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माटी की मूरत..

कुछ बच्चे गाँव के कच्चे रास्ते पर गिल्ली-डण्डा खेल रहे थे,तभी उन बच्चों में से एक ने गिल्ली इतनी जोर से उछाली कि वो गिल्ली वहाँ से गुजर रहे ताँगें में बैठी एक सात साल की बच्ची को जा लगी,उस ताँगे में जमींदार शिवपूजन सिंह बैठें थे और वो बच्ची उनकी भाँजी थी,जब उस बच्ची के माथे से गिल्ली जा टकराई तो बच्ची के माथे पर जोर से चुभ गई क्योंकि गिल्ली की गति तीव्र थी और गिल्ली नुकीली भी थी, इसलिए गिल्ली ने बच्ची के माथे पर घाव कर दिया,घाव हुआ तो बच्ची चीखी और बच्ची चीखी तो भला मामा को दर्द क्यों ना होता इसलिए शिवपूजन सिंह फौरन ताँगें से उतरकर उन बच्चों के पास आए और उनसे पूछा....
"गिल्ली किसने इतनी जोर से उछाली"
अब बच्चे शिवपूजन की लम्बी कद-काठी और बड़ी बड़ी रुआबदार मूँछें देखकर डर गए और कुछ ना बोल सके,तभी शिवपूजन दोबारा दहाड़े...
"कोई बोलता क्यों नहीं कि ये किसका काम है?"
तब एक बच्चा डरते हुए उस झुण्ड में से बाहर आकर बोला....
"जी!मुझसे ये काम हुआ है"
"नाम क्या है तेरा",शिवपूजन सिंह ने पूछा...
"जी!चितवन",लड़का बोला...
"किसके लड़के हो",शिवपूजन सिंह ने पूछा...
"जी!रघुवा कुम्हार का",चितवन बोला...
"घर कहाँ है तेरा"?,शिवपूजन ने पूछा...
"वो जो नीम का पेड़ दिख रहा है उसी के पास मेरी झोपड़ी है",चितवन बोला...
"चल मैं अभी तेरे बाप के पास तेरी शिकायत कहने चलता हूँ "और फिर इतना कहकर शिवपूजन सिंह ने ताँगे में बैठी बच्ची को पुकारा.....
"रत्ना....ओ रत्ना....बिन्नो इधर तो आना" और फिर अपने मामा की पुकार पर रत्ना ताँगें से उतरकर बाहर आई और शिवपूजन से बोली...
"जी!मामा जी"!
"चल बिन्नो इस लड़के की शिकायत करके आते हैं" इतना कहकर शिवपूजन रत्ना का हाथ पकड़कर चितवन के साथ उसके घर चल पड़े और वहाँ पहुँचते ही चितवन की झोपड़ी के सामने खड़े होकर चितवन से बोले....
"बाहर बुला अपने बाप को"
शिवपूजन सिंह के कहने पर चितवन ने अपने पिता को पुकारा...
"बापू....ओ...बापू! तुम्हें कोई पूछ रहा है"
"क्या है रे!कौन पूछता मुझे",रघुवा ने बाहर आकर कहा....
"ये बाबू साहब पूछ रहे थे",चितवन बोला....
"जी बाबू साहब!का बात है"?रघुवा ने शिवपूजन सिंह से पूछा...
तब शिवपूजन सिंह बोला....
"देखो तुम्हारे बेटे ने गिल्ली मारकर मेरी भांँजी का माथा फोड़ दिया,गिल्ली लगते ही बेचारी दर्द से कराह उठी"
"क्यों रे!बच्ची का माथा क्यों फोड़ दिया तूने?",रघुवा ने चितवन से पूछा...
"बापू!मैनें जानबूझकर नहीं किया, गलती से हो गया",चितवन बोला...
तब रघुवा ने शिवपूजन से कहा...
"माँफ कर दो बाबू साहब!बिन माँ का बच्चा है,तमीज सिखाने वाला कोई नहीं है हो गई होगी गलती"
"ठीक है रहने दीजिए ना मामा जी!हो गई होगी गलती",रत्ना बोली...
"तू कहती है तो ठीक है माँफ कर देता हूँ,वैसे तू करता क्या है"? शिवपूजन ने चितवन से पूछा....
"कुछ नहीं करता बाबू साहब!,दिनभर आवारागर्दी करता है,माँ होती तो घर में ठहरता,वो जरा लगाम लगाकर रखती तो सुधरा रहता,दस साल का होने को आया है लेकिन कोई भी सहूर नहीं है,पाठशाला में नाम लिखवा दिया था तो वहाँ भी नहीं जाता",रघुवा बोला....
"कोई बात नहीं,इसे हमारी हवेली पर भेज दिया करो,गाय-बैलों का भूसा-पानी कर दिया करेगा,हमारे घर के पास ही तो पाठशाला है,मन किया तो वहाँ भी पढ़ आया करेगा,शायद कोई सुधार आ जाए इसमें", शिवपूजन सिंह बोले....
"जी!बाबू साहब!कल से आ जाएगा आपकी हवेली,मैं भी चाहता हूँ कि ये सुधर जाएं",रघुवा बोला....
और फिर उस दिन के बाद चितवन शिवपूजन सिंह की हवेली में काम करने लगा, वहाँ जाना उसे इसलिए अच्छा लगता था क्योंकि वहाँ रत्ना थी,रत्ना की मीठी मीठी बातें उसे बहुत भातीं थीं,रत्ना के कहने पर वो अब पाठशाला भी जाने लगा था,रत्ना तो पाठशाला नहीं जाती थी क्योंकि उस जमाने में लड़कियों के स्कूल जाने में मनाही थी,इसलिए रत्ना को पढ़ाने मास्टर जी घर में ही आ जाया करते थे,रत्ना को मिट्टी के खिलौनें बहुत भाते थे और चितवन तो वैसें भी कुम्हार का बेटा था इसलिए उसने अपने पिता रघुवा के साथ इस काम में भी रूचि लेना शुरू कर दिया,देखते ही देखते चितवन का मिट्टी के बर्तन बनाने में हाथ बैठ गया और वो इस काम में माहिर हो गया,अब जब भी रत्ना उससे जो भी फरमाइश करती वो उसे बनाकर दे देता,रत्ना तो वैसें भी अनाथ थी उसके माँ बाप एक हादसे में गुजर चुके थे इसलिए मामा शिवपूजन उसे अपने संग ले आएं थे,वैसे भी शिवपूजन के कोई सन्तान ना थी और उनकी पत्नी शिवगामी सदैव इस बात को लेकर आँसू बहाती रहती थी लेकिन जब से रत्ना उनके घर में आकर रहने लगी थीं दोनों दम्पत्ति अपने सन्तानहीन होने का दुख भूल बैठे थे,
रत्ना के आ जाने से दोनों के जीवन में बहार आ गई थी,इधर चितवन को भी रत्ना से बात करके अच्छा लगता था,दोनों धीरे धीरे बचपन की दहलीज़ पार करके जवानी की ओर बढ़ रहे थें,गाँव की पाठशाला केवल पाँचवीं तक थी इसलिए चितवन ने पाँचवीं पास करके पढ़ाई छोड़ दी थी,, चितवन अब भी जमींदार शिवपूजन सिंह की हवेली में उनके जानवरों की देखभाल करने आता था और इसके बदले में शिवपूजन उसे कुछ रुपए और दो समय का भोजन दे देते थे,जीवन ऐसे ही गुजर रहा था कि एक रोज रघुवा कुम्हार को मलेरिया बुखार हुआ और बुखार इतना तेज हुआ कि सम्भल ना पाया और रघुवा के बूढ़े शरीर ने मलेरिया के प्रकोप में अपने प्राण त्याग दिए,बापू के जाने से अब चितवन बिल्कुल अकेला हो गया था,उसे अब अपना घर काटने को दौड़ता था लेकिन कर भी क्या सकता था,बाप के जाने से जीवन जीना तो नहीं छोड़ सकता था इसलिए अब उसने अपने पिता के काम को अकेले सम्भालना शुरू कर दिया,इस काम में उसका हाथ तो पहले से ही बैठा था इसलिए अब उसने घड़े और सुराही छोड़कर भगवान की मूरतें बनानी शुरू कर दीं और देखते ही देखते उसके इस काम को बहुत सराहना मिलने लगी ,लोग दूर दूर से उसके हाथ की बनी मूरते खरीदने आने लगे,दिन यूँ ही गुजर रहे थे और अब रत्ना सोलह साल की हो चली थी और चितवन उन्नीस साल का,एक दिन रत्ना चितवन से बोली....
"चितवन! तुम सबके लिए इतनी मूरत बनाते हो लेकिन तुमने आज तक मुझे कोई मूरत बनाकर नहीं दी"
"बस !इतनी सी बात! मुझे दो-तीन दिन का समय दो ,मैं तुम्हारे बहुत खूबसूरत सी मूरत बनाकर लाऊँगा",चितवन बोला...
"मैं ना कहती तो तुम मुझे मूरत बनाकर ही ना देते",रत्ना बोली...
"मूरत तो ना जाने मैनें कब बना ली थी अपने मन में,बस उसे मिट्टी में ढ़ालना भूल गया था",चितवन बोला...
"मतलब क्या है तुम्हारा"?,रत्ना ने पूछा..
"कुछ नहीं",चितवन बोला....
"ठीक है तो फिर जल्दी ही मेरे लिए कोई अच्छी सी मूरत लेकर आना",रत्ना बोली...
"हाँ!छोटी मालकिन!जल्दी ही मूरत लाऊँगा"
और इतना कहकर दो तीन दिन बाद चितवन एक कागज में मूरत लपेटकर रत्ना के लिए लेकर आया,रत्ना ने मूरत खोली तो देखकर दंग रह गई क्योंकि वो मूरत तो उसकी ही थी,उस मूरत को देखकर रत्ना बोली....
"चितवन!ये तो मैं हूँ"
"हाँ!छोटी मालकिन! तुम ही हो",चितवन बोला...
"कैसें बनाई ये मूरत तुमने मुझे देखे बिना?",रत्ना ने पूछा...
"जो मन में होते हैं ना तो वें मन की आँखों से दिख जाते हैं",चितवन बोला...
"क्या कह रहे हो?"रत्ना ने पूछा...
"मतलब तुम्हें बचपन से देखता आ रहा हूँ तो तुम्हारी मूरत बनाना कठिन नहीं था मेरे लिए",चितवन बोला...
"कुछ भी कहते हो तुम तो,लेकिन तुमने मूरत बहुत सुन्दर बनाई है,"रत्ना बोली....
सच तो ये था कि चितवन बचपन से ही रत्ना को चाहता था लेकिन ये बात उसने कभी भी किसी से नहीं कही थी,जब वो अपने घर में अकेला होता था तो वो रत्ना की मूरत से बात करता था,उसने ना जाने कितनी ही रत्ना की मूरत बनाकर घर की भीतर वाली कोठरी में सँजा रखी थी,वो कभी भी किसी को भी उस कोठरी में जाने ना देता था,क्योंकि वो दुनिया उसने केवल अपने लिए ही सजाई थी और उन मूरत में से भी उसने रत्ना को कोई मूरत नहीं दी थीं,उसके लिए नयी माटी की मूरत बनाई थी तब उसे दी थी,दिन बीते और रत्ना का ब्याह तय हो गया,इस बात से चितवन को कोई फरक नहीं पड़ा क्योंकि वो रत्ना को चाहता था रत्ना उसे नहीं,रत्ना ब्याहकर अपने ससुराल चली गई और वो अपनी माटी की रत्ना के साथ बातें करके खुश था,ऐसे ही रत्ना के ब्याह को साल भर होने को आया और रत्ना बुरी तरह बीमार पड़ी,रत्ना के ससुराल में कोई भी स्त्री नहीं थी जो उसकी देखभाल कर सके, उसकी ससुराल में उसका पति,देवर और ससुर बस ही थे,इसलिए रत्ना के पति भरत सिंह उसे लेकर उसके मामा मामी के घर चले आएं,यहाँ मामा मामी रात दिन रत्ना की सेवा में लगे रहते लेकिन रत्ना का स्वास्थ्य ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा था,ना जाने कौन-कौन से वैद्य,हकीमों से रत्ना को दिखवाया गया लेकिन रत्ना की बिमारी का कोई भी पता ना चल सका,फिर जब रत्ना को खून की उल्टियाँ होने लगी तो उसे शहर के अस्पताल में दिखवाया गया तब पता चला कि रत्ना को तपैदिक है और वो ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है,क्योंकि तपैदिक ने भयंकर रूप ले लिया उस समय तपैदिक का मुनासिब इलाज नहीं था,इस बात से सभी दुखी हुए और उसे क्रिस्चियन अस्पताल में भरती करवा दिया गया,जो कि अंग्रेजों के जमाने का था,कुछ दिन वहाँ उसका इलाज चला लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ,तब रत्ना ने खुद सबसे विनती की कि उसे अस्पताल में नहीं मरना ,उसे घर ले चलो,तब उसे ट्रैक्टर से फिर से घर लाया गया और अब रत्ना घर आकर सबसे ये बोली कि....
"मुझे पता है कि मैं अब ठीक नहीं हो सकती लेकिन मैं अब घर में चैन से मरना चाहती हूँ"
रत्ना अस्पताल से वापस लौटी तो चितवन भी उसे देखने आया और उसकी हालत देखकर रो पड़ा और रत्ना से बोला...
"तुम्हें ये क्या हो गया है छोटी मालकिन"?
"रोता क्यों है पगले?सभी तो जाते हैं मैं बस और लोगों से कुछ जल्दी जा रही हूँ",रत्ना लरझती आवाज में बोली....
"नहीं!छोटी मालकिन!ये नहीं हो सकता,भगवान तुम्हारे साथ ऐसा अन्याय नहीं कर सकते",चितवन बोला...
"मैनें भी तो किसी के साथ अन्याय किया था शायद उसी की सजा दे रहा होगा भगवान मुझे",रत्ना बोली....
"तुमने किसी का क्या बिगाड़ा है छोटी मालकिन,जो भगवान तुम्हें ऐसी सजा देगा",चितवन बोला....
"किसी के मन में बसी मूरत को मैनें किसी और के हवाले कर दिया ,किसी सच्चे इन्सान के दिल को समझा ही नहीं,परिवार की खातिर समाज के खातिर किसी अच्छे इन्सान को अनदेखा किया तो ऐसी सजा तो मिलनी ही थी मुझे",रत्ना बोली....
अब रत्ना का जवाब सुनकर चितवन एकदम स्तब्ध हो गया और बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया और उस दिन के बाद वो रत्ना से मिलने नहीं आया,सावन का महीना था इसलिए मौसम ने जोर पकड़ा,बिजली की गड़गड़ाहट के साथ ऐसी मूसलाधार बारिश हुई कि एक हफ्ता होने को आया और बारिश थमी ही नहीं और इधर रत्ना का स्वास्थ्य दिनबदिन गिरता ही चला जा रहा था और फिर एक दिन आखिरकार मौत ने रत्ना को अपने आगोश में ले ही लिया और रत्ना के प्राण त्यागने के बाद घर में हाहाकार मच गया,चितवन भी आया लेकिन उसकी आँख से एक बूँद आँसू भी ना गिरा ,बस वो रत्ना को यूँ ही टकटकी लगाकर देखता रहा,बारिश अब भी ना थमी थी और गाँव के पास की नदी का पानी गाँव भर में भर गया,कहीं भी सूखी जमीन ना रह गई थी कि रत्ना का दाह संस्कार किया जा सके,इसलिए सबने रत्ना को नदी में ही प्रवाहित करने का सोचा,सब घर से रत्ना का पार्थिव शरीर लेकर निकले तो अब भी हल्की हल्की बारिश हो रही थी, मामा शिवपूजन,पति भरत सिंह के अलावा चितवन ने भी रत्ना की अर्थी को काँन्धा दिया,जब तक रत्ना के पार्थिव शरीर को नदी के घाट तक लाया गया तो तब तक अँधियारा छाने लगा था,लालटेन जलाई गई और रत्ना के शरीर को एक डोंगी में लादकर उसके मामा ,पति और चितवन नदी के बीच में लाए और उसके शरीर में दो तीन खाली घड़े बाँधे ताकि शरीर जल में समा सके और ये सब क्रिया करके चितवन ने ना चाहते हुए भी रत्ना के शरीर को पानी में छोड़ दिया,देखते ही देखते शरीर से बंधे घड़ो में पानी भर गया और रत्ना नदी में समा गई,उधर बादल रो रहा था और इधर चितवन की आँखें,सभी घर लौटें फिर चितवन भी अपने घर लौट गया और जब सुबह बहुत बुलाने पर चितवन ने अपने घर का दरवाजा नहीं खोला तो लोगों ने दरवाजा तोड़कर देखा कि वो धरती पर मृत पड़ा था और उसके मंदिर में भगवान के स्थान पर रखी थी रत्ना की माटी की मूरत,जिसे वो बचपन से पूजता आया था और उसी की अराधना करते करते उसने इस संसार को अलविदा कह दिया था......

समाप्त.....
सरोज वर्मा.....