं। मैं पिछले उन्नीस वर्षों से यही सोचता आ रहा था कि कोई अच्छा सा अवसर आने पर तुम्हारी मां को सब कुछ विस्तार से समझा दूंगा, पर उसने तो कुछ सुनना ही नहीं चाहा। सुनना तो एक तरफ उसने तुम्हारे ऊपर मेरी अवैद्दय संतान होने का दोष भी लगा दिया। अब तुम ही सोचो कि, मैं ये बात कहां तक सहन कर सकता हूं?'

'!!'

'हमारे प्रभु यीशु मसीह ने कितनी जिल्लत अपमान सहा था और लोगों की हरेक प्रकार की बातें सुनी थीं, उस सब के समक्ष ये तो कुछ भी नहीं है।'

-खामोशी.

बदली की इस प्रकार की बात को सुनकर सनी अवाक् सा रह गया। वह चाह कर भी फिलहाल कुछ नहीं कह सका। केवल गंभीर होकर रह गया तो बदली ने बात आगे बढ़ाई। वह बोली कि,

'आप कहो तो मैं खुद मम्मी से जाकर बात करूं। हो सकता है कि मेरे कहने से वह बात मान जायें.'

'देखो बेटी, तुमने और मैंने ऐसा कोई भी गलत कार्य नहीं किया है कि, जिसके कारण हमें शर्मिन्दा होना पड़े। वह तुम्हारे ही कारण यहां से गई है और तुम्हीं ही उसे मनाने जाओगी। फिर वह खुद तो गई सो गई, अपने साथ तुम्हारे दोनों छोटे भाईयों को भी ले गई। उसे इतना भी ख्याल नहीं आया कि उन दोनों बच्चों की पढ़ाई का कितना नुक्सान होगा। उनके भविष्य का क्या बनेगा। अपने घर की दहलीज से कदम बाहर निकालने से पहले उसे कुछ नहीं तो अपनी औलाद के भविष्य के बारे में तो सोचना ही चाहिये था?'

तब अपने पिता सनी की बात को सुनकर बदली काफी देर तक चुप बनी रही। वह चुप ही नहीं, बल्कि गंभीर भी हो गई थी। इतने में सनी ने खाने की प्लेट को हाथ बढ़ा कर आगे खिसकाया, चाहा कि थोड़ा बहुत खाले, पर तभी बदली ने फिर से अपनी बात आरंभ कर दी। वह बोली,

'जब तक मम्मी की गलतफहमी दूर नहीं होगी, तब तक कुछ भी होना मुनासिब नहीं है और इसके लिये किसी तीसरे ही को बीच में आना पड़ेगा।'

'हां ! बेटी तुम ठीक कहती हो, पर उसकी गलतफहमी तो तब दूर होगी जब कि वह कुछ सुनने की कोशिश करे। वह तो इस विषय पर कुछ सुनना ही नहीं चाहती है। बस उसके मस्तिष्क में केवल एक ही बात रहती है कि, मेरा शादी से पूर्व किसी से नाजायज़ सम्बंध रहा था।'

'तब फिर ऐसा कब तक चलेगा। आप कब तक अपने आपको इस तरह से गलाते रहेंगे। और खुद मम्मी भी क्या चैन से रह सकेंगी?'

बदली ने कहा तो सनी अपने सिर पर हाथ रखते हुये बोला कि,

'वही तो नहीं सोच पा रहा हूं?'

'तब फिर एक काम करते हैं हम।'

'वह क्या?'

'आप जानते हैं कि, मम्मी के जाने का कारण केवल मैं हूं। इस कारण मैं फिर से अपने होस्टल लौट जाती हूं।'

बदली ने कहा तो, सनी अचानक ही चौंक गया। वह एक दम से बोला कि,

'तीर अपनी कमान से छूट चुका है। तुम सोचती हो कि, तुम्हारे यहां से चले जाने भर से ही सारी समस्या हल हो जायेगी और तुम्हारी मां बड़ी आसानी से घर वापस आ जायेगी? उसको तो मैं जितनी अच्छी तरह से जानता हूं, तुम नहीं। वह भूरी और कंजी आंखों वाली स्त्री है, एक दम ज़िद्दी मिज़ाज की।'

'??

-खामोशी।

अपने पिता की इस बात पर बदली खामोश हो गई। वह आगे फिर कुछ भी नहीं कह सकी। केवल मूक बनी हुई कमरे के अंदर की सारी वस्तुओं को एक क्रम से निहारने लगी। तब अपने चारो तरफ की चुप्पी को देख कर सनी ने बात आगे बढ़ाई। वह बोला कि,

'देखो बदली बेटा, तुम तो सारी वास्तविकता को जानती हो। मैंने तुमसे कभी भी कुछ नहीं छिपाया है। राहेल तुम्हारी जन्म देने वाली मां है और तुम उसकी ही बेटी हो। मैंने हमेशा तुम्हारी मां की आंखों में उसकी खोई हुई पुत्री की गुमशुदा खामोशी के भरपूर चिन्ह देखे हैं। ये और बात है कि, वह अपने इस दर्द को मुझसे चाह कर भी कभी कह नहीं सकी है, लेकिन इसके बाबजूद जब आज उसको अपनी संतान मिली भी तो बगैर कुछ भी जाने और सुने तुमको तिरस्कृत करके चली भी गई। उसे क्या मालुम है कि उसकी बेटी यानि कि तुम पिछले बीस वर्षों से अपनी मां की ममता के लिये तरसती आ रही हो। ये ठीक है कि, मैंने तुम्हारे पिता की कमी पूरी कर दी, परन्तु फिर भी तुम्हें अपनी मां तो चाहिये ही।'

तब सनी की इस बात को सुन कर बदली ने कुछ कहना चाहा। वह बोली कि, 'लेकिन पापा…!'

'लेकिन क्या…?'

'मम्मी को सारी वास्तविकता पता भी तो नहीं है।'

'हां, मैं जानता हूं, पर मुसीबत तो ये है कि, वह असलियत को सुनना भी नहीं चाहती है।'

इस बात पर बदली फिर से चुप हो गई। वह थोड़ी देर तक तो कुछ भी नहीं कह सकी। केवल इधर-उधर देख कर ही सारी समस्या पर जैसे गंभीरता से विचार करने लगी। फिर काफी देर तक सोचने के पश्चात उसने सनी से कहा कि, 'इसीलिये तो मैं चाहती थी कि…'

'वह क्या?'

'मुझे एक बार मम्मी से बात तो कर लेने दीजिये।'

बदली की इस बात को सुन कर सनी फिर से चुप हो गया तो उसने फिर से अनुरोध किया। वह अपने पिता से बोली,

'पापा जी! मुझे एक बार तो जाने दीजिये… प्लीज।'

तब बदली की ये बात और आग्रह को देख सनी ने उसे फिर से समझाना चाहा। वह उससे बोला कि,

'बेटी, मैं जानता हूं कि, तुम अब कोई छोटी बच्ची नहीं हो। बड़ी हो। सयानी हो रही हो। स्नातक कक्षा में पढ़ रही हो। तुम भी अब अपना अच्छा-भला समझने लगी होगी। जीवन के बहुत से मामलों में अपने फैसले खुद भी करने लायक हो गई हो। तुम्हारी इच्छा है, अपनी मां से मिलने की, तो वहां जा सकती हो, लेकिन मैं नहीं चाहता हूं कि, तुम अपनी मां के पास से बिना किसी भी कारण के तिरस्कृत होकर वापस आओ। मुझे तुम्हारी मां के चले जाने का इतना अफसोस नहीं है, दुख है तो यही कि, तुमने अपने जीवन के उन्नीस वर्ष अपनी मां के रहते हुये भी उसकी ममता के बगैर तरसते हुये गुजार दिये। वह तो तुम पर दोष लगाने से नहीं चूकी और तुम हो कि आज भी उसका ही पक्ष ले रही हो?'

अपने पिता की इस बात पर फिर बदली ने आगे कुछ भी कहना उचित नहीं समझा। वह सनी की मनोस्थिति से भली भांति परिचित थी। उसकी परेशानी में खुद भी परेशान थी। समझदार थी। इस लिये नहीं चाहती थी कि, मात्र उसके घर में पदार्पण के कारण उसके मां बाप का बसा-बसाया घरोंदा बिखर कर रह जाये। यही सब सोच कर वह चुप हो गई और अपने पिता के सामने से खाने की उस प्लेट को जिसमें से उसने कुछ खाया भी और नहीं भी, उठा कर रसोई में चली गई। वह जानती थी कि, ये सब कुछ होने से पूर्व उसका पिता सनी किसकदर सुखी और प्रसन्न नज़र आता था। पर अचानक ही न जाने ऐसा क्या हो गया था कि, वह स्वंय कि 'बदली' थी, जिसकी एक लहर से ही सारा घराना अपने नसीब पर मुसीबत के आंसू बहाने लगेगा। एक ऐसी 'बदली' कि, जिसकी हल्की झलक मात्र से ही सारे परिवार पर अंधकार की चादर फैल कर रह गई थी।

बदली रसोई में आकर ऐसा ही कुछ सोचे जा रही थी तो दूसरी तरफ सनी भी कुर्सी से अपनी पीठ टिकाये हुये कमरे की छत को बिना मकसद ही ताकता हुआ जैसे अपने अतीत में खो गया था। उसे अपने कालेज के वे सुनहरे दिन स्वतः ही याद आने लगे जब कि वह किसी समय कालेज में पढ़ा करता था और वह स्नातक कक्षा का छात्र था . . .'

तब ऐसा ही कोई दिन था। जुलाई का माह था। कालेज खुले हुये मुश्किल से एक सप्ताह ही हुआ होगा कि, तब ही सनी ने राहेल को जीवन में पहली बार देखा था। दुबली-पतली, छरहरे बदन की एक बहुत ही साधारण, स्नातक कक्षा की छात्रा के रूप में। तब राहेल भी सनी ही की कक्षा में प्रवेश लेकर आई थी। सुंदरता और असाधारणता के नाम पर राहेल में जो कुछ भी सनी ने पाया था, वह थी उसकी गहरी, भूरी, कंजी आंखे, जिन्हें एक बार देखने के पश्चात सनी के सारे बदन में तब हलचल सी होकर रह गई थी। राहेल को देखने के बाद सनी के मन और मस्तिष्क में तब ढेरों विचार तो उत्पन्न हुये ही थे, साथ ही तमाम तरह के सपने भी आकर ठहर गये थे। वह राहेल को लेकर तब बहुत कुछ सोचने पर विवश हो गया था। अपनी ज़िन्दगी के वे ढेरों-ढेर सपने जिन्हें राहेल की पहली ही झलक ने सब तरफ से तब उसको एकत्रित करने पर विवश कर दिया था।

कालेज के आरंभ के दिनों में उसने राहेल से कुछ भी नहीं कहा। वह बस अपने मन की बात, केवल मन में ही रखे हुए जीवन के सुखद सपनों में रहने लगा था। वह प्रतिदिन ही राहेल को चोर नज़रों से देखता, सोचता, और फिर कभी उसका मन करता कि वह राहेल से बात करे, परन्तु फिर न जाने क्या सोच कर चुप हो जाता था। विशेष कर ये कि, दोनों एक ही कक्षा के छात्र थे। एक ही साथ पढ़ा करते थे और वह यह भी नहीं जानता था कि राहेल कौन है? कहां से आई है? उससे किस प्रकार सम्पर्क करना चाहिए?

सनी के तब दिन इन्हीं सोच-विचारों में एक-एक करके खिसकते जा रहे थे और वह अभी तक यह निर्णय नहीं कर पाया था कि वह अपनी बात राहेल तक कैसे बढ़ाए? किस प्रकार उस को जाहिर करे वह भी उसके सपनें देखने लगा है। उसने कई बार चाहा भी कि वह राहेल से बात करे पर उसकी चुप्पी देख कर कभी उसका साहस भी नहीं हो सका था। लेकिन एक दिन अचानक ही उसकी आशाओं को जैसे कोई नया जीवन मिल गया था, जबकि उसने अचानक ही राहेल को अपने पिता के साथ स्थानीय चर्च की इबादत में देख लिया था। तभी उसे यह जान कर और भी प्रसन्नता हुई थी कि राहेल भी एक मसीही लड़की है, और तब उसकी आशाओं पर और भी उम्मीदों के काफिले आकर ठहर गए थे। तब उसने सोचा था कि, अब राहेल से बात करने और उस तक अपने इरादे खोलने में उसे कोई भी संकोच नहीं होना चाहिए। उसी दिन चर्च की इबादत के पश्चात राहेल ने उससे अपने पिता का परिचय भी कराया था और बताया था कि, उसके पिता मिशन में ही कार्यरत हैं और मिशन के ही कार्य से यहां आए हुए थे। वह तो चूंकि हॉस्टिल में रह कर पढ़ा करती थी, इसलिए दूसरे चर्च जाया करती थी, परन्तु उस दिन वह अपने पिता के कारण वह इस चर्च में आई थी। तब कितने महीनों के पश्चात उसकी राहेल से यह पहली बात हुई थी। ये सोच कर सनी और भी खुश हो गया था, कि चलो अब उसके भविष्य के वह रास्ते तो खुल ही गए हैं, जिन पर उसने अपनी हसरतों के पुष्प उगाने की कभी कल्पना की थी।

राहेल से उस दिन की भेंट के पश्चात फिर इतना तो हुआ था कि, वे दोनों फिर प्रायः ही कक्षा में एक दूसरे से बात-चीत भी कर लिया करते थे। इस तरह से सनी के दिन उम्मीदों के सहारे अच्छी तरह से गुज़रने लगे थे। राहेल से भेंट और प्रायः बात होने के कारण उसे अपने सपनों के पूर्ण हो जाने की उम्मीद और लग गई थी। फिर इस प्रकार किसी तरह से स्नातक कक्षा का प्रथम वर्ष व्यतीत हो गया। कालेज बन्द हुए तो राहेल कुछ दिनों के लिए अपने घर चली गई, परन्तु जुलाई में वह फिर से आ गई। इस बार भी सनी और वह एक ही कक्षा में थे और उनका यह अंतिम वर्ष था। राहेल इस बार पहले से अधिक बदली हुई पर अधिक प्रसन्न नज़र आने लगी थी। चूंकि यह उसका अंतिम वर्ष था, इसलिए सनी भी अपनी बात राहेल से कहने का अवसर ढूंढ रहा था।

फिर इस प्रकार थोड़े से दिन और बीत गए। छमाई परीक्षा आई और समाप्त भी हो गई। कालेज में सभी क्रिसमस में छुट्टियों की तैयारियां करने लगे। हवाओं में भी काफी ठंडक आ गई थी। धीरे-धीरे वातावरण ने कड़ी ठंड की चादर लपेट ली। रातें सिकुड़ने लगीं और स्वतः ही सड़कें सही सांझ से खामोश और सुनसान होने लगीं। जाड़े के कारण लोगों ने निकलना बंद कर दिया था। सनी अभी तक राहेल को अपने मन में बसाए हुए, उस तक अपना संदेश पहुंचाने का अवसर ढूंढ़ ही रहा था कि तभी एक दिन राहेल ने उससे अपने कालेज में कहा था कि,

'सनी, यदि मैं तुम्हें अपने घर पर बुलाऊं तो आओगे ?'

'?'- राहेल के इस अप्रत्याशित प्रश्न को सुन कर सनी चौंका तो, पर उससे भी अधिक उसकी जिज्ञासा ये जान लेने की हुई कि राहेल ने ऐसा क्यों कहा था? वह उसकी भूरी आंखों में झांकता हुआ बोला,

'हां, हां, क्यों नहीं? कोई खास बात है क्या?'

'जब कोई विशेष बात होती है, तभी तो बुलाया जाता है।'

'क्या मैं जान सकता हूं कि ऐसी क्या विशेष बात है?' सनी ने उत्सुक होकर पूछा तो राहेल मुस्कराते हुए बोली कि,

'मैं चाहती हूं कि तुम जब मेरे घर पर आओ तभी तुम्हें पता चले कि मैंने तुम्हें क्यों बुलाया है?'

'ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी, पर जाना कब होगा?'

'जब कालेज बन्द हो जायेंगे, और गर्मी की छुट्टियां हो जायेंगी। तब मैं यहां से जाने से पहले तुम्हें अपने घर का पता, तारीख और आने के मार्ग के बारे में सब सूचना दे दूंगी। लेकिन तुम आओगे तो न?'

राहेल की इस बात पर सनी जैसे आश्चर्य से गड़ गया था। वह तब गंभीर होकर राहेल से बोला था कि,

'लगता है कि दो वषों तक हमारे साथ-साथ पढ़ने के पश्चात भी तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है?'

'नहीं, ऐसी बात नहीं है, मैंने तो इस कारण कहा था कि, जहां मैं रहती हूं, वह जगह कोई पास में नहीं है। लोग अक्सर कहने के पश्चात टाल जाया करते हैं।'

'तुम अल्मोड़ा की रहने वाली हो?'

'हां।'

'मैं अवश्य ही आऊंगा।'

'तुम यदि आओगे, तो नैनीताल भी घूम सकते हो। अल्मोड़ा से नैनीताल कोई विशेष दूर भी नहीं है।' राहेल ने कहा तो सनी ने अपनी बात पक्की करते हुए उससे कहा था कि,

'मैं नैनीताल घूमने जाऊं या न जाऊं, पर तुम्हारे घर आने का प्रोग्राम नहीं टाल सकता हूं।'

उपरोक्त बातों की समाप्ति के पश्चात फिर सनी की राहेल से कोई भी विशेष बात नहीं हो सकी थी। इसके साथ ही वह जो अपने मन की बात और विवाह के प्रस्ताव के ख्याल को राहेल से कहने का अवसर ढूंढ़ रहा था, राहेल के इस प्रकार घर बुलाने के प्रोग्राम के कारण सशोपंज में पड़ गया था। तब सनी ने सोचा था कि हो सकता है कि जो कुछ वह राहेल के बारे में सोचता रहा है, ठीक वैसा ही कहीं राहेल तो नहीं सोचे जा रही है? इस लिए अपने मन में बसे इस ख्याल को वह फिलहाल टाल गया था और सोच लिया था कि जब वह उसके घर जाएगा तभी सारे माहौल की नज़ाकत को देख कर, वह अपनी बात कहे या नहीं? इसका निर्णय उसने स्थगित कर दिया था।

फिर कुछ दिनों के पश्चात अंतिम परीक्षायें भी हो गईं। कालेज बंद हो गये और गर्मी की छुट्टियों में राहेल सनी को सब कुछ समझा­बुझाकर अपने घर आने का निमंत्रण एक बार फिर से देकर अल्मोड़ा चली गई और इसके साथ ही सनी भी उसके घर जाने का कार्यक्रम बनाने लगा।

तब एक दिन निर्धारित समय पर सनी अपनी ज़िन्दगी की तमाम हसरतों का ढेर बांधे हुये अल्मोड़ा के लिये चल पड़ा। जाते समय वह सोचे जा रहा था कि, उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि, अल्मोड़ा की इन बेहद खुबसूरत घाटियों में, जहां हर समय आवारा बादलों की मटरगश्ती हुआ करती है, उसकी ज़िन्दगी के हसीन सपनों की दुनियां भी कैद होगी। वह जगह जहां पर सदा वर्षा की रिमझिम अपना नृत्य करती रहती है, उसके जीवन के न जाने कितने संजोये हुये सपनों का हिसाब लिये हुये उसके आगमन में अपनी आंखें बिछाये हुये उसका स्वागत करने के लिये आतुर होंगी। पहाड़ी देश और उसकी सूनी घाटियां उसके भविष्य का सारा प्यार समेटे हुये मानो उसकी झोली भर देने का संकेत कर रही होंगी?

सनी यही सब कुछ सोचता हुआ, अपने दिल के घरौंदे में चुपचाप अपनी लालसाओं और मुहब्बतों को संभाले हुये चला जा रहा था। गाड़ी की गति के साथ-साथ मानो उसके दिल की धड़कनें भी शामिल हो गईं थीं। फिर जब वह राहेल के घर पहुंचा तो वहां का दृश्य देख कर वह शीघ्र ही कुछ समझ भी नहीं सका था। मेहमान तो दिख रहे थे, पर उनकी संख्या कोई विशेष अधिक भी नहीं थी। वह वहां आये हुये मेहमानों में से किसी को भी नहीं जानता था, सो किसी से अधिक बात-चीत करने का प्रश्न ही नहीं होता था। उसके दिल में पहले ही से कोई छिपी हुई संदेहयुक्त बात थी, सो वह अधिक पूछताछ करके अपने को मूर्ख भी नहीं साबित करना चाहता था। सबसे अच्छी बात जो उसके मन के अनुसार हुई थी वह केवल यही थी कि, राहेल ने उसके आने पर उसका भरपूर स्वागत किया था और वह उसे देख कर जैसे फूलों समान खिल भी गई थी। उसने उसके ठहरने का अच्छा और विशेष प्रबंध करवा दिया था, क्योंकि आये हुये अतिथियों में एक केवल वही ऐसा था जो काफी दूर से आया था, वरना अधिकांश मेहमान तो स्थानीय ही प्रतीत होते थे। सबसे अधिक आश्चर्य की जो बात सनी को वहां महसूस हुई थी, वह यही थी कि, राहेल तब उसे कालेज के दिनों से भी अधिक प्रसन्न नज़र आ रही थी और दूसरी बात उसके अपने परिवार में उसके पिता और स्वंय उसके अतिरिक्त कोई दूसरा नज़र भी नहीं आ रहा था। परिवार की समस्या तो और लोगों से बात करने पर हल हो गई थी; राहेल के घर में उसके पिता और स्वंय उसके अतिरिक्त कोई अन्य था भी नहीं, पर राहेल की प्रसन्नता सनी के आने के कारण थी, अथवा किसी अन्य कारण से? सनी इसके बारे में तब कोई भी निर्णय नहीं कर सका था। मगर बाद में और भी अधिक जानकारी मालुम होने पर उसकी जिज्ञासा ये जानकर और भी बढ़ गई थी कि राहेल ने उसको ये विशेष निमंत्रण अपने विवाह की मंगनी होने के उपलक्ष्य में ही दिया था। लेकिन उसकी ये मंगनी किसके साथ थी और राहेल ने उसे अपने घर बुलाने कर निमंत्रण देकर एक संशय में क्यों रखा था, ये सब ऐसे प्रश्न थे कि, जिनकी तह तक पहुंचने से पूर्व ही सनी के दिल और दिमाग दोनों ही के सभी तारों में एक झंकार सी उत्पन्न हो गई थी। उसे लगता था कि, इतने दिनों से उसकी मुहब्बत के मायूस और सुस्त पड़े फूल अचानक ही किसी वायु की हल्की सी लहर के आगमन की सूचना मात्र से ही जैसे मुस्करा उठे थे। परन्तु, सनी के मन में बसे हुये ख्यालों के समान ऐसा नहीं हो सका था। राहेल के प्रति बसी हुई उसकी प्यार की खुशबू अचानक ही अपना बंद तोड़ कर जमाने की मौसमी हवाओं में जाकर विलीन हो गई। सनी को तब ऐसा लगा था कि, जैसे बिना बताये ही किसी ने उसकी मुहब्बत के आंचल में अपनी बेवफाई के कांटे भर दिये हों। उसकी प्यार भरी हसरतों के वे नादान पुष्य जो उसने अपने पिछले दो वर्षों से चुन-चुन कर अपने दिल के भंडार में रख कर किसी की मुहब्बत की आरती में अर्पण करने चाहे थे, समय आने पर बासी साबित कर दिये गये थे। सनी के लिये तब ये जोरदार आघात ही साबित हुआ था। ये उसकी ज़िन्दगी की वास्तविकता का वह कठोर तमाचा था कि, जिसके एक ही प्रहार से न केवल वह तिलमिला ही गया था, बल्कि उसका असली रूप देख कर ना तो वह अपने ही को दोष दे सका था और ना ही किसी के प्रति अपनी खिन्नता ही वह प्रदर्शित कर सका था- जब कि, राहेल के पिता ने अपने घर पर दी गई इस एक बड़ी दावत में अपनी इकलौती पुत्री राहेल की मंगनी पक्की कर देने का ऐलान किया था। ये मंगनी सनी के साथ न होकर अमरीका में पहले ही से निवास करने वाले एक डाक्टर लड़के के साथ की गई थी। ये और बात थी कि, संयोग से वह लड़का हवाई जहाज की उड़ान विलम्ब से आने के कारण वहां सम्मिलित नहीं हो सका था और राहेल के पिता को मंगनी में आये हुये मेहमानों के कारण कार्यक्रम पूरा करना पड़ गया था।

उस समय सनी को तो ये सब सहन करना ही था; अपने साथ हुये जीवन के इस बेहद कड़वे मजाक के कारण वह तो चाह कर भी किसी पर दोष नहीं लगा सका था। राहेल को भी वह तब कोई दोष नहीं दे सका था। पर हां, उसको आश्चर्य केवल इतना ही हुआ था कि, राहेल ने अपनी मंगनी की बात उससे छिपाकर क्यों रखी थी? क्या केवल इसलिये कि, वह भी पिछले दो वर्षों से कालेज के दौरान सनी की आंखों में अपने प्रति प्यार के खामोश निमंत्रण की आवाज़ को सुन तो रही थी, पर उसका उत्तर देने का साहस वह कभी भी नहीं कर सकी थी?

बाद में सनी, मंगनी की रस्म पूरी होने के पश्चात औपचारिकतावश राहेल को अपनी दुआओं का आशीर्वाद देकर, अपना सा मुंह लेकर वापस आ गया था- अल्मोड़ा और उसके हसीन वादियों से भरे आलम को मानो अलविदा कह कर। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि, वह पहाड़ों की खुबसूरती और वह ठंडी मदमस्त हवाओं में भीगी गहरी घाटियों की पथरीली सरज़मी, जो कभी उसके आने पर अपनी मुहब्बतों का लिवास पहने हुये उसके स्वागत में अपना आंचल फैलाये हुये उसके आने की राह देख रही थी, मतलब निकल जाने के पश्चात उसकी झोली में अपनी बेरूखी के कांटे भर कर विदा करेगी? वह यहां आया था, किन उम्मीदों के सहारे और वापस जा रहा था, कैसी दिल की उजड़ी हुई दास्ताँ की किताब के फटे हुए पृष्ठ लेकर? वह कभी यह अनुमान भी नहीं लगा सका था कि, राहेल उस पर अपने प्रति उसके दिल में बसी हुई अपार मुहब्बत का सम्मान इस तरह से करेगी? इकरार या इनकार तो अलग बात थी। अपनी बात उस तक पहुंचाने का कोई झूठा अवसर भी उसने सनी को नहीं दिया था।

फिर इसके पश्चात 'सनी' के जीवन में गर्दिशों के तो नहीं पर हां, मायूसियों के बादल अवश्य ही आकर ठहर गये थे। वह अपने को ना तो समझा ही सका था और ना ही अपने भविष्य के बारे कोई भी ठोस निर्णय ही उसने लिया था। अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी को फिर उसने विवश होकर विधाता के हाथों में सौंप दिया। राहेल की मुहब्बत का दर्द वह अपने दिल से निकाल तो नहीं सका, पर समय की हवाओं ने उस पर वक्त की तहें अवश्य ही जमा कर दी थीं। उसके दिल के अंदर रिसते हुये आंसू बंद तो नहीं हो सके थे, पर जीवन की व्यस्तता ने उनके प्रति अनदेखा जरूर कर दिया था। उसने इस बात और ज़िन्दगी की बे-हद कड़वी दास्ताँ को अपने दिल का एक अनकहा दर्द समझ कर अपने तक ही सीमित रखा और खुद को जमाने की राहों में पड़ा समझ कर अपने आपको अपने उदास जीवन को वक्त के सहारे व्यतीत करने पर मजबूर कर लिया। वह अपना स्थानीय घर और स्थान छोड़ कर एक दिन टीकटपारा के एक छोटे से मिशन हस्पताल में 'मेल नर्स' की नौकरी करने लगा।

सनी के दिन इसी प्रकार ना-उम्मीदों के शिकार होकर व्यतीत हो रहे थे। उसके अन्य भाई-बहन अब तक अपने अपने विवाह आदि करके भारत के विभिन्न शहरों में जैसे बिखर चुके थे। सब ही के अपने परिवार थे। सब ही अपनी गृहस्थियों में प्रसन्न भी थे। जब भी कोई त्यौहार जैसे, बड़ा दिन या ईस्टर आदि आता था तो सब ही किसी एक स्थान पर मिल जाया करते थे। परन्तु फिर भी सनी की मां अभी तक उसके साथ ही रहा करती थीं। वह भी सोचा करती थीं कि, किसी तरह से सनी का भी विवाह हो जाये तो वे निश्चिंत हो जायें। इस लिये उन्होंने इस बारे में जब कभी भी सनी से बात भी की तो वह सहज ही टाल जाता था। परन्तु फिर भी वे सनी के लिये कोई न कोई रिश्ता ढूंढ कर लाती ही रहती थी. मगर एक सनी था, जो कभी अपने विवाह के लिये हां नहीं कहता था।

अब तक राहेल की मंगनी हुये एक वर्ष से अधिक हो चुका था और सनी अपनी बीती यादों को साथ लेकर कभी-कभार सोचा करता था कि, अब तक तो उसका विवाह भी हो चुका होगा। वह अपने डाक्टर पति के साथ अमरीका में बड़ा ही सम्पन्न और ऐश-ओ-आराम का जीवन व्यतीत कर रही होगी। वह उसको अब याद तो नहीं करता था, परन्तु उसकी यादों के चित्र को वह अपने दिल के पर्दे से साफ भी नहीं कर सका था।

तब जीवन की इन्हीं व्यस्तताओं के मध्य एक रात जब कि वह अपने काम पर था, उसके हस्पताल में अचानक से एक ऐसा केस आया कि, जिसने उसे एक बार फिर से बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया- वह राहेल, जिसके प्रति उसने कभी अपनी मुहब्बत के फूल उसके आंचल में भरने के ख्वाब देखे थे और जिसके घर से एक दिन वह बड़ा ही मायूस होकर, खाली और छूंछे हाथ लौट आया था, आज उसी के हस्पताल में अपने पूरे दिनों के साथ भरती होने को आई थी। साथ में राहेल के पिता भी थे- बड़े ही विवश, परेशान और चिंतित से- यह सब कुछ देखकर सनी को तो आश्चर्य होना ही था। उसके आश्चर्य करने का सबसे पहला कारण, उसके हिसाब से राहेल का ये पैदा होने वाला बच्चा अमरीका में होना चाहिये था। दूसरा कारण यदि भारत में ही होना था तो, अल्मोड़ा के दूसरे छोर पर बसे हुये टीकटपारा के इस छोटे से मिशन हस्पताल में आने का क्या कारण हो सकता था? चलो यदि यहां आये भी हैं तो राहेल का अमरीकी निवासी डाक्टर पति इस आपातकालीन स्थिति के समय नदारद क्यों था? उसे तो यहां होना चाहिये था? राहेल के पिता क्यों उसका उत्तरदायित्व पूरा कर रहे हैं? सनी के समझ ये ऐसे प्रश्न चिन्ह थे कि, जिनके बारे में वह मालुम करने के लिये उत्सुक तो था, पर पूछने का साहस नहीं जुटा पाया था। फिलहाल उसको अपनी नौकरी का उत्तरदायित्व पूर्ण करना था, इसलिये इन बातों को मन से निकाल कर वह अपना कार्य करने लगा। राहेल तो बिल्कुल ही बेहोशी की हालत में अस्पताल में भरती हुई थी। उसकी दशा भी खराब थी, परन्तु डाक्टरों के अथक प्रयास ने उसका बिगड़ा हुआ केस संभाल लिया था। उसने एक बड़ी ही प्यारी बच्ची को जन्म दिया था।

सनी अभी तक अपने मन में तमाम तरह के प्रश्नों को कैद किये हुये चुपचाप अपना कार्य कर रहा था। इससे पूर्व कि राहेल को होश आये, उसके पिता अचानक ही उसके सामने आ खड़े हुये थे। तब सनी के कुछ कहने और पूछने से पहले ही उन्होंने जो कुछ अपनी समस्या सनी को बतलाई, उसे सुन कर सनी अवाक सा रह गया था। राहेल के पिता के अनुसार राहेल की पैदा हुई ये संतान, उसके विवाह होने से पूर्व ही हुई थी, क्योंकि उसका होने वाला पति भारत में आकर अपनी मंगनी करने के पश्चात, कुछ दिनों तक राहेल के साथ रह कर वापस लौटकर फिर बाद में विवाह करने का आश्वासन देकर अमरीका चला गया था, मगर वह आज तक वापस नहीं लौटा था और उसके वापस आने की कोई उम्मीद भी अब बाकी नहीं बची थी। क्योंकि उससे ना तो टेलीफोन पर ही कोई बात हो पाती थी और ना वह किसी भी पत्र का कोई भी उत्तर राहेल या फिर उसके पिता को देता था। राहेल को इसी अप्रत्याशित बदनामी से बचाने की खातिर उसके पिता पिछले वर्ष से अल्मोड़ा से काफी दूर इस अपरिचित शहर में रहने पर विवश थे और उसकी इस पैदा हुई संतान को बहुत चाह कर भी नहीं रखना चाहते थे।

सनी तो तब ये सब कुछ सुन कर दंग ही रह गया था। लेकिन समस्या का समाधान भी करना आवश्यक था। इसीलिये बाद में जो निर्णय लिया गया, उसके आधार पर राहेल की बच्ची को अनाथालय में देने का विचार कर लिया गया और राहेल को ये कह कर समझा दिया गया था कि, उसने एक मरी हुई संतान को जन्म दिया था। इतना सब कुछ होने के बाद राहेल के पिता को तो तसल्ली मिल गई थी, परन्तु सनी फिर भी अपने को नहीं समझा सका था। राहेल के प्रति उसके दिल में बसी हुई उसकी मुहब्बत इस रूप में काम आई कि, अनाथालय जाकर उसने राहेल की बच्ची को बाकायदा अपना कर गोद ले लिया, और पिता के स्थान पर उसको अपना नाम दे दिया। फिर जब तक बच्ची छोटी रही तब तक वह उसको किसी को भी बताये बगैर अनाथालय में ही रख कर पालता आया था। सो इस प्रकार से 'बदली' जहां अपनी मां राहेल के जीवन से छूटकर बाहर निकली थी, वहीं वह 'सनी' के ऊपर उसके जीवन का एक बादल बन कर छाया भी करने लगी। सनी को बदली के सहारे जीने का साधन मिला तो वह अपने बिखरे हुये सपनों को फिर से एकत्रित करने लगा था।

फिर इसी बीच जब उसकी मां ने उसके विवाह के प्रस्तावों में राहेल की तस्वीर दिखाई तो वह इस बार चाह कर भी मना नहीं कर सका और इस प्रकार राहेल कितने ही वर्षों के पश्चात बाकायदा विवाहसूत्र में बंध कर सनी के आंगन का फूल बन कर मुस्कराने लगी। 'बदली' की पैदाइश और राहेल के जीवन की 'ट्रेजिडी' के बारे में यदि किसी को कुछ मालूम था तो वे केवल तीन ही व्यक्ति थे- एक थे राहेल के पिता, दूसरा सनी और तीसरी खुद राहेल, पर राहेल यह समझती थी कि सनी को इस बारे में कुछ भी मालूम नहीं है। इसलिए न तो सनी ने ही उससे कुछ पूछा और कहा और न ही राहेल ने अपनी तरफ से सनी ही से कुछ कहा- दोनों ही पति­पत्नी बन कर अपना सुखी जीवन व्यतीत करने लगे थे। बाद के वर्षों में उनके पास 'स्टार' और 'दीप' भी आ गये। इस प्रकार से वह तब एक भरा पूरा परिवार बन कर अपना सुखी जीवन व्यतीत कर रहा था- परन्तु फिर भी सनी ने अब तक 'बदली' के बारे में राहेल को कुछ भी नहीं बताया था। वह अब तक बारहवीं कक्षा की छात्रा और अनाथालय से निकल कर अब हॉस्टल में रह कर पढ़ा करती थी। सनी प्रायः ही उसके पास मिलने चला जाया करता था और सनी ने भी जो कुछ भी उसके साथ घटित हुआ था बदली को सब कुछ बता दिया था। साथ में उसे आश्वासन भी दिया था कि समय आने पर वह उसे बाकायदा उसकी मां अर्थात राहेल के पास ले आएगा। लेकिन उस दिन की घटना ने उसके सारे बने बनाए सपनों पर पानी फेर दिया था- जब कि वह राहेल और अपने दोनों बच्चों स्टार तथा दीप के साथ रविवार की एक पारिवारिक धार्मिक मसीही फिल्म 'जीजस ऑफ नाज़रत' देखने चला गया था। तब उसे क्या ज्ञात था कि बदली भी अपनी हॉस्टल की सखियों के साथ वही फिल्म देखने आई होगी। तब उसी समय फिल्म समाप्त होने के पश्चात् हॉल से निकलते समय बदली ने जब अपने पिता को वहां देख लिया तो उसे देख कर सहसा ही उसके मुख से निकल पड़ा था,

'अरे पापा जी ! आप यहां?'

'?' -

सनी तो बदली को राहेल और अपने बच्चों के साथ देख कर सहसा ही कोई प्रत्युत्तर नहीं दे सका था, परन्तु बदली अपने पर नियंत्रण न रखते हुए उसके गले से लिपट गई थी, लेकिन बाद में जब उसने अपनी मां राहेल और दोनों भाइयों को भी साथ देखा तो फिर उसे अपनी भूल का एहसास भी हुआ। इसलिए वह भीड़ में ही सनी से ये कह कर कि, 'मेरी सखियां मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं, बाद में मिलूंगी', कहते हुये, तुरन्त ही छोड़कर चली भी गई थी।

तब बदली के वहां से जाने के पश्चात जहां सनी घर में आने वाले किसी पूर्व तूफान से संघर्ष की मन ही मन तैयारी कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ राहेल के मस्तिष्क में भी सनी के प्रति विभिन्न प्रकार के सैकड़ों कीड़े कुलबुलाने लगे थे। इसलिये घर पर आकर वह सीधे ही अपने कमरे में चली गई थी और कमरे की मनहूस खामोशी में जबरन अपने आपको कैद करके विचारों के ताने-बानों में उलझाने लगी। इसी बीच सनी ने खाना गर्म किया और दोनों बच्चों को देकर फिर वह राहेल के पास आया और बोला कि,

'आते ही लेट गई हो। खाना नहीं खाना है क्या? तबियत तो ठीक है न तुम्हारी?'

'नहीं। खा लिया, जितना खाना था इस घर में।' राहेल ने निर्लिप्त भाव से एक रूखा सा उत्तर दिया तो सनी भी चौंक गया। उसने पहले तो राहेल को गंभीरता से निहारा, फिर कुछ समझने और न समझने के मध्य की स्थिति में पड़ता हुआ वह उससे आश्चर्य से बोला कि,

'तुम्हारी इस बात का मतलब?'

'!!' -

उसकी इस बात पर राहेल ने उसको एक संशय से देखा, फिर वह उससे पहले से भी बे-रूखे भाव से बोली कि,

'ऐसे न बनें कि, जैसे मेरी बात को समझ नहीं रहे हैं?'

'कहना क्या चाहती हो तुम?' सनी ने तब पूछा था।

'यही कि, जब पहले ही से किसी की 'नाजायज़' औलाद के बाप बने हुये थे, तो फिर मुझसे शादी करने और इन बच्चों को पैदा करने की क्या जरूरत थी?' राहेल ने अपने पहले से भी अधिक खराब लहज़े में कहा तो सनी भी जैसे बिफर गया। वह भी फिर तनिक भावावेष में आते हुये उससे बोला कि,

'तुम में सुनने की हिम्मत है कि, जब मैं पहले ही से किसी का पिता बन चुका हूं तो फिर तुमसे शादी क्यों की थी? क्यों ये घर बसाया और क्यों इन नादान मासूमों को जन्म दिया?'

'अपनी सफाई देने की कोशिश मत करिये। इतना सब कुछ अपनी आंखों से देखने के पश्चात भी क्या कुछ और भी देखना और सुनना बाकी रह गया है, मेरे लिए? राहेल ने कहा तो सनी ने उसे उत्तर दिया. वह उससे बोला कि,

'हां ! बाकी रह गया है, वह सब कुछ, जिसे तुमको बहुत पहले ही देखना और सुन लेना चाहिये था।'

'अब इसकी कोई भी आवश्यकता नहीं है। मैने फैसला कर लिया है।'

'फैसला ! कैसा फैसला?'

'मैं ये घर छोड़ कर कल यहां से जा रही हूं।'

'जा रही हो, लेकिन कहां पर?'

'वह मेरी प्रोब्लम है, आपकी नहीं। फिर दुनियां बहुत बड़ी है, कहीं भी चली जाऊंगी।'

'??'- सनी अपना सिर पकड़कर बैठ गया.

उसके पश्चात सनी ने राहेल को बहुत समझाना चाहा। उसको सारी वास्तविकता से परिचित करवा देना चाहा, पर उसने तो सुनना अलग, सनी से कोई बात ही नहीं करना पसंद की- और इस प्रकार वह दूसरे दिन ही अपना थोड़ा बहुत सामान समेटकर कर स्टार और दीप को साथ लेकर चली गई थी। राहेल के चले जाने के पश्चात जब सुबह बदली ने सनी को फोन किया और कल वाली घटना के बारे में उसकी प्रतिक्रिया जान लेनी चाही तो सनी ने उसको सब कुछ बता दिया था। तब बदली ये जानकर कि उसके पिता घर पर अकेले रह गये हैं और उसकी मां भी चली गई हैं, तो वह भी घर पर आ गई थी। तब से दोनों पिता और पुत्री इसी समस्या पर विचारमग्न थे और सोच नहीं पा रहे थे कि किस प्रकार इसको हल करें।

दूसरी तरफ, जब राहेल स्टार और दीप के साथ अचानक ही अलमोड़ा अपने पिता के घर पहुंची तो उसे यूं बगैर कोई भी सूचना दिये आये देख कर उसके पिता चौंक तो गये, पर सहज ही उन्होंने इसे विशेष नहीं लिया था। उन्होंने केवल राहेल से इतना ही भर पूछा था कि, ‘सनी के बगैर वह अचानक कैसे आ गई?' लेकिन अपने पिता की ये बात सुन कर राहेल सुनी-अनसुनी कर गई तो उसके पिता ने उससे उस समय तो कुछ भी नहीं कहा था। मगर जब कई एक दिन व्यतीत हो गये तो राहेल की चुप्पी और गुमसुमपन देख कर उनका भी माथा ठनक गया। उन्हें तब समझते देर नहीं लगी थी कि, अवश्य ही दाल में कहीं कुछ काला है।

तब एक दिन शाम को खाने आदि से निवृत्त होकर जब दोनों बच्चे भी सो गये तो उन्होंने राहेल से अचानक ही पूछा तो वह भी बुरी तरह से सुबक पड़ी। इसके पश्चात जब वह सामान्य हो गई तो उसने भी सारी बात अपने पिता को बता दी कि, वह सनी का घर सदा के लिये छोड़ कर आ गई है। ये सुन कर उसके पिता भी सारी बात समझ गये। वे राहेल के मुख से ये सब सुन कर गंभीर तो हुये, पर कोई आश्चर्य नहीं कर सके थे, क्योंकि वे जानते थे कि जिस प्रकार की समस्यायें उनके अपने पिछले जिये हुये दिनों में आईं थीं, उन सबका अंजाम कभी न कभी, कुछ ऐसा ही होना था। पर अब समस्या ये थी कि, इस आई हुई परेशानी से किस प्रकार मुक्त हुआ जाये। किस प्रकार से बसे हुये घर की सारी बिखरी हुई वस्तुओं को फिर से समेट लिया जाये। राहेल तो जल्दबाजी में बगैर कुछ भी सोचे-समझे एक गलत कदम उठा आई है। उसका तो जो होना था, वह तो होगा ही, पर इन नादान बच्चों का क्या बनेगा?

तब काफी देर की खामोशी के पश्चात, गंभीर होकर उन्होंने राहेल से फिर बात आरंभ की। वे राहेल से बोले कि,

'बेटी ! अपने जीवन का इतना बड़ा कदम उठाने से पूर्व तुम्हें कुछ नहीं तो कम से कम मुझसे तो पूछ लेना ही चाहिये था?'

'हां, पूछना तो चाहिये था, पर पूछ कर करती भी क्या? सब कुछ तो अपनी आंखों से देख ही लिया था मैंने।'

राहेल ने उत्तर दिया तो उसके पिता ने तुरन्त ही कहा कि,

'क्या देखा था तुमने?'

'सनी शादी से पहले ही, मुझसे छिपा कर अपनी किसी नाजायज़ औलाद को पाल रहा है।'

'अच्छा ! लेकिन तुम्हें कैसे मालुम हुआ कि वह उसी की नाजायज़ संतान है?' उसके पिता ने कहा तो वह तुरन्त ही बोली,

'उस अनजान लड़की ने मेरे सामने ही सनी को 'पापा जी' बोला था।'

'और तुमने विश्वास कर लिया कि,, वह उसकी अपनी ही संतान है?'

'हां, इसमें भी कोई शक है क्या?'

'!!' -

राहेल की इस प्रकार की बात पर तब उसके पिता थोड़ी देर को गंभीर हो गये और फिर काफी देर की खामोशी के पश्चात वे उससे बोले कि,

'देखो बेटी, तुम ये तो जानती हो कि, हम मसीही लोग हैं, लेकिन इससे भी पहले हम इंसान हैं। इस पापी संसार में रहते हैं, इसलिये हमसे भूल होना स्वभाविक ही है। लेकिन मसीहत के हिसाब से यदि हम दूसरों की गलतियों पर अपनी नज़र लगाते हैं तो पहले खुद हमको अपने अंदर झांक लेना चाहिये। मेरा ख्याल था कि, तुम सनी को अपने कालेज के दिनों से जानती तो थीं ही और उससे विवाह के बाद उसे खूब अच्छी तरह से समझ भी गई होगी, पर ऐसा नहीं हुआ है। तुमने उसे समझने में भूल की है। वह तो तुमको कालेज के दिनों ही से प्यार करता था और तुमसे विवाह भी करना चाहता था, पर उसे तुमसे ये सब कहने का अवसर ही नहीं मिल सका था। इधर तुम्हारी मंगनी भी हो गई थी। फिर तुम्हारी मंगनी के बाद तुम्हारे जीवन में जो दुखद घटना हुई थी, वह तुमसे छुपी भी नहीं है।

'आप कहना क्या चाहते हैं?'

'मैं कहना चाहता हूं कि, तुम सनी को मात्र एक खोखले संदेह के आधार पर छोड़ कर चली आई हो, पर उसकी महानता देखो कि, उसने तुम्हारे बारे में सब कुछ जानते हुये भी तुमसे केवल इस कारण ही विवाह किया था, क्योंकि वह तुम्हें पहले ही से प्यार करता था। तुम्हारे जीवन की सबसे बड़ी भूल को उसने तुम्हारा कलंक न समझ कर एक दुखद घटना जान कर अपने दिल के अंदर दफन कर लिया और तुम्हें कभी इस कारण से जाहिर भी नहीं होने दिया, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि, केवल महज इसी कारण से तुम हमेशा अपने आप में एक हीन भावना से ग्रस्त रहो, और अपने पारिवारिक जीवन में कभी भी उससे मुंह उठा कर बात करने का साहस न जुटा सको, हमेशा उसके सामने नज़रें झुकाकर बात करती रहो।'

'इसका मतलब ये हुआ कि, उसे . . .?'

'तुम्हारे बारे में सब कुछ पहले ही से ज्ञात है।'

'वह कैसे?'

'वह आज भी टीकटपाड़ा के उसी मिशन हस्पताल में काम करता है, जहां पर तुमने अपनी पहली संतान को जन्म दिया था। तुम्हें तो कुछ भी मालुम नहीं है कि, जब तुम अपनी बिगड़ी हुई दशा में हस्पताल पहुंची थी, तब वह वहीं पर काम कर रहा था। मुझे और तुम्हें देख कर वह चौंक गया था। उसे मुझको सारी परिस्थिति से परिचित करवाना ही पड़ा था। तुम्हें तो समझा दिया गया था कि, तुमने एक मरी हुई बच्ची को जन्म दिया है, पर ऐसा नहीं था। उस बच्ची को मैंने अनाथालय में भिजवा दिया था, क्योंकि हमारे बिगड़े हुये हालात, भरे समाज में एक शान के साथ उस बच्ची को पालने की इजाज़त नहीं देते थे। लेकिन सनी अपने मन को तब भी समझा नहीं सका था। उसका तुम्हारे प्रति उपजी प्यार की कोपल तुम्हारी बच्ची के रूप में उभर कर सामने आई और उसने तुम्हारी बच्ची को केवल इसी कारण अपना लिया था, क्योंकि वह बच्ची तुम्हारी था। तुमने तो उसको जन्म दिया था। आज भी सनी तुम्हारी नाजायज़ संतान को जायज़ बना कर पाल रहा है। वह चाहता था कि, अपनी जिस पहली संतान के लिये तुम हमेशा से तरसती आई हो, उसको वह किसी विशेष अवसर पर तुमको एक उपहार के रूप में भेंट करे, पर ऐसा करने का उसे अवसर मिलता, उससे पहले ही बात यहां आकर बिगड़ गई। बदली तुम्हारी अपनी ही वह औलाद है, जिसके बारे में ये संसार तो कुछ नहीं जानता है, पर तुम सब कुछ ही जानती हो।'

'??' - राहेल के सिर पर अचानक ही जैसे अल्मोड़ा शहर का पूरा पहाड़ ही गिर पड़ा. अपने पिता के मुख से ऐसी अनहोनी सी बात सुन कर दंग रह गई। वह फिर आगे कुछ भी नहीं कह सकी। शब्द जैसे अटक कर ही रह गये थे।

'तुम सोच रही होगी कि, मैंने ऐसा क्यों किया था?'

खामोशी- राहेल के मुख से एक शब्द भी नहीं निकल सका.

उनकी इस बात पर राहेल ने कहा तो कुछ भी नहीं, केवल एक प्रश्नसूचक दृष्टि से उन्हें देखने लगी तो वे आगे बोले,

'उस समय मेरे पास इसके अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं था। तुम ये तो अच्छी तरह से जानती हो कि, हमारा भारतीय समाज शादी से पूर्व हुई संतानों के साथ किसी को भी सम्मान के साथ जीने की इजाज़त नहीं देता है। ज़रा सोचो कि, मुसीबत के दिनों में उसने तुम्हारी और मेरी मदद की। तुम्हें भरे समाज में सम्मान के साथ सिर उठा कर जीने का अवसर प्रदान किया। तुम्हारी गलती को अपनी मुहब्बत का कोई पाक दामन समझ कर उसने अपने बदन से लपेट लिया। बाइबल कहती है कि, 'यदि तुम दूसरों के गुनाहों को मॉफ नहीं करोगे तो बदले में अपने स्वर्गीय परमेश्वर से तुम भी मॉफी नही पा सकोगे।' ईश्वर ने तुमको कितना खुबसूरत परिवार दिया है। तुम्हारा पति 'सनी' अर्थात् सूरज है, जो सदा चमकता रहता है और सारे संसार को उजाला देता है। कितने सुंदर तुम्हारे अपने बच्चे 'स्टार' और 'दीप' हैं, जो तुम्हारे पारिवारिक जीवन में एक रोशनी के सूचक हैं। तुम्हारी अपनी पहली संतान 'बदली' भी, जो तुम्हारी तपिश के दिनों में सदैव तुम्हारे जीवन पर छाया करती रहेगी। वैसे तुम्हारी अपनी मर्जी है, जो चाहो वह निर्णय ले सकती हो,, पर इतना याद रखना कि, परमेश्वर के बनाये हुये नीड़ से बाहर निकल कर तुम आसमान में खूब ऊंचा उड़ तो सकते हो, पर टिक कहीं भी नहीं सकोगे। बेहतर है कि, तुम जिस प्रकार से आई हो, वैसे ही वापस लौट भी जाओ। सनी एक बहुत ही समझदार इंसान है, उसे तो मैं भी समझा दूंगा।'

'!!' - खामोशी। अपने पिता के मुख से ये सब सुन कर राहेल अवाक सी रह गई। वह आगे फिर एक शब्द नहीं कह सकी। केवल सोचती ही रही कि, भावावेष में वह अपने प्यारे से घरौंदे को हवा में टिका कर चली आई है। सनी जो आज उसका पति है, वह तो हमेशा से उसके लिये सोचता आया है। क्या खुद उसको कभी भी सनी के बारे में सोचने का अवसर मिला है? उसने तो सदा अपनी ज़िन्दगी के हसीन रास्तों को और भी सुखमय बनाने की कल्पना की होगी, पर एक सनी है जो सदैव ही उसके मार्गो से कांटे बीन-बीन कर अपने बदन से टांकता आया है। वह भी केवल इसलिये कि, यदि हम वास्तव में मानव हैं, इंसानियत हमारे दिलों में है और ऊपर से मसीही होने का ढोंग तो नहीं करते हैं, तो दूसरों की बुराईयों को सदैव नज़रअंदाज ही नहीं, बल्कि हृदय से क्षमा भी करते रहेंगे। वह तो हमेशा से अपनी खुदगर्जी के लिये ही जीती आई है, पर सनी ने तो निस्वार्थ भाव से जीकर मानवता की सभी सीमायें पार कर ली हैं। वह तो ऐसा इंसान है कि, कभी स्वंय अपने लिये नहीं जिया होगा, पर सदैव दूसरों को जिन्दगी जीने के नये आयाम देता रहा है।

राहेल का इतना भर सोचना था कि, उसने फिर आगे कुछ भी सोचे बगैर, मन ही मन अपने घर वापस लौटने का निर्णय ले लिया। उसे अपना ठुकराया हुआ घर स्वतः ही याद आने लगा। वह वहां तुरन्त ही वापस जाने के लिये जैसे पानी से बाहर आई हुई किसी मछली के समान छटपटाने लगी।

फिर दूसरे दिन की नई भोर को जब वह अल्मोड़ा से काठगोदाम तक जाने वाली बस में जा रही थी तो एक स्थान पर बस के रूकने पर वह सोचने लगी कि, जब भी कहीं जल्दी जाना चाहो तो मार्ग में यातायात क्यों मिलता है? इसके साथ ही उसे लग रहा था कि, उसके जीवन के वे रास्ते जिन पर चल कर कभी उसने अपनी मंजिल की परवाह नहीं की थी, आज मानो एकत्रित होकर उसके अपने घर का वास्तविक मार्ग दिखा रहे थे, परमेश्वर के शब्द कहते हैं कि, न्याय उनके लिये है जो सब कुछ जानते हुये भी अपने मार्गों से नहीं फिरते हैं और परमेश्वर के घर का रास्ता भी केवल उन लोगों के लिये है, जिन्होंने पश्चाताप किया है और पाप के मार्गों से फिर गये हैं।

फिर राहेल जैसे ही अपने घर पहुंची तो उसने शीघ्रता से घर की बाहरी घंटी बजाई. बदली ने दरवाज़ा खोला तो राहेल उसे देख कर, तुरंत ही उसको अपने अंक से लगाकर फूट-फूटकर रो पड़ी- इस बात की साक्षी में कि, हरेक स्त्री में, मां तो मां ही होती है, चाहे वह कितनी भी कठोर क्यों न हो.
- समाप्त