Mata-Pita-Bachcho ka Vyahvar - 2 in Hindi Anything by Disha Jain books and stories PDF | माता-पिता-बच्चो का व्यवहार - 2

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माता-पिता-बच्चो का व्यवहार - 2

★ माता-पिता का बच्चों के प्रति व्यवहार (पूर्वार्ध)

1. सिंचन, संस्कार के...
प्रश्नकर्ता : यहाँ अमरीका में पैसा है, लेकिन संस्कार नहीं हैं और यहाँ आसपास का वातावरण ही ऐसा है, तो इसके लिए क्या करें?

दादाश्री : पहले तो माता-पिता को संस्कारी बनना चाहिए। फिर बच्चे बाहर जाएँगे ही नहीं। माता-पिता ऐसे हों कि उनका प्रेम देखकर बच्चे वहाँ से दूर जाएँ ही नहीं। माता-ि पता को ऐसा प्रेममय बनना चाहिए। बच्चों को अगर सुधारना हो तो आप ज़िम्मेदार होो। बच्चों के साथ आप फर्ज़ से बँधे हुए हो। आपको समझ में नहीं आया?

अपने लोगों के बच्चों को बहुत उच्च स्तर के संस्कार देने चाहिए। अमरीका में कईं लोग कहते हैं कि ‘हमारे बच्चे मांसाहार करते हैं और ऐसा बहुत कुछ करते हैं।’ तब मैंने उनसे पूछा, ‘आप मांसाहार करते हो?’ तो बोले, ‘हाँ, हम करते हैं।’ तब मैंने कहा, ‘फिर तो बच्चे भी करेंगे ही।’ आपके ही संस्कार! और अगर आप नहीं करते तो भी वे कर सकते हैं, लेकिन दूसरी जगह। लेकिन आपका फर्ज़ इतना है कि अगर आपको उन्हें संस्कारी बनाना हो तो आपको अपना फर्ज़ नहीं चूकना चाहिए।

अब बच्चों का आपको ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा-वैसा, यहाँ का खाना न खाएँ। और यदि आप खाते हों तो अब यह ज्ञान प्राप्त होने के बाद आपको सब बंद कर देना चाहिए। अत: जैसे वे आपके संस्कार देखेंगे वैसा ही करेंगे। पहले हमारे माता-पिता संस्कारी क्यों कहलाते थे? वे बहुत नियमवाले थे और तब उनमें संयम था। और ये तो संयम रहित हैं।

प्रश्नकर्ता : जब बच्चे बड़े हो जाएँ, तब हमें उन्हें धर्म का ज्ञान किस तरह देना चाहिए?

दादाश्री : आप धर्म स्वरूप हो जाओ, तो वे भी हो जाएँगे। जैसे आपके गुण होंगे, बच्चे वैसा ही सीखेंगे। इसलिए आप ही धर्मिष्ठ हो जाना। आपको देख-देखकर सीखेंगे। यदि आप सिगारेट पीते होंगे, तो वे भी सिगारेट पीना सीखेंगे। आप शराब पीते होंगे तो वे भी शराब पीना सीखेंगे। माँस खाते होंगे तो माँस खाना सीखेंगे। जो आप करते होंगे वैसा ही वे सीखेंगे। वे सोचेंगे कि हम इनसे भी बढ़कर करें।

प्रश्नकर्ता : अच्छे स्कूल में पढ़ाने से अच्छे संस्कार नहीं आते?

दादाश्री : लेकिन, वे सब संस्कार नहीं हैं। माता-पिता के सिवा बच्चे अन्य किसी से संस्कार प्राप्त नहीं करते। संस्कार माता-पिता और गुरु के, और थोड़ा-बहुत उसका जो सर्कल होता है, फ्रेन्ड सर्कल उसके, उसके संयोग। संस्कार मित्रों तथा आसपास के लोगों से मिलते हैं। सबसे अधिक संस्कार माता-पिता से मिलते हैं। माता-पिता संस्कारी हों, तो बच्चे भी संस्कारी बनते हैं वर्ना संस्कारी होंगे ही नहीं।

प्रश्नकर्ता : हम बच्चों को पढ़ाई के लिए ‘इन्डिया’ भेज़ दें, तो हम अपनी ज़िम्मेदारी नहीं चूक जाते?

दादाश्री : नहीं, नहीं चूकते। आप उनका सब खर्च दे दो। वहाँ पर तो ऐसे स्कूल हैं कि जहाँ हिन्दुस्तान के लोग भी अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए भेजते हैं। खाना-पीना वहाँ पर और रहने का भी वहाँ पर, ऐसे अच्छे स्कूल हैं।

प्रश्नकर्ता : दादा, घर-संसार शांतिपूर्ण रहे और अंतरात्मा का भी जतन हो, ऐसा कर दीजिए।

दादाश्री : घर-संसार शांतिपूर्ण रहे इतना ही नहीं, लेकिन बच्चे
भी आपको देखकर ज़्यादा संस्कारी हों, ऐसा है। यह तो माता-पिता का पागलपन देखकर बच्चे भी पागल हो गए हैं। क्योंकि माता-पिता के आचार-विचार उपयुक्त नहीं है। पति-पत्नी भी, बच्चे बैठे हों, तब अनुपयुक्त व्यवहार करते हैं, तो फिर बच्चे बिगड़ें नहीं तो और क्या होगा? बच्चों में कैसे संस्कार आएँगे? मर्यादा तो रखनी चाहिए न! अंगारों का कैसा प्रभाव पड़ता है? छोटा बच्चा भी अंगारे से डरता है न? माता-पिता के मन फ्रेक्चर हो गए हैं। मन विव्हल हो गए हैं। कुछ भी बोल देते हैं, दूसरों को दु:खदायी हो, वैसी वाणी बोलते हैं। इससे बच्चे बिगड़ जाते हैं। पत्नी ऐसा बोलती है कि पति को दु:ख होता है और पति ऐसा बोलता है कि पत्नी को दु:ख होता है। हिन्दुस्तान के माता-पिता कैसे होने चाहिए? वे बच्चों को सिखाकर, इस प्रकार तैयार करें कि सभी संस्कार उन्हें पंद्रह साल की उम्र तक दे दें।

प्रश्नकर्ता : अब यह जो उसके संस्कार का स्तर है वह भी कम होने लगा है। उसी की यह सब परेशानी है।

दादाश्री : नहीं, नहीं। संस्कार ही खत्म होने लगे हैं। इसमें अब दादा मिल गए हैं, इसलिए फिर से मूल संस्कार में लाएँगे। जैसे सतयुग में थे, वैसे संस्कार फिर से लाएँगे। इस हिन्दुस्तान का एक बच्चा सारे विश्व का बोझ उठा सके, इतनी शक्ति का धनी है। सिर्फ उसे पुष्टि देने की ज़रूरत है। ये तो भक्षक निकले! भक्षक यानी अपने सुख के लिए जो दूसरों को सभी तरह से लूट लें। जो खुद के सुख का त्याग करके बैठा है, वही दूसरों को समस्त सुख दे सकता है।

लेकिन यहाँ तो सेठजी पूरे दिन सिर्फ लक्ष्मी के ही विचारों में रहते हैं। तब मुझे सेठजी से कहना पड़ता है कि ‘सेठ, आप लक्ष्मी के पीछे पड़े हो और यहाँ घर बिखर गया है!’ बेटियाँ मोटर लेकर एक तरफ जाती हैं, बेटे दूसरी तरफ और सेठानी कहीं और ही जाती हैं! सेठ, आप तो हर तरह से लुटे गए हो! तब सेठ ने पूछा, ‘मैं क्या करूँ?’ मैंने कहा, ‘बात को समझो और जीवन किस प्रकार जीना, यह समझो। सिर्फ पैसों के पीछे मत पड़ो। शरीर का ध्यान रखो, नहीं तो हार्ट फेल हो जाएगा। शरीर का ध्यान, पैसों का ध्यान, बेटियों के संस्कार का ध्यान, सभी कोने बुहारने हैं। आप एक ही कोना बुहार रहे हो। अब बंगले का एक कोना बुहारो और बाकी सब जगह कूड़ा पड़ा रहे तो कैसा लगेगा? सभी कोने बुहारने हैं। इस तरह तो जीवन कैसे जीया जाए? इसलिए उनके साथ अच्छा बर्ताव करो, उच्च संस्कारी बनाओ। इन बच्चों को उच्च संस्कारी बनाओ। आप खुद तप करो, लेकिन उन्हें संस्कारी बनाओ।’

प्रश्नकर्ता : हम उन्हें सुधारने के प्रयत्न तो सभी करते हैं, फिर भी वह नहीं सुधरे तो फिर क्या आदर्श पिता को उसे प्रारब्ध मानकर छोड़ देना चाहिए?

दादाश्री : नहीं, लेकिन प्रयत्न तो आप अपनी तरह से करते हो न? आपके पास सर्टिफिकेट है? मुझे बताओ।

प्रश्नकर्ता : हमारी बुद्धि के अनुसार प्रयत्न करते हैं।

दादाश्री : आपकी बुद्धि अर्थात्, मैं आपको बता दूँ कि एक आदमी खुद जज हो, खुद ही मुजरिम हो और वकील भी खुद हो, तो वह कैसा न्याय करेगा?

खुद के संस्कार तो लेकर ही आता है बच्चा। लेकिन उसमें आपको हेल्प करके उन संस्कारों को रंग देने की ज़रूरत है।

उसे छोड़ नहीं देना चाहिए कभी भी। उनका ध्यान रखना चाहिए। छोड़ दोगे तो फिर वह खत्म हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : हाँ, ऐसा करते हैं, लेकिन लास्ट स्टेज में क्या वह प्रारब्ध पर छोड़ देना चाहिए?

दादाश्री : ना, नहीं छोड़ सकते। ऐसे छोड़ने का मौंका आए, तब मेरे पास ले आना। मैं ओपरेशन कर दूँगा। ऐसे छोड़ नहीं सकते, जोखिम है।

एक बेटा अपने पिताजी की मूँछें खींच रहा था, तो पिताजी खुश
हो गए। कहने लगा, ‘कैसा बेटा है! देखो, मेरी मूँछें खींची!’ लो, अब उसके कहे अनुसार करोगे तो बेटा मूँछ पकड़ेगा और बार-बार खींचेगा, तब भी अगर कुछ नहीं बोलोगे तो क्या होगा फिर? और कुछ नहीं करें तो बच्चे को ज़रा चिमटी भर लेना, चिमटी भरने से वह समझेगा कि यह गलत बात है। मैं यह जो वर्तन कर रहा हूँ वह गलत है, ऐसा उसे ज्ञान होगा। उसे बहुत मारना मत, सिर्फ धीरे से चिमटी भरना।

बाप ने बच्चे की मम्मी को बुलाया, तब वह रोटी बेल रही थी। उसने कहा, ‘क्या काम है? मैं रोटी बेल रही हूँ।’ ‘तू यहाँ आ, जल्दी आ, जल्दी आ, जल्दी आ!’ वह दौड़ती-दौड़ती आई, ‘क्या है?’ तब वह बोला, ‘देख, देख, बेटा कितना होशियार हो गया है! देख, पैर की एड़ियाँ ऊँची करके जेब में से पच्चीस रुपये निकाले।’ बच्चा यह देखकर सोचता है, ‘अरे! मैंने आज बहुत अच्छा काम किया। अब मैं ऐसा काम सीख गया।’ ऐसे फिर वह चोर बन गया। तब क्या होगा? ‘जेब से पैसे निकालना अच्छा है’ ऐसा उसे ज्ञान प्रकट हो गया। आपको क्या लगता है? क्यों नहीं बोलते? क्या ऐसा करना चाहिए?

ऐसे घनचक्कर कहाँ से पैदा हुए? ये बाप बन बैठे हैं! शर्म नहीं आती? इससे बच्चे को कैसा प्रोत्साहन मिला, यह समझ में आता है? बच्चा देखता रहा कि ‘मैंने बहुत बड़ा पराक्रम किया!’ इस प्रकार लुट जाना क्या शोभा देता है आपको? क्या बोलने से बच्चों को ‘एन्करेजमेंट’ (प्रोत्साहन) मिलेगा और क्या बोलने से नुकसान होगा, उसका भान तो होना चाहिए न? ये तो ‘अनटेस्टेड फादर’ (अयोग्य पिता) और ‘अनटेस्टेड मदर’ (अयोग्य माता) हैं। बाप मूली और माँ गाजर, बच्चे कैसे निकलेंगे। सेब थोड़े ही बनेंगे?!

इसलिए कलियुग के इन माता-पिताओं को यह सब आता ही नहीं और गलत ‘एन्करेजमेंट’ देते हैं कुछ तो, उन्हें लेकर घूमते हैं। पत्नी कहती है, ‘इसके उठा लो,’ तो पति बच्चे को उठा लेता है। क्या करे? यदि वह अकड़वाला हो और न ले तो पत्नी कहेगी, ‘क्या मेरी अकेली का है? मिलकर रखने हैं।’ एैसा-वैसा कहे तो पति को बच्चे को उठाना ही पड़ता है, क्या इससे छुटकारा है? कहाँ जाएगा वह? बच्चों को उठा-उठाकर सिनेमा देखने जाना, दौड़धूप करना। फिर बच्चों को संस्कार किस तरह मिलेंगे?

एक बैंक मेनेजर ने मुझसे कहा, ‘दादाजी, मैंने तो कभी भी वाइफ या बच्चों को एक अक्षर भी नहीं बोला है। चाहे कितनी भी भूल करें, कुछ भी करे, लेकिन मैं कुछ नहीं कहता।’

वह ऐसा समझा होगा कि दादाजी मेरी बहुत तारीफ करेंगे। वह क्या आशा करता था समझ में आया न? और मुझे उसके ऊपर बड़ा गुस्सा आया कि तुझे किस ने बैंक का मैनेजर बनाया? तुझे बाल-बच्चे सम्हालना नहीं आता और बीवी सम्हालना नहीं आता! तब वह तो घबरा गया बेचारा। उल्टा मैंने उसे कहा, ‘आप अंतिम प्रकार के बेकार आदमी हो! आप इस दुनिया में किसी काम के नहीं हो!’ वह आदमी मन में समझ रहा था कि मैं ऐसा कहूँगा तो ‘दादा’ मुझे बड़ा इनाम देंगे। पगले, इसका इनाम होता होगा? बच्चा गलत करे तब हमें ‘तूने ऐसा क्यों किया? फिर ऐसा मत करना।’ इस तरह नाटकीय रूप से कहना चाहिए; नहीं तो बच्चा समझेगा कि वह जो कुछ कर रहा है वह ‘करेक्ट’ ही है, क्योंकि पिता ने ‘एक्सेप्ट’ किया है। ऐसा नहीं बोलने के कारण ही घरवाले मुँहफट हो गए। सबकुछ कहना, लेकिन नाटकीय! बच्चों को रात को बिठाकर समझाओ, बातचीत करो। घर के सभी कोनों से कूड़ा बुहारना पड़ेगा न? बच्चों को थोड़ा हिलाने की ज़रूरत है। वैसे संस्कार तो होते ही हैं, लेकिन हिलाना पड़ता है। उनको हिलाने में कुछ गुनाह है?

नन्हें बेटे-बेटियों को समझाना कि सुबह नहा-धोकर भगवान की पूजा करो और रोज़ बोलो कि ‘मुझे और सारे जगत् को सद्बुद्धि दो, जगत् का कल्याण करो।’ वे यदि इतना बोलें तो उन्हें संस्कार मिले हैं, ऐसा कहलाएगा और माता-पिता का कर्म-बँध छूट जाएगा। दूसरा, आपको बच्चों से ‘दादा भगवान के असीम जय जयकार हो’ हर रोज़ बुलवाना चाहिए। हिन्दुस्तान के बच्चे तो इतने सुधर गए हैं, कि सिनेमा भी नहीं जाते। पहले दो-तीन दिन थोड़ा अटपटा लगेगा, लेकिन बाद में दो-तीन दिनों के बाद अभ्यस्त होने पर, अंदर स्वाद उतरने पर, बल्कि वे खुद याद करेंगे।

2. फर्ज़ के गीत क्या गाना?
स्वैच्छिक कार्य का इनाम होता है। एक भाई फर्ज़ के तौर पर किए गए कार्य का इनाम पाना चाहते थे! सारा संसार इनाम खोज रहा है कि ‘मैंने इतना-इतना किया, आपको पता नहीं? आपको मेरी कीमत नहीं है।’ अरे भाई, क्यों कीमत खोज रहा है? यह जो कुछ किया वह तो फर्ज़ निभाया! एक आदमी अपने लड़के के साथ बहस कर रहा था, बाद में मैंने उसे डाँटा। वह कह रहा था, ‘कर्ज़ लेकर मैंने तुझे पढ़ाया। अगर मैं कर्ज़ न लेता तो क्या तू पढ़ पाता? भटकता रहता।’ भाई, बिना वजह बकवास क्यों कर रहा है? यह तो आपका फर्ज़ है, ऐसा नहीं कह सकते! यह तो बेटा समझदार है। अगर ‘आपको किसने पढ़ाया?’ ऐसे पूछता तो क्या जवाब देते? ऐसा पागल की तरह बोलते रहते हैं न लोग? मूर्ख लोग, नासमझ, कुछ पता ही नहीं।

बच्चों के लिए सबकुछ करना चाहिए। लेकिन बच्चे कहें कि ‘नहीं पिताजी अब बहुत हो गया।’ तो भी पिता उसे छोड़ता नहीं, तब क्या करें? बच्चें लाल झंडी दिखाएँ तो हमें समझना नहीं चाहिए? आपको कैसा लगता है?

फिर वह कहे कि मुझे व्यवसाय करना है, तो हमें व्यवसाय के लिए कुछ रास्ता कर देना चाहिए। इससे ज़्यादा गहराई तक जानेवाला पिता मूर्ख है। यदि वह नौकरी में लग गया हो तो अपने पास जो कुछ हो, उसे गांठ बाँधकर रख देना चाहिए। किसी वक्त मुसीबत में हो, तब हज़ार-दो हज़ार भेजना चाहिए। किन्तु यह तो हमेशा पूछता ही रहता है। तब बेटा कहता है ‘आपको मना कर रहा हूँ न कि मेरी बात में दख़ल मत दीजिए।’ तब यह क्या कहता है, ‘अभी उसमें अक्ल नहीं है, इसलिए ऐसा कहता है।’ अरे, यह तो आप निवृत्त हो गए; अच्छा ही हुआ, जंजाल से छूटे। बेटा खुद ही आपको मना कर रहा है न!

प्रश्नकर्ता : सही रास्ता कौन सा? हम वहाँ बच्चे सँभालें या हमारे कल्याण के लिए सत्संग में आएँ?

दादाश्री : बच्चे तो अपने आप सँभल रहे हैं। बच्चों को आप क्या सँभालोगे? अपना कल्याण करना वही मुख्य धर्म है। बाकी ये बच्चे तो सँभले हुए हैं न! बच्चों को क्या आप बड़े करते हो? बाग में गुलाब के पौधे लगाए हों तो रात में बढ़ते हैं या नहीं बढ़ते? वह तो हम मानते हैं कि मेरा गुलाब, लेकिन गुलाब तो यही समझ रहा है कि मैं खुद ही हूँ। किसी और का नहीं हूँ। सभी अपने खुद के स्वार्थ से प्रेरित हैं। ये तो हम पगला अहंकार करते हैं, पागलपन करते हैं।

प्रश्नकर्ता : यदि हम गुलाब को पानी न दें, तो गुलाब तो मुरझा जाएगा।

दादाश्री : न दें ऐसा होता ही नहीं न! बेटे को अच्छी तरह न रखें तो बेटा काटने को दौड़ेगा या तो पत्थर मारेगा।

अब सांसारिक फर्ज़ निभाते समय धर्म कार्य का समन्वय किस प्रकार हो? बेटा उल्टा बोल रहा हो तो भी हमें अपना धर्म चूके बगैर, फर्ज़ पूरा करना चाहिए। आपका धर्म क्या? बेटे को पाल-पोषकर बड़ा करना, उसे सही रास्ते पर चलाना। अब वह टेढ़ा बोल रहा है और आप भी टेढ़ा बोलो तो परिणाम क्या होगा? वह बिगड़ जाएगा। इसलिए आपको प्रेम से उसे फिर से समझाना चाहिए कि बैठो भाई, देखो, ऐसा है, वैसा है। यानी सभी फर्ज़ों के साथ धर्म होना चाहिए। धर्म नहीं होगा तो उसकी जगह अधर्म आ जाएगा। कोठरी खाली नहीं रहेगी। अभी यहाँ हमने कोठरियाँ खाली रख छोड़ी हों तो लोग ताला खोलकर घुस जाएँगे या नहीं घुस जाएँगे?

वास्तव में घर में स्त्रियों का सच्चा धर्म क्या? आसपास के सभी लोग ऐसा कहें कि वाह! क्या कहना! फर्ज़ ऐसा निभाएँ कि आसपास के लोग खुश हो जाएँ। इसलिए स्त्री का सच्चा धर्म है कि बच्चों की परवरिश करना, उन्हें अच्छे संस्कार देना; पति में संस्कार कम हों तो संस्कार सींचना। सबकुछ अपना सुधारना, इसका नाम धर्म। सुधारना नहीं पड़ेगा?

कुछ लोग तो क्या करते हैं? भगवान की भक्ति में तो तन्मय रहते हैं, लेकिन बच्चों को देखकर चिढ़ते हैं। जिनमें भगवान प्रकट हुए ऐसे बच्चों को देखकर चिढ़ता है और वहाँ भगवान की भक्ति करता रहता है, उसका नाम भगत! इन बच्चों पर चिढऩा चाहिए क्या? अरे! इनमें तो प्रकट भगवान है!

3. नहीं झगड़ते, बच्चों की उपस्थिति में...
अगर हम मांसाहार न करें, शराब न पीएँ और घर में पत्नी के साथ झगड़ा न करें तो बच्चे देखते हैं कि पापाजी बहुत अच्छे हैं। दूसरों के पापा-मम्मी झगड़ते हैं, मेरे मम्मी-पापा नहीं झगड़ते। इतना देखें तो फिर बच्चे भी सीखते हैं।

रोज़ाना पति पत्नी के साथ झगड़े तो बच्चे यों देखते रहते हैं। ‘ये पापा है ही ऐसे’ कहेंगे। क्योंकि भले ही इतना छोटा सा हो फिर भी इसका न्याय करनेवाली न्यायाधीश बुद्धि उसमें होती है। बेटियों में न्यायाधीश बुद्धि कम होती है। बेटियाँ हर वक्त उनकी माँ का ही पक्ष लेती हैं। लेकिन ये लड़के तो न्यायाधीश बुद्धिवाले, जानते हैं कि पापा का दोष है! फिर दो-चार व्यक्तियों को पापा का दोष बताते-बताते, निश्चय भी करता है कि बड़ा होकर सिखाऊँगा! बाद में बड़ा होने पर वैसा करता भी है। तेरी अमानत वापस तुझी को!

बच्चों की मौजूदगी में नहीं लड़ना चाहिए। आप संस्कारी होने चाहिए। आपकी गलती हो तो भी पत्नी कहे, ‘कोई बात नहीं।’ और उसकी गलती हो तो आप कहो, ‘कोई बात नहीं।’ बच्चे ऐसा देखते हैं तो ऑल राइट (ठीक) होते जाते हैं। और अगर लड़ना हो तो इंतजार करना, जब बच्चे स्कूल जाएँ, तब जितना लड़ना हो उतना लड़ना। लेकिन बच्चों की उपस्थिति में ऐसा लड़ाई-झगड़ा हो, तो वे देखते हैं और फिर उनके मन में बचपन से पापा और मम्मी के लिए विरोधी भावना जन्म लेने लगती है। उनका सकारात्मक भाव छूटकर नकारात्मक शुरू हो ही जाता है। अर्थात् आजकल बच्चों को बिगाड़ने वाले माता-पिता ही हैं!

यदि लड़ना हो तो एकांत में लड़ना, बच्चों की मौजूदगी में नहीं। एकांत में दरवाज़ा बंद करके दोनों को आमने-सामने लड़ना हो तो लड़ो।

महँगे आम लाए हों और उस आम का रस, साथ में रोटियाँ तैयार करके सब पत्नी ने परोसा और भोजन की शुरूआत हुई। थोड़ा खाया और जैसे ही कढ़ी में हाथ डाला, थोड़ी खारी लगी कि टेबल ठोककर कहता है कि ‘कढ़ी खारी बना दी।’ अरे! सीधी तरह खाना खा ले न! घर का मालिक, वहाँ कोई उसके ऊपर नहीं। वह खुद ही बॉस, इसलिए डाँट-डपट शुरू कर देता है। बच्चे डर जाते हैं कि पापा ऐसे पागल क्यों हो गए? लेकिन बोल नहीं सकते। क्योंकि बेचारे दबे हुए हैं, लेकिन मन में अभिप्राय बाँध लेते हैं कि पापा पागल लगते हैं।

अत: बच्चे सब ऊब गए हैं। वे कहते हैं कि फादर-मदर शादीशुदा हैं, उनका सुख (व्यंग में) देखकर हम ऊब गए हैं। मैंने पूछा, ‘क्यों? क्या देखा?’, तब वे कहते हैं कि रोज़ाना क्लेश होता है। इसलिए हम समझ गए हैं कि शादी करने से दु:ख मिलता है। अब हमें शादी नहीं करनी।

4. अनसर्टिफाइड फादर्स एण्ड मदर्स
एक बाप कहता है, ‘ये सारे बच्चे मेरे विरोधी हो गए हैं।’ मैंने कहा, ‘आपमें योग्यता नहीं यह स्पष्ट हो जाता है।’ आपमें योग्यता हो तो लड़के क्यों विरोध करें? इसलिए इस प्रकार अपनी आबरू मत बिगाड़ना।

और बच्चों को डाँटते रहें तो बिगड़ जाते हैं। उन्हें सुधारना हो तो हमारे पास बुलाकर कुछ बातचीत करवाएँ तो वे सुधर जाएँ!

इसलिए मैंने पुस्तक में लिखा है कि ‘अनक्वालिफाइड फादर्स एण्ड अनक्वालिफाइड मदर्स’ (बिना योग्यतावाले माता-पिता), तब बच्चे भी वैसे ही हो जाएँगे न! इसलिए मुझे कहना पड़ा, फादर बनने की योग्यता का सर्टिफिकेट लेने के बाद शादी करनी चाहिए।

इन्हें तो जीवन जीना भी नहीं आता, कुछ भी नहीं आता! यह संसार-व्यवहार किस तरह चलाना, यही नहीं आता। इसलिए फिर बच्चों की धुलाई करता है! अरे उन्हें पीटता है तो क्या वे कपड़े हैं, जो धुलाई करता है? बच्चों को इस तरह सुधारें, मारपीट करें, यह कहाँ का तरीका है? जैसे पापड़ का आटा गूँध रहे हों! मोगरी से पापड़ का आटा गूँधते हैं, इस तरह एक आदमी को धुलाई करते मैंने देखा।

माता-पिता तो वे कहलाते हैं कि अगर बेटा बुरी लाईन पर चला गया हो, फिर भी एक दिन जब माता-पिता कहें, ‘बेटा, यह हमें शोभा नहीं देता, यह तूने क्या किया?’ तो दूसरे दिन सब बंद कर दे। ऐसा प्रेम है ही कहाँ? यह तो बगैर प्रेम के माता-पिता! यह जगत् प्रेम से ही वश होता है। इन माता-पिता को बच्चों पर कितना प्यार है? गुलाब के पौधे पर माली को जितना होता है उतना! इन्हें माता-पिता कैसे कह सकते हैं?

प्रश्नकर्ता : बच्चों की पढ़ाई के लिए या संस्कार के लिए हमें कुछ सोचना ही नहीं चाहिए?

दादाश्री : सोचने में हर्ज नहीं।

प्रश्नकर्ता : पढ़ाई तो स्कूल में होती है, लेकिन संस्कार व चारित्र कैसे दें?

दादाश्री : गढ़ाई सुनार को सौंप दो। जो उन्हें गढऩेवाले होंगे, वे गढ़ेंगे। जब तक बेटा पँद्रह साल का हो, तब तक उसे कह सकते हैं, तब तक हम जैसे हैं, वैसा उसे बना दें। बाद में उसकी पत्नी उसे गढ़ेगी। यह तो बच्चे को गढऩा आता नहीं फिर भी लोग गढ़ रहे हैं! इससे गढ़ाई ठीक से नहीं होती। मूर्ति अच्छी नहीं बनती। नाक ढाई इंच के बजाय साढ़े चार इंच की कर देता है! बाद में जब बेटे की पत्नी आएगी, वह उसकी नाक को काटकर ठीक करने जाएगी, तब बेटा भी उसकी नाक काटने जाएगा। इस तरह दोनों आमने-सामने आ जाएँगे।

प्रश्नकर्ता : ‘सर्टिफाइड’ फादर-मदर की परिभाषा क्या है?

दादाश्री : ‘सर्टिफाइड’ माता-पिता, अर्थात् अपने बच्चे अपने कहने के मुताबिक चलें, अपने बच्चे अपने पर श्रद्धा नहीं रखें, माता-पिता को परेशान करें। ऐसे माता-पिता ‘अन्सर्टिफाइड’ ही कहलाएँगे न?

वर्ना बच्चे ऐसे होते ही नहीं, बच्चे आज्ञाकारी होते हैं। ये तो माता-पिता का ही ठिकाना नहीं। ज़मीन ऐसी है, जैसा बीज है माल (फल) भी वैसा है! ऊपर से कहता है कि ‘मेरे बच्चे महावीर बनेंगे।’ महावीर होते होंगे? महावीर की माँ तो कैसी होनी चाहिए!! बाप ऐसा-वैसा हो तो चलेगा, लेकिन माँ तो कैसी हो?!

इसमें से कोई बात आपको पसंद आई?

प्रश्नकर्ता : यह बात पसंद आए, तब उसका असर हो ही जाता है।

दादाश्री : बहुत से लोग बेटे से कहते हैं, ‘तू मेरा कहा नहीं मानता।’ मैंने कहा, ‘आपकी वाणी उसे पसंद नहीं है, अगर पसंद हो तो असर हो ही जाएगा।’ और बाप कहता है, ‘तू मेरा कहा नहीं मानता।’ अरे!, तुझे बाप बनना नहीं आया। इस कलियुग में लोगों की दशा तो देखो! नहीं तो सतयुग में कैसे माता-पिता थे!

मैं यह सिखाना चाहता हूँ कि आप ऐसा बोलो कि बच्चों को आपकी बातों में इन्टरेस्ट (रुचि)आए, तब वे आपका कहा हुआ करेंगे ही। आपने मुझसे कहा न कि मेरी बात आपको पसंद आती है। तो आपसे इतना होगा ही।

प्रश्नकर्ता : आपकी वाणी का असर ऐसा होता है कि जिस पज़ल का बुद्धि हल ना खोज सके, उसका हल यह वाणी ला सकती है।

दादाश्री : हृदयस्पर्शी वाणी। वह मदरली (मातृत्ववाली) कहलाती है। हृदयस्पर्शी वाणी यदि कोई बाप अपने बेटे से कहे, तो वह सर्टिफाइड़ फादर कहलाएगा!

प्रश्नकर्ता : बच्चे इतनी आसानी से नहीं मानते!

दादाश्री : तो क्या हिटलरीज़म (ज़बरदस्ती) से मानते हैं? यदि हिटलरीज़म करें तो वह हेल्पफुल (सहायक) नहीं है।

प्रश्नकर्ता : वे मानते हैं लेकिन बहुत समझाने के बाद।

दादाश्री : उसमें कोई हर्ज नहीं। वह न्यायसंगत है। बहुत समझाना पड़ता है, इसका कारण क्या है? कि आप खुद नहीं समझ पाते, इसलिए ज़्यादा समझाना पड़ता है। समझदार व्यक्ति को एक बार समझाना पड़ता है। फिर हम न समझ जाएँ? बहुत समझना पड़े, लेकिन बाद में समझ जाते हैं न?

प्रश्नकर्ता : हाँ।

दादाश्री : वह सबसे अच्छा रास्ता है। यह तो मार-ठोककर समझाना चाहते हैं। यों बाप बन बैठा, जैसे अब तक दुनिया में कभी कोई बाप ही नहीं बना था! अर्थात् जो समझा-बुझाकर इस तरह काम लेते हैं, उन्हें मुझे अन्क्वालिफाइड (अक्षम) नहीं कहना है।

‘बाप होना’ वह सद्व्यवहार कैसा होना चाहिए? बेटे के साथ दादागीरी तो नहीं, किन्तु सख्ती भी नहीं होनी चाहिए, वह बाप कहलाता है।

प्रश्नकर्ता : जब बच्चे परेशान करें, तब बाप को क्या करना चाहिए? तब भी बाप को सख्ती नहीं बरतनी चाहिए?

दादाश्री : बच्चे बाप के कारण ही परेशान करते हैं। बाप में नालायकी हो, तभी बच्चे परेशान करते हैं। इस दुनिया का कानून ऐसा ही है। बाप में योग्यता न हो तो बच्चे परेशान किए बगैर नहीं रहते।

प्रश्नकर्ता : बेटा बाप का कहा न माने तो क्या करें?

दादाश्री : ‘अपनी भूल है’ ऐसा समझकर छोड़ देना! अपनी भूल हो तब नहीं मानते न! बाप होना आया हो, बेटा उसकी बात नहीं माने ऐसा होता होगा? लेकिन बाप होना आता ही नहीं न!

प्रश्नकर्ता : एक बार फादर बन गए तो पिल्ले छोड़ेंगे क्या?

दादाश्री : छोड़ते होंगे क्या? पिल्ले तो सारा जीवन ‘डॉग’ और ‘डॉगिन’ दोनों को देखते ही रहते हैं कि ये भौं-भौं करे और यह (डॉगिन) काटती रहे। ‘डॉग’ भौं-भौं किए बिना नहीं रहता। लेकिन आखिर में दोष उस ‘डॉग’ का ही निकलता है। बच्चे उनकी माँ की तरफदारी करते हैं। इसलिए मैंने एक आदमी से कहा था, ‘बड़े होकर ये बच्चे तुझे मारेंगे। इसलिए घरवाली के साथ सीधी तरह रहना।’ यह तो बच्चे देखते हैं उस समय, उनके बस में न हो तब तक और जब बस में हो, तब कोठरी में बंद करके पिटाई करते हैं। लोगों के साथ ऐसा हुआ भी है! बेटे ने उसी दिन से मन में ठान लिया होता है कि बड़ा होकर मैं बाप को वापस लौटाऊँगा। मेरा कुछ भी हो लेकिन उनको तो सबक सिखाऊँगा ही ऐसा ठान लेता है। यह भी समझने जैसा है न?

प्रश्नकर्ता : क्या पूरा दोष बाप का ही है?

दादाश्री : बाप का ही! दोष ही बाप का है। बाप में बाप बनने की योग्यता न हो, तभी उसकी पत्नी उसके सामने हो जाती है। बाप में योग्यता नहीं हो तभी ऐसा होता है न! ये तो बड़ी मुश्किल से जैसे-तैसे अपना संसार निभाते हैं। लेकिन पत्नी कब तक समाज के डर से डरकर रहे?

प्रश्नकर्ता : क्या हमेशा बाप की ही भूल होती है?

दादाश्री : बाप की ही भूल होती है। उसे बाप होना नहीं आया, इसलिए यह सब बिगड़ गया है। घर में यदि बाप बनना हो, तो उसकी स्त्री उसके पास विषय की भीख माँगे, ऐसी दृष्टि हो तब बाप बन सकता है।

प्रश्नकर्ता : बाप घर में रुआब न रखे, बापपना न रखे तब भी उसकी भूल है?

दादाश्री : तब तो सब ठीक हो जाए।

प्रश्नकर्ता : फिर भी बच्चे बाप का कहा मानेंगे, इसकी क्या गारन्टी है?

दादाश्री : है न! अपना ‘केरेक्टर’ (चरित्र) अच्छा हो, तो सारा संसार केरेक्टर वाला (चरित्रवान) है।

प्रश्नकर्ता : बच्चे निम्न कोटि के निकलें, तो उसमें बाप क्या करे?

दादाश्री : मूल दोष बाप का ही होता है। वह क्यों भुगत रहा है? पहले से आचरण बिगाड़े हैं, उसकी वजह से यह दशा हुई है न? हम यह कहना चाहते हैं कि जिसका किसी जन्म में अपने आचरण पर से कंट्रोल (अंकुश)न बिगड़ा हो उसके साथ ऐसा नहीं होता। पूर्व कर्म कैसे हुए? अपना मूल कंट्रोल नहीं है तभी न? अर्थात् हम कंट्रोल में मानते हैं। कंट्रोल मानने के लिए तुझे उसके सभी नियम समझने चाहिए।

ये बच्चे अपना आईना हैं। अपने बच्चों पर से पता चलता है कि अपनी कितनी गलतियाँ हैं!

यदि आपमें शील नामक गुण हो तो बाघ भी आपके वश में रहे, तो बच्चों की क्या मजाल? अपने शील का ठिकाना नहीं है, उसी वजह से यह सब गड़बड़ है। शील समझ गए न?

प्रश्नकर्ता : शील किसे कहना? उसके बारे में ज़रा विस्तार से, सब समझ सकें, इस प्रकार कहिए न!

दादाश्री : किंचित्मात्र दु:ख देने के भाव न हों। अपने दुश्मन को भी ज़रा सा दु:ख पहुँचाने का भाव न हो। उसके अंदर ‘सिन्सियारिटी’ (निष्ठा) हो, ‘मोरालिटी’ (नैतिकता) हो, सारे गुण सम्मिलित हों। किंचित्मात्र हिंसक भाव न हो, वह ‘शीलवान’ कहलाता है।


प्रश्नकर्ता : आज-कल के माता-पिता ऐसा सब कहाँ से लाएँ?

दादाश्री : तो भी हमें उसमें से थोड़ा बहुत, पच्चीस प्रतिशत चाहिए या नहीं चाहिए? लेकिन हम काल (समय) के कारण आईसक्रीम खाते रहें ऐसे मौजी हो गए हैं।

प्रश्नकर्ता : पिता का चरित्र कैसा होना चाहिए?

दादाश्री : बच्चे रोज़ कहें कि ‘पापा, हमें बाहर अच्छा नहीं लगता। आपके साथ बहुत अच्छा लगता है।’ ऐसा चरित्र होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : यह तो उल्टा होता है, बाप घर में हो तो बेटा बाहर जाए और बाप बाहर जाए तो बेटा घर में रहता है।

दादाश्री : बेटे को पापा के बगैर अच्छा न लगे ऐसा होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : तो ऐसा होने के लिए पापा को क्या करना चाहिए?

दादाश्री : जब मुझे बच्चे मिलते हैं न, तो बच्चों को मेरे बगैर अच्छा नहीं लगता। बूढ़े मिलते हैं, तो बुड्ढों को भी मेरे बगैर अच्छा नहीं लगता। जवान मिलते हैं तो जवानों को भी मेरे बगैर अच्छा नहीं लगता।

प्रश्नकर्ता : हमें भी आप जैसे ही बनना है।

दादाश्री : हाँ, यदि आप मेरे जैसा करो तो वैसे बन जाओगे। यदि आप कहो, ‘पेप्सी लाओ।’ तो वे कहेंगे, ‘नहीं है।’ ‘तो कोई हर्ज नहीं, पानी ले आओ।’ जबकि ये तो कहें, ‘पेप्सी क्यों लाकर नहीं रखी?’ ये हुई गड़बड़ फिर से। हमें तो दोपहर को भोजन का समय हुआ हो और कहें कि ‘आज तो खाना नहीं बनाया’। तो मैं कहूँगा कि ‘ठीक है, लाओ थोड़ा पानी पी लें, बस।’ ‘आपने क्यों नहीं पकाया?’ कहा कि फौजदार हो जाते हैं। वहाँ पर फौज़दारी करने लगते हैं।

5. समझाने से सुधरें, बच्चे
यह किट-किट करने के बजाय मौन रहना अच्छा, नहीं बोलना अच्छा। बच्चे सुधरने के बजाय बिगड़ते हैं, इसलिए एक अक्षर भी मत कहना। बिगड़े उसकी ज़िम्मेदारी अपनी है। यह समझ में आए ऐसी बात है न?

आप कहो कि ऐसा मत करना, तब वह उल्टा ही करता है। ‘करूँगा, जाइए जो करना है करो।’ उल्टा वह ज़्यादा बिगड़ता है। बच्चे अपनी आबरू मिट्टी में मिला देते हैं। इन भारतियों को जीना भी नहीं आया! बाप होना नहीं आया और बाप बन बैठे हैं। इसलिए ऐसे-वैसे मुझे समझाना पड़ता है, पुस्तकें प्रकाशित करनी पड़ती हैं। वर्ना जिसने अपना ज्ञान लिया है, वे तो बच्चों को बहुत अच्छा बना सकते हैं। उसे बिठाकर, हाथ फेरकर पूछो कि ‘बेटा, तुझे, यह भूल हुई, ऐसा नहीं लगता!’

यह इन्डियन फिलॉसफि (भारतीय तात्विक समझ) कैसी होती है? माता-पिता में से एक डाँटने लगे तब दूसरा, बच्चे का बचाव करता है। इसलिए वह कुछ सुधर रहा हो, तो सुधरना तो एक ओर रहा, ऊपर से बेटा समझता है कि ‘मम्मी अच्छी है और पापा बुरे हैं, बड़ा हो जाऊँगा तब इन्हें मारूँगा।’

बच्चों को सुधारना हो तो हमारी आज्ञानुसार चलो। बच्चों के पूछने पर ही बोलना और उन्हें यह भी कह देना कि मुझे नहीं पूछो तो अच्छा। बच्चों के संबंध में उल्टा विचार आए तो तुरंत उसका प्रतिक्रमण कर डालना।

किसी को सुधारने की शक्ति इस काल में खत्म हो गई है। इसलिए सुधारने की आशा छोड़ दो। क्योंकि मन-वचन-काया की एकात्मवृति हो, तभी सामनेवाला सुधर सकता है। मन में जैसा हो, वैसा वाणी में निकले और वैसा ही वर्तन हो, तभी सामने वाला सुधरेगा। इस काल में ऐसा नहीं है। घर में प्रत्येक व्यक्ति के साथ कैसे व्यवहार हो, उसकी ‘नोर्मेलिटी’ (समानता) ला दो। आचार, विचार और उच्चार में सीधा परिवर्तन हो तो खुद परमात्मा बन सकता है और उल्टा परिवर्तन हो तो राक्षस भी बन सकता है।

लोग सामनेवाले को सुधारने के लिए सब फ्रेक्चर कर डालते हैं। पहले खुद सुधरे तो ही दूसरों को सुधार सकता है। लेकिन खुद के सुधरे बगैर सामने वाला कैसे सुधरेगा?

आपको बच्चों के लिए भाव करते रहना है कि बच्चों की बुद्धि सीधी हो। ऐसा करते-करते बहुत दिनों के बाद असर हुए बिना नहीं रहता। वे तो धीमे-धीमे समझेंगे, आप भावना करते रहो। उन पर ज़बरदस्ती करोगे तो उल्टे चलेंगे। तात्पर्य यह कि संसार जैसे-तैसे निभा लेने जैसा है।

बेटा शराब पीकर आए और आपको दु:ख दे, तब आप मुझे कहो कि यह बेटा मुझे बहुत दु:ख देता है तो मैं कहूँ कि गलती आपकी है, इसलिए शांति से चुपचाप भुगत लो, बिना भाव बिगाड़े। यह भगवान महावीर का नियम है और संसार का नियम तो अलग है। संसार के लोग कहेंगे कि ‘बेटे की भूल है।’ ऐसा कहनेवाले आपको आ मिलेंगे और आप भी अकड़ जाओगे कि ‘बेटे की ही भूल है, यह मेरी समझ सही है।’ बड़े आए समझ वाले! भगवान कहते हैं, ‘तेरी भूल है।’

आप फ्रेन्डशिप (मित्रता) करोगे तो बच्चे सुधरेंगे। आपकी फ्रेन्डशिप होगी तो बच्चे सुधरेंगे। लेकिन माता-पिता की तरह रहोगे, रोब जमाने जाओगे, तो जोखिम है। फ्रेन्ड (मित्र) की तरह रहना चाहिए। वे बाहर फ्रेन्ड खोजने न जाए इस प्रकार रहना चाहिए। अगर आप फ्रेन्ड हैं, तो उसके साथ खेलना चाहिए, फ्रेन्ड जैसा सब करना चाहिए! तेरे आने के बाद हम चाय पिएँगे, ऐसा कहना चाहिए। हम सब साथ मिलकर चाय पिएँगे। आपका मित्र हो इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए, तब बच्चे आपके रहेंगे। नहीं तो बच्चे आपके नहीं होंगे, सचमुच कोई बच्चा किसी का होता ही नहीं। कोई आदमी मर जाए तो, उसके पीछे उसका बेटा मरता है कभी? सब घर आकर खाते-पीते हैं। ये बच्चे नहीं हैं, ये तो सिर्फ कुदरत के नियमानुसार (संबंध के तौर पर) दिखाई देते हैं इतना ही। ‘योर फ्रेन्ड’ (आपका मित्र) के तौर पर रहना चाहिए। आप पहले तय करो तो फ्रेन्ड के तौर पर रह सकते हो। जैसे फ्रेन्ड को बुरा लगे ऐसा नहीं बोलते, वह उल्टा कर रहा हो तो हम उसे कब तक समझाते हैं कि वह मान जाए तब तक और न माने तो फिर उसे कहते हैं कि ‘जैसी तेरी मरज़ी।’ फ्रेन्ड होने के लिए मन में पहले क्या सोचना चाहिए? बाह्य व्यवहार में ‘मैं उसका पिता हूँ’, परंतु अंदर से मन में हमें मानना चाहिए कि मैं उसका बेटा हूँ। तभी फ्रेन्डशिप हो पाएगी, नहीं तो नहीं होगी। पिता मित्र कैसे होगा? उसके लेवल (स्तर) तक आने पर। उस लेवल तक किस प्रकार आएँ? वह मन में ऐसा समझे कि ‘मैं इसका पुत्र हूँ।’ यदि ऐसा कहे तो काम निकल जाए। कुछ लोग कहते हैं और काम हो भी जाता है।

प्रश्नकर्ता : आपने कहा कि सोलह साल की उम्र के बाद बच्चे की तरह रहना, तो क्या सोलह साल पहले भी उसके साथ फ्रेन्डशिप ही रखनी चाहिए?

दादाश्री : तब तो बहुत अच्छा। लेकिन दस-ग्यारह साल की उम्र तक हम फ्रेन्डशिप नहीं रख सकते। तब तक उससे भूलचूक हो सकती है। इसलिए उसे समझाना चाहिए। एकाध चपत (धौल) भी लगानी पड़ती है, दस-ग्यारह साल तक। वह बाप की मूँछ खींच रहा हो तो चपत भी लगानी पड़ती है। जो बाप बनने गए न, वे तो मार खाकर मर गए।

प्रत्येक मनुष्य को अपने बच्चों को सुधारने के सभी प्रयत्न करने चाहिए। लेकिन प्रयत्न सफल होने चाहिए। बाप हुआ और बच्चे को सुधारने के लिए वह बापपना छोड़ सकता है? ‘मै पिता हूँ’ क्या यह छोड़ देता है?

प्रश्नकर्ता : अगर वह सुधरता है तो अहम् भाव, द्वेष, सब छोड़कर उसे सुधारने के प्रयत्न करने चाहिए?

दादाश्री : आपको बाप होने का भाव छोड़ देना होगा।

प्रश्नकर्ता : ‘यह मेरा पुत्र है’ ऐसा नहीं मानें और ‘मैं बाप हूँ’ ऐसा नहीं मानें?

दादाश्री : तो उसके जैसा तो और कुछ भी नहीं।

मेरा स्वभाव प्रेम भरा इसलिए ऐसे दो-चार लोग थे, वे मुझे प्रेम से ‘दादा’ कहते थे। और अन्य सभी तो ‘दादा कब आए?’ ऐसा ऊपर-ऊपर से पूछते थे। मैं कहूँ कि ‘परसों आया।’ उसके बाद कुछ भी नहीं, दिखावटी सलाम! लेकिन वे तो ‘रेग्युलर’ (नियम से) सलाम करते थे। मैंने खोज निकाला कि वे मुझे ‘दादा’ कहें, तब मैं मन से उन्हें ‘दादा’ मानूँ। वे मुझे जब ‘दादा’ कहें तब मैं मन से उन्हें ‘दादा’ कहूँ अर्थात् प्लस-माइनस करता रहता था, भेद उड़ाता रहता था। मैं उन्हें मन से दादा कहता था जैसे-जैसे मेरा मन बहुत अच्छा रहने लगा, हलका होने लगा वैसे-वैसे उन्हें ‘अट्रैक्शन’ (लगाव) ज़्यादा होने लगा।

मैं उन्हें मन से ‘दादा’ मानता, इसीलिए उनके मन को मेरी बात पहुँचती थी न! उन्हें लगे कि ‘ओहोहो! उन्हें मुझ पर कितना भाव है!’ यह गौर से समझने योग्य बात है। ऐसी सूक्ष्म बात कभी ही निकलती है, तो यह आपको बता देता हूँ। यदि आपको ऐसा करना आ जाए तो कल्याण हो जाए ऐसा है। फिर क्या किया? ऐसा व्यवहार हमेशा चलता इसलिए उनके मन में ऐसा ही लगता कि दादा जैसा कोई और नहीं मिलेगा।

प्रश्नकर्ता : बाप ऐसा सोचता है कि बेटा एडजस्ट (अनुकूल) क्यों नहीं होता?

दादाश्री : यह तो उसका बापपना है इसलिए। भान ही नहीं है। बापपना यानी बेभानपना। जहाँ ‘पना’ शब्द आया, वहाँ बेहोशी है।

प्रश्नकर्ता : यह तो उल्टा बाप कहता है कि ‘मैं तेरा बाप हूँ, तू मेरा कहा नहीं मानता? मेरा मान नहीं रखता?’

दादाश्री : ‘तुझे मालूम नहीं, कि मैं तेरा बाप लगता हूँ?’ एक आदमी को तो मैंने ऐसा कहते सुना था। ये तो किस तरह के घनचक्कर पैदा हुए हैं? ऐसा भी कहना पड़ता है? जो बात सारा संसार जानता है, वह बात भी कहनी पड़ती है?

प्रश्नकर्ता : दादा, उसके आगे का डायलोग (संवाद) भी मैंने सुना है कि तुम्हें किस ने कहा था कि हमें पैदा करो!

दादाश्री : ऐसा कहे तब हमारी आबरू क्या रह गई फिर?

6. प्रेम से सुधारो नन्हे मुन्नों को
प्रश्नकर्ता : उनकी भूल होती हो तो टोकना तो पड़ेगा न?

दादाश्री : तब आपको उनसे ऐसा पूछना चाहिए कि यह सब आप जो करते हो, वह आपको ठीक लगता है? आपने यह सब सोच-समझकर किया है? तब यदि वह कहे कि मुझे ठीक नहीं लगता। तो आप कहना कि तो फिर भाई हमें व्यर्थ क्यों ऐसा करना चाहिए? ऐसा सोच-समझकर, कहो न! सभी समझते हैं। सभी खुद ही न्याय करते हैं, गलत हो रहा हो तो खुद समझता तो है ही! ‘तूने ऐसा क्यों किया?’ ऐसा कहें तो उल्टा पकड़ता हैं। ‘मैं करता हूँ वही सही है।’ ऐसा कहता है और उल्टा करता है फिर। कैसे घर चलाना वह नहीं आता। जीवन कैसे जीना यह नहीं आता। इसलिए जीवन जीने की सभी चाबी बताई हैं कि किस प्रकार जीवन जीना चाहिए!

सामनेवाले का अहंकार खड़ा ही ना हो। हमारी सत्तापूर्ण आवाज़ नहीं हो। अर्थात् सत्ता नहीं होनी चाहिए। बच्चों से आप कुछ कहो तो आवाज़ सत्तापूर्ण नहीं होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : संसार में रहते हुए हैं तो कितनी ही ज़िम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं और ज़िम्मेदारियाँ निभाना एक धर्म है। यह धर्म निभाते हुए कारण-अकारण कटु वचन बोलने पड़ें तो यह पाप या दोष है?

दादाश्री : ऐसा है न, कटु वचन बोलते समय हमारा मुँह कैसा हो जाता है? गुलाब के फूल जैसा? अपना मुँह बिगड़े तो समझना कि पाप लगा। अपना चेहरा बिगड़े ऐसी वाणी निकले, तब समझना कि पाप हुआ। कटु वचन मत बोलना। थोड़े शब्द कहो लेकिन आहिस्ता से समझ कर कहो। प्रेम रखो तो एक दिन जीत सकोगे। कडुवाहट से नहीं जीत सकोगे। उल्टा वह विरुद्ध जाएगा और परिणाम विपरीत होगा। वह बेटा उल्टे परिणाम के बीज डालता है। ‘अभी तो मैं छोटा हूँ, इसलिए डाँट रहे हो लेकिन बड़ा होकर देख लूँगा।’ ऐसा अभिप्राय अंदर बना लेगा। इसलिए ऐसा मत करो, उसे समझाओ। एक दिन प्रेम की जीत होगी। दो दिन में ही उसका परिणाम नहीं आएगा। दस दिन, पंद्रह दिन, महीना भर उसके साथ प्रेम रखो। देखो, इस प्रेम का क्या नतीजा आता है, यह तो देखो!

प्रश्नकर्ता : हम अनेक बार समझाएँ पर वह ना समझे तो क्या करें?

दादाश्री : समझाने की ज़रूरत ही नहीं। प्रेम रखो, फिर भी धीरज से आप उसे समझाओ। अपने पड़ोसी को भी क्या ऐसे कटु वचन बोलते हो कभी?

जैसे कि अँगारे के लिए हम क्या करते हैं? चिमटे से पकड़ते हैं न? चिमटा रखते हो न? अब यों ही हाथ से अँगारे पकड़ें तो क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : जल जाएँगे।

दादाश्री : इसलिए चिमटा रखना पड़ता है।

प्रश्नकर्ता : तब किस प्रकार का चिमटा रखना चाहिए?

दादाश्री : अपने घर का एक आदमी चिमटे जैसा है, वह खुद नहीं जलता और सामनेवाले को, जलते हुए को पकड़ता है, हमें उसे बुलाकर कहना चाहिए कि ‘भैया, मैं जब इसके साथ बात करूँ तब तू साथ देना।’ इसके बाद वह सब ठीक कर देगा। कुछ रास्ता निकालना चाहिए। खाली हाथ अंगारे पकड़ने जाएँ तो क्या हालत होगी?

अपने कहने का परिणाम न आ रहा हो तो चुप हो जाना चाहिए। आप मूर्ख हैं, आपको बोलना नहीं आता, इसलिए चुप हो जाना चाहिए। अपने कहने का परिणाम न हो और उल्टा अपना मन बिगड़ेगा, आत्मा बिगड़ेगा ऐसा कौन करेगा?

प्रश्नकर्ता : माता-पिता अपने बच्चों के प्रति जो लगाव रखते हैं, उसमें कईं बार लगता है कि कुछ ज़्यादा ही हो जाता है।

दादाश्री : वह सब इमोशनल (भावुक) है। कम दिखानेवाला भी इमोशनल है। नोर्मल (सामान्य) होना चाहिए। नोर्मल यानी सिर्फ दिखावा, ‘ड्रामेटिक’ (नाटकिय)। ‘ड्रामा’ (नाटक) में, किसी औरत के साथ ड्रामा करना पड़े, तो वह वास्तविक, एक्ज़ेक्ट हो ऐसा लोगों को लगता हैं, कि ‘रियल’ (सच) है। लेकिन कलाकार बाहर निकलकर कहें कि ‘चल मेरे साथ तो?’ वह साथ में नहीं जाती, कहेगी कि ‘यह तो ड्रामे तक था।’ समझ में आया न?

इस संसार को सुधारने का रास्ता प्रेम ही है। संसार जिसे प्रेम कहता है वह प्रेम नहीं, वह तो आसक्ति है। इस बच्ची से प्रेम करते हो, लेकिन वह ग्लास फोड़े तब प्रेम रहता है? तब तो तू चिढ़ता है। यानी वह आसक्ति है। बच्चे प्रेम खोजते हैं, लेकिन प्रेम मिलता नहीं। इसलिए फिर उनकी मुश्किलें वे ही जानें, न कह सकते हैं, न सह सकते हैं। आज के जवानों के लिए हमारे पास रास्ता है। इस जहाज का मस्तूल किस तरह सँभालना, इसका मार्गदर्शन मुझे भीतर से मिलता है। मेरे पास ऐसा प्रेम उत्पन्न हुआ है कि जो बढ़े नहीं और घटे भी नहीं। बढ़े-घटे, वह आसक्ति कहलाती है। जो बढ़े-घटे नहीं वह परमात्मप्रेम है। सभी प्रेम के वश रहा करते हैं। जिसे सच्चा प्रेम कहते हैं न, वह तो देखने को भी नहीं मिलता। प्रेम जगत् ने देखा ही नहीं। किसी समय ज्ञानीपुरुष अथवा भगवान हों तब प्रेम देख पाते हैं। प्रेम कम-ज़्यादा नहीं होता, आसक्ति होती है। वही प्रेम है, ज्ञानियों का प्रेम ही परमात्मा है।

छोटे बच्चों के साथ हमारी खूब जमती है। मेरे साथ फ्रेन्डशिप (मित्रता) करते हैं। अभी जब यहाँ अंदर आ रहे थे न, तब एक इतना सा बच्चा था, वह लेने आया और बोला कि ‘चलिए’। यहाँ आते ही लेने आया। हमारे साथ फ्रेन्डशिप की। आप तो लाड़ लड़ाते हो। हम लाड़ नहीं लड़ाते, प्रेम करते हैं।

प्रश्नकर्ता : यह ज़रा समझाइए न दादाजी, लाड़-लड़ाना और प्रेम करना। कुछ उदाहरण देकर समझाइए।

दादाश्री : अरे, एक आदमी ने तो अपने बच्चे को छाती से ऐसा दबाया! दो साल से उसे मिला नहीं था और उठाकर ऐसे दबाया! तब बच्चा बहुत दब गया तो उसके पास कोई चारा नहीं रहा, इसलिए उसने काट खाया। यह तो कोई तरीका है? इन लोगों को तो बाप होना भी नहीं आता!

प्रश्नकर्ता : और जो प्रेमवाला हो, वह क्या करता है?

दादाश्री : हाँ, वह ऐसे गाल पर हाथ फेरता है, ऐसे कंधा थपथपाता है। इस प्रकार खुश करता है। लेकिन क्या उसे ऐसे दबा देने चाहिए कि फिर वह बेचारा साँस न ले पाए? तब काट ही लेगा न! नहीं काटेगा, साँस रुके तो?

और बच्चों को कभी मारना मत। कोई भूलचूक हो तो समझाना ज़रूर, धीरे से माथे पर हाथ फेरकर उन्हें समझाना ज़रूर। प्रेम दोगे तो बच्चा समझदार होता है।

7. ‘विपरीतता ऐसे छूट जाए
क्या कभी ड्रिंक्स (शराब) वगैरह लेते हो?

प्रश्नकर्ता : कभी-कभी। जब घर में झगड़ा होता है तब। यह मैं सत्य कह रहा हूँ।

दादाश्री : बंद कर देना। उससे परवश हो गया! यह सब नहीं चलता, यह सब नहीं चाहिए। लेना मत तू, छूना भी मत तू। दादा की आज्ञा है, इसलिए ऐसी चीज़ों को छूना मत। तभी तेरा जीवन अच्छा व्यतीत होगा। क्योंकि अब तुझे उसकी ज़रूरत नहीं रहेगी। यह चरणविधि आदि सब पढ़ेगा तो तुझे उसकी ज़रूरत नहीं रहेगी और आनंद भरपूर रहेगा, बहुत आनंद रहेगा। समझ में आया या नहीं?

प्रश्नकर्ता : व्यसन से मुक्त किस प्रकार रहें?

दादाश्री : व्यसन से मुक्त होने के लिए ‘व्यसन बुरी चीज़ है’ ऐसी हमें प्रतीति होनी चाहिए। यह प्रतीति ढीली नहीं होनी चाहिए। अपना निश्चय हिलना नहीं चाहिए। ऐसा हो तो मनुष्य व्यसन से दूर रहता है। ‘इसमें कोई हर्ज नहीं’ ऐसा कहा तो व्यसन और मज़बूत हो जाता है।

प्रश्नकर्ता : लंबे अरसे तक किसी ने शराब पी हो अथवा ‘ड्रग्स’ (नशीले पदार्थ) लिए हों, तो कहते हैं उसका असर उसके दिमाग़ पर पड़ता है। फिर बंद कर दें तो भी उसका असर तो रहता है। तब उस असर से मुक्त होने के लिए आप क्या कहते हैं? किस प्रकार बाहर निकलें, उसके लिए कोई रास्ता है?

दादाश्री : बाद में रिएक्शन आता है उसका। जो सभी परमाणु हैं। वे सभी शुद्ध तो होने चाहिए न! पीना बंद कर दिया है न? अब उसे क्या करना है? ‘शराब पीना बुरा है’ ऐसा हमेशा कहते रहना है।

हाँ, छोड़ने के बाद भी ऐसा कहते रहना। लेकिन ‘अच्छी है’ ऐसा कभी मत कहना। नहीं तो फिर से असर हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : शराब पीने से दिमाग़ को किस प्रकार नुकसान होता है?

दादाश्री : एक तो सुध भुला देता है। उस समय भीतर की जागृति पर आवरण आ जाता है। फिर सदा के लिए वह आवरण नहीं जाता। हमें मन में ऐसा लगता है कि हट गया, लेकिन नहीं हटता। ऐसा करते-करते आवरण आते-आते फिर... मनुष्य पूरा जड़ जैसा हो जाता है। फिर उसे अच्छे विचार भी नहीं आते। जो डेवेलप (विकास-शील) हुए हैं, उनका इसमें से बाहर निकलने के बाद ब्रेन (दिमाग़) बहुत अच्छा डेवेलप होता है। उसे फिर से बिगाड़ना नहीं चाहिए।

प्रश्नकर्ता : शराब पीने से दिमाग़ जो डैमेज (नुकसान) हुआ हो, दिमाग़ के परमाणु जो डैमेज हुए हों, तो वह डैमेज्ड हिस्सा फिर से रिपेयर कैसे हो सकेगा?

दादाश्री : उसका कोई रास्ता है ही नहीं। वह तो समय के साथ धीरे-धीरे चला जाएगा। पिए बगैर जो टाइम व्यतीत होगा, वैसे-वैसे सब निरावरण होता जाएगा। एकदम से नहीं होगा। शराब और मांसाहार से जो नुकसान होता है, शराब और मांसाहार में से जो सुख भोगता है, वह सुख ‘री पे’ करते (चुकाते) वक्त पशु योनि में जाना पड़ता है। ये जितने भी सुख आप लेते हो, वे ‘री पे’ करने पड़ेंगे। ऐसी ज़िम्मेदारी आपको समझनी चाहिए। ‘यह जगत् गप्प नहीं है।’ चुकाना पड़े ऐसा यह जगत् है! सिर्फ यह आंतरिक सुख ही ‘री पे’ नहीं करने पड़ते। अन्य सभी बाहर के सुख ‘री पे’ करने हैं। जितना हमें जमा करना हो वे करना और फिर वापस देना पड़ेगा!!

प्रश्नकर्ता : अगले जन्म में जानवर बनकर ‘री पे’ करना पड़ेगा, वह तो ठीक, लेकिन इस जन्म में क्या होगा? इस जन्म में क्या परिणाम हैं?

दादाश्री : इस जन्म में उसे खुद को आवरण आ जाते हैं, इसलिए जड़ जैसा, जानवर जैसा ही हो जाता है। लोगों में ‘प्रेस्टिज’ नहीं रहती, लोगों में सम्मान नहीं रहता, कुछ भी नहीं रहता।

अंडे हो या बच्चे हो, दोनों एक ही हैं। किसी का अंडा खाना और किसी का बच्चा खाना उसमें फर्क नहीं है। तुझे बच्चे खाना पसंद है क्या? तुझे किसी के बच्चे खा जाना पसंद है?

प्रश्नकर्ता : अंडों में भी शाकाहारी अंडे होते हैं ऐसी लोगों की मान्यता होती है।

दादाश्री : नहीं, वह तो गलत मान्यता है। जिन अंडों को निर्जीव अंडे कहते हैं, वे क्या बिना जीव की चीज़ है? जिसमें जीव न हो, वह चीज़ नहीं खा सकते।

प्रश्नकर्ता : यह बात कुछ अलग लगती है। कृपया विस्तार से समझाइए।

दादाश्री : अलग है लेकिन बात ‘एक्ज़ेक्ट’ है। यह तो ‘साइन्टिस्टों’ ने भी कहा था कि हमेशा निर्जीव चीज़ नहीं खाई जा सकती और जीवित ही खाई जाती है। उसमें जीव तो है, लेकिन भिन्न प्रकार का जीव। यह तो लोगों ने गलत लाभ उठाया है। उसे तो छूना भी नहीं चाहिए और बच्चों को अंडे खिलाने से क्या होता है? शरीर इतना आवेशमय हो जाता है कि कंट्रोल में नहीं रहता। अपना ‘वेजिटेरियन फूड’ (शाकाहारी भोजन) तो बहुत अच्छा होता है, कच्चा भले हो। डॉक्टरों का इसमें दोष नहीं होता। वे तो उनकी समझ और बुद्धि के अनुसार कहते हैं। हमें अपने संस्कारों की रक्षा करनी है न! हम संस्कारी घरों के लोग हैं।

प्रश्नकर्ता : अमरीका में दादा ने कईं लड़कों को एकदम ‘टर्न’ कर (बदल) दिया है।

दादाश्री : हाँ, उनके माता-पिता शिकायत लेकर आए थे कि हमारे बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं, उनका क्या करें? मैंने कहा, ‘आप कब सुधरे थे कि बच्चे बिगड़ गए! आप मांसाहार करते हो?’ तब बोले, ‘हाँ, कभी कभी।’ ‘शराब पीने का?’ तो बोले, ‘हाँ, कभी कभी।’। इसलिए ये बच्चे समझते हैं कि हमारे पिताजी कर रहे हैं इसलिए यह करने जैसी चीज़ है। हितकर हो वही हमारे पिताजी करते हैं न? यह सब आपको शोभा नहीं देता। फिर उन बच्चों से मांसाहार छुड़वा दिया। उन बच्चों से कहा कि ‘क्या यह आलू तू काट सकता है? क्या यह पपीता तू काट सकता है? क्या ये ‘एप्पल’ (सेब) काट सकता है? ये सब काट सकता है?’ ‘हाँ, सब काट सकता हूँ।’ मैंने कहा, ‘कद्दू इतना बड़ा हो तो?’ ‘अरे! उसे भी काट सकता हूँ।’ ‘ककड़ी इतनी बड़ी हो तो उसे भी काट सकता हूँ।’ ‘उस वक्त ‘हार्ट’ (हृदय) पर असर होगा?’ तब बोला, ‘नहीं।’ फिर मैंने पूछा, ‘बकरी काट सकता है?’ तब बोला, ‘नहीं।’ ‘मुर्गी काट सकता है?’ तब बोला, ‘नहीं, मुझसे नहीं कटेगी।’ इसलिए जो तेरा हार्ट काटने को ‘एक्सेप्ट’ (स्वीकार) करे, उतनी ही चीज़ें तू खाना। तेरा हार्ट एक्सेप्ट नहीं करे, हार्ट को पसंद न हो, रुचे नहीं वे चीज़ें मत खाना। नहीं तो उनका परिणाम विपरीत होगा और वे परमाणु तेरे हार्ट पर असर करेंगे। परिणाम स्वरूप, लड़के सब अच्छी तरह समझ गए और छोड़ दिया।

(प्रसिद्ध लेखक) ‘बर्नाड शॉ’ से किसी ने पूछा, ‘आप माँसाहार क्यों नहीं करते?’ तब बोले, ‘मेरा शरीर कब्रिस्तान नहीं है, यह मुर्गी-मुर्गों का कब्रिस्तान नहीं है।’ लेकिन उसका क्या फायदा? तब उन्होंने कहा, ‘आई वॉन्ट टु बी ए सिविलाइज्ड मेन।’ (मैं सुसंस्कृत इन्सान होना चाहता हूँ)। फिर भी कहते हैं, क्षत्रियों को यह अधिकार है, लेकिन यदि उसमें क्षत्रियता हो, तभी अधिकार है।

प्रश्नकर्ता : इन छोटे बच्चों को मगदले (एक प्रकार की अधिक घी वाली मिठाई) खिलाते हैं, वह खिला सकते हैं?

दादाश्री : नहीं खिला सकते, मगदल नहीं खिला सकते। छोटे बच्चों को मगदल, गोंदपाक, पकवान ज़्यादा मत खिलाना। उन्हें सादा भोजन देना और दूध भी कम देना चाहिए। बच्चों को यह सब नहीं देना चाहिए। लोग तो दूध से बनी चीज़ें बार-बार खिलाते रहते हैं। ऐसी चीज़ें मत खिलाना। आवेग बढ़ेगा और बारह साल का होते ही उसकी दृष्टि बिगड़ने लगेगी। आवेग कम हो बच्चों को ऐसा भोजन देना चाहिए। ये सब तो सोच में भी नहीं है। जीवन कैसे जीना, इसकी समझ ही नहीं है न!

प्रश्नकर्ता : हमें कुछ कहना न हो, लेकिन मान लीजिए कि हमारा बेटा चोरी करता हो तो क्या चोरी करने दें?

दादाश्री : दिखावे के लिए विरोध करो, लेकिन अंदर समभाव रखो। बाहर देखने में विरोध और वह चोरी करे उस पर निर्दयता ज़रा भी नहीं होने देनी चाहिए। यदि अंदर समभाव टूट जाएगा तो निर्र्दयता होगी और सारा जग निर्दय हो जाता है।

उसे समझाओ कि ‘जिसके वहाँ चोरी की, उसका प्रतिक्रमण ऐसे करना और प्रतिक्रमण कितने किए यह मुझे बताना। तब फिर ठीक हो जाएगा। बाद में तू चोरी नहीं करने की प्रतिज्ञा कर। दोबारा चोरी नहीं करूँगा और जो हो गई उसकी क्षमा चाहता हूँ।’ ऐसे बार-बार समझाने से यह ज्ञान फिट हो जाएगा। ताकि फिर अगले जन्म में फिर चोरी नहीं करेगा। यह तो सिर्फ इफेक्ट (परिणाम) है, दूसरा नया न सिखाया जाए तो फिर नया खड़ा नहीं होगा।

यह लड़का हमारे पास सब भूलें कबूल करता है। चोरी करे वह भी कबूल कर लेता है। आलोचना तो जो ग़ज़ब का पुरुष हो, वहीं हो सकती है। अगर ऐसा सब होगा तो हिन्दुस्तान का आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाएगा!

8. नयी जनरेशन, हेल्दी माइन्ड वाली

दादाश्री : रविवार के दिन नज़दीक में सत्संग होता है, तो क्यों नहीं आते?

प्रश्नकर्ता : रविवार के दिन टी.वी. देखना होता है न, दादाजी!

दादाश्री : टी.वी. और आपका क्या संबंध? यह चश्मा आ गया है, फिर भी टी.वी. देखते हो? हमारा देश ऐसा है कि टी.वी. देखना न पड़े, नाटक देखना न पड़े, वो सब यहीं का यहीं रास्तों पर होता रहता है न!

प्रश्नकर्ता : उस रास्ते पर पहुँचेंगे तब बंद होगा न?

दादाश्री : कृष्ण भगवान ने गीता में कहा है कि मनुष्य व्यर्थ समय बिगाड़ रहे हैं। कमाने के लिए नौकरी पर जाना अनर्थ नहीं कहलाता। जब तक वह दृष्टि नहीं मिलती, तब तक यह दृष्टि नहीं छूटती।

लोग भी जानवर की तरह बदन पर बदबूवाला कीचड़ कब मलते हैं? उन्हें जलन हो तब। ये टी.वी., सिनेमा, सब बदबूवाले कीचड़ जैसे हैं। उसमें से कुछ सारतत्व नहीं निकलता। हमें टी.वी. के प्रति कोई विरोध नहीं हैं। प्रत्येक चीज़ देखने की छूट होती है लेकिन एक तरफ पाँच बजकर दस मिनिट को टी.वी. का कार्यक्रम हो और दूसरी ओर पाँच बजकर दस मिनट पर सत्संग हो, तो क्या पसंद करोगे? ग्यारह बजे परीक्षा हो और ग्यारह बजे भोजन करना हो तो क्या करोगे? ऐसी समझ होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : रात देर तक टी.वी. देखते हैं, इसलिए फिर सोते ही नहीं न?

दादाश्री : लेकिन टी.वी. तो आप खरीद लाए तभी देखते हो न? आपने ही इन सब बच्चों को बिगाड़ा है। इन माता-पिता ने ही बच्चों को बिगाड़ा है, ऊपर से टी.वी. लाए घर में! पहले ही क्या कम मुसीबत थी, जो एक और बढ़ाई?

नयी पेंट पहनकर बार-बार शीशा देखते हैं। अरे, आइना क्या देख रहा है? यह किसकी नक़ल कर रहे हो, यह तो समझो! अध्यात्म वालों की नक़ल की या भौतिक वालों की नक़ल की? जो भौतिकवालों की नक़ल करनी हो तो वे आफ्रीकावाले हैं, उनकी नक़ल क्यों नहीं करते? लेकिन यह तो साहब जैसे लगते हैं, इसलिए नक़ल करनी शुरू की। लेकिन तुझ में योग्यता तो नहीं है। काहे का साहब बनने फिरता है? लेकिन साहब होने के लिए ऐसे शीशे में देखता है, बाल सँवारता है और समझता है कि अब ‘ऑल राइट’ हो गया है। ऊपर से पतलून पहनकर पीछे ऐसे थपथपाता फिरता है। अरे, क्यों बिना वजह थपथपाता है? कोई देखनेवाला नहीं है, सब अपने-अपने काम में लगे हैं! सब अपनी-अपनी चिंता में पड़े हैं!

तुझे देखने की फुरसत किसे हैं? सब अपनी-अपनी झंझट में पड़े हैं। लेकिन अपने आपको न जाने क्या समझ बैठे हैं?

कोई पुरानी पीढ़ीवाला बच्चे के साथ अगर झिक-झिक कर रहा हो तो मैं उनसे पूछूँ कि ‘आप छोटे थे, तब आपके बाप भी आपको कुछ कहते थे?’ तब कहते हैं कि, ‘वे भी झिक-झिक करते थे।’ उनके बाप से पूछें कि ‘आप छोटे थे तब?’ तब कहेंगे ‘हमारे बाप भी झिक-झिक करते थे।’ यानी यह ‘आगे से चली आई है।’

बेटा पुरानी बातें स्वीकार करने को तैयार नहीं। इसलिए ये
परेशानियाँ खड़ी हुई हैं। मैं माँ-बाप को मॉडर्न (आधुनिक) होने के लिए कहता हूँ तो वे होते नहीं। और हों भी कैसे? मॉडर्न होना कोई आसान बात नहीं है।

हमारा देश यूज़लेस (निकम्मा) हो गया है! कुछ जातियों का बहुत तिरस्कार करते हैं। एक-दूसरे के साथ नहीं बैठते, भेदभाव रखते हैं। ऊपर हाथ रखकर प्रसाद देता है! लेकिन यह नयी पीढ़ी हेल्दी माईन्ड वाली है, बहुत अच्छी है!

बच्चों के लिए अच्छी भावना करते रहो। सभी अच्छे संयोग आ मिलेंगे। नहीं तो इन बच्चों में कोई सुधार होनेवाला नहीं है। बच्चे सुधरेंगे, लेकिन अपने आप कुदरत सुधारेगी। बच्चे बहुत अच्छे हैं। जैसे किसी भी काल में नहीं थे ऐसे बच्चे हैं आज!

इन बच्चों में ऐसे कौन से गुण होंगे कि मैं ऐसा कहता हूँ कि जैसे किसी भी काल में नहीं थे ऐसे गुण इन बच्चों में हैं! बेचारों में किसी प्रकार का तिरस्कार नहीं है, कुछ भी नहीं है। सिर्फ मोही हैं। उसी कारण सिनेमा में और दूसरी जगह भटका करते हैं। पहले तो इतना तिरस्कार कि ब्राह्मण का बेटा दूसरों को छूए तक नहीं। क्या अब है ऐसी माथापच्ची?

प्रश्नकर्ता : ऐसा कुछ नहीं है। ज़रा सा भी नहीं।

दादाश्री : सब माल शुद्ध हो गया और लोभ भी नहीं है, मान की भी परवाह नहीं। अब तक तो सब अशुद्ध माल था, मानी-क्रोधी-लोभी! और ये तो हैं मोही बेचारे!

प्रश्नकर्ता : आप कहते हैं कि वर्तमान जनरेशन ‘हेल्दी माइन्डवाली’ है और दूसरी ओर देखें तो सब व्यसनी हो गए हैं, और न जाने क्या क्या हैं?

दादाश्री : भले वे व्यसनी दिखें लेकिन उन बेचारों को यदि रास्ता नहीं मिले तो क्या करें? उनके माईन्ड हेल्दी हैं।

प्रश्नकर्ता : हेल्दी माईन्ड यानी क्या?

दादाश्री : हेल्दी माईन्ड यानी मेरी-तेरी की बहुत परवाह नहीं करते और हम तो छोटे थे तब, बाहर किसी का कुछ पड़ा हो, कुछ देखें तो ले लेने की इच्छा होती थी। किसी के वहाँ भोजन करने गए हों तो घर में खाते हों उससे थोड़ा ज़्यादा खा लेते थे। छोटे बच्चों से लेकर बुड्ढों तक सब ममतावाले होते थे।

अरे! ये ‘डबल बेड’ का सिस्टम हिन्दुस्तान में होता होगा? किस प्रकार के जानवर जैसे लोग हैं? हिन्दुस्तान के स्त्री-पुरुष कभी साथ में एक रूम (कमरे) में नहीं होते! हमेशा अलग रूम में रहते थे! इसके बदले आज यह देखो तो सही! वर्तमान में तो बाप ही बेडरूम बना देता है, ‘डबल बेड’ खरीदकर! इससे बच्चे समझ गए कि यह दुनिया इसी प्रकार चलती है शायद। आपको मालूम है कि पहले स्त्री-पुरुषों के बिस्तर अलग रूमों में रहते थे। आपको मालूम नहीं? वह सब मैंने देखा था। आपने अपने ज़माने में डबल बेड देखे थे?

9. माता-पिता की शिकायतें
एक भाई मुझसे कहता है, मेरा भतीजा हर रोज़ नौ बजे उठता है। घर में कोई काम नहीं करता। फिर घर के सभी सदस्यों से पूछा कि यह जल्दी नहीं उठता यह बात आप सबको पसंद नहीं क्या? तब सभी ने कहा, ‘हमें पसंद नहीं, फिर भी वह जल्दी उठता ही नहीं।’ मैंने पूछा, ‘सूर्यनारायण आने के बाद उठता है या नहीं उठता?’ तब कहा, ‘उसके बाद भी एक घंटे के पश्चात् उठता है।’ इस पर मैंने कहा कि ‘सूर्यनारायण की भी मर्यादा नहीं रखता, तब तो वह बहुत बड़ा आदमी होगा! नहीं तो लोग सूर्यनारायण के आने से पहले सब जाग जाते हैं, लेकिन यह तो सूर्यनारायण की भी परवाह नहीं करता।’ फिर उन लोगों ने कहा, आप उसे थोड़ा डाँटो। मैंने कहा, ‘हम डाँट नहीं सकते। हम डाँटने नहीं आए, हम समझाने आए हैं। हमारा डाँटने का व्यापार ही नहीं हैं, हमारा तो समझाने का व्यापार है।’ फिर उस लड़के से कहा, ‘दर्शन कर ले और रोज़ बोलना कि दादा मुझे जल्दी उठने की शक्ति दो।’ इतना उससे कराने के बाद घर के सभी लोगों से कहा, अब वह चाय के समय भी नहीं उठे तो उससे पूछना कि, ‘भई, ये ओढ़ा दूँ तुझे? जाड़े की ठंड है, ओढऩा हो तो ओढ़ा दूँ।’ इस प्रकार मज़ाक में नहीं, लेकिन सही में उसे ओढ़ा देना। घर के लोगों ने ऐसा किया। परिणाम स्वरूप सिर्फ छ: महीनों में वह लड़का इतना जल्दी उठने लगा कि घर के सभी लोगों की शिकायत चली गई।

प्रश्नकर्ता : आज के बच्चे पढऩे के बजाय खेलने में ज़्यादा रुचि रखते हैं, उन्हें पढ़ाई की ओर ले जाने के लिए उनसे कैसे काम लिया जाए, जिससे लड़कों के प्रति क्लेश उत्पन्न न हो?

दादाश्री : इनामी योजना निकालो न! लड़कों से कहो कि पहला नंबर आएगा उसे इतना इनाम दूँगा और छठा नंबर आएगा, उसे इतना इनाम और पास होगा उसे इतना इनाम। कुछ उनका उत्साह बढ़े ऐसा करो। उसे तुरंत फायदा हो ऐसा कुछ दिखाओ, तब वह चुनौती स्वीकारेगा। दूसरा क्या रास्ता करने का? वर्ना उन पर प्रेम रखो। प्रेम हो तो बच्चे सबकुछ मानते हैं। मेरा कहा सब बच्चे मानते हैं। मैं जो कहूँ वह करने के लिए तैयार हैं, यानी हमें उन्हें समझाते रहना चाहिए। फिर जो करे वह सही।

प्रश्नकर्ता : मूल समस्या यह है कि पढऩे के लिए बच्चों को हम कईं तरह से समझाते हैं लेकिन हमारे कहने पर भी वे लोग समझते नहीं, हमारी सुनते नहीं।

दादाश्री : ऐसा नहीं कि वे नहीं सुनते, लेकिन आपको माँ होना नहीं आया इसलिए। अगर माँ होना आता तो क्यों नहीं सुनते? क्यों बेटा नहीं मानता? क्योंकि ‘अपने माता-पिता का कहा खुद उसने कभी माना ही नहीं था न!’

प्रश्नकर्ता : दादा, उसमें वातावरण का दोष है या नहीं?

दादाश्री : नहीं, वातावरण का दोष नहीं है। माता-पिता को वास्तव में माता-पिता होना आया ही नहीं। प्रधानमंत्री बनने में उसमें कम ज़िम्मेदारी है, लेकिन माता-पिता होना, उसमें बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है।

प्रश्नकर्ता : वह कैसे?

दादाश्री : प्रधानमंत्री होने में तो लोगों का ऑपरेशन है। यहाँ तो बच्चों का ही ऑपरेशन होना है। घर में दाखिल हों तो बच्चे खुश हो जाएँ ऐसा होना चाहिए और आजकल तो बच्चे क्या कहते हैं? ‘हमारे पिताजी घर में न आएँ तो अच्छा।’ अरे, ऐसा हो तब फिर क्या हो?

इसलिए हम लोगों से कहते हैं, ‘भैया, बच्चों को सोलह साल के होने बाद ‘फ्रेन्ड (मित्र) के रूप में स्वीकार लेना’, ऐसा नहीं कहा? ‘फ्रेन्डली टोन’ (मैत्रीपूर्ण व्यवहार) में हो न, तो अपनी वाणी अच्छी निकले, वर्ना हर रोज़ बाप बनने जाएँ तो कोई सार नहीं निकलता। बेटा चालीस साल का हुआ हो और हम बापपना दिखाएँ तो क्या हो?

प्रश्नकर्ता : लेकिन दादा, बूढ़े लोग भी हमारे साथ ऐसा व्यवहार करें, उनके विचार पुराने हो गए हों, तो हमें उन्हें कैसे हैन्डल करना चाहिए?

दादाश्री : यह गाड़ी ऐन वक्त पर, जब जल्दी में हो तब, पंक्चर हो जाए, तो क्या हम उसके ‘व्हील’ (पहिया) को पीटते हैं?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : ऐन वक्त पर, जल्दी हो और टायर पंक्चर हो जाए तो व्हील को मारना चाहिए? तब तो फटाफट सभाँलकर अपना काम कर लेना चाहिए। गाड़ी में पंक्चर तो होता ही रहता है। वैसे बूढ़े लोगों को पंक्चर होता ही है। हमें सँभाल लेना चाहिए। पंक्चर हो तो गाड़ी को मार-पीट कर सकते हैं?

प्रश्नकर्ता : दो बेटे आपस में लड़ रहे हों, हम जानते हैं कि दोनों में से कोई समझनेवाला नहीं, तो तब हमें क्या करना चाहिए?

दादाश्री : एक बार दोनों को बिठाकर बोल देना कि आपस में झगड़ने में फायदा नहीं, उससे लक्ष्मी चली जाती है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन वे मानने को तैयार न हों तो क्या करें, दादाजी?

दादाश्री : जैसा है वैसा रहने दो।

प्रश्नकर्ता : बेटे आपस में लड़ें और वह मामला बड़ा स्वरूप ले ले, तो हम कहते हैं कि यह ऐसा कैसे हो गया?

दादाश्री : उन्हें बोध होने दो न, आपस में लड़ने पर उन्हें खुद मालूम होगा, समझ में आएगा न? ऐसे बार-बार रोकते रहने से बोध नहीं होगा। जगत् तो सिर्फ निरीक्षण करने योग्य है!

ये बच्चे किसी के होते ही नहीं, यह तो सिर पर आ पड़ी जंजाल है! इसलिए इनकी मदद ज़रूर करना लेकिन अंदर से ड्रामेटिक रहना।

पहले शिकायत करने कौन आता है? कलियुग में तो जो गुनहगार हो, वही पहले शिकायत लेकर आता है और सत्युग में जो निर्दोष हो वह पहले शिकायत लेकर आता है। इस कलियुग में न्याय करनेवाले भी ऐसे हैं कि जिसका पहले सुने उसके पक्ष में बैठ जाते हैं।

घर में चार बच्चे हों, उनमें दो बच्चों की कुछ भूल ना हो तो भी बाप उन्हें डाँटता रहता है और दूसरे दो भूल करते रहें तो भी कोई उन्हें कुछ नहीं कहता। उसके पीछे जो रूट कोज़ (मूल कारण) है, उसी के कारण है। अपने घर में दो संतानें हों, तो दोनों समान लगनी चाहिए। यदि हम किसी के पक्ष में हों कि ‘यह बड़ा दयालु है और छोटा वाला थोड़ा कच्चा है।’ तो सब बिगड़ जाता है। दोनों समान लगने चाहिए।

प्रश्नकर्ता : बेटा बात-बात में जल्दी रूठ जाता है।

दादाश्री : महँगा बहुत है न! बहुत महँगा, फिर क्या हो? बेटी सस्ती है, इसलिए बेचारी रूठती नहीं।

प्रश्नकर्ता : ये रूठना क्यों होता होगा, दादाजी?

दादाश्री : ये तो, मनाने जाते हैं न, इसलिए रूठते हैं। मेरे पास रूठें तो जानूँ! मेरे साथ कोई नहीं रूठता। फिर से बुलाऊँगा ही नहीं न! खाए या न खाए, फिर से नहीं बुलाऊँगा। मैं जानता हूँ, इससे बुरी आदत हो जाती है, ज़्यादा बुरी आदत पड़ती है। नहीं, नहीं, बेटा खाना खा ले, बेटा खाना खा ले। अरे, भूख लगेगी तो बेटा अपने आप खा लेगा, कहाँ जानेवाला है? वैसे तो मुझे दूसरी कलाएँ भी आती हैं। बहुत टेढ़ा हुआ हो तो, भूखा हो तो भी नहीं खाएगा। ऐसा हो तब हम उसकी आत्मा के साथ अंदर विधि करते हैं, आपको ऐसा नहीं करना है। आप जो करते हो, वही करो। बाकी मेरे साथ नहीं रूठते और यहाँ मेरे पास रूठकर फायदा भी क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : दादाजी, वह कला सिखा दीजिए न! क्योंकि यह रूठना-मनाना तो सबका रोज़ाना का हो गया है। अगर ऐसी एकाध चाबी दे दें तो सबका निराकरण हो जाए।

दादाश्री : जब हमें बहुत गरज़ हो तो वह ऐसे रूठता है। इतनी गरज़ क्यों फिर?

प्रश्नकर्ता : इसका मतलब क्या, मैं समझा नहीं। बहुत गरज़ हो तो रूठते हैं? किसे गरज़ होती है?

दादाश्री : सामनेवाले की गरज़। रूठनेवाला तब रूठता है, जब सामनेवाले को उसकी गरज़ हो।

प्रश्नकर्ता : अर्थात् हमें गरज़ ही नहीं दिखानी?

दादाश्री : गरज़ होनी ही नहीं चाहिए। किसलिए गरज़? कर्म के उदयानुसार जो होनेवाला हो वह होगा, फिर उसकी गरज़ क्यों रखनी? और फिर कर्म का उदय ही है। गरज़ दिखाने पर जिद पर चढ़ते हैं बल्कि।

प्रश्नकर्ता : छोटे बच्चों का गुस्सा दूर करने के लिए उन्हें कैसे समझाएँ?

दादाश्री : उनका गुस्सा दूर कर के क्या फायदा?

प्रश्नकर्ता : हमारे साथ झगड़ा न करें।

दादाश्री : उसके लिए कोई दूसरा उपाय करने के बजाय उनके माता-पिता को इस प्रकार से रहना चाहिए कि उनका गुस्सा बच्चे न देखें। उन्हें गुस्सा करते देखकर बच्चों को लगता है कि ‘मेरे पिताजी करते हैं, तो मैं उनसे सवा गुना गुस्सा करूँ।’ अगर आप बंद करोगे, तो (उनका) अपने आप ही बंद हो जाएगा। मैंने बंद किया है, मेरा गुस्सा बंद हो गया है तो मेरे साथ कोई गुस्सा करता ही नहीं। मैं कहूँ, गुस्सा करो तो भी नहीं करते। बच्चे भी नहीं करते, मैं मारूँ तब भी गुस्सा नहीं करते।

प्रश्नकर्ता : बच्चों को सही मार्ग पर लाने के लिए माता-पिता को फर्ज़ तो अदा करना चाहिए न, इसलिए गुस्सा तो करना पड़ता है न?

दादाश्री : गुस्सा क्यों करना पड़े? वैसे ही समझाकर कहने में क्या हर्ज है? गुस्सा आप करते नही हों, आपसे हो जाता है। किया हुआ गुस्सा, गुस्सा नहीं कहलाता। आप खुद गुस्सा करते हैं, आप उसे धमकाए उसे गुस्सा नहीं कहते। लेकिन आप तो गुस्सा हो जाते हो।

प्रश्नकर्ता : गुस्सा हो जाने का कारण क्या?

दादाश्री : ‘वीकनेस’। यह ‘वीकनेस’ (कमज़ोरी) है! अर्थात् वह खुद गुस्सा नहीं करता, वह तो गुस्सा होने के बाद खुद को पता चलता है कि यह गलत हो गया, ऐसा नहीं होना चाहिए। अत: अंकुश उसके हाथ में नहीं हैं। यह मशीन गरम हो जाए, तब उस समय आपको ज़रा ठंडा रहना चाहिए। जब अपने आप ठंडा हो जाए, तब हाथ डालना।

बच्चे पर आप चिढ़ते हो तब वह नया कर्ज़ लेने जैसा है, क्योंकि चिढऩे में हर्ज नहीं, लेकिन आप जो ‘खुद’ चिढ़ते हो वह नुकसान करता है।

प्रश्नकर्ता : बच्चों को जब तक डाँटे नहीं, तब तक शांत ही नहीं होते, डाँटना तो पड़ता है न!

दादाश्री : नहीं, डाँटने में हर्ज नहीं। लेकिन ‘खुद’ डाँटते हो इसलिए आपका मुँह बिगड़ जाता है, इसलिए ज़िम्मेदारी है। आपका मुँह बिगड़े नहीं ऐसे डाँटो, मुँह अच्छा रखकर डाँटो, खूब डाँटो। आपका मुँह बिगड़ जाए तो इसका मतलब यह है कि आपको जो डाँटना है वह आप अहंकार करके डाँटते हो।

प्रश्नकर्ता : तब तो बच्चों को ऐसा लगेगा कि ये झूठमूठ का डाँट रहे हैं!

दादाश्री : वे इतना जाने तो बहुत हो गया। तो उनको असर होगा, नहीं तो असर ही नहीं होगा। आप बहुत डाँटो तो वे समझते हैं कि ‘ये कमज़ोर आदमी हैं।’ वे लोग मुझे कहते हैं, ‘हमारे पिताजी बहुत कमज़ोर आदमी हैं, बहुत चिढ़ते रहते हैं।’

प्रश्नकर्ता : हमारा डाँटना ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमें ही मन में विचार आते रहें और खुद पर असर होता रहे?

दादाश्री : वह तो गलत है। डाँटना ऐसा नहीं होना चाहिए। ऊपरी तौर पर डाँटना जैसे कि नाटक में लड़ते हैं, उस प्रकार का होना चाहिए। नाटक में लड़ते हैं, ‘क्यों तू ऐसा कर रहा है और ऐसा वैसा’ सब बोलते हैं लेकिन अंदर कुछ भी नहीं होता, ऐसे डाँटने का है।

प्रश्नकर्ता : बच्चों को कहने जैसा लगता है तब डाँटते हैं, तब उन्हें दु:ख भी होता हो, तब क्या करें?

दादाश्री : फिर हम भीतर माफी माँग लें। इस बहन को बहुत ज़्यादा बोल गए हों और उसे दु:ख हुआ हो तो आप इस बहन से कहो कि क्षमा चाहता हूँ। अगर ऐसा नहीं बोल सकते तो अतिक्रमण हुआ इसलिए भीतर प्रतिक्रमण करो। आप तो ‘शुद्धात्मा हो’ इसलिए आप चंदूभाई से कहना कि ‘प्रतिक्रमण करो।’ आपको दोनों विभाग अलग रखने हैं। अकेले में भीतर अपने आपसे कहो कि ‘सामनेवाले को दु:ख न हो’ ऐसा बोलना। फिर भी बेटे को दु:ख हो तो चंदूभाई से कहना, ‘प्रतिक्रमण करो।’

प्रश्नकर्ता : लेकिन अपने से छोटा हो, अपना बेटा, हो तब क्षमा कैसे माँगे?

दादाश्री : भीतर से क्षमा माँगना, हृदय से क्षमा माँगना। उसके भीतर दादा दिखाई दें और उनकी साक्षी में आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान उस लड़के के करें तो तुरंत उसे पहुँच जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : हम किसी को डाँटे, लेकिन उसकी भलाई के लिए डाँट रहे हों, जैसे बच्चों को ही डाँटे तो क्या वह पाप कहलाएगा?

दादाश्री : नहीं, उससे पुण्य बँधेगा। लड़के की भलाई के लिए डाँटें-मारें तब भी पुण्य बँधता है। भगवान के घर अन्याय होता ही नहीं! बेटा उल्टा कर रहा है इसलिए लड़के की भलाई के लिए खुद को आकुलता हुई और उसे दो चपत लगा दीं, तो भी उसका पुण्य बँधता है। उसे अगर पाप माना जाए तो ये क्रमिक मार्ग के सभी साधु-आचार्यों में से किसी का मोक्ष नहीं हो सकता। पूरे दिन शिष्य के प्रति अकुलाते रहते हैं, लेकिन उससे पुण्य बँधता है। क्योंकि दूसरों की भलाई के लिए वह क्रोध करता है। अपनी भलाई के लिए क्रोध करना पाप है। कितना सुंदर न्याय है! कितना न्याय पूर्ण है! भगवान महावीर का न्याय कितना सुंदर है! यह न्याय तो धर्म-कांटा ही है न!!

अत: बच्चों को उसकी भलाई के लिए डाँटों, मारो, तब पुण्य बँधता है। परंतु ‘मैं पिता हूँ, उसे थोड़ा मारना तो पड़ेगा न?’ ऐसा भाव अंदर प्रविष्ट हुआ तो फिर पाप बँधेगा। इस तरह अगर सही समझ नहीं होगी तो फिर उसमें ऐसा विभाजन होगा!

अत: बाप लड़के पर उसके हित के लिए अकुलाए उसका क्या फल हो? पुण्य बँधेगा।

प्रश्नकर्ता : बाप तो अकुलाता है लेकिन बेटा भी सामने अकुलाए तो क्या होता है?

दादाश्री : बेटा पाप बाँधता है! क्रमिक मार्ग में ‘ज्ञानीपुरुष’ शिष्य पर अकुलाए तो उसका ज़बरदस्त पुण्य बँधता है, पुण्यानुबंधी पुण्य बँधता है। वह आकुलता व्यर्थ नहीं जाती। ये शिष्य नहीं हैं उनके बच्चे, नहीं कुछ लेना-देना, फिर भी शिष्य पर अकुलाते हैं।

यहाँ हमारे पास डाँट-डपट बिल्कुल नहीं होती! डाँटने पर मनुष्य स्पष्ट नहीं कह सकता, कपट करता है। इसी वजह से संसार में ये सब कपट पैदा हुए हैं! दुनिया में डाँटने की ज़रूरत नहीं है। बेटा सिनेमा देखकर आए और हम उसे डाँटें तो दूसरे दिन बहाना बनाकर, ‘स्कूल में कुछ कार्यक्रम था’ कहकर सिनेमा देखने जाता है! जिसके घर में माँ सख्त हो, उसके बेटे को व्यवहार नहीं आता।

प्रश्नकर्ता : कोल्ड ड्रिंक्स ज़्यादा पिए, चॉकलेट ज़्यादा खाए, उस वक्त डाँटती हूँ।

दादाश्री : उसमें डाँटने की कहाँ ज़रूरत है! उसे समझाना चाहिए कि ज़्यादा खाने से क्या नुकसान होगा। आपको कौन डाँटता है? यह तो बड़प्पन का झूठा अहंकार है! ‘माँ’ बनकर बैठी है, बड़ी! माँ बनना आता नहीं और सारा दिन बच्चे को डाँटती रहती हो! अगर आपको सास डाँटती हो तो मालूम पड़े। बच्चे को डाँटना शोभा देता होगा? बच्चे को भी ऐसा लगे कि यह तो (माँ) दादी से भी बुरी है। इसलिए बच्चे को डाँटना छोड़ दो। धीरे से समझाना कि यह सब नहीं खाना चाहिए, उससे तेरा शरीर बिगड़ेगा।

वह गलत करे तो भी उसे बार-बार मत पीटो। गलत करे और बार-बार पीटें तो क्या होगा? एक आदमी तो जैसे कपड़े धो रहा हो, उस प्रकार बच्चे की धुलाई कर रहा था। अरे भाई, बाप होकर लड़के की यह क्या दशा करता है? उस समय बेटा मन में क्या तय करता है, जानते हो? सहन नहीं हो तो मन में सोचता है, ‘बड़ा होने पर आप को मारूँगा, देख लेना।’ भीतर ठान लेता है। बड़ा होकर फिर उसे मारता भी है।

मारने से जगत् नहीं सुधरता। डाँटने से या चिढऩे से भी कोई नहीं सुधरता। सही करके दिखाने से सुधरता है। जितना बोलें उतना पागलपन है।

एक भाई थे। वे रात दो बजे न जाने क्या-क्या करके घर आते थे! उसका वर्णन करने योग्य नहीं है। आप समझ जाओ। फिर घर के लोगों ने तय किया कि इसको डाँटे या फिर घर में घुसने नहीं दें, क्या उपाय करें? बाद में वे लोग इसका अनुभव कर आए। उसके बड़े भैया कहने गए तो उनसे कहने लगा, ‘आपको मारे बगैर नहीं छोडूँगा।’ फिर घर के सब लोग मुझे पूछने आए कि ‘इसका क्या करें? यह तो ऐसा बोलता है।’ तब मैंने घरवालों से कह दिया कि ‘कोई उसे एक अक्षर भी कहे नहीं। बोलेंगे तो वह ज़्यादा उद्दंड हो जाएगा, और घर में आने नहीं दोगे तो बगावत करेगा। उसे जब आना हो, तब आए और जाना हो तब जाए। हमें ‘राइट’ (सही) भी नहीं कहना और ‘रोंग’ (गलत) भी नहीं कहना है। राग भी नहीं करना, द्वेष भी नहीं करना है। समता रखनी है, करुणा रखनी है।’ तीन-चार साल बाद वह भाई सही रास्ते पर आ गया! आज वह व्यापार में बहुत मदद करता है। दुनिया बेकार नहीं है, लेकिन काम लेना आना चाहिए। सभी के भीतर भगवान हैं और सभी भिन्न-भिन्न कार्य लेकर बैठे हैं, इसलिए नापसंद जैसा मत रखना।

एक आदमी संडास के दरवाज़े को लातें मार रहा था। मैंने पूछा, ‘लातें क्यों मार रहे हो?’ तो बोला, ‘बहुत सफाई करता हूँ फिर भी बदबू आ रही है।’ बोलिए, अब यह कितनी बड़ी मूर्खता कहलाएगी! संडास के दरवाज़े को लात मारे तो भी बदबू आती है! इसमें भूल किसकी?

कितने ही लोग तो बच्चों को बहुत मारते रहते हैं, यह क्या मारने की चीज़ है? यह तो ‘ग्लास वेयर’ (काँच के बरतन) के जैसे हैं। ‘ग्लास वेयर’ को जतन से रखने चाहिए। ‘ग्लास वेर’ को ऐसे फेंके तो? ‘हेन्डल विथ केयर।’ अर्थात् सावधानी रखो। अब ऐसे मारते मत रहना। ऐसा है, इस जन्म के बच्चों की चिंता करते हो लेकिन पिछले जन्मों में जो संतानें थी उनका क्या किया? प्रत्येक जन्म में संतान छोड़कर आए हैं, जहाँ भी जन्म लिए उन सबमें बच्चे छोड़-छोड़कर आए हैं। इतने छोटे-छोटे को बेचारे भटक जाएँ, ऐसे बच्चों को छोड़कर आए हैं। वहाँ से आना नहीं चाहता था, फिर भी यहाँ आया। बाद में भूल गया और फिर इस जन्म में दूसरे बच्चे आए! तो फिर बच्चों संबंधी क्लेश क्यों करते हो? उन्हें धर्म के मार्ग पर ले जाओ, अच्छे बन जाएँगे।

एक लड़का तो ऐसा टेढ़ा था कि कड़वी दवाई पिलाए तो पीता ही नहीं था, गले से नीचे उतारता नहीं था, लेकिन उसकी माँ भी पक्की थी। बच्चा इतना टेढ़ा हो तो माँ कच्ची होगी क्या? माँ ने क्या किया, उसकी नाक दबाई और दवाई फट से गले में उतर गई। परिणाम स्वरूप बच्चा और भी पक्का हो गया! दूसरे दिन जब पिला रही थी और नाक दबाने गई तो उसने फूऊ ऊ ऊ करके माँ की आँखों में उड़ाया! यह तो वही ‘क्वॉलिटी!’ माँ के पेट में नौ महीने बिना भाड़े के रहे, वह मुनाफा और ऊपर से फूऊऊऊ करता है!

एक बाप मुझे कह रहा था कि ‘मेरा तीसरे नंबर का बेटा बहुत खराब है। दो लड़के अच्छे हैं।’ मैंने पूछा, ‘यह खराब है तो आप क्या करोगे?’ तब बोला, ‘क्या करूँ? दो लड़कों को मुझे कुछ नहीं कहना पड़ता और इस तीसरे लड़के के कारण मेरी सारी ज़िंदगी बरबाद होने लगी है।’ मैंने कहा, ‘क्या करता है आपका बेटा?’ तब वह बोला, ‘रात डेढ़ बजे आता है, शराब पीकर आता है वह।’ मैंने पूछा, ‘फिर आप क्या करते हो?’ तब बोला, ‘मैं दूर से देखता हूँ उसे, अगर मेरा मुँह दिखाऊँ तो गालियाँ देता है। मैं दूर रहकर खिड़की में से देखता रहता हूँ कि क्या कह रहा है?’ तब मैंने कहा, ‘डेढ़ बजे घर आने के बाद क्या करता है?’ तब बोला, ‘खाने-पीने की तो कोई बात ही नहीं, उसके आने पर उसका बिस्तर लगा देना पड़ता है। आकर तुरंत सो जाता है और खर्राटे लेने लगता है।’ इस पर मैंने कहा, ‘तो चिंता कौन करता है?’ तब बोला, ‘वह तो मैं ही करता हूँ।’

बाद में कहे, ‘उसका यह हाल देखकर मुझे तो सारी रात नींद नहीं आती।’ मैंने कहा, ‘इसमें दोष आपका है, वह तो आराम से सो जाता है। खुद का दोष खुद भुगतते हो। पिछले जन्म में उसे शराब की आदत डालने वाला तू ही है।’ उसको सिखाकर खिसक गया। किस कारण सिखाया? लालच की खातिर। यानी पिछले जन्म में उसे बिगाड़ा था, उल्टी राह पर चढ़ाया था। वह सिखाने का फल आया है अब। अब उसका फल भुगतो आराम से! जो ‘भुगते उसी की भूल‘!। देखो, वह तो सो जाता है न आराम से? और बाप सारी रात चिंता करते-करते डेढ़ बजे तक जागता है कि कब आए, लेकिन उसे कुछ बोल नहीं सकता। बाप भुगतता है, इसलिए भूल बाप की है।

बहू समझती है कि ससुर दूसरे कमरे में बैठे हैं। इसलिए वह दूसरे के साथ बात करती है कि ‘ससुर ज़रा कम अक्ल है।’ अब उस समय हम वहाँ खड़े हों तो हमें यह सुनने में आए, तो हमें भीतर असर होता है। तब वहाँ क्या हिसाब लगाना चाहिए कि अगर हम दूसरी जगह में बैठे होते तो क्या होता? तब कोई असर नहीं होता। अर्थात् यहाँ आए, इस भूल का यह असर है! हम इस भूल को सुधार लें, ऐसा समझकर कि हम कहीं और बैठे थे और हमने यह सुना ही नहीं था। इस प्रकार इस भूल को सुधार लें।

महावीर भगवान के पीछे भी लोग उल्टा बोलते थे। लोग तो बोलेंगे ही, हम अपनी भूल खत्म कर दें। उसे जो ठीक लगा वैसा बोला। हमारे बुरे कर्मों का उदय हो तभी ऐसा उल्टा उससे बोला जाता है।

बच्चों का अहंकार जागृत हो जाए, उसके बाद उसे कुछ नहीं कह सकते और हम कहें भी क्यों? उन्हें ठोकर लगेगी तो सीखेंगे। बच्चे पाँच साल के हों, तब तक उन्हें कहने की छूट। और पाँच से सोलह सालवाले बच्चे को शायद कभी थप्पड़ भी लगानी पड़े। लेकिन बीस साल का जवान होने के बाद ऐसा नहीं कर सकते। उसे एक अक्षर भी नहीं बोल सकते। उसे कुछ भी बोलना गुनाह होगा। वर्ना तो किसी दिन शायद आपको बंदूक भी मार दे।

‘बिन माँगी सलाह मत देना’ ऐसा हमने लिखा भी है! अगर कोई आपसे कुछ पूछे, तब आपको सलाह देनी चाहिए और उस समय जो ठीक लगता हो वह कह देना। सलाह देने के बाद यह भी कहना कि आपको ठीक लगे वैसा करना। हम तो आपको यह कह चुके।’ तब फिर उन्हें बुरा लगे ऐसी कोई बात नहीं रहती। अत: हमें जो कुछ भी कहना है, उसके पीछे विनय रखना है।

इस काल में कम बोलने जैसी अच्छी बात और कुछ भी नहीं है। इस काल में बोल पथ्थर लगें, ऐसे निकलते हैं और सबके ऐसे होते हैं। इसलिए मितभाषी हो जाना अच्छा है। किसी को कुछ कहने जैसा नहीं है। कहने से और बिगड़ेंगे। उससे कहें कि ‘गाड़ी पर जल्दी जा।’ तब देर से जाएगा और कुछ नहीं कहोगे तो समय पर जाएगा। हम नहीं हों तो भी सब चले ऐसा है। यह तो खुद का गलत अहंकार है। जिस दिन से बच्चों के साथ आपकी झिक-झिक बंद हो जाएगी, उस दिन से बच्चे सुधरने लगेंगे। आपके शब्द अच्छे निकलते नहीं, इसलिए सामनेवाला अकुलाता है। आपके शब्द स्वीकार नहीं होते और उल्टे वे शब्द पलटकर वापस आते हैं। हम तो बच्चों को खाना-पीना बनाकर दें और अपना फर्ज़ निभाएँ, और कुछ कहने जैसा नहीं है। कहने से फायदा नहीं, ऐसा आपको लगता है? बच्चे बड़े हो गए हैं, वे क्या सीढिय़ों से गिर पड़ेंगे? आप अपना आत्मधर्म क्यों चूक रहे हो? इन बच्चों के साथ तो रिलेटिव धर्म है। वहाँ भेजाफोड़ी करने जैसी नहीं है, क्लेश करने के बजाय मौन रहना उत्तम होगा। क्लेश से तो खुद का और सामनेवाले का भी दिमाग़ बिगड़ जाता है।

वे आपको बुरा कहें, आप उसे बुरा कहो! फिर वातावरण दुषित होता जाता है और विस्फोट होता है। इसलिए आप उन्हें अच्छे से कहना। किस दृष्टि से? एक दृष्टि मन में रख लो कि ‘आफ्टर ऑल ही इज़ ए गुड मेन (आखिरकार तो वह अच्छा आदमी है)।’

प्रश्नकर्ता : टकराव हो तब बच्चों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए?

दादाश्री : राग-द्वेष नहीं होना चाहिए। उसने कुछ बिगाड़ा हो, कुछ नुकसान किया हो, तब भी उस पर द्वेष नहीं होना चाहिए। उसे ‘शुद्धात्मा’ के रूप में देखना चाहिए। अर्थात् राग-द्वेष नहीं हुआ तो सब निराकरण हो गया और अपना ज्ञान राग-द्वेष मत होने देना।

अपने मन में ज़रा सी भी दुविधा हो तो वह दूसरे किसी की नहीं, अपनी ही है, इसलिए हमें समझ लेना है कि यह दुविधा हमारी है। दुविधा क्यों हुई? हमें देखना नहीं आया, इसलिए। हमें ‘शुद्धात्मा’ ही देखना है। उलझनें खत्म करनी हैं ‘मैं शुद्धात्मा हूँ’, बाकी सब ‘व्यवस्थित’ है। ऐसा ‘सल्यूशन’ (हल) मैंने दिया है।

बेटे की शादी होने के बाद परेशान हों तो नहीं चलेगा, उससेपहले सँभल जाओ। साथ में रखोगे तो क्लेश होगा। उसका जीवन बिगड़ेगा और साथ में हमारा भी बिगड़ेगा। अगर प्रेम पाना चाहते हो तो उससे अलग रहकर प्रेम रखो, वर्ना जीवन बिगाड़ोगे और इससे प्रेम घट जाएगा। उसकी पत्नी आई तब उनको साथ में रखना चाहो तो सदैव वह पत्नी का कहा मानेगा, आपका नहीं सुनेगा। उसकी पत्नी कहेगी, ‘आज तो माताजी ऐसा कह रही थीं, वैसा कह रही थीं।’ तब बेटा कहेगा, ‘हाँ, माँ ऐसी ही हैं।’ और फिर चला तूफान। दूर से सब अच्छा रहता है!

प्रश्नकर्ता : बच्चे विदेश में हैं उनकी याद आती रहती है, उनकी चिंता होती है।

दादाश्री : वे बच्चे वहाँ खा-पीकर मज़ा कर रहे होंगे, माँ को याद भी नहीं करते होंगे और माँ यहाँ चिंता करती रहती है, यह कैसी बात?

प्रश्नकर्ता : वे लड़के वहाँ से लिखते हैं कि आप यहाँ आ जाओ।

दादाश्री : हाँ! लेकिन जाना क्या अपने हाथ में हैं? उसके बजाय आप खुद ही जैसा है वैसा बंदोबस्त कर लो। वह गलत है क्या? वे उनके घर, हम अपने घर! इस कोख से जन्म हुआ इसलिए क्या हमारे हो गए सब? हमारे हों तो हमारे साथ आए लेकिन कोई आता है इस संसार में?

घर में पचास व्यक्ति हों, लेकिन आपको पहचानना नहीं आया इसलिए गड़बड़ होती रहती है। उन्हें पहचानना चाहिए न? यह गुलाब का पौधा है कि किसका पौधा है, यह पता नहीं लगाना चाहिए?

पहले क्या था? सत्युग में एक घर में सब गुलाब और दूसरे घर में सभी मोगरा, तीसरे घर चंपा! अभी क्या हुआ है कि एक ही घर में मोगरा है, गुलाब है, चंपा है! गुलाब होगा तो काँटे होंगे और यदि मोगरा है तो काँटे नहीं होंगे, मोगरे का फूल सफेद होगा, गुलाब गुलाबी होगा, लाल होगा। इस समय ऐसे अलग-अलग पौधे हैं। यह बात आपकी समझ में आई?

सत्युग में जो खेत थे, आज कलियुग में वे बगीचे जैसे हो गए हैं! लेकिन उन्हें देखना नहीं आता, उसका क्या करें? उन्हें सही देखना न आए तो दु:ख ही होगा न? इस जगत् के लोगों के पास यह देखने की दृष्टि नहीं है। कोई बुरा होता ही नहीं। यह मतभेद तो अपना-अपना अहंकार है। देखना नहीं आता उसका दु:ख है। देखना आए तो दु:ख ही नहीं! मुझे सारे संसार में किसी के भी साथ मतभेद ही नहीं होता। मुझे देखना आता है कि यह गुलाब है या मोगरा है। वह धतूरा है कि कड़वी तुरई का फूल है, ऐसे सबको पहचान लेता हूँ।

प्रकृति को पहचानते ही नहीं इसलिए मैंने पुस्तक में लिखा है, ‘आज घर बगीचा बन गया है। इसलिए काम निकाल लो इस समय में।’ जो खुद ‘नोबल’ (उदार) हो और बेटा कंजूस हो तो कहेगा, ‘मेरा बेटा बिल्कुल कंजूस है।’ उसे वह मार-पीटकर ‘नोबल’ बनाना चाहो तो नहीं हो सकेगा। वह माल ही अलग है। जबकि माता-पिता उसे अपने जैसा बनाना चाहते हैं। अरे, उसे खिलने दो, उसकी शक्तियाँ क्या हैं? उसे खिलने दो। किसका स्वभाव कैसा है, वह देख लेना है। अरे भाई, किसलिए उनसे झगड़ते हो?

इस बगीचे को पहचानने जैसा है। ‘बगीचा’ कहता हूँ तब लोग समझते हैं और फिर अपने बच्चे को पहचानते हैं। प्रकृति को पहचान! एक बार बच्चे को पहचान ले और उसके मुताबिक व्यवहार कर।

उसकी प्रकृति को देखकर व्यवहार करें तो क्या हो? मित्र की प्रकृति को ‘एडजस्ट’ होते हैं या नहीं? ऐसे प्रकृति को देखना पड़ता है, प्रकृति को पहचानना पड़ता है। पहचान कर चलें तो घर मे झगड़े नहीं होंगे। यहाँ तो मार-पीटकर ‘मेरे जैसे बनो,’ ऐसा कहते हैं। वैसे किस प्रकार बन सकते हैं?

सारा संसार ऐसे व्यवहार ज्ञान की खोज में है, यह धर्म नहीं है। यह ज्ञान संसार में रहने का इलाज है। संसार मे एडजस्ट होने का उपाय है। वाइफ के साथ कैसे एडजस्टमेन्ट करें, लड़के के साथ कैसे एडजेस्टमेन्ट करें, उसके उपाय हैं।

घर में खिटपिट हो, तब इस वाणी के शब्द ऐसे हैं कि सबकी तकलीफ मिट जाए। इस वाणी से सब अच्छा होता है। जिससे दु:ख चले जाएँ, ऐसी वाणी लोग खोजते हैं। क्योंकि किसी ने ऐसे उपाय ही नहीं बताए न! सीधे काम आनेवाले हों ऐसे उपाय ही नहीं हैं न!

10. शंका के शूल
एक आदमी मेरे पास आता था। उसकी एक बेटी थी। उसे मैंने पहले से समझाया था कि ‘यह तो कलियुग है, इस कलियुग का असर बेटी पर भी होता है। इसलिए सावधान रहना।’ वह आदमी समझ गया और जब उसकी बेटी दूसरे के साथ भाग गई, तब उस आदमी ने मुझे याद किया और मेरे पास आकर मुझसे कहने लगा, ‘आपने कही थी वह बात सच्ची थी। अगर आपने मुझे ऐसी बात नहीं बताई होती तो मुझे ज़हर पीना पड़ता।’ ऐसा है यह जगत्, पोलंपोल (गड़बड़)! जो होता है उसे स्वीकार करना चाहिए, उसके लिए क्या ज़हर पीएँ? नहीं, तब तो तू पागल कहलाएगा। यह तो कपड़े ढककर आबरू रखते हैं और कहते हैं कि हम खानदानी हैं।

एक हमारा खास संबंधी था, उसकी चार बेटियाँ थीं। वह बहुत जागृत था, मुझसे कहता है, ‘ये बेटियाँ बड़ी हो गई, कॉलेज गई, लेकिन मुझे इन पर विश्वास नहीं होता।’ उस पर मैंने कहा, ‘कॉलेज साथ में जाना और वे कॉलेज से निकलें तब पीछे-पीछे आना।’ इस प्रकार एक बार जाएगा पर दूसरी बार क्या करेगा? बीवी को भेजेगा? अरे, विश्वास कहाँ रखना और कहाँ नहीं रखना, इतना भी नहीं समझता? हमें बेटी से इतना कह देना चाहिए, ‘देखो बेटी, हम अच्छे घर के लोग, हम खानदानी, कुलवान हैं।’ इस प्रकार उसे सावधान कर देना। बाद में जो हुआ सो ‘करेक्ट’, उस पर शंका नहीं करने की। कितने शंका करते होंगे? जो इस मामले में जागृत हैं, वे शंका करते रहते हैं। ऐसा संशय रखने से कब अंत आएगा?

इसलिए किसी भी प्रकार की शंका हो तो उत्पन्न होने से पहले ही उखाड़ कर फेंक देना। यह तो बेटियाँ बाहर घूमने-फिरने जाती हैं, खेलने जाती हैं, उसकी शंका करता है और शंका उत्पन्न हुई तो हमारा सुख-चैन टिकता है? नहीं।

अत: कभी बेटी रात देर से आए तो भी शंका मत करना। शंका निकाल दो तो कितना लाभ हो? बिना वजह डराकर रखने का क्या अर्थ है? एक जन्म में कुछ परिवर्तन होनेवाला नहीं। उन लड़कियों को बिना वजह दु:ख मत पहुँचाना, बच्चों को दु:ख नहीं देना। बस इतना ज़रूर कहना कि, ‘बेटी, तू बाहर जाती है लेकिन देर मत करना, हम खानदानी लोगों में से हैं, हमें यह शोभा नहीं देता, इसलिए ज़्यादा देर मत करना।’ इस तरह सब बात करना, समझाना। लेकिन शंका करना ठीक नहीं होगा कि ‘किस के साथ घूम रही होगी, क्या कर रही होगी?’ और कभी रात बारह बजे आए, तब भी दूसरे दिन कहना कि, ‘बेटी, ऐसा नहीं होना चाहिए।’ उसे अगर घर से बाहर कर दें तो वह किसके वहाँ जाएगी। उसका ठिकाना नहीं। फायदा किस में है? कम से कम नुकसान हो, उसमें फायदा है न? कम से कम नुकसान हो, वही फायदेमंद। इसलिए मैंने सभी से कहा है कि ‘रात को देर से आएँ तो भी लड़कियों को घर में आने देना। उन्हें बाहर मत निकाल देना।’ वर्ना ये तो बाहर से ही निकाल दें, ऐसे गरम मिज़ाज के लोग हैं! काल कैसा विचित्र है! कितना दु:खदाई काल है!! और ऊपर से यह कलियुग है, इसलिए घर में बिठाकर उन्हें समझाना।

प्रश्नकर्ता : अब सामनेवाला कोई हमारे ऊपर संशय रखे तो उसका निराकरण खुद कैसे करें?

दादाश्री : वह संशय रखता है, ऐसा मत सोचना, ऐसा हमें जो ज्ञान है, वह ज्ञान भुला देना।

प्रश्नकर्ता : उसे हम पर संशय हुआ, तो हमें पूछना चाहिए कि क्यों संशय हुआ?

दादाश्री : पूछने में मज़ा नहीं है, ऐसा पूछना ही मत। हमें तुरंत समझ लेना चाहिए कि अपना कुछ दोष है, वर्ना उसे शंका क्यों हुई?

‘भुगते उसी की भूल’ यह वाक्य समझ लिया कि निराकरण आ गया। शंका करनेवाला भुगत रहा है या फिर शंका जिस पर हो रही है, वह भुगत रहा है? यह देख लेना।

11. वसीहत में बच्चों को कितना?
प्रश्नकर्ता : पुण्योदय से ज़रूरत से ज़्यादा लक्ष्मी प्राप्त हो तब क्या करना चाहिए?

दादाश्री : तब अच्छे कार्य में खर्च कर देना। बच्चों के लिए बहुत मत रखना। उन्हें पढ़ा-लिखाकर काम-धंधे पर लगा देना। काम पर लग गए, बाद में ज़्यादा लक्ष्मी मत रखना। इतना ख्याल रखना कि जितना अपने साथ आया उतना ही हमारा।

प्रश्नकर्ता : यहाँ से साथ में ले जा सकते हैं क्या?

दादाश्री : अब क्या लेकर जाएँगे? साथ में जो था वह सब यहाँ खर्च करके पूरा किया। अब कुछ मोक्ष संबंधी मेरे पास से यहाँ आकर पाए तो दिन बदलेंगे। अब भी जीवन बाकी है, अब भी जीवन बदल सकते हैं, जब जागे तब सवेरा।

वहाँ (अगले जन्म में) ले जाने में क्या काम आता है? यहाँ जो आपने खर्च किया, वह सब गटर में गया, आपके मौज-मज़ा के लिए, आपके रहने के लिए जो कुछ भी करते हो वह सब गटर में गया। सिर्फ दूसरों के लिए जो कुछ किया उतना ही आपका ओवरड्राफ्ट (जमा) है।

एक आदमी ने मुझे प्रश्न किया कि बच्चों को कुछ नहीं दें? मैंने कहा, ‘बच्चों को देना, लेकिन आपके पिता ने आपको जितना दिया हो, उतना देना। बीच में जो कमाया, वह हम जहाँ चाहें, किसी अच्छे कार्य में खर्च कर दें।’

प्रश्नकर्ता : हमारे वकीलों के कानून में भी ऐसा है कि बाप-दादा की प्रोपर्टी (संपति) हो, उसे बच्चों को देनी ही चाहिए और जो स्व-उपार्जित धन है उसका बाप जो करना चाहे कर सकता है।

दादाश्री : हाँ, जो करना चाहे करे। अपने हाथों से ही कर लेना चाहिए। अपना मार्ग क्या कहता है कि तेरा अपना माल हो, वह अलग करके खर्च कर, तो वह तेरे साथ आएगा। क्योंकि यह ‘ज्ञान’ प्राप्त करने के बाद अभी एक-दो जन्म बाकी रहे हैं, इसलिए साथ में ज़रूरत पड़ेगी न? दूसरे गाँव जाते हैं तब साथ में थोड़ी रोटियाँ ले जाते हैं। तब यहाँ भी साथ में कुछ होना चाहिए न?

इसलिए बेटे को तो सिर्फ क्या देना चाहिए, एक ‘फ्लैट’ (मकान) देना, हम रहते हैं वह। वह भी हो तो देना। उसे कह देना कि, ‘बेटे, हम नहीं रहे उस दिन यह सब तेरा, तब तक मालिकी हमारी! पागलपन करेगा तो तुझे तेरी पत्नी के साथ निकाल बाहर करूँगा। हम हैं तब तक तेरा कुछ भी नहीं। हमारे जाने के बाद सबकुछ तेरा।’ विल बना देना। आपके बाप ने दिया हो उतना आपको उसे देना है। वह उतना हकदार है। आखिर तक लड़के के मन में ऐसा रहे कि ‘अभी पिताजी के पास पचास हज़ार और हैं।’ आपके पास तो लाख होंगे। वह मन में समझे कि 40-50 हज़ार देंगे। उसे आखिर तक इस लालच में रखना। वह अपनी पत्नी से कहे कि, ‘जा, पिताजी को फर्स्ट क्लास भोजन करा, चाय-नाश्ता ला।’ आप रोब से रहना है। अर्थात् आपके पिताजी ने जो कुछ कोठरी (मकान) दी हो वह उन्हें दे दो।

कोई कुछ साथ में नहीं ले जाने देता। अपने जाने के बाद अपने शरीर को जला देते हैं। तब फिर बच्चों के लिए अधिक छोड़कर क्या करें? बच्चों के लिए ज़्यादा छोड़ जाएँ तो बच्चे क्या करेंगे? वे सोचेंगे कि ‘अब नौकरी-धंधा करने की ज़रूरत नहीं।’ बच्चे शराबी बन जाएँगे। क्योंकि फिर उन्हें संगत ऐसी मिल जाती है। ये शराबी ही हुए हैं न सब! अत: बेटे को तो हमें सोच-समझकर मर्यादा में देना चाहिए। अगर ज़्यादा दें तो दुरुपयोग होगा। हमेशा जॉब (काम) ही करता रहे ऐसा कर देना चाहिए। बेकार बैठे तो शराब पिए न?

कोई बिज़नेस (धंधा) उसे पसंद हो तो करवा देना। कौन सा व्यवसाय पसंद है वह पूछकर, उसे जो व्यवसाय ठीक लगे वह करवा देना। पच्चीस-तीस हज़ार बैंक से लोन पर दिलवाना, ताकि अपनेआप भरता रहे और थोड़े बहुत अपने पास से दे देना। उसे ज़रूरत हो उसमें से आधी रकम हमें देनी है और आधी रकम बैंक में से लोन दिलवा देना। इस लोन की किश्तें तू भरना, ऐसा कह देना। किश्तें भरता रहे और वह बेटा समझदार होता है फिर।

अत: बेटे को नियम से, नियम से जितना देना चाहिए उतना देकर, बाकी सारा लोगों के सुख के लिए अच्छे रास्ते खर्च कर देना। लोगों को सुख कैसे मिले? उनके हृदय को ठंडक पहुँचे तब! तो वह संपत्ति आपके साथ आएगी। ऐसे नकदी नहीं आती लेकिन ओवरड्राफट (जमाराशि) के रूप में आती है। नकदी तो ले जाने ही नहीं देते न! यहाँ पर इस तरह ओवरड्राफट करो, लोगों को खिला दो, सबके दिलों को ठंडक पहुँचाओ। किसी की मुश्किल दूर करो। यह रास्ता है आगे ड्राफट भेजने का। पैसों का सदुपयोग करो। चिंता मत करो। खाओ-पीओ, खाने-पीने में कंजूसी मत करो। इसलिए कहता हूँ कि ‘खर्च डालो और ओवरड्राफट लो।’

मैंने उनके बेटों से कहा कि तुम्हारे बाप ने यह सब संपत्ति तुम्हारे लिए इकट्ठा की है, धोती पहनकर (कंजूसी करके)। तब बोले, ‘आप हमारे बाप को जानते ही नहीं हो।’ मैंने पूछा, ‘कैसै?’ तब कहा, ‘अगर यहाँ से पैसा ले जा सकते न, तो मेरा बाप तो लोलोगो कर्ज़ लेकर दस लाख ले जाए ऐसा पक्का है। इसलिए यह बात मन में रखने जैसी नहीं है।’ उस लड़के ने ही मुझे ऐसे समझाया और मैंने कहा कि, ‘अब मुझे सच्ची बात मालूम हुई! मैं जो जानना चाहता था, वह मुझे मिल गया।’

इकलौता बेटा हो, उसे वारिस बनाकर सौंप दिया। कहते हैं कि ‘बेटा, यह सब तेरा, अब हम दोनों धर्मध्यान करेंगे।’ ‘अब यह सारी संपत्ति उसी की ही तो है’, ऐसा बोलोगे तो फज़ीहत होगी। क्योंकि उसे सारी संपति दे दी तो क्या होगा? बाप सारी संपति इकलौते बेटे को दे दें तो बेटा माता-पिता को कुछ दिन तो साथ रखेगा लेकिन एक दिन बेटा कहेगा, ‘आपमें अक्ल नहीं, आप एक जगह बैठे रहो, यहाँ पर।’ अब बाप के मन में ऐसा हो कि मैंने इसके हाथ में लगाम क्यों सौंपी?! ऐसे पछतावा हो, उसके बजाय हमें लगाम अपने पास ही रखनी चाहिए।

एक बाप ने अपने बेटे से कहा कि, ‘सब संपति तुझे देनी है।’ तब उसने कहा कि, आपकी संपति की मैंने आशा नहीं रखी है। उसे आप जहाँ चाहो वहाँ इस्तेमाल करो। अंत में कुदरत जो परिणाम दे वह अलग बात है। लेकिन उसका ऐसा निश्चय, अपना अभिप्राय दे दिया न! इसलिए वह सर्टिफाइड हो गया और अब मौज-शौक कुछ रहा नहीं।

12. मोह के मार से मरे अनेकों बार

प्रश्नकर्ता : बच्चे बड़े होंगे, फिर अपने रहेंगे या नहीं यह किसे मालूम है?

दादाश्री : हाँ, अपना कुछ रहता नहीं। यह शरीर ही अपना नहीं रहता तो! यह शरीर भी बाद में हमसे ले लेते हैं। क्योंकि पराई चीज़ हमारे पास कितने दिन रहे?

बच्चा मोहवश ‘पापा, पापा’ बोलता है, तो पापाजी बहुत खुश हो जाते हैं और ‘मम्मी मम्मी’ बोलता है तो मम्मी भी बहुत खुश होकर हवा में उड़ने लगती है। पापाजी की मूँछें खींचे तो भी पापा कुछ बोलते नहीं। ये छोटे बच्चे तो बहुत काम करते हैं। अगर पापा-मम्मी के बीच झगड़ा हुआ हो, तो वह बच्चा ही मध्यस्थी के रूप में समाधान करता है। झगड़ा तो हमेशा होता ही है न! पति-पत्नी के बीच वैसे भी ‘तू-तू, मैं-मैं’ होती ही रहती है, तब बेटा किस प्रकार समाधान करता है? सवेरे वे चाय न पी रहे हों, ज़रा सा रुठे हों, तो वह स्त्री बच्चे से क्या कहेगी कि, बेटा, जा, पापाजी से कह, ‘मेरी मम्मी चाय पीने बुलाती है, पापाजी चलिए।’ अब बेटा पापाजी के पास जाकर बोला, ‘पापाजी, पापाजी’ और यह सुनते ही सबकुछ भूलकर तुरंत चाय पीने आता है। इस तरह सब चलता है। बेटा ‘पापाजी’ बोला कि ओहो! न जाने कौन सा मंत्र बोला। अरे, अभी तो कहता था कि मुझे चाय नहीं पीनी! ऐसा है यह जगत्!

इस दुनिया में कोई किसी का बेटा नहीं बना। सारी दुनिया में से ऐसा बेटा ढूँढ लाओ कि जो अपने बाप के साथ तीन घंटा झगड़ा किया हो और बाद में कहे कि, ‘हे पूज्य पिताश्री, आप चाहें जितना भी डाँटे फिर भी आप और मैं एक ही हैं।’ ऐसा बोलनेवाला खोज लाओगे? यह तो आधा घंटा ‘टेस्ट’ पर लिया हो तो फूट जाए। बंदूक की टिकड़ी फूटते देर लगती है, लेकिन यह तो तुरंत फूट जाता है। ज़रा डाँटना शुरू करें, उसके पहले ही फूट जाता है या नहीं फूटता?

बेटा ‘पापाजी-पापाजी’ करे तब वह कड़वा लगना चाहिए। अगर मीठा लगे तो वह सुख उधार लिया ऐसा कहा जाएगा। फिर वह दु:ख के रूप में लौटाना होगा। बेटा बड़ा होगा, तब आपको कहेगा कि, ‘आप में अक्ल ही नहीं हैं।’ तब हमें लगे कि ऐसा क्यों? आपने जो उधार लिया था, वह वसूल कर रहा है। इसलिए पहले से सावधान हो जाओ। हमने तो उधार का सुख लेने का व्यवहार ही छोड़ दिया था। अहो! खुद के आत्मा में अनंत सुख है! उसे छोड़कर इस भयानक गंदगी में क्यों पड़ें?

एक सत्तर साल की बुढिय़ा थी। एक दिन घर से बाहर आकर चिल्लाने लगीं, ‘आग लगे इस संसार को, कड़वा ज़हर जैसा, मुझे तो यह संसार ज़रा भी नहीं भाता! हे भगवान! तू मुझे उठा ले।’ तब कोई बेटा वहाँ से गुज़र रहा था उसने कहा, ‘क्यों माई हर रोज़ तो बहुत अच्छा कहती थी। हर रोज़ तो मीठा अँगूर जैसा लगता था और आज कड़वा कैसे हो गया?’ तब कहने लगी, ‘मेरा पुत्र मेरे साथ कलह करता है। इस बुढ़ापे में मुझसे कहता है, चली जा यहाँ से।’

पहले उपकारी खोजने बाहर जाना पड़ता था और आज तो उपकारी घर बैठे जन्मे हैं। इसलिए शांति से बेटा जो सुख-दु:ख दे, उसे स्वीकार कर लेना।

महावीर भगवान को भी उपकारी नहीं मिलते थे। आर्य देश में उपकारी नहीं मिले तो उन्हें फिर साठ मील दूर अनार्य देश में विचरण करना पड़ा, जबकि हमें तो घर बैठे उपकारी मिले हैं। बेटा कहे, ‘हमें देर हो जाए तो आप झिक-झिक मत करना। आपको सोना हो तो सो जाना चुपचाप।’ बाप सोचता है, ‘अब सो जाऊँगा चुपचाप। यह सब मैं नहीं जानता था, वर्ना संसार शुरू ही नहीं करता।’ अब जो हुआ सो हुआ। हमें पहले ऐसा मालूम नहीं होता न, इसलिए शुरू कर देते हैं और बाद में फँस जाते हैं!

प्रश्नकर्ता : नापसंद मिले तो उसे आत्मा हेतु उपयोग में लेना, ऐसा अर्थ हुआ?

दादाश्री : नापसंद मिले वह आत्मा के लिए हितकारी ही होता है। वह आत्मा का विटामिन ही है। दबाव आया कि तुरंत आत्मा में आ जाते हैं न? अभी कोई गाली दे उस घड़ी वह संसार में नहीं रहता और अपने आत्मा में ही एकाकार हो जाता है लेकिन जिसे आत्मा का ज्ञान हुआ है वही ऐसा कर सकता है।

प्रश्नकर्ता : बुढ़ापे में हमारी सेवा कौन करेगा?

दादाश्री : सेवा की आशा क्यों रखें? हमें परेशान न करें तो भी अच्छा हैं। सेवा की आशा मत रखना। शायद पाँच प्रतिशत अच्छे मिल जाएँ, बाकी तो पंचानवे प्रतिशत तो हवा निकाल दें, ऐसे हैं।

अरे! लड़के तो क्या करते हैं? एक लड़के ने उसके बाप से कहा कि ‘आप मुझे मेरा हिस्सा दे दो, रोज़ाना खिटपिट करते हो ऐसा नहीं चलेगा।’ तब उसके बाप ने कहा, ‘तूने मुझे इतना परेशान किया है कि मैं तुझे कुछ भी हिस्सा नहीं देनेवाला।’

‘यह मेरी खुद की कमाई है, इसलिए मैं तुझे इस संपति में सें कुछ नहीं दूँगा।’ तब लड़के ने कहा, ‘यह सब मेरे दादा का है इसलिए मैं कोर्ट में दावा करूँगा।’ मैं कोर्ट में लडूँगा लेकिन छोडूँगा नहीं। अर्थात् सच में ये संतानें अपनी नहीं होतीं।

यदि बाप लड़के के साथ एक घंटा लड़े, इतनी बड़ी-बड़ी गालियाँ दे, तब बेटा क्या कहता है? ‘आप क्या समझते हो?’ पारिवारिक संपति के लिए अदालत में दावा भी करते हैं। फिर उस लड़के के लिए चिंता होगी क्या? ममता छूट गई कि चिंता भी छूट गई। अब मुझे वह बेटा नहीं चाहिए। चिंता होती है न, वह ममतावालों को होती है।

उसका साढ़ू बीमार हो न, तो बारह दफा अस्पताल मिलने जाए और बाप हो तब तीन ही बार मिलने जाता है। ऐसा तू किस आधार पर करता है? घर में बीवी चाबी घुमाती है, कि ‘मेरे बहनोई से मिलते आना!’ अत: बीवी ने कहा कि तुरंत तैयार! ऐसे बीवी के आधीन है जगत्।

वैसे तो बेटा अच्छा होता है, लेकिन यदि उसको गुरु (पत्नी) नहीं मिलनेवाले हो तब। लेकिन गुरु मिले बिना रहते नहीं न! मैं क्या कहना चाहता हूँ कि फिर चाहे गुरु परदेशी हो कि इन्डियन हो, काबू अपने हाथ में नहीं रहता। इसलिए लगाम पद्धतिनुसार अपने हाथ में रखनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : पिछले जन्म में किसी के साथ बैर बँधा हो, तो वह किसी न किसी जन्म में उससे मिलकर चुकाना पड़ता है न?

दादाश्री : नहीं, ऐसा नहीं है। इस तरह बदला नहीं चुकाया जाता। बैर बँधने पर भीतर राग-द्वेष होता है। पिछले जन्म में बेटे के साथ बैर हो गया हो तो हम सोचें कि कौन से जन्म में पूरा होगा? इस प्रकार फिर कब इकट्ठा होंगे? वह बेटा तो इस जन्म में बिल्ली होकर आए। आप उसे दूध दो, तो भी वह आपके मुँह पर नाखून मारे! ऐसा है यह सब! ऐसे आपका बैर चुकता होता जाता है। परिपक्व होना काल का नियम है इसलिए थोड़े समय में हिसाब पूरा हो जाता है। कुछ तो बैरभाव से मिलते हैं, ऐसा बेटा मिले तो बैरभाव से हमारा तेल निकाल दे। आया समझ में? शत्रु-भाव से आए तो ऐसा हो या न हो?

प्रश्नकर्ता : मेरी तीन बेटियाँ हैं, उनकी मुझे चिंता रहती है। उनके भविष्य के बारे में?

दादाश्री : हम भविष्य के बारे में विचार करें उससे अच्छा आज की सेफसाइड (सलामती) करना, प्रतिदिन सेफसाइड करना अच्छा। आगे के विचार जो करते हो न, वे विचार किसी भी तरह ‘हेल्पिंग’ (सहायक) नहीं हैं, बल्कि नुकसानदायक हैं। उसके बजाय हम प्रतिदिन सेफसाइड करते रहें यही सबसे बड़ा इलाज है।

आपको बेटों-बेटियों के अभिभावक बनकर, ट्रस्टी की तरह रहना है। उनकी शादी की चिंता नहीं करनी चाहिए। बेटी अपना हिसाब लेकर आई होती है। बेटी के बारे में चिंता आपको नहीं करनी है। बेटी के आप पालक हो। बेटी अपने लिए लड़का भी लेकर आई होती है। हमें किसी को कहने जाने की ज़रूरत नहीं कि हमारी बेटी है, उसके लिए लड़के को जन्म देना। क्या ऐसा कहने जाना पड़ता है? अर्थात् अपना सबकुछ लेकर आई होती है। तब बाप कहेगा, ‘यह पच्चीस साल की हुई, अभी भी उसका ठिकाना नहीं हुआ, ऐसा है-वैसा है,’ यों सारा दिन गाता रहता है। अरे! वहाँ पर लड़का सत्ताईस का हुआ है लेकिन तुझे मिला नहीं, क्यों शोर मचा रहा है? सो जा चुपचाप! वह बेटी अपना टाइमिंग (समय) सब सेट करके आई है।

चिंता करने से तो अंतराय कर्म होता है। वह कार्य विलंबित होता है। हमें किसी ने बताया हो कि फलाँ जगह पर एक लड़का है, तो हमें प्रयत्न करना है। चिंता करने को भगवान ने ‘ना’ बोला है। चिंता करने से तो एक अंतराय और पड़ता है और वीतराग भगवान ने क्या कहा है कि ‘आप चिंता करते हो तो आप ही मालिक हो क्या? आप ही दुनिया चलाते हो?’ इसे ऐसे देखें तो पता चले कि अपने को तो संडास जाने की भी स्वतंत्र शक्ति नहीं है। अगर बंद हो जाए तो डॉक्टर बुलाना पड़ता है। तब तक ऐसा लगता है कि यह शक्ति हमारी है, परंतु यह शक्ति हमारी नहीं है। यह शक्ति किसके अधीन है यह सब जानना पड़ेगा।

यह तो अंत समय में खटिया में पड़ा हो, तब भी छोटी बेटी की चिंता करता है कि, इसकी शादी करनी रह गई। ऐसी चिंता में और चिंता में मर जाए तो फिर पशु योनि में जाता है। पशु योनि में जन्म निंद्य है, किन्तु मनुष्य जन्म पाकर भी सीधा न रहे तब क्या हो?

13. भला हुआ जो न बँधी जंजाल...
दादाश्री : किसी दिन चिंता करते हो?

प्रश्नकर्ता : चिंता बहुत नहीं, परंतु कभी-कभी ऐसा लगता है कि, वैसे तो सबकुछ है लेकिन बालक नहीं है।

दादाश्री : अहोहो! अर्थात् खानेवाला कोई नहीं है। इतना सबकुछ है फिर भी, खाने का सबकुछ है परंतु खानेवाला कोई नहीं हो तो वह फिर चिंता(उपाधि) ही न?

किसी जन्म में जब बहुत पुण्यवान हों, तब बच्चे नहीं होते। क्योंकि बच्चे होना-न होना सब अपने कर्मों की खाता बही का हिसाब है। इस जन्म में महान पुण्यवान हो कि तुम्हें बच्चा नहीं हुआ। ऐसे लोग बहुत पुण्यवान कहलाते हैं। भाई, तुझे किस ने ऐसा सिखाया? तब कहा, ‘मेरी पत्नी हर रोज़ खिटपिट करती है।’ मैंने कहा, ‘मैं आऊँगा वहाँ पर।’ बाद में उसकी बीवी को समझाया तो समझ गई। मैने कहा कि देखो, इनको तो कोई परेशानी नहीं है। तुम्हारी बहीखाता में खाता ही नहीं है, बहुत अच्छा है, नहीं? इसलिए परम सुखी ही हो आप।

एक भी संतान नहीं हो और बेटे का जन्म हो तो वह बेटा बाप को बहुत खुश करता है, उसे बहुत आनंद करवाता है। लेकिन जब वह जाए, तब रुलाता भी उतना ही है। इसलिए हमें इतना जान लेना है कि वह आया है, तो जाए तब क्या-क्या होगा? इसलिए आज से हँसना ही मत, तो बाद में मुश्किल ही नहीं आए न!

बच्चे तो हमारे राग-द्वेष का हिसाब होते हैं। पैसे का हिसाब नहीं, राग-द्वेष के ऋणानुबंध होते हैं। राग-द्वेष का हिसाब चुकाने के लिए ये बच्चे बाप का तेल निकाल देते हैं, कोल्हू में पेलते हैं। श्रेणिक राजा का भी बेटा था और वह उन्हें रोज़ पीटता था, जेल में भी डाल दिया था।

कहते हैं कि मेरे बच्चे नहीं हैं। बच्चों का क्या करना है? ऐसे बच्चे हों जो परेशान करें वे किस काम के? उसके बजाय तो सेर मिट्टी न हो वह अच्छा और किसी जन्म में तुझे सेर मिट्टी नहीं थी? अब यह मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से मिला है, तो भाई, सीधा मर न! और कुछ मोक्ष का साधन खोज निकाल और अपना काम निकाल ले।

प्रश्नकर्ता : पिछले साल इनका एक बच्चा गुज़र गया न, तब कह रहे हैं कि मुझे बहुत दु:ख हुआ और मानसिक रूप से बहुत सहन करना पड़ा। इससे हमें ऐसा जानने को मन करता है कि पिछले जन्म में हमने ऐसा क्या किया होगा, कि जिसकी वजह से ऐसा हुआ?

दादाश्री : ऐसा है न कि जिसका जितना हिसाब उतना ही हमारे साथ वह रहता है, फिर हिसाब पूरा होते ही हमारी बहीखाते में से अलग हो जाता है। बस इतना ही इसका नियम है।

प्रश्नकर्ता : कोई बच्चा पैदा होने के बाद तुरंत मर जाए, तब क्या उसका उतना ही लेन-देन होता है?

दादाश्री : माता-पिता के साथ जितना राग-द्वेष का हिसाब है, उतना पूरा हो गया, परिणाम स्वरूप माता-पिता को रुलाकर जाता है, बहुत रुलाता है, सिर भी तुड़वाता है। बेटा डॉक्टर का खर्च भी करवाता है, सबकुछ करवाकर चला जाता है!

बच्चों की मृत्यु के बाद उनके लिए चिंता करने से उनको दु:ख झेलना पड़ता है। हमारे लोग अज्ञानता के कारण ऐसा सब करते हैं। इसलिए आपको यथार्थ रूप से समझकर शांति से रहना चाहिए। आखिर बेवजह माथापच्ची करें उसका क्या अर्थ है? बच्चे कहाँ नहीं मरते? यह तो सांसारिक ऋणानुबंध हैं। हिसाबी लेन-देन है। हमारे भी बच्चा-बच्ची थे, लेकिन वे मर गए। मेहमान आया था वह मेहमान गया, वह अपना कहाँ है? क्या हमें भी एक दिन नहीं जाना? हमें तो जो जीवित हैं उन्हें शांति देनी है। जो गया सो तो गया। उसे याद करना भी छोड़ दो। यहाँ जीवित हों, जितने हमारे आश्रित हों, उन्हें शांति दें, उतना हमारा फर्ज़। यह तो गए हुए को याद करते हैं और यहाँवालों को शांति नहीं दे सकते, यह कैसा? अत: आप सभी फर्ज़ भूल रहे हैं। आपको ऐसा लगता है? गया सो गया। जेब में से लाख रुपये कहीं गिर जाए और फिर हाथ न आएँ, तब हमें क्या करना चाहिए? क्या सिर पटकना चाहिए?

प्रश्नकर्ता : उसे भूल जाएँ।

दादाश्री : हाँ, अत: यह सब नासमझी है। सचमुच में कोई भी बाप-बेटे हैं ही नहीं। बेटा मर जाए तब चिंता करने जैसा है ही नहीं। वास्तव में संसार में चिंता करने जैसी हो तो वह माता-पिता की मृत्यु हो, तभी मन में चिंता होनी चाहिए। बेटा मर जाए तो बेटे के साथ हमारा क्या लेना-देना? माता-पिता ने तो हम पर उपकार किया था। माता ने तो हमें नौ महीने पेट में रखा, फिर बड़ा किया। पिता ने पढ़ाई के लिए फीस दी हैं और बहुत कुछ दिया है।

आपको मेरी बात समझ में आती है? इसलिए जब याद आए, तब इतना बोलना कि ‘हे दादा भगवान, यह बेटा आपको सौंप दिया!’ इस से आपको समाधान होगा। आपके बेटे को याद करके उसकी आत्मा का कल्याण हो ऐसा मन में बोलते रहना, आँख में पानी मत आने देना। आप तो जैन थ्योरी (सिद्धांत) समझनेवाले आदमी हो। आप तो जानते हो कि किसी के मर जाने के बाद ऐसी भावना करनी चाहिए कि, ‘उसकी आत्मा का कल्याण हो। हे कृपालुदेव, उसकी आत्मा का कल्याण करो।’ उसके बदले हम मन से ढीले हों यह तो अच्छा नहीं। अपने ही स्वजन को दु:ख में डालें यह अपना काम नहीं। आप तो समझदार, विचारशील और संस्कारी लोग हो, इसलिए जब-जब मृत बेटा याद आए, तब ऐसा बोलना कि, ‘उसकी आत्मा का कल्याण हो। हे वीतराग भगवान, उसकी आत्मा का कल्याण करो।’ ऐसे बोलते रहना। कृपालुदेव का नाम लोगे, दादा भगवान कहोगे तो भी आपका काम होगा। क्योंकि दादा भगवान और कृपालु देव आत्मस्वरूप से एक ही हैं। देह से अलग दिखते हैं। आँखों से अलग दिखते हैं, लेकिन वास्तव में एक ही हैं। इसलिए महावीर भगवान का नाम दोगे, तो भी वही का वही है। ‘उसकी आत्मा का कल्याण हो’ इतनी ही भावना निरंतर हमें रखनी है। हम जिनके साथ निरंतर रहें, साथ में खाया-पीया, तो हम उनका किसी प्रकार कल्याण हो ऐसी भावना करते रहें। हम औरों के लिए अच्छी भावना करते हैं, तो फिर ये तो अपने खुद के लोग, उनके लिए क्यों भावना न करें?

हमने पुस्तकों में लिखा है कि तुझे ‘कल्प’ के अंत तक भटकना पड़ेगा। उसका नाम ‘कल्पांत।’ कल्पांत का अर्थ और किसी ने किया ही नहीं है न? आपने आज पहली बार सुना न?

प्रश्नकर्ता : हाँ, पहली बार सुना।

दादाश्री : अत: इस ‘कल्प’ के अंत तक भटकना पड़ता है और लोग क्या करते हैं? बहुत कल्पांत करते हैं। अरे भाई, कल्पांत का अर्थ पूछ तो सही कि कल्पांत यानी क्या? कल्पांत तो कोई एकाध मनुष्य करता है। कल्पांत तो किसी का इकलौता बेटा हो, उसकी अचानक मृत्यु हो जाए उस स्थिति में कल्पांत हो सकता है।

प्रश्नकर्ता : दादाजी के कितने बच्चे थे?

दादाश्री : एक लड़का और एक लड़की थी। 1928 में पुत्र जन्मा तब मैंने मित्रों को पेड़े खिलाए थे। बाद में 1930 में गुज़र गया। तब मैंने फिर सबको पेड़े खिलाए। पहले तो सबने ऐसा समझा कि दूसरा पुत्र जन्मा होगा, इसलिए पेड़े खिलाते होंगे। पेड़े खिलाए तब तक मैंने स्पष्टीकरण नहीं दिया। खिलाने के बाद मैंने सबसे कहा, ‘वे ‘गेस्ट’ आए थे न, वे गए!’ वे सम्मानपूर्वक आए थे, तो हम उन्हें सम्मानपूर्वक विदा करें। इसलिए यह सम्मान किया। इस पर सभी मुझे डाँटने लगे। अरे, डाँटो मत, सम्मानपूर्वक विदा करना चाहिए।

बाद में ‘बिटिया’ आई थी। उसे भी सम्मानपूर्वक बुलाया और सम्मानपूर्वक विदा किया। इस दुनिया में जो आते हैं, वे सभी जाते हैं। उसके बाद तो घर में और कोई है नहीं, मैं और हीराबा (दादाजी की धर्मपत्नी) दो ही हैं।

(1958 में) ज्ञान होने से पहले हीराबा ने कहा, ‘बच्चे मर गए और अब हमारे बच्चे नहीं हैं, क्या करेंगे हम? बुढ़ापे में हमारी सेवा कौन करेगा?’ उन्हें उलझन हुई! उलझन नहीं होती? तब मैंने उन्हें समझाया, ‘आज-कल के बच्चे आपका दम निकाल देंगे। बच्चे शराब पीकर आएँ, तब आपको अच्छा लगेगा?’ तब उन्होंने कहा, ‘नहीं, वह तो अच्छा नहीं लगेगा।’ तब मैंने कहा, ‘ये आए थे वे गए, इसलिए मैंने पेड़े खिलाए।’ उसके बाद जब उन्हें अनुभव हुआ, तब मुझसे कहने लगी, ‘सभी के बच्चे बहुत दु:ख देते हैं।’ तब मैंने कहा, ‘हम तो पहले ही कह रहे थे, लेकिन आप मानती नहीं थीं।’

जो पराया है, वह कभी अपना हो सकता है? बिना वजह हाय -हाय करना। यह देह जो पराई है, उस देह के वे सगे-संबंधी! यह देह पराई और उस पराई देह की यह सारी संपति। कभी अपनी होती होगी?

प्रश्नकर्ता : क्या करें? इकलौता बेटा है। वह हमसे अलग हो गया है।

दादाश्री : वह तो तीन हों, तो भी अलग हो जाते हैं और अगर वे अलग न हों तो हमें जाना पड़ेगा। फिर चाहे सब इकट्ठे रहें तो भी एक दिन हमें जाना पड़ेगा सबकुछ छोड़कर। छोड़कर नहीं जाना पड़ेगा? तो फिर हाय-हाय किसलिए? पिछले जन्म के बच्चे कहाँ गए? पिछले जन्म के बच्चे कहाँ रहते हैं?

प्रश्नकर्ता : वो तो ईश्वर जाने!

दादाश्री : लो! पिछले जन्म के बच्चों का पता नहीं, इस जन्म के बच्चों के लिए ऐसा हुआ। इन सबका कब निबेड़ा आएगा? मोक्ष में जाने की बात करो न, वर्ना नाहक अधोगति में चले जाओगे। परेशानियों से जब ऊब जाए, तब उससे कौन-सी गति होगी? यहाँ से फिर मनुष्य गति में से किस गति में जन्म होगा? जानवर गति, अति निंदनीय कार्य किए हों तो नर्क गति में भी जाना पड़ सकता है। नर्कगति-पशुगति पसंद है?

एक-एक जन्म में भयंकर मार खाई है, लेकिन पहले की खाई हुई मार भूलता जाता है और नई मार खाता रहता है। पिछले जन्म के बच्चे छोड़ आता है और नये, इस जन्म के बच्चों को गले लगाता है।

14. नाता, रिलेटिव या रिअल?

यह रिलेटिव संबंध है! सँभल-सँभलकर काम लेना है। यह रिलेटिव संबंध है, इसलिए आप जितना रिलेटिव रखेंगे उतना रहेगा। आप जैसा रखेंगे वैसा रहेगा, इसका नाम व्यवहार है।

आप मानते हैं कि बेटा मेरा है, इसलिए कहाँ जानेवाला है? अरे! आपका बेटा है, लेकिन घड़ीभर में विरोधी हो जाएगा। कोई आत्मा बाप-बेटा नहीं होता। यह तो पारस्परिक लेन-देन का हिसाब है। घर जाकर ऐसा मत कहना कि आप मेरे पिता नहीं है। वैसे वे व्यवहार से तो, पिता हैं ही न!

संसार में ड्रामेटिक रहना है। ‘आईए बहन जी’ आओ बेटी,’ ऐसे, यह सब सुपरफल्युअस (ऊपर-ऊपर से) व्यवहार करने का है। तब अज्ञानी क्या करता है कि बेटी को गोदी में बिठाता है, बेटी भी उस पर चिढ़ती है जबकि ज्ञानीपुरुष व्यवहार में सुपरफल्युअस रहते हैं। इसलिए सभी उन पर खुश रहते हैं, क्योंकि लोग सुपरफल्युअस व्यवहार चाहते हैं। ज़्यादा आसक्ति लोगों को पसंद नहीं होती। इसलिए हमें भी सुपरफल्युअस रहना है। इस सब झंझट में पड़ना नहीं है।

ज्ञानी क्या समझते हैं? बेटी की शादी हुई, वह भी व्यवहार और बेटी बेचारी विधवा हुई, वह भी व्यवहार। यह ‘रियल’ नहीं होता। ये दोनों ही व्यवहार हैं, रिलेटिव हैं और किसी से बदला नहीं जा सकता ऐसा है! अब ये लोग क्या करते हैं? दामाद मर जाए, उसके पीछे सिर फोड़ें, तब उल्टा डॉक्टर बुलाना पड़ता है। उल्टा वह राग-द्वेष के अधीन है न! व्यवहार, व्यवहार है ऐसा समझ में आया नहीं है इसीलिए न!

बच्चों को डाँटना पड़े, बीवी को दो शब्द कहने पड़ें तो नाटकीय भाषा में, ठंडा रहकर गुस्सा करना। नाटकीय भाषा यानी क्या कि ठंडे कलेजे से गुस्सा करना। उसे कहते हैं नाटक!

15. वह है लेन-देन, नाता नहीं

बीवी-बच्चे अगर अपने होते न, तब इस शरीर को कितनी भी तकलीफ़ होती तो उसमें से थोड़ी वाइफ ले लेती, ‘अर्धांगिनी’ कहलाती है न! लकवा मार गया हो तो बेटा ले लेगा? नहीं, कोई लेता नहीं। यह तो सब हिसाब है! बाप के पास जितना तुम्हारा माँगने का हिसाब था, उतना ही आपको मिला है।

एक बेटे को उसकी माँ, कुछ गलत नहीं करे तो भी मारती रहती है और एक बेटा बहुत ऊधम मचाता हो, फिर भी उसे लाड़ करती रहती है। पाँचों लड़के उसी माँ के हैं लेकिन पाँचों के प्रति अलग अलग बर्ताव होता है, इसकी क्या वजह?

प्रश्नकर्ता : उनमें से प्रत्येक के कर्म के उदय भिन्न होंगे?

दादाश्री : वह तो हिसाब ही चुक रहा है। माँ को पाँचों लड़कों पर समान भाव रखना चाहिए, लेकिन रहेगा कैसे? और फिर लड़के कहते हैं, मेरी माँ इसका पक्ष लेती है। ऐसे चिल्लाते हैं। इस दुनिया में ऐसे झगड़े हैं।

प्रश्नकर्ता : तो उस लड़के के प्रति उस माँ को ऐसा बैर भाव क्यों होता है?

दादाश्री : वह उसका कुछ पूर्वभव का बैर है। दूसरे लड़के के प्रति पूर्वभव का राग है। इसलिए राग जताती है। लोग न्याय खोजते हैं कि पाँचों लड़के उसके लिए समान क्यों नहीं?

कुछ लड़के अपने माता-पिता की सेवा करते हैं, ऐसी सेवा करते हैं कि खाना-पीना भी भूल जाएँ। सबके लिए ऐसा नहीं है। हमें जो मिला है सब अपना ही हिसाब है। अपने दोष के कारण हम इकट्ठा हुए हैं। इस कलियुग में हम क्यों आए? सत्युग नहीं था? सत्युग में सब सीधे थे। कलियुग में सब टेढ़े मिल आते हैं। बेटा अच्छा हो तो समधी टेढ़ा मिलता है और वह लड़ाई-झगड़े करता रहता है। बहू झगड़ालू मिलती है और झगड़ती ही रहती है। कोई न कोई ऐसा मिल जाता है और घर में लड़ाई-झगड़े चलते ही रहते हैं लगातार।

प्रश्नकर्ता : ‘वनस्पति में भी प्राण हैं’ ऐसा कहते हैं। अब आम का पेड़ हो, उस पेड़ के जितने भी आम हों, उन सभी आमों का स्वाद एक सा होता है, जबकि इन मनुष्यों में पाँच बच्चे हों तो पाँचों बच्चों के विचार-वाणी-वर्तन अलग-अलग, ऐसा क्यों?

दादाश्री : आमों में भी अलग-अलग स्वाद होता है, आपकी समझने की शक्ति नहीं है, लेकिन प्रत्येक आम का अलग-अलग स्वाद, प्रत्येक पत्ते में भी फर्क होता है। एक से दिखते हैं, एक ही प्रकार की सुगंध हो, लेकिन कुछ न कुछ फर्क होता है। क्योंकि इस संसार का नियम ऐसा है कि ‘स्पेस’ (जगह) बदलने से फर्क होता ही है।

प्रश्नकर्ता : आम तौर पर कहते हैं न कि ये सब परिवार होते हैं न, वे एक वंश परंपरा से इकट्ठा होते हैं।

दादाश्री : हाँ, वे सभी हमारी जान-पहचानवाले ही होते हैं। अपना ही सर्कल, सब साथ रहनेवाले, समान गुणवाले हैं, इसलिए राग-द्वेष के कारण वहाँ पर जन्म लेते हैं और हिसाब चुकाने के लिए इकट्ठा होते हैं। वास्तव में आँखों से ऐसा दिखाई देता है, लेकिन वह भ्रांति से हैं जबकि ज्ञान से ऐसा नहीं है।

प्रश्नकर्ता : यह जो जन्म लेनेवाला है, वह अपने कर्मों से जन्म लेता है न?

दादाश्री : निश्चय ही, वह गोरा है या काला है, नाटा है या लंबा है, वह उसके कर्मों से हैं। यह तो लोगों ने इन आँखो से देखा कि बेटे की नाक तो एक्ज़ेक्ट वैसी ही दिखती है, इसलिए पिता के गुण ही पुत्र में उतरे हैं। तब बाप संसार में कृष्ण भगवान हुए, तो क्या बेटा भी कृष्ण भगवान हो गया? ऐसे तो कईं कृष्ण भगवान हो गए। सभी प्रकट पुरुष कृष्ण भगवान ही कहलाते हैं। लेकिन उनका एक भी पुत्र कृष्ण भगवान हुआ? अत: यह तो नासमझी की बातें हैं!!

अगर पिता के गुण पुत्र में आते हों, तब तो सभी बच्चों में समान रूप से आने चाहिए। यह तो पिता के जो पूर्व जन्म के पहचानवाले हैं, सिर्फ उनके गुण मिलते हैं। आपकी पहचानवाले सब कैसे होते हैं? आपकी बुद्धि से मिलते हैं, आपके आशय से मिलते हैं। जो आपसे मिलते-जुलते हों, वे इस जन्म में फिर बच्चे होंगे। अर्थात् उनके गुण आपसे मिलते हैं, लेकिन वास्तव में तो उनके अपने गुण ही धारण करते हैं। साइन्टिस्टों (वैज्ञानिकों) को ऐसा लगता है कि ये गुण परमाणु में से आते हैं लेकिन वह तो अपने खुद के ही गुण धारण करता है। फिर कोई बुरा, नालायक हो तो शराबी भी निकलता है। क्योंकि जैसे जैसे संयोग उसने जमा किए हैं, ऐसा ही होता है। किसी को विरासत में कुछ भी नहीं मिलता। अर्थात् विरासत सिर्फ दिखावा है। शेष, पूर्वजन्म में जो उनकी पहचानवाले थे, वे ही आए हैं।

प्रश्नकर्ता : यानी जो हिसाब चुकाने हैं, ऋणानुबंध चुकाने हैं, वे हिसाब चुकने के बाद पूरे हो जाते हैं?

दादाश्री : हाँ, वे सभी चुक जाते हैं। इसलिए मुझे यहाँ पर यह विज्ञान खोलना पड़ा कि अरे! उसमें बाप का क्या दोष है? तू क्रोधी, तेरा बाप क्रोधी, लेकिन यह तेरा भाई ठंडा क्यों है? अगर तुझ में तेरे बाप का गुण उत्पन्न हुआ हो तो तेरा यह भाई ठंडा क्यों है? यह सब नहीं समझते, इसलिए लोग बिना वजह झंझट करते हैं और जो ऊपर से दिखाई देता है, उसे ही सत्य मानते हैं। बात गहराई से समझने लायक है। यह जो मैंने बताई उतनी ही नहीं है, यह तो बहुत गहन बात है! ये तो हिसाब से ही लेते हैं और चुकाए जा रहे हैं!

आत्मा किसी का बेटा नहीं होता और न ही किसी का पिता होता है। आत्मा किसी की पत्नी नहीं होता, न ही किसी का पति होता है। ये सब ऋणानुबंध हैं। कर्म के उदय से एकत्र हुए हैं। अभी (इस जन्म में) लोगों को यह प्रतीति होती है। लेकिन हमें भी यह प्रतीति हो रही है और यह सिर्फ प्रतीति होती है इतना ही, वास्तव में दृश्यमान भी नहीं होता। वास्तविक होता न, तो कोई लड़ता ही नहीं। यह तो एक घंटे में ही झमेला हो जाता है, मतभेद हो जाता है, तब लड़ पड़ते हैं या नहीं लड़ पड़ते? ‘मेरी-तेरी’ करते हैं या नहीं करते?

प्रश्नकर्ता : करते हैं।

दादाश्री : इसलिए सिर्फ आभास है न, ‘एक्ज़ेक्ट’ (वास्तविक) नहीं है। कलियुग में आशा मत करना। कलियुग में आत्मा का कल्याण हो ऐसा करो, वर्ना समय बहुत विचित्र आ रहा है, आगे भयावह विचित्र समय आ रहा है। अब के बाद के हज़ार साल अच्छे हैं, लेकिन तत्पश्चात् भयावह काल आनेवाला है। फिर कब मौका मिलेगा? इसलिए हम आत्मार्थ कुछ कर लें।

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बच्चों का माँ-बाप के प्रति व्यवहार (उतरार्ध)

16. ‘टीनेजर्स’ (युवा उम्रवालों) के साथ ‘दादाश्री’
प्रश्नकर्ता : आदर्श विद्यार्थी के जीवन में किन-किन लक्षणों की ज़रूरत है?

दादाश्री : विद्यार्थी को घर के जितने व्यक्ति हों, उन सबको खुश रखने की ज़रूरत है और फिर स्कूल में जिन लोगों के साथ हों, अपने जो टीचर हों, उन सबको खुश रखने की ज़रूरत है। हम जहाँ जाए, वहाँ सबको खुश रखना चाहिए और अपनी पढ़ाई में भी ध्यान लगाना चाहिए।

दादाश्री : आपने कभी जीव-जंतु मारे थे?

प्रश्नकर्ता : हाँ।

दादाश्री : कहाँ मारे थे?

प्रश्नकर्ता : बगीचे में, पीछे आंगन में।

दादाश्री : कौन-से जंतु थे? कोक्रोच वगैरह थे?

प्रश्नकर्ता : सभी को मारा था।

दादाश्री : मनुष्य के बच्चे को मार डालता है क्या?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : किसी के बच्चे को नहीं मारते? यह किसी का बच्चा हो तो मार नहीं सकते?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : ऐसा क्यों? अब तूने जिस जीव को मारा, वैसा एक तू मुझे बनाकर देगा? लाख रुपये इनाम दूँगा। यदि कोई एक जीव बनाकर देगा, तो उसे लाख रुपये इनाम दूँगा। तू बना देगा? नहीं बनेगा?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : तब फिर हम कैसे मार सकते हैं? क्या इस दुनिया में कोई एक भी जीव बना सकता है? ये साइन्टिस्ट बना सकते हैं?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : तो फिर जो बना सकते नहीं, उसे हम नहीं मार सकते। यह कुर्सी बनाते हैं, ये सब चीज़ें बनाते हैं, उसका नाश कर सकते हैं। तेरी समझ में आया?

प्रश्नकर्ता : हाँ।

दादाश्री : अब क्या करेगा?

प्रश्नकर्ता : किसी को नहीं मारूँगा।

दादाश्री : उस जीव को मरने का डर लगता है? हम मारने जाएँ तो भागता है?

प्रश्नकर्ता : हाँ।

दादाश्री : तो फिर कैसे मार सकते हो? और इस गेहूँ, बाजरा को भय नहीं लगता, उसे हर्ज नहीं, क्या? गेहूँ, बाजरा, लौकी ये सब भागते हैं क्या? हम चाकू लेकर जाए तो लौकी भाग जाती है?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : तब उसकी सब्ज़ी बनाकर खा सकते हैं। तुझे मरने का डर लगता है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : लगता है।

दादाश्री : हाँ, तब ऐसा उसे भी लगता है।

अणहक्क (बिना हक का) गड्ढा तो बहुत गहरा! फिर से ऊपर आ ही नहीं सकते। इसलिए चौकन्ना रहकर चलना अच्छा। इसलिए तू सँभल जाना। अभी तो जवानी है, जिसे बुढ़ापा आनेवाला हो, उन्हें हम कुछ नहीं कहते। यह भय सिग्नल तुझे दिखाते हैं।

प्रश्नकर्ता : हाँ, हाँ, नहीं ले जाऊँगा, दूसरे की बीवी नहीं ले जाऊँगा।

दादाश्री : हाँ, ठीक है। ले जाने की सोचना भी मत किसी स्त्री के प्रति आकर्षण हो तो भी ‘हे दादा भगवान! मुझे क्षमा करो’ कहना।

बच्चों के लिए माता-पिता को क्या करना चाहिए? बच्चे बाहर कहीं मान नहीं खोजे ऐसा रखना। वे मान के भूखे नहीं हों और बाहर मान की होटलों में मान खाने नहीं जाएँ। इसके लिए क्या करना? घर आए तो ऐसे बुलाना, ‘बेटा, तू तो बड़ा सयाना है, ऐसा है, वैसा है,’ उसे थोड़ा सम्मान देना अर्थात् उसके साथ फ्रेन्डशिप (मित्रता) जैसा भाव रखना चाहिए। उसके साथ बैठकर उसके सिर पर हाथ फिरा और कहना, ‘बेटे, चलो हम खाना खा लें, हम साथ में नाश्ता करें’ ऐसा होना चाहिए। तब वह बाहर प्रेम नहीं खोजेगा। हम तो पाँच साल का बच्चा हो, उसके साथ भी प्रेम रखते हैं। उसके साथ फ्रेन्डशिप रखते हैं।

प्रश्नकर्ता : पापा या मम्मी मेरे पर गुस्सा करें तब क्या करूँ?

दादाश्री : ‘जय सच्चिदानंद, जय सच्चिदानंद’ बोलना। ऐसा बोलोगे न, तो वह शांत हो जाएगी।

पापा, मम्मी के साथ झगड़ा करने लगें, तब बच्चे सभी ‘सच्चिदानंद, सच्चिदानंद’ कहें तो इससे सब बंद हो जाए। दोनों शर्मा जाएँगे बेचारे! भय का अलार्म खींचे तो तुरंत बंद हो जाते हैं।

अब घर के सभी लोगों को तेरे कारण आनंद हो, ऐसा रखना। तुझे इनके कारण दु:ख हो तो उसका समभाव से निबटारा करना और तुझ से उन सबको आनंद हो ऐसा रखना। फिर उन लोगों का प्रेम देखना तू, कैसा प्रेम है? यह तू प्रेम ब्रेकडाउन कर (तोड़) डालता है। उन लोगों का प्रेम हो और उस पर तू पत्थर डालता रहे तो सारा प्रेम टूट जाएगा।

प्रश्नकर्ता : बुज़ुर्ग ही क्यों ज़्यादा गरम हो जाते हैं?

दादाश्री : यह तो गाड़ी खटारा हो गई हो, गाड़ी पुरानी हो गई हो तब रोज़ गरम हो जाती है। अगर नयी गाड़ी हो तो गरम नहीं होती। इसलिए बुज़ुर्ग बेचारों को क्या ...(उम्र होने के कारण नई पीढ़ी के साथ एडजस्टमेन्ट नहीं ले पाते और टकराव होता रहता है।)

गाड़ी गरम हो जाए तो उसे हमें ठंडी नहीं करनी पड़ती? बाहर किसी के साथ कुछ अनबन हो गई हो, रास्ते में पुलिसवाले के साथ, तब चेहरा इमोशनल (भावुक) हो जाए, तब आप चेहरा देखो तो क्या कहोगे? ‘आपका मुँह जब देखो तब उतरा हुआ रहता है, हमेशा लटका हुआ।’ ऐसा नहीं बोलना चाहिए। हमें समझ लेना है कि किसी परेशानी में हैं। इसलिए फिर हम यों ही गाड़ी को ठंडा करने के लिए नहीं रोकते?

बुज़ुर्गों की सेवा करना तो सबसे बड़ा धर्म है। युवाओं का धर्म क्या? तब कहे, बुज़ुर्गों की सेवा करना। पुरानी गाड़ी को धकेलकर ले जाना और तभी जब हम बूढ़े हों जाएँगे, तब हमें भी धकेलनेवाले मिलेंगे। यह तो देकर लेना है। हम वृद्धों की सेवा करें तो हमारी सेवा करनेवाले युवा आ मिलेंगे और हम वृद्धों को धमकाते फिरें तो हमें धमकानेवाले आ मिलेंगे। फिर आपको जो करना हो, करने की छूट है।

17. पत्नी का चुनाव
जो योजना बनी है, उसमें कोई परिवर्तन होनेवाला नहीं है! जो शादी करने की योजना हुई है और अभी हम तय करें कि मुझे शादी नहीं करनी है तो वह अर्थहीन बात है। उसमें आपका कुछ चलेगा नहीं और शादी तो करनी ही पड़ेगी।

प्रश्नकर्ता : इस जन्म में हमने जो भावना की हो, वह अगले जन्म में फलेगी न?

दादाश्री : हाँ, इस जन्म में भावना करें तो अगले जन्म में फलती है। लेकिन अभी तो उससे बच ही नहीं सकते! वर्तमान में उसमें किसी का नहीं चलता न! भगवान भी रोकने जाएँ कि शादी मत करना, तब भगवान की भी वहाँ पर नही चलेगी! पिछले जन्म में शादी करने की योजना की ही नहीं, इसीलिए शादी का संयोग नहीं आता। जो योजना की होगी वही आएगी।

जैसे संडास गए बिना किसी को नहीं चलता, वैसे ही शादी किए बिना चले ऐसा नहीं है! तेरा मन कुँआरा है, तो हर्ज नहीं है। लेकिन जहाँ मन शादी-शुदा है, वहाँ शादी किए बिना नहीं चलता और किसी के सहारे के बिना मनुष्य नहीं रह सकता। सहारे के बिना कौन रह सकता है? सिर्फ ‘ज्ञानीपुरुष’ ही। जहाँ दूसरा कोई नहीं हो, वहाँ भी। क्योंकि खुद निरालंब हुए हैं। किसी अवलंबन की उन्हें ज़रूरत ही नहीं है।

मनुष्य बेचारे बिना सहारे के नहीं जी सकते। बीस लाख रुपये का बड़ा बंगला हो और रात को अकेले सोने को कहें तो? उसे सहारा चाहिए। मनुष्यों को सहारा चाहिए, इसलिए तो शादी करते हैं न! शादी की प्रणाली कुछ गलत नहीं है। यह तो कुदरत का नियम है।

इसलिए शादी करने में सहज प्रयत्न रखना, मन में भावना रखना कि अच्छी जगह शादी करनी है, फिर वह स्टेशन आने पर उतर जाना।

स्टेशन आने से पहले दौड़-धूप करें तो क्या हो? तुझे पहले दौड़-धूप करनी है?

प्रश्नकर्ता : नहीं, स्टेशन आए तब।

दादाश्री : हाँ, स्टेशन को अपनी गर्ज है और हमें स्टेशन की गर्ज है। ‘हम’ (दादाजी को) अकेले को ही स्टेशन की गर्ज नहीं। स्टेशन को भी हमारी गर्ज है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : आपके संघ में सम्मिलित होनेवाले युवक-युवतियाँ शादी के लिए मना करें, तब आप उन्हें अकेले में क्या उपदेश देते हैं?

दादाश्री : मैं अकेले में उन्हें शादी करने को कह देता हूँ कि भाई, आप शादी करोगे तो थोड़ी-बहुत लड़कियाँ ठिकाने लग जाएगी। मुझे तो आप शादी करके आओ तो भी कोई परेशानी नहीं है। यह हमारा मोक्ष मार्ग शादी-शुदा लोगों के लिए है। मैं तो उन्हें कहता हूँ कि शादी करो तो लड़कियाँ कम हों और शादी करने से यहाँ मोक्ष रुके ऐसा नहीं है।

लेकिन उन्होंने क्या पता लगाया कि शादी करने से झंझट बहुत होती है। वे कहते हैं, ‘हमने अपने माता-पिता का सुख (!) देखा है। इसलिए वह सुख (!) हमें अच्छा नहीं लगता।’ यानी वे ही माता-पिता के सुख का प्रमाण देते हैं। आजकल माता-पिता के लड़ाई-झगड़े बच्चे घर में देखते ही है और उनसे ऊब गए होते हैं।

लड़के पर दबाव मत डालना वर्ना आपके सिर पर आएगा कि मेरे पिता ने बिगाड़ा। उन्हें चलाना नहीं आता उससे बिगड़ता है और नाम हमारा आता है।

उसे बुलाकर कहना, ‘हमें लड़की पसंद आई है, अब तुझे पसंद हो तो बोल और पसंद नहीं हो, तो हम रहने दें।’ तब यदि वह कहे, ‘मुझे पसंद नहीं,’ तो उसे रहने दो। लड़के के पास स्वीकृति अवश्य करवाना, वर्ना बेटा भी विरुद्ध हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : यह लव मेरिज पाप गिना जाता है?

दादाश्री : नहीं, टेम्पररी लव मैरिज हो तो पाप मानी जाएगी। परमानेन्ट लव मेरिज हो तो नहीं। अर्थात् लाइफ लोंग लव मेरिज हो तो हर्ज नहीं। टेम्परेरी लव मेरिज अर्थात् एक-दो साल के लिए। ब्याहना हो तो एक को ही ब्याहना चाहिए। पत्नी के अलावा और किसी से फ्रेन्डशिप बहुत नहीं करनी चाहिए वर्ना नर्क में जाना पड़ेगा।

पहले जब पिताजी ने कहा कि, ‘यह लफड़ा क्यों करने लगा है?’ तब बेटा उल्टा-सीधा बोलने लगा। इसलिए उसके पिता ने समझा कि ‘उसे अपने आप अनुभव होने दो! हमारा अनुभव लेने को तैयार नहीं है। तब उसे अपना अनुभव होने दो।’ वह उसे दूसरों के साथ देखेगा न! तब अनुभव होगा! तब पछताएगा कि पिताजी कहते थे, वह बात सही है। यह तो लफड़ा ही है।

प्रश्नकर्ता : मोह और प्रेम की भेदरेखा क्या है?

दादाश्री : यह पतंगा है न। पतंगा दीपक के पीछे पड़कर ‘या होम’ हो जाता है न? वह अपनी जिंदगी खत्म कर देता है। यह ‘मोह’ कहलाता है। जबकि प्रेम हमेशा टिकता है, यद्यपि उसमें भी थोड़ी आसक्ति के दर्द होते हैं। जो मोह होता है, वह टिकाऊ नहीं होता।

यहाँ बारह महीने तक इतना सा फोड़ा हो जाए न, तो मुँह भी नहीं देखता, मोह छूट जाता है। यदि सच्चा प्रेम हो तो एक फोड़ा तो क्या, दो फोड़े हों तो भी प्रेम नहीं जाता है। इसलिए ऐसा प्रेम ढूँढ निकालना। वर्ना शादीही मत करना। नहीं तो फँस जाओगे। वह मुँह चढ़ाएगी तब कहोगे, ‘मुझे इसका मुँह देखना अच्छा नहीं लगता।’ जब देखा तब अच्छा लगा था, इसलिए तो तुझे पसंद आया था और अब यह पसंद नहीं? यह तो मीठा बोलते हो, तब तक पसंद आता है और कड़वा बोले तो कहे, ‘मुझे तेरे साथ अच्छा नहीं लगता।’

प्रश्नकर्ता : ‘डेटिंग’ शुरू हो गई हो, अब उसे कैसे बंद करें?

दादाश्री : बंद कर देना। इसी वक्त तय करो कि यह बंद कर देना है। हम कहें कि यहाँ तू छला जा रहा हैं, तो फिर छला जाना बंद कर दे। नये सिरे से ठगे जाना बंद। जब जागे तब सवेरा। जब समझ में आया कि यह गलत हो रहा है तो बंद कर देना चाहिए।

वाइल्ड लाइफ (असंस्कृत जीवन) नहीं होनी चाहिए, इन्डियन लाइफ (संस्कृत जीवन) होनी चाहिए।

आप अच्छे होगे तब आपको पत्नी भी अच्छी मिलेगी। वही ‘व्यवस्थित,’ जो एक्ज़ेक्ट होता है।

प्रश्नकर्ता : कोई भी लड़की चलेगी। मैं कलर-वलर में नहीं मानता। जो लड़की अच्छी हो, अमरीकन हो या इन्डियन, तो भी हर्ज नहीं।

दादाश्री : लेकिन ऐसा है न, इन अमरीकन आमों और हमारे आमों में फर्क होता है, यह तू नहीं जानता? क्या फर्क होता है हमारे आमों में?

प्रश्नकर्ता : हमारे मीठे होते हैं।

दादाश्री : हाँ, तब फिर देखना। वह मीठे चखकर तो देख, हमारे इन्डिया के।

प्रश्नकर्ता : अभी चखा नहीं।

दादाश्री : नहीं, लेकिन इसमें फँसना नहीं! अमरीकन में फँसने जैसा नहीं है। देख, तेरी मम्मी और पापा को तूने देखा न? उन दोनों में कभी मतभेद होता है या नहीं होता?

प्रश्नकर्ता : मतभेद तो होता है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन उस वक्त तेरी मम्मी घर छोड़कर चली जाती है कभी?

प्रश्नकर्ता : नहीं, नहीं।

दादाश्री : और वह अमरीकन तो ‘यू यू’ करती यों बंदूक दिखाकर चली जाती है और यह तो पूरा जीवन रहती है। इसलिए हम तुझे समझाते हैं कि भाई, ऐसा मत करना, इस तरफ मुड़ने के बाद पछताओगे। यह इन्डियन तो आखिर तक साथ रहती है, हाँ... रात को झगड़ा करके सवेरे तक रिपेयर हो जाती है।

प्रश्नकर्ता : बात सही है।

दादाश्री : इसलिए अब तय कर ले कि मुझे भारतीय लड़की के साथ शादी करनी है। इन्डियन में तुझे जो पसंद हो वह, ब्राह्मण, बनिया जो तुझे अच्छी लगे, उसमें हर्ज नहीं।

प्रश्नकर्ता : अपनी बिरादरी में ही शादी करने के क्या लाभ हैं, यह ज़रा बताइए।

दादाश्री : खुद की कम्युनिटी की पत्नी हो तो आपके स्वभाव के अनुकूल होगी। कंसार परोसा हो तो आपको घी ज़्यादा चाहिए। यदि किसी ऐसी जाति की लड़की लाया, तो वह परोसेगी नहीं, ऐसा नीचा हाथ करके डालने में ही उसके हाथ दु:खेंगे। इसलिए उसके भिन्न स्वभाव के साथ सारा दिन टकराव होता रहेगा और अपनी जातिवाली के साथ ऐसा कुछ नहीं होगा। समझ में आया न? वह दूसरी तो भाषा बोले न, तो वह भी बड़ी सफाई के साथ बोलती है और हमारा दोष निकालती है कि ‘तुम्हें बोलना नहीं आता।’ उसकी तुलना में हमारी अच्छी कि कुछ कहेगी तो नहीं, डाँटेगी तो नहीं।

प्रश्नकर्ता : आप कहते हैं कि अपनी जाति की हो वहाँ झगड़ा नहीं होता, लेकिन अपनी जाति की हो, वहाँ पर भी झगड़ा होता है, इसकी क्या वजह है?

दादाश्री : झगड़ा होता है मगर उसका समाधान हो जाता है। उसके साथ सारा दिन अच्छा लगता है और दूसरी के साथ अच्छा नहीं लगता। एकाध घंटा अच्छा लगता है और फिर ऊब जाते हैं।

वह आए और झुंझलाहट आती है। अपनी जाति की हो तो पसंद आती है, वर्ना पसंद ही नहीं आती। ये सब जो पछताए हैं, उनके उदाहरण बता रहा हूँ। ये सब लोग बुरी तरह फँस गए थे। अब तो अंतरजातीय शादी करने में हर्ज नहीं है, पहले थोड़ी तकलीफ थी।

प्रश्नकर्ता : अपने हाथ में कहाँ है? अपने हाथ में नहीं है न, अमरीकन पत्नी आएगी या नहीं?

दादाश्री : हाथ में नहीं, फिर भी ऐसे अनदेखी थोड़े ही कर सकते हैं? कहना तो पड़ेगा न, ‘एय! उस अमरीकन लड़की के साथ तू मत घूमना! अपना काम नहीं है।’ ऐसे कहते रहें तब अपने आप ही असर होगा। वर्ना वह समझेगा कि इसके साथ घूमते हैं, वैसे ही उसके साथ भी घूमें। कहने में क्या हर्ज है? यदि मुहल्ला खराब हो, तब वहाँ बोर्ड लगाते हैं, ‘बिवेयर ऑफ थीव्स’ (चोरों से सावधान) ऐसा क्यों करते हैं? कि जिन्हें सँभलना हो वह सँभले। ये शब्द, काम आते हैं या नहीं आते?

पितृपक्ष कुल कहलाता है और मातृपक्ष को जाति कहते हैं। जाति कुल का मिश्रण हो तो संस्कार आते हैं। सिर्फ जाति हो और कुल नहीं हो तब भी संस्कार नहीं होते। सिर्फ कुल हो, जाति नहीं हो तब भी संस्कार नहीं होते। जाति और कुल दोनों का मिश्रण, एक्ज़ेक्टनेस हो तभी संस्कारी लोग जन्म लेते हैं। ये दोनों पक्ष अच्छे जमा हुए हों तो बात आगे बढ़ाना, दूसरी बातों में मज़ा नहीं है।

अत: माता जातिवान होनी चाहिए और पिता कुलवान होना चाहिए। उनकी संतान बहुत उमदा होगी। जाति में विपरीत गुण नहीं होते और पिता में कुलवान प्रजा के गुण होते हैं। कुलवाले आराम से दूसरों के लिए घिस जाते हैं। लोगों के लिए घिस जाते हैं, बहुत ऊँचा कुलवान कौन? दोनों ओर से नुकसान सहन करे। आते समय भी खर्च करे और जाते समय भी खर्च करे। वर्ना संसार के लोग कैसे कुलवान हैं? लेते समय पूरा लेते हैं लेकिन देते समय थोड़ा ज़्यादा देते हैं, तोलाभर ज़्यादा। लोग चालीस तोला दें, लेकिन खुद इकतालीस तोला देता है। डबल कुलवान कौन? खुद उनतालीस तोला लेता है, एक तोलाभर वहाँ कम लेता है और देते समय एक तोलाभर ज़्यादा देता है, वह डबल कुलवान कहलाते हैं। दोनों तरफ से नुकसान उठाते हैं अर्थात् वहाँ पर कम क्यों लेते हैं? वह उनकी जातिवाला दु:खी है, उसका दु:ख दूर करने के लिए! यहाँ भी अच्छी भावना, वहाँ भी अच्छी भावना। मैं ऐसे लोगों को देखता तब क्या कहता था, ये द्वापरयुगी आए।

अब उच्च कुल हो और कुल का अहंकार करे, तो दूसरी बार उसे निम्न कुल मिलता है और नम्रता रखे तो उच्च कुल में जाता हैं। यह अपनी ही शिक्षा है, अपनी ही फसल है। वे गुण प्राप्त नहीं करने पड़ते, सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। वहाँ उच्च कुल में जन्म होने पर, जन्म से ही सभी अच्छे संस्कार प्राप्त होते हैं।

ये सभी व्यवहार में काम की बातें हैं, ये ज्ञान की बातें नहीं हैं। व्यवहार में ज़रूरत है न!

प्रश्नकर्ता : दादाजी, आपने ठीक कहा है। ज्ञान की चोटी तक पहुँचने तक हम व्यवहार में हैं, तो व्यवहार में ये ज्ञान की बातें भी काम में आती हैं न?

दादाश्री : हाँ, काम में आती हैं न! व्यवहार भी अच्छा चलता है। ‘ज्ञानीपुरुष’ में विशेषता होती है। ‘ज्ञानीपुरुष’ के पास बोधकला और ज्ञानकला दोनों कलाएँ होती हैं। बोधकला सूझ से उत्पन्न हुई है और ज्ञानकला ज्ञान से उत्पन्न हुई है इसलिए वहाँ (ज्ञानीपुरुष के पास) पर हमारा निराकरण आ जाता है। किसी दिन ऐसी बातचीत की हो तो उसमें क्या हर्ज? इसमें हमारा क्या नुकसान है? ‘दादा’ भी बैठे होते हैं, उनकी कोई फीस नहीं होती। फीस हो तो हर्ज हो।

प्रश्नकर्ता : युवक और युवतियाँ विवाहित जीवन में प्रवेश करने से पहले स्त्री अथवा पुरुष को किस प्रकार पसंद करें और क्या करें? क्या देखें? गुण किस प्रकार देखें?

दादाश्री : वह ज़्यादा देखने की ज़रूरत नहीं हैं। युवक-युवतियाँ शादी के वक्त देखने जाएँ और आकर्षण नहीं हो तो बंद रखना। और कुछ भी देखने की ज़रूरत नहीं है। आकर्षण होता है या नहीं, इतना ही देखना।

प्रश्नकर्ता : किस प्रकार का आकर्षण?

दादाश्री : इन आंखों का आकर्षण होता है, भीतर आकर्षण होता है। बाज़ार में तुम्हें कोई चीज़ खरीदनी हो, तब उस चीज़ का एट्रेक्शन (आकर्षण) नहीं हो तो आप खरीद नहीं सकते। अर्थात् उसका हिसाब हो तभी आकर्षण होता है। कुदरत के हिसाब के बगैर कोई विवाह नहीं हो सकता। अत: आकर्षण होना चाहिए।

यह मज़ाक करने का युग है। इसलिए स्त्रियों का मज़ाक हो रहा है। लड़की देखने जाता है, तब बेटा कहता है... ऐसे घूमो, वैसे घूमो। इतना मज़ाक!

आजकल तो लड़के लड़कियों को पसंद करने से पहले बहुत मीन मेख निकालते हैं। ‘बहुत लंबी है, बहुत छोटी है, बहुत मोटी है, बहुत पतली है, ज़रा काली है’ एक बेटा ऐसा कह रहा था, तो मैंने उसे धमकाया। मैंने कहा, ‘तेरी माँ भी बहू बनी थी। तू किस प्रकार का आदमी है?’ स्त्रियों का ऐसा घोर अपमान!

अगर लोग मुझसे कहें कि जाइए, आपको इजाज़त है, आपको इस बेटे को जो कहना हो कहिए। वह लड़का भी कहे कि मुझे जो कहना चाहें कहिए, तब मैं कहूँगा कि भाई, ‘यह लड़की भैंस हैं क्या, जो इस तरह देख रहा है? भैंस को चारों ओर से देखना पड़ता है, इस लड़की को भी?

अब स्त्रियाँ इसका बदला कब लेती है, यह जानते हो? यह मज़ाक किया उसका? इसका परिणाम लड़कों को क्या मिलेगा बाद में?

यह तो स्त्रियों की संख्या ज़्यादा है, इसलिए बेचारियों के दाम घट गए हैं। कुदरत ही ऐसा करवाती है। अब इसका रिएक्शन कब आएगा? बदला कब मिलेगा? जब स्त्रियों की संख्या कम हो जाती है और पुरुषों की बढ़ जाती है, तब स्त्रियाँ क्या करती हैं? स्वयंवर! अर्थात् वह ब्याहनेवाली एक और ये एक सौ बीस पुरुष। स्वयंवर में सभी साफ़ा-वाफा पहनकर टाईट होकर आते हैं और मूँछो पर ऐसे ताव देते हैं! उसकी राह देखते हैं कि कब मुझे वरमाला पहनाए! वह देखते-देखते आती है। यह समझता है कि मुझे पहनाएगी, ऐसे गरदन भी आगेकरता है लेकिन वह घास ही नहीं डालती न! फिर जब उसका दिल अंदर से किसी के प्रति एकाकार हो, आकर्षण हो, उसे वरमाला पहनाती है। फिर चाहे वह मूछों पर ताव दे रहा हो या नहीं! वहाँ फिर मज़ाक उड़ती है। बाकी सारे मूरख बनकर चले जाते हैं फिर, ऐसे-ऐसे करके। तब ऐसा मज़ाक हुआ, इस तरह बदला मिलता है!

आजकल तो बिल्कुल सौदेबाजी हो गई है, सौदेबाजी! प्रेम कहाँ रहा, सौदेबाजी ही हो गई! एक ओर रुपये रखो और एक ओर हमारा लड़का, तभी शादी होगी ऐसा कहते हैं। एक तराजू में रुपये रखने पड़ते थे, तराजू के तोल पर नापते थे।

18. पति का चयन
परवशता, निरी परवशता! जहाँ देखो वहाँ परवश! पिता सदा के लिए अपने घर में बेटी को रखते नहीं हैं। कहते हैं, ‘वह उसके ससुराल में ही शोभा देती है’ और ससुराल में तो सब सिर्फ डाँटने के लिए बैठे होते हैं। तू भी सास से कहती है कि ‘माजी, आपका मैं क्या करूँ? मुझे तो सिर्फ पति चाहिए था?’ लेकिन नहीं, पति अकेला नहीं आता, साथ में लश्कर आएगा ही। लाव-लश्कर समेत।

शादी करने में हर्ज नहीं है। शादी करना लेकिन सोच-समझकर शादी करो कि ‘ऐसा ही निकलनेवाला है।’ ऐसा समझकर बाद में शादी करो।

कोई ऐसे भाव करके आई हो कि ‘मुझे दीक्षा लेनी है अथवा मुझे ब्रह्मचर्य पालन करना है’ तो बात अलग है। बाकी शादी से तो छुटकारा ही नहीं। परंतु पहले से तय करके शादी करें न कि, आगे ऐसा होनेवाला है तो झंझट नहीं होगा, अचरज नहीं होगा। तय करके प्रवेश करना है सुख ही है, ऐसा मानकर, तब फिर सिर्फ परेशानी ही महसूस होगी! शादी तो दु:ख का समंदर है। सास के घर में दाखिल होना कोई आसान बात है? अब संयोग से ही कहीं पति अकेला होता है, यदि उसके माता-पिता का निधन हो गया हो तो।

जो सिविलाइज्ड (संस्कारी) हैं, वे लड़ते नहीं। रात को दोनों सो जाते हैं, झगड़ा नहीं करते। जो अनसिविलाइज्ड (असंस्कारी) हैं न, वे लोग झगड़ा करते हैं, क्लेश करते हैं।

प्रश्नकर्ता : अब हम अमरीकन लड़कों के साथ पार्टी में नहीं जाते। क्योंकि उस पार्टी में खाना-पीना सब होता है। इसलिए हम उन लोगों की पार्टी में नहीं जाते, लेकिन ‘इन्डियन’ लड़के जो पार्टी रखते हैं, उसमें जाते हैं और एक दूसरे के मम्मी-पापा सबको पहचानते हैं।

दादाश्री : लेकिन इसमें फायदा क्या मिलेगा?

प्रश्नकर्ता : एन्जॉयमेन्ट, मज़ा आता है।

दादाश्री : एन्जॉयमेन्ट! खाने में बहुत एन्जॉयमेन्ट होता है लेकिन खाने में क्या करना चाहिए? उसे कंट्रोल करना चाहिए कि तो ‘भाई, तुझे इतना ही मिलेगा।’ फिर वह धीरे धीरे एन्जॉय करते करते खाते हैं। यह तो ज़्यादा छूट देते हैं न, इसलिए एन्जॉय नहीं करते। किसी दूसरी जगह एन्जॉयमेन्ट खोजते हैं। इसलिए भोजन में पहले कंट्रोल करना चाहिए कि अब इतना ही मिलेगा, ज़्यादा नहीं मिलेगा।

प्रश्नकर्ता : हम हमारे लड़के-लड़कियों को ऐसी ‘पार्टियों’ में जाने दें? ऐसी पार्टियों में साल में कितनी बार जाने दें?

दादाश्री : ऐसा है न, लड़कियों को उनके माता-पिता के कहने के मुताबिक चलना चाहिए। हमारे अनुभवियों की खोज है कि लड़कियों को सदैव उनके माता-पिता के कहने के अनुसार चलना चाहिए। शादी के बाद पति के कहे अनुसार चलना चाहिए। अपनी मर्ज़ी के अनुसार नहीं करना चाहिए। ऐसा हमारे जानकारों का कहना है।

प्रश्नकर्ता : बेटों को माता-पिता के कहने के अनुसार करना चाहिए या नहीं?

दादाश्री : बेटों को भी माता-पिता के कहने के अनुसार चलना है, लेकिन लड़कों के लिए थोड़ी ढील रखो तो चलेगा! क्योंकि बेटे को रात बारह बजे जाने को कहो तो अकेला जाए, तो हर्ज नहीं, किन्तु तुझे रात बारह बजे अकेली जाने को कहा हो तो अकेली जाएगी?

प्रश्नकर्ता : नहीं जाऊँगी, डर लगता है।

दादाश्री : और बेटा हो तो हर्ज नहीं, बेटे को छूट ज़्यादा होनी चाहिए और बेटियों को छूट कम होनी चाहिए, क्योंकि आप बारह बजे नहीं जा सकतीं।

अर्थात् यह आपके भविष्य के सुख की खातिर कहते हैं। भविष्य के सुख के लिए ये आपको मना करते हैं। अभी आप इस झंझट में पड़ोगी न, तो भविष्य बिगाड़ दोगी। आपका भविष्य का सुख चला जाएगा। इसलिए भविष्य नहीं बिगड़े इस कारण आपको कहते हैं कि ‘बिवेयर, बिवेयर बिवेयर (सावधान, सावधान, सावधान)।’

प्रश्नकर्ता : हमारी हिन्दू फेमिली (परिवार) में कहते हैं, ‘बेटी पराए घर चली जाएगी और बेटा कमाकर खिलाएगा या हमारा सहारा बनेगा।’ ऐसी अपेक्षाएँ हों, ऐसी दृष्टि रखें और बेटी के प्रति परिवारवाले प्रेम न रखें तो वह ठीक है?

दादाश्री : प्रेम नहीं रखते, यह शिकायत करनेवाली खुद ही गलत है। यह विरोध ही गलत है। यही नासमझी है! प्रेम नहीं रखें ऐसे कोई माता-पिता होते ही नहीं। यह तो उन्हें समझ ही नहीं है, तो फिर क्या हो? प्रेम नहीं रखते ऐसा कहें, तो माता-पिता को कितना दु:ख हो अगर तुझे प्रेम नहीं करना था तो तुझे बचपन से पाला-पोसा किसलिए?

प्रश्नकर्ता : तब फिर मुझे ऐसी फीलिंग (भाव) क्यों हुई कि माता-पिता प्रेम नहीं करते? मुझे ऐसी दृष्टि कहाँ से आई?

दादाश्री : नहीं, सभी ऐसे प्रश्न खड़े करते हैं, क्या करें इसका? छोटी हो तो एड़ी से दबा दें, लेकिन बड़ी हो गई तो करें भी क्या?

अब हमें नज़र आता है, उसे यह जो अक्ल मिली है न, बाहर से बुद्धि मिली है न वह विपरीत बुद्धि है। इसलिए खुद भी दु:खी होती है और औरों को भी दु:खी करती है।

प्रश्नकर्ता : हाँ, आजकल लड़कियाँ भी जल्दी शादी करने को तैयार नहीं होती!

दादाश्री : लड़कियाँ तैयार नहीं होती। हो सके तब तक शादी जल्दी हो जाए तो अच्छा। पढ़ाई खत्म हो जाए और इधर शादी हो जाए, ऐसा हो सके तो बेहतर। दोनों साथ में हो जाए। यदि शादी के पश्चात एकाध साल में पढ़ाई पूरी होती हो तो भी हर्ज नहीं। लेकिन शादी में बँध जाए, तो ‘लाइफ’ (ज़िंदगी) अच्छी गुज़रे, वर्ना बाद में लाइफ बहुत दु:खमय हो जाती है।

फ्रेन्ड पर मोह यानी सखी की बात करती हो या सखा की?

प्रश्नकर्ता : नहीं, दोनों की।

दादाश्री : (लड़की को) सखा भी! मूँछवाला (पुरुष) भी!

प्रश्नकर्ता : हाँ, दोनों।

दादाश्री : ठीक है। तब उसके साथ हमें समभाव से रहना है। उस घड़ी तेरी जागृति रहनी चाहिए। उस घड़ी होश नहीं खो देना चाहिए। जिसे ब्रह्मचर्य का पालन करना है, जो मोक्ष चाहते हैं, उन स्त्रियों को पुरुषों का परिचय कम से कम करना, अनिवार्य होने पर ही। जिन्हें मोक्ष में जाना है, उन्हें इतना जतन करना चाहिए। ऐसा तुझे लगता है या नहीं लगता? तुझे क्या लगता है?

प्रश्नकर्ता : हाँ, करना चाहिए।

दादाश्री : मोक्ष में नहीं जाना है या अभी चलेगा, ऐसा है?

प्रश्नकर्ता : नहीं, मोक्ष में जाना है।

दादाश्री : तो फिर इन दोस्तों से क्या मैत्री करना? यह निरी जूठन!

(उस लड़की से) स्त्रियों के साथ घूमो-फिरो, खाओ पीओ, मज़े करो, पुरुषों के संग नहीं।

प्रश्नकर्ता : दादाजी, एक बहन पूछती हैं कि हमारे लड़कों के साथ ‘फ्रेन्डली रिलेशन’ (मैत्री संबंध) हों, फिर भी माता-पिता शंका क्यों करते हैं?

दादाश्री : नहीं, लड़कों के साथ फ्रेन्डली रिलेशन रख ही नहीं सकते। लड़कों के साथ फ्रेन्डली रिलेशन गुनाह है।

प्रश्नकर्ता : उसमें क्या गुनाह है?

दादाश्री : पेट्रोल और आग, दोनों साथ नहीं रख सकते न? वे दोनों (लड़का और लड़की) मौका ढूँढते रहते हैं। यह सोचे कि कब मेरी पकड़ में आए और सामनेवाला सोचे कि यह कब मेरी पकड़ में आए?! दोनों शिकार की ताक में रहते हैं, दोनों ही शिकारी!

प्रश्नकर्ता : आपने कहा न कि लड़के और लड़कियों को दोस्ती नहीं करनी चाहिए।

दादाश्री : बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, ऐसा कहा इससे उन लोगों को संतोष नहीं हुआ।

दादाश्री : वह फ्रेन्डशिप आखिर में पोईज़न (ज़हर) समान बन जाएगी, आखिर में पोईज़न ही बन जाएगी। लड़की को मरने का समय आएगा, लड़के का कुछ नहीं जाता। इसलिए लड़के के साथ तो खड़ा भी नहीं रहना चाहिए। लड़कों से कोई फ्रेन्डशिप मत करना। वर्ना वह तो पोईज़न है। लाख रुपये दे फिर भी फ्रेन्डशिप मत करना। फिर अंत में ज़हर खाकर मरना पड़ता है। कितनी ही लड़कियाँ ज़हर खाकर मर जाती हैं।

इसलिए उम्र होने पर हमें घर में माता-पिता से कह देना चाहिए कि, ‘‘किसी अच्छे व्यक्ति के साथ मेरा रिश्ता कर दीजिए, फिर से टूटे नहीं ऐसा जोड़ दीजिए। मेरी शादी के लिए अब लड़का ढूँढिए। दादा भगवान ने मुझसे कहा है कि ‘आप कहना।’’ ऐसे कह देना, शर्म में मत रहना। तब उन्हें पता चलेगा कि बच्चों की खुशी है, चलो अब शादी करवा दें। बाद में दो साल बाद शादी कर लेना, आमने सामने पसंद करके रिश्ता जोड़ लेना। शादी हो जाने पर दूसरा कोई हमारी ओर देखेगा नहीं। कहेगा, उसका तो तय हो गया!

यह दोस्ती अच्छी नहीं, लोग तो छल-कपटवाले होते हैं। सहेलियों के साथ मित्राचारी कर सकते हैं। पुरुषों की मित्राचारी नहीं करनी चाहिए। धोखा देकर निकल जाते हैं। कोई विश्वासयोग्य नहीं है, सभी दगाबाज। एक भी असली नहीं है। बाहर किसी का विश्वास मत करना।

शादी कर लेना अच्छा, इधर-उधर भटकें उससे कुछ अच्छा नहीं होता। तेरे माता-पिता शादी-शुदा हैं, तो है कुछ झंझट? ऐसे तुझे भी शादी के नाते से बँध जाना पसंद नहीं आया? खूँटे से बँधना (शादी के रिश्ते से जुड़ जाना) तुझे पसंद नहीं? मुक्त रहना पसंद है?

लड़कियों से कहता हूँ कि शादी क्यों नहीं करतीं? तब कहती हैं, ‘क्या दादाजी आप भी ऐसा कहते हैं हमें शादी करने को कह रहे हैं!’ मैंने कहा, ‘इस संसार में शादी किए बिना नहीं चलेगा, ब्रह्मचर्य का पालन करना है ऐसा डिसाइड करो और वह भी निश्चित, यकीनन होना (करना ही) चाहिए। ऐसा न हो तो शादी कर लो, लेकिन दो में से एक में आ जाओ।’ तब कहती हैं, ‘क्यों शादी करने को कह रहे हैं?’ मैंने कहा, ‘क्यों? क्या तकलीफ है? कोई अच्छा लड़का नहीं मिल रहा?’ तो बोली, ‘अच्छे लड़के कहाँ हैं? बुद्धू हैं, भाई बुद्धू से क्या शादी करनी?’ इस पर मैं चौंक पड़ा। मैंने कहा, ‘ये लड़कियाँ कैसी हैं? देखो तो, अभी से इनका इतना पावर है, तो बाद में उन्हें कैसे जीने देंगी, बेचारों को?’ इसलिए कईं लड़के मुझसे कहते हैं, ‘हमें शादी नहीं करनी।’ लड़कियाँ क्या कहती हैं, ‘बुद्धू से क्यों शादी करूँ?’ मैंने कहा, ‘ऐसा मत बोलना। तेरे मन में से, यह निकाल दे कि वह बुद्धू है। क्योंकि शादी किए बिना चारा नहीं है।’ ऐसा नहीं चलता। मन में बुद्धू है ऐसा घुस जाए तो फिर सदैव झगड़े होते हैं। फिर तुझे वह बुद्धू ही लगता रहेगा।

पूरा संसार मोक्ष की ओर ही जा रहा है, लेकिन मोक्ष के लिए यह सब हेल्पिंग (सहायक) नहीं है। ये तो लड़-झगड़कर उल्टे ब्रेक लगाते हैं। वर्ना गरमी का ऐसा स्वभाव है कि बारिश खींच लाती है। जहाँ हो वहाँ से खींच लाती है। गरमी का स्वभाव है कि बढ़ती जाती है और बारिश खींच लाती है। यह संसार घबराहट रखने जैसा नहीं है।

इस संसार का स्वभाव ऐसा है कि हमें मोक्ष की ओर ले जाता है। मोक्ष को खींच लाता है। संसार जितना ज़्यादा कठिन हो न, उतना ही मोक्ष जल्दी आता है। लेकिन कठिन हो तो हमें बिगड़ नहीं जाना चाहिए, स्थिर रहना चाहिए। सही उपाय करने चाहिए, गलत उपाय करने पर फिर से गिर पड़ते हैं। दु:ख आया तब ऐसा समझना कि मेरे आत्मा के लिए विटामिन मिला और जब सुख प्राप्त हो तो देह का विटामिन मिला, ऐसे समझना। हमें हर रोज़ विटामिन मिलता है, हम तो ऐसा मानकर बचपन से टेस्ट करके आगे बढ़े हैं। आप तो एक ही तरह के विटामिन को विटामिन कहते हो, वह बुद्धि का विटामिन है। जबकि ज्ञान दोनों को विटामिन कहता है। वह विटामिन अच्छा कि बहुत कुछ खाने को हो, फिर भी लोग तप करते हैं। मजेदार साग-सब्ज़ी हो, फिर भी लोग तप करते हैं। तप करते हैं यानी दु:ख सहन करते हैं ताकि आत्मा का विटामिन मिले। यह सब आपके सुनने में नहीं आया है?

प्रश्नकर्ता : हाँ, सुना है दादाजी।

दादाश्री : और यह तप तो घर बैठे अपने आप मिलता है।

लव मेरिज पसंद करने जैसी चीज़ नहीं है। कल उसका मिजाज़ कैसा निकले, किसे मालूम है? माता-पिता पसंद करें, उसे देखना। लड़़काबेवकूफ या डिफेक्टवाला तो नहीं है न? बेवकूफ नहीं होना चाहिए! क्या बेवकूफ होते हैं?

हमें पसंद आए ऐसा चाहिए। थोड़ा हमारे मन को भाए ऐसा होना चाहिए। बुद्धि की लिमिट में आना चाहिए। अहंकार एक्सेप्ट करे ऐसा चाहिए और चित्त को भाए ऐसा चाहिए? चित्त को भाए ऐसा चाहिए न। अत: माता-पिता जो खोजें उसमें हर्ज नहीं, लेकिन हमें भी खुद देख लेना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : कभी-कभी माता-पिता भी लड़का खोजने में भूल कर सकते हैं?

दादाश्री : उनका इरादा नहीं है, उनका इरादा तो भला करने का ही है। फिर गलती हो जाए तो हमारे प्रारब्ध का खेल है। क्या हो सकता है? और आप यदि स्वतंत्र रूप से खोजोगे तो उसमें गलती होने की संभावना ज़्यादा है। बहुत से उदाहरण हैं, फेल होने के।

हमारे एक महात्मा थे, उनका इकलौता बेटा था। मैंने उसे पूछा, ‘अरे! तुझे शादी करनी है या नहीं?’ तब बोला, ‘करूँगा दादाजी।’ ‘कैसे लड़की पास करेगा?’ तब कहे, ‘आप कहें वैसा करूँगा।’ फिर अपने आप कहने लगा, ‘मेरी मम्मी तो पास करने में होशियार है।’

इन लोगों ने डिसाइड कर लिया है, तो मम्मी जो पास करे सो। ऐसा होना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : मेरी छोटी बेटी पूछती है कि, ‘ऐसे ही कैसे शादी करें, फिर तो सारी ज़िंदगी बिगड़ जाएगी न? पहले बेटे को अच्छी तरह देख लें और मालूम कर लें कि लड़का अच्छा है या नहीं, बाद में शादी कर सकते हैं न!’ मुझसे ऐसा प्रश्न पूछती रहती है। तो इसका सोल्यूशन क्या है, दादाजी?

दादाश्री : सभी लोग देखकर ही शादी करते हैं और बाद में मारामारी और झगड़े होते हैं। जिसने देखे बगैर शादी की, उनका बहुत अच्छा चलता है। क्योंकि कुदरत का दिया हुआ है जबकि वहाँ तो अपना सयानापन दिखाया है न।

हमारे एक महात्मा की बेटी ने क्या किया? अपने पिता से कहा कि, ‘मुझे यह लड़का पसंद नहीं।’ अब लड़का पढ़ा-लिखा था। अब वह लड़का, लड़की का माँ-बाप सबको पसंद आया था। इसलिए उसके पिताजी को व्याकुलता हो गई कि बड़ी मुश्किल से ऐसा अच्छा लड़का मिला है और यह लड़की तो मना कर रही है।

फिर उसने मुझसे पूछा तब मैंने कहा, ‘उस लड़की को मेरे पास बुलाओ।’ मैंने कहा, ‘बहन, मुझे बता न! क्या हर्ज है? लंबा लगता है? मोटा लगता है? पतला लगता है?’ तब कहे, ‘नहीं, थोड़ा ब्लैकिश (काला) है।’ मैंने कहा, ‘वह तो मैं उजला कर दूँगा, तुझे और कोई दिक्कत है?’ तब बोली, ‘नहीं, और कुछ नहीं।’ इस पर मैंने कहा, ‘तू हाँ कर दे, फिर मैं उसे उजला कर दूँगा।’ फिर वह लड़की उसके पापा से कहने लगी कि, ‘आप दादाजी तक शिकायत ले गए?’ तब क्या करें फिर?

शादी के बाद मैंने पूछा, ‘बहन, उजला करने के लिए साबुन मँगा दूँ क्या?’ तब उसने कहा, ‘नहीं दादाजी, उजला ही है।’ बिना वजह ब्लैकिश, ब्लैकिश कर रही थी! वह तो, कुछ काला लगाए तो काला नज़र आए और पीला लगाए तो पीला दिखेगा। वास्तव में लड़का अच्छा था। मुझे भी अच्छा लगा। उसे कैसे जाने दें? लड़की क्या समझी, ज़रा सा ढीला है। ठीक कर लेना फिर, लेकिन ऐसा दूसरा नहीं मिलेगा!

प्रश्नकर्ता : क्या डेटींग करना पाप है? डेटींग यानी ये लोग लड़के लड़कियों के साथ बाहर जाएँ और लड़कियाँ लड़कों के साथ बाहर जाएँ, तो क्या वह पाप है? उसमें कुछ हर्ज है?

दादाश्री : हाँ, लड़कों के साथ घूमने की इच्छा हो तो शादी कर लेना। फिर एक ही लड़का पसंद करना, एक निश्चित होना चाहिए। अन्यथा ऐसा गुनाह नहीं करना चाहिए। जब तक शादी न हो जाए, तब तक आपको लड़कों के साथ नहीं घूमना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : यहाँ अमरीका में तो ऐसा है कि लड़के-लड़कियाँ चौदह साल की उम्र से ही बाहर घूमने जाते हैं। फिर मन मिलें तो उसमें आगे बढ़ते हैं। उसमें से कुछ बिगड़ जाए, एक-दूसरे से मन न मिले तो फिर किसी और के साथ घूमते हैं। उसके साथ नहीं जमा तो फिर तीसरा, ऐसे चक्कर चलता रहता है और एक साथ दो-दो, चार-चार के साथ भी घूमते हैं।

दादाश्री : देट इज़ वाईल्डनेस, वाईल्ड लाइफ! (यह तो जंगलीपन है, जंगली जीवन!)

प्रश्नकर्ता : तब उन लोगों को क्या करना चाहिए?

दादाश्री : लड़की को एक लड़के के प्रति सिन्सियर (वफादार) रहना चाहिए और लड़का लड़की को सिन्सियर रहे, ऐसी लाइफ (जिंदगी) होनी चाहिए। इनसिन्सियर लाइफ, वह रोंग लाइफ है।

प्रश्नकर्ता : अब इसमें सिन्सियर कैसे रहें? एक-दूसरे के साथ घूमते हों, उसमें फिर लड़का या लड़की इनसिन्सियर हो जाते हैं।

दादाश्री : तब घूमना बंद कर देना चाहिए न! शादी कर लेनी चाहिए। आफ्टर ऑल वी आर इन्डियन, नोट वाइल्ड लाइफ। (आखिर हम भारतीय है, जंगली नहीं।)

अपने यहाँ शादी के बाद दोनों सारा जीवन सिन्सियरली (वफादारी से) साथ में रहते हैं। जिसे सिन्सियरली रहना हो, उसे पहले से ही दूसरे आदमी से फ्रेन्डशिप नहीं करनी चाहिए। इस मामले में बहुत सख्त रहना चाहिए। उसे किसी लड़के के साथ घूमना नहीं चाहिए और घूमना हो तो एक ही लड़का पक्का करके माता-पिता से कह देना कि शादी करूँगी तो इसके साथ ही करूँगी, मुझे किसी दूसरे से शादी नहीं करनी। इनसिन्सियर लाइफ इज़ वाइल्ड लाइफ। (बेवफा जीवन ही जंगली जीवन है।)

चरित्र खराब हो, व्यसनी हो, तो बहुत परेशानी होती है। व्यसनी पसंद है या नहीं है?

प्रश्नकर्ता : बिल्कुल नहीं।

दादाश्री : और चरित्र अच्छा हो पर व्यसनी हो तो?

प्रश्नकर्ता : सिगरेट तक चला सकते हैं।

दादाश्री : सच कहती हो, सिगरेट तक निभा सकते हैं। फिर आगे वह ब्रांडी के पेग लगाए वह कैसे पुसाएगा? उसकी हद होती है और चरित्र तो बहुत बड़ी चीज़ है। बहन, तू चरित्र में मानती है? तू चरित्र पसंद करती है?

प्रश्नकर्ता : उसके बगैर जिया ही कैसे जाए?

दादाश्री : हाँ, देखो! अगर इतना हिन्दुस्तानी स्त्रियाँ, लड़कियाँ समझें न तो काम हो जाए। अगर चरित्र को समझें तो काम हो जाए।

प्रश्नकर्ता : हमारे इतने ऊँचे विचार अच्छे वांचन से हुए हैं।

दादाश्री : चाहे किसी भी वांचन से, इतने अच्छे विचारों के संस्कार मिले न!

वास्तव में तो यह दग़ा है। आप सभी को नज़र नहीं आता, मुझे तो सबकुछ दिखता है, सिर्फ छल-कपट है। और दग़ा हो, वहाँ सुख कभी भी नहीं होता! इसलिए एक-दूसरे के प्रति सिन्सियर रहना चाहिए। दोनों की शादी से पहले गलतियाँ हुई हों, उन्हें हम एक्सेप्ट करवा दें और फिर एग्रीमेन्ट (करार) कर दें, कि सिन्सियर रहो। दूसरी जगह मत देखना। जीवनसाथी पसंद हो या नहीं हो, फिर भी सिन्सियर रहना। यदि अपनी माँ अच्छी नहीं लगती हो, उसका स्वभाव खराब हो फिर भी उसे सिन्सियर रहते हैं न!

प्रश्नकर्ता : संसार व्यवहार में पूर्वे जो कर्म हुए हैं, उनके उदय अनुसार सब चलता है। उसमें कहीं प्रपंच मालूम पड़े कि हमारे साथ प्रपंच किया जा रहा है, तब उस स्थिति में ‘समभाव से निकाल (निपटारा)’ करने के लिए क्या करें?

दादाश्री : पति टेढ़ा मिल जाए तो उसे किस प्रकार जीतोगी? क्योंकि जो प्रारब्ध में लिखा है, वह छोड़ेगा नहीं न! जब ऐसा लगे कि यह संसार अपनी इच्छा के अनुसार नहीं चल रहा है। तब मुझे बता देना कि ‘दादाजी, ऐसा पति मिला है।’ तब मैं तेरा सब तुरंत रिपेयर कर दूँगा और तुझे ठीक से रहने की चाबी भी दे दूँगा।

औरंगाबाद में एक मुस्लिम लड़की आई थी। मैंने पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’ तब कहती हैं, ‘दादाजी, मेरा नाम मशरूर है।’ मैंने कहा, ‘आ, यहाँ बैठ मेरे पास, क्यों आई हैं तू?’ वह आई। यहाँ आने पर उसे अच्छा लगा। अंतर में ठंडक हुई कि ये खुदा के असिस्टेन्ट (सहायकर्ता) जैसे तो लग ही रहे हैं, ऐसा लगा तो फिर बैठ गई। बाद में दूसरी बातें निकली।

फिर मैंने पूछा, ‘क्या करती है तू?’ उसने कहा, ‘मैं लेक्चरर (व्याख्याता) हूँ।’ इस पर मैंने पूछा, ‘शादी-वादी की या नहीं की?’ तो कहा, ‘नहीं, शादी नहीं की, लेकिन मँगनी हुई है।’ मैंने कहा, ‘कहाँ हुई है, मुंबई में?’ तो कहा, ‘नहीं, पाकिस्तान में।’ ‘कब करनेवाली हो?’ तब कहे, ‘छ: महीने में ही।’ मैंने कहा, ‘किसके साथ? पति कैसा खोज निकाला है?’ तो कहा, ‘लॉयर है।’

बाद में मैंने पूछा कि, ‘वह पति बनकर तुझे कुछ दु:ख नहीं देगा? अभी तुझे किसी प्रकार का दु:ख नहीं है और पति पाने जाएगी और पति दु:ख देगा तो?’ मैंने कहा, ‘उसके साथ शादी करने के बाद तेरी क्या योजना है? उसके साथ शादी होने से पहले तेरी कुछ योजना होगी न कि उसके साथ कैसे बर्ताव करना (करेगी) या फिर योजना नहीं की है? वहाँ शादी के बाद क्या करना उसके लिए कुछ तैयारियाँ तूने की होंगी न, कि शादी के बाद उस लॉयर (वकील) के साथ तेरी जमेगी या नहीं?’ तब वह कहती है, ‘मैंने सब तैयारियाँ कर रखी हैं। वह ऐसे बोलेगा तो मैं ऐसा जवाब दूँगी। वह ऐसे कहेगा तो मैं ऐसा कहूँगी, वह ऐसा कहेगा तो, एक-एक बात के जवाब मेरे पास तैयार हैं।’

जितनी रशिया ने अमरीका के सामने युद्ध की तैयारियाँ कर डाली हैं न, उतनी तैयारियाँ कर रखी थीं। दोनों ओर से पूरी तैयारियाँ! वह तो मतभेद खड़ा करने की ही तैयारियाँ कर रखी थीं। वह झगड़ा करे, उससे पहले ही यह बम फोड़ दे! वह ऐसे सुलगाए तो हमें ऐसे सुलगाना। अत: वहाँ जाने से पहले ही हुल्लड़ करने को तैयार है न! वह इस तरफ तीर छोड़े, तब हमें उस ओर रोकेट छोड़ना। मैंने कहा, ‘यह तो तूने कोल्ड वॉर शुरू कर दिया। वह कब शांत होगा?’ कोल्ड वॉर (क्लाउड वार) बंद होता है? यह देखो न, बड़े साम्राज्यवालों का कहाँ बंद हो रहा है, रशिया-अमरीका का?

ये लड़कियाँ ऐसा सब सोचती हैं, सारा प्रबंध कर दे इस तरह। ये लड़के तो बेचारे भोले! लड़के ऐसा सब नहीं करते और उस घड़ी मार खा जाते हैं, भोले हैं न!

यह आप जो कहते हो न, प्रपंच के सामने क्या तैयारी करनी चाहिए? लेकिन उस लड़की ने सारी तैयारियाँ कर रखी थीं, बोम्बार्डिंग कब और कैसे करूँगी! वह ऐसा बोले तो अटेक, वैसे बोले तो ऐसे अटेक (आक्रमण)। ‘सभी तैयारियाँ कर रखी हैं कहती थी!’ फिर बीच में मैंने उसे कहा, ‘यह सब तुझे किस ने सिखाया है? निकाल बाहर करेगा और तलाक दे देगा!’ तलाक दे देगा या नहीं देगा? मैंने कह दिया कि इस तरह तो छ: महीने में तलाक हो जाएगा, तुझे तलाक लेने हैं? यह तरीका गलत है। फिर मैंने उसे कहा, ‘तुझे तलाक नहीं दे, इसलिए मैं तुझे यह सब सिखा रहा हूँ।’

इस पर मुझसे कहती है, ‘दादाजी, ऐसा नहीं करूँ तो क्या करूँ? वर्ना तो वह मुझे दबा देगा।’ मैंने कहा, ‘वह क्या दबानेवाला था? बेचारा लट्टू! वह तुझे क्या दबानेवाला था?’

बाद में मैंने पूछा, ‘बहन, मेरा कहा मानोगी? तुझे सुखी होना है या दु:खी होना है? बाकी जो औरतें सब तैयारियाँ करके पति के पास गई थीं, वे अंत में दु:खी हुई हैं। तू मेरे कहने के मुताबिक जाना, किसी भी तैयारी के बगैर जाना।’ फिर उसे समझाया।

घर में हर रोज़ क्लेश होगा तो वकील कहेगा, ‘जाने दो, इससे तो अच्छा दूसरी लाऊँ।’ उसमें फिर यह टिट फोर टैट (जैसे को तैसा) होगा। जहाँ प्रेम के सौदे करने हैं, वहाँ ऐसे सौदे क्यों करें?

प्रश्नकर्ता : प्रेम के।

दादाश्री : प्रेम के! भले आसक्ति से हो लेकिन कुछ प्रेम जैसा है न! उस पर द्वेष तो नहीं होता न! मैंने कहा, ‘ऐसा नहीं करते। तू पढ़ी-लिखी है इसलिए ऐसी तैयारियाँ कर रखी है? यह तो वॉर (लड़ाई) है? यह क्या हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की वॉर है? संसार में सभी यही कर रहे हैं। यें लड़के-लड़कियाँ सभी यही कर रहे हैं। फिर दोनों का जीवन नष्ट हो जाता है।’ फिर उसे सब प्रकार से समझाया।

पति के साथ इस प्रकार बर्ताव करना चाहिए। इस प्रकार यानी वह टेढ़ा चले तो तू सीधी चलना। उसका समाधान होना चाहिए, हल निकालना चाहिए। वह झगड़ने की तैयार हो तब तू एकता रखना। वह अलगाव रखे फिर भी आप एकता रखना। वह बार बार अलग होने की बातें करे, उस हालत में भी तू कहना कि ‘हम एक हैं।’ क्योंकि ये सब रिलेटिव संबंध हैं। वे रिश्ता तोड़ दें और तू भी तोड़ देगी तो टूट जाएगा कल सवेरे। अर्थात् तलाक दे देगा। तब पूछा, ‘मुझे क्या करना है?’ मैंने उसे समझाया, उनका मूड देखकर व्यवहार करने को कहा, जब मूड में नहीं हो तब तू मन में ‘अल्लाह’ का नाम लेती रहना और मूड ठीक हो तब उनके साथ बातचीत शुरू करना। वह मूड में न हो और तू छेड़ेगी तो आग लग जाएगी।’

तुझे उन्हें निर्दोष देखना है। वे तुझे उल्टा-सीधा कहें फिर भी तू शांत रहना। सच्चा प्रेम होना चाहिए। आसक्ति में तो छ:-बारह महीने में फिर टूट ही जाएगा। प्रेम में सहनशीलता होनी चाहिए, एडजस्टेबल (समाधानी) होना चाहिए।

मशरूर को मैंने ऐसा पढ़ा दिया। मैंने कहा, ‘तू कुछ भी मत करना, जब वह इस ओर तीर चलाए तब अपनी स्थिरता रखकर ‘दादा, दादा’ करती रहना। फिर उस ओर तीर चलाए तब स्थिरता रखकर ‘दादा, दादा’ करना। तू एक भी तीर मत चलाना।’ फिर मैंने विधि कर दी।

बाद में पूछा कि ‘तेरे ससुराल में कौन-कौन हैं?’ तब कहा, ‘मेरी सास है।’ मैने पूछा, ‘सास के साथ तू कैसे एडजस्टमेन्ट करेगी?’ तब कहने लगी, ‘उसका भी मैं सामना कर लूँगी।’

फिर मैंने उसे समझाया। बाद में उसने कहा, ‘हाँ, दादाजी, मुझे ये सब बातें पसंद आई।’ ‘तू इस प्रकार करना तो तलाक नहीं देगा और सास के साथ मेल रहेगा।’ फिर उसने मुझे एक चंदन की माला पहनाई। मैंने कहा, ‘यह माला तू ले जाना और तेरे साथ रखना। माला के दर्शन करने के बाद पति के साथ अपना व्यवहार चलाना, तो बहुत सुंदर चलेगा। उसने वह माला आज भी अपने पास रखी हुई है।’

उससे चरित्रबल की बात कही थी कि ‘पति कुछ भी बोले, तुझे कुछ भी कहे, तब भी तू मौन धारण करके, शांत भाव से रहेगी, तो तुझ में चरित्रबल उत्पन्न होगा और उसका उस पर प्रभाव पड़ेगा। वकील हो तो भी। वह कैसे भी डाँटे, तब ‘दादा’ का नाम लेना और स्थिर रहना। उसके मन में होगा कि यह कैसी औरत है! यह तो हार ही नहीं मानती! बाद में वह हार जाएगा।’ फिर उसने ऐसा ही किया, लड़की ही ऐसी थी। दादा जैसे सिखानेवाले मिल जाएँ तो फिर क्या बाकी रहेगा? वर्ना पहले एडजस्टमेन्ट ऐसा था, रशिया और अमरीका जैसा। वहाँ बटन दबाते ही सुलगे सब, सटासट। क्या यह मानवता है? किसलिए डरते हो? जीवन किसलिए होता है? जब संयोग ही ऐसे हैं, तब क्या करें फिर?

वे जो जीतने की तैयारी करते हैं न, इससे चरित्रबल ‘लूज़’ (कमज़ोर) हो जाता है। हम ऐसी किसी प्रकार की तैयारी नहीं करते। चरित्र का उपयोग, जिसे आप तैयारी कहते हो, लेकिन उससे आपमें जो चरित्रबल है वह ‘लूज़’ हो जाता है और अगर चरित्रबल खत्म हो जाएगा, तब तेरे पति के सामने तेरी क़ीमत ही नहीं रहेगी। इस तरह उस लड़की की समझ में अच्छी तरह बैठ गया। बाद में मुझसे कहा कि ‘दादाजी, अब मैं किसी दिन हारूँगी नहीं, ऐसी गारन्टी देती हूँ।’

अपने साथ कोई प्रपंच करे और जवाब में हम भी वैसा ही करें तो हमारा चरित्रबल टूट जाएगा। कोई कितने भी प्रपंच करे लेकिन अपने प्रपंच से खुद ही उसमें फँस जाता है। लेकिन अगर आप तैयारी करने जाओगे, तब आप खुद उसके प्रपंच में फँस जाओगे। हमारे सामने तो बहुत लोगों ने प्रपंच किए थे लेकिन वे प्रपंच करनेवाले फँस गए थे। क्योंकि हमें घड़ी भर भी उस बारे में कोई विचार ही नहीं आते। वर्ना यदि उसका सामना करने की तैयारी करने के विचार आए न, तो भी अपना चरित्रबल टूट जाता है, शीलवानपन टूट जाता है।

शीलवान यानी क्या? कि वह गालियाँ देने के लिए आए लेकिन यहाँ आकर चुप बैठ जाए। हम कहें कि ‘कुछ बोलिए, बोलिए’, लेकिन वह वह एक अक्षर भी नहीं बोल पाए। वह शील का प्रभाव है! अगर हम एक अक्षर भी सामने बोलने की तैयारी करें न, तो शील टूट जाता है। इसलिए तैयारी मत करना। जिसे जो कहना हो कहे। ‘सर्वत्र मैं ही हूँ’ कहना। (आत्मस्वरूप से सबके साथ अभेद हूँ।)

प्रपंच के सामने तैयारी करने में हमें नये प्रपंच खड़े करने पड़ते हैं और फिर हम स्लिप (फिसल) हो जाते हैं। अब हमारे पास वह शस्त्र ही नहीं है न! उसके पास तो वह शस्त्र है, इसलिए वह भले ही चलाए! किन्तु वह ‘व्यवस्थित’ है न! इसलिए आखिर उसका शस्त्र उसे ही लगता है, ऐसा ‘व्यवस्थित’ है!

उसे अच्छी तरह समझ में आ गया। दादाजी ने ड्रॉईंग कर दिया। मुझसे बोली, ‘ऐसा ड्रॉईंग कहना चाहते हैं?’ मैंने कहा, ‘हाँ, ऐसा ड्रॉईंग।’

फिर बेटी ने उसके माता-पिता से बात कही। उसकी बात सुनकर उसके पिता जो डॉक्टर थे, वे दर्शन करने आए।

देखो, ऐसे दादाजी को कुछ देर लगती है? मशरूर आनी चाहिए यहाँ! आ गई तो ऑपरेशन हो गया झट-पट! देखो, वहाँ पर हमेशा ‘दादाजी, दादाजी’ हर रोज़ याद करती है न!

सबके काम हो जाते हैं। हमारा एक-एक शब्द तुरंत समाधान लानेवाला है। वह आखिर में मोक्ष तक ले जाता है! आप सिर्फ ‘एडजस्ट एवरीव्हेर’ करते रहो।

19. संसार में सुख की साधना, सेवा से

जो व्यक्ति माता-पिता के दोष देखता है, उसमें कभी भी बरक़त नहीं हो सकती। संभव है पैसेवाला हो, लेकिन उसकी आध्यात्मिक उन्नति कभी भी नहीं होती। माता-पिता के दोष नहीं देखने चाहिए। उनका उपकार तो भूल ही कैसे सकते हैं? किसी ने चाय पिलायी हो तो भी उसका उपकार नहीं भूलते, तो फिर हम माता-पिता का उपकार कैसे भुला सकते हैं?

तू समझ गया? हाँ, अर्थात् तुझे उनका उपकार मानना चाहिए, माता-पिता की बहुत सेवा करनी चाहिए। वे उल्टा-सीधा कहें तो ध्यान पर नहीं लेना चाहिए। वे उल्टा-सीधा कहें लेकिन वे बड़े हैं न! क्या तुझे भी उल्टा-सीधा बोलना चाहिए?

प्रश्नकर्ता : नहीं बोलना चाहिए। लेकिन बोल देते हैं उसका क्या? मिस्टेक हो जाए तो क्या करें?

दादाश्री : हाँ, क्यों फिसल नहीं जाता? क्योंकि वहाँ जागृत रहता है और अगर फिसल गया तो पिताजी भी समझ जाएँगे कि यह बेचारा फिसल गया। यह तो जान-बूझकर तू ऐसा करने जाए तो, ‘तू यहाँ क्यों फिसल गया?’ उसका मैं जवाब माँग रहा हूँ। सही है या गलत? जब तक संभव हो तब तक ऐसा नहीं होना चाहिए, फिर भी यदि तुझसे ऐसा कुछ हो जाए, तब सभी समझ जाएँगे कि ‘यह ऐसा नहीं कर सकता।’

माता-पिता को खुश रखना। वे तुझे खुश रखने के प्रयत्न करते हैं या नहीं? क्या उन्हें तुझे खुश रखने की इच्छा नहीं है?

प्रश्नकर्ता : हाँ, किन्तु दादाजी, हमें ऐसा लगता है कि उन्हें किच-किच करने की आदत हो गई है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन उसमें तेरी भूल है, इसलिए माता-पिता को जो दु:ख हुआ, उसका प्रतिक्रमण करना चाहिए। उन्हें दु:ख नहीं होना चाहिए, ‘मैं सुख देने आई हूँ’ ऐसा आपके मन में होना चाहिए। ‘मेरी ऐसी क्या भूल हुई की माता-पिता को दु:ख हुआ’ उन्हें ऐसा लगना चाहिए।

पिताजी बुरे नहीं लगते? ऐसे लगेंगे तब क्या करेगी? सच में बुरे जैसा इस दुनिया में कुछ है ही नहीं। जो कुछ भी हमें मिला, वे सभी अच्छी चीज़ें होती हैं क्योंकि हमारे प्रारब्ध से मिली हैं। माँ मिली, वह भी अच्छी। कैसी भी काली-कलूटी हो, फिर भी अपनी माँ ही अच्छी। क्योंकि हमें प्रारब्ध से हमें जो मिली वह अच्छी। क्या बदलकर दूसरी ला सकते हैं?

प्रश्नकर्ता : नहीं।

दादाश्री : बाज़ार में दूसरी माँ नहीं मिलती? और मिले तब भी किस काम की? गोरी पसंद हो फिर भी हमारे लिए किस काम की? अब जो है, वही अच्छी। दूसरों की गोरी माँ देखकर ‘मेरी बुरी है’ ऐसा नहीं कहना चाहिए। ‘मेरी माँ तो बहुत अच्छी है’ ऐसा कहना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : पापा का क्या मानना चाहिए?

दादाश्री : पापा का? वे जिससे खुश रहें, वैसा ही व्यवहार उनके साथ करना। खुश रखना नहीं आता? वे खुश रहें ऐसा करना।

माता-पिता यानी माता-पिता। इस संसार में सर्व प्रथम सेवा करने योग्य कोई हो तो वे माता-पिता हैं। उनकी सेवा करेगा?

प्रश्नकर्ता : हाँ, सेवा जारी ही है। घर के काम में मदद करता हूँ।

दादाश्री : शांति के लिए क्या करोगे? जीवन में शांति लानी है या नहीं लानी?

प्रश्नकर्ता : लानी है।

दादाश्री : ला देंगे, लेकिन कभी माता-पिता की सेवा की है? माता-पिता की सेवा करने से शांति नहीं जाती। लेकिन आज-कल सच्चे दिल से माता-पिता की सेवा नहीं करते। पच्चीस-तीस साल का हुआ और ‘गुरु’ (पत्नी) आए, तब कहती है कि ‘मुझे नये घर ले जाइए।’ आपने ‘गुरु’ देखे हैं? पच्चीस-तीस साल की उम्र में ‘गुरु’ मिल जाते हैं और ‘गुरु’ मिलने पर सबकुछ बदल जाता है। गुरु कहे कि ‘माँजी को आप जानते ही नहीं।’ वह पहली बार ध्यान नहीं देता। पहली बार तो अनसुना कर देता है, लेकिन दो-तीन बार कहने से फिर धीरे-धीरे वह भ्रमित हो जाता है।

जो शुद्ध भाव से माता-पिता की सेवा करें तो उन्हें कभी अशांति न हो, ऐसा जगत् है। यह जगत् नज़रअंदाज़ करने जैसा नहीं है। तब लोग प्रश्न करते हैं कि लड़के का ही दोष है न! लड़के माता-पिता की सेवा नहीं करते, उसमें माता-पिता का क्या दोष? मैंने कहा, ‘उन्होंने माता-पिता की सेवा नहीं की थी, इसलिए उन्हें प्राप्त नहीं होती।’ यह परंपरा ही गलत है। अब नये सिरे से परंपरा से हटकर चलें तो अच्छा होगा।

बुज़ुर्र्गों की सेवा करने से हमारा विज्ञान में आगे बढ़ता है। क्या मूर्तियों की सेवा हो सकती है? मूर्तियों के पैर थोड़े ही दु:खते हैं? सेवा तो अभिभावक, बुज़ुर्गों अथवा गुरुजन हों, उनकी करनी होती है।

माता-पिता की सेवा करना धर्म है। हिसाब कैसा भी हो लेकिन सेवा करना हमारा धर्म है। जितना अपने धर्म का पालन करेंगे, हमें उतना ही सुख प्राप्त होगा। बुज़ुर्गों की सेवा तो होगी ही, लेकिन साथ में हमें सुख भी प्राप्त होगा। माता-पिता को सुख दें, तो हमें सुख मिलेगा। माता-पिता की सेवा करनेवाला व्यक्ति कभी दु:खी नहीं रहता।

एक बड़े आश्रम में मुझे एक भाई मिल गए। मैंने उनसे पूछा, ‘आप यहाँ कैसे?’ तब उन्होंने कहा, ‘मैं इस आश्रम में पिछले दस साल से रहता हूँ।’ तब मैंने उनसे कहा, ‘आपके माता-पिता गाँव में अंतिम अवस्था में बहुत गरीबी में दु:खी हो रहे हैं।’ तब उन्होंने कहा, ‘उसमें मैं क्या करूँ? मैं उनकी और ध्यान दूँ, तो मेरा धर्म रह जाएगा।’ इसे धर्म कैसे कहेंगे? धर्म तो वह है कि माता-पिता की खबर रखें, भाईयो से अच्छा व्यवहार करें, सभी से अच्छा व्यवहार करें। व्यवहार आदर्श होना चाहिए। जो व्यवहार खुद के धर्म का तिरस्कार करे, माता-पिता के संबंध को भी दुतकारे, उसे धर्म कैसे कह सकते हैं?

मैंने भी माँ की सेवा की थी। बीस साल की उम्र थी। अत: माताजी की सेवा हुई। पिताजी को कंधा दिया था, उतनी ही सेवा हुई थी। फिर हिसाब समझ में आया कि ऐसे तो कईं पिताजी (पिछले जन्मों) हो चुके हैं। अब क्या करेंगे? जवाब मिला, ‘जो हैं उनकी सेवा कर।’ फिर जो गए वे गए। लेकिन अभी जो हैं, उनकी सेवा कर। अगर ऐसा कोई हो तो ठीक, नहीं हो तो चिंता मत करना। ऐसे तो बहुत हो गए। जहाँ भूले वहीं से फिर गिनो। माता-पिता की सेवा, प्रत्यक्ष है। भगवान कहाँ दिखते हैं? भगवान दिखाई नहीं देते, माता-पिता तो दिखाई देते हैं।

अभी ज़्यादा से ज़्यादा अगर कोई दु:खी है तो 65 साल की (और उससे बड़ी) उम्रवाले लोग बहुत दु:खी हैं। लेकिन वे किसे कहें? बच्चे ध्यान नहीं देते। दरार पड़ गई है पुराने ज़माने और नये ज़माने के बीच। बुड्ढा पुराना ज़माना छोड़ता नहीं, मार खाए तो भी नहीं छोड़ता।

प्रश्नकर्ता : पैंसठ साल होने पर सभी की यही हालत होती है न?

दादाश्री : हाँ, ऐसी ही हालत। यही का यही हाल! इसलिए इस ज़माने में वास्तव में करने जैसा क्या है? किसी जगह इन बुज़ुर्गों के लिए रहने का स्थान बनाया हो तो बहुत अच्छा। ऐसा हमने सोचा था। फिर मैंने सोचा कि ऐसा कुछ किया हो, तो पहले हमारा यह ज्ञान दे दें, फिर उनके खाने-पीने की व्यवस्था तो, दूसरी सामाजिक संस्थाओं को सौंप दो तो भी चलेगा। लेकिन ज्ञान दे दिया हो और फिर दर्शन करते रहें तो भी काम होगा! यह ज्ञान दे देंगे तो बेचारों को शांति रहेगी, वर्ना शांति किसके सहारे रहे?

अब आपके घर में बच्चों में कैसे संस्कार पड़ेंगे? आप अपने माता-पिता को नमस्कार करो। इतनी बड़ी उम्र में आपके बाल सफेद होने पर भी आप आपके माता-पिता को प्रणाम करते हो तो बच्चों के मन में भी ऐसे विचार नहीं आएँगे कि पिताजी लाभ लेते हैं तो हम क्यों नहीं लें? फिर आपके पैर छुएँगे या नहीं?

प्रश्नकर्ता : आज के बच्चे माता-पिता के पैर नहीं छूते। उन्हें संकोच होता है।

दादाश्री : ऐसा है, माता-पिता के पैर क्यों नहीं छूते? वे बच्चे माता-पिता के दूषण (गलतियाँ-दोष) देख लेते हैं इसलिए ‘पैर छूने योग्य नहीं हैं’ मन में ऐसा मानते हैं, इसलिए पैर नहीं छूते। अगर उनमें आचार-विचार ऊँचे, बेस्ट लगें, तो हमेशा पैर छूएँगे ही। लेकिन आज के माता-पिता तो बच्चों के सामने भी झगड़ते रहते हैं। माता-पिता झगड़ते हैं या नहीं झगड़ते? अब बच्चों के मन में उनके प्रति जो आदर-सम्मान हो, वह कब तक रहेगा?

इस संसार में तीन लोगों का महान उपकार होता है। वह उपकार भूलने जैसा नहीं है। माता-पिता और गुरु का। जिन्होंने हमें सही रास्ते पर लगाया हो, उनका उपकार नहीं भूलना चाहिए।

जय सच्चिदानंद