Prem Gali ati Sankari - 64 in Hindi Love Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | प्रेम गली अति साँकरी - 64

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प्रेम गली अति साँकरी - 64

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रतनी और शीला दीदी की गृहस्थी शुरू हो गईं और जैसे एक तसल्ली भरा खुशनुमा माहौल संस्थान के कोने-कोने में मुस्कुराने लगा | रतनी के बच्चों को लगता, अब उन्हें पिता मिला है | जेम्स यानि जय एक इंसान के रूप में इतना सही, गंभीर, विवेकी और प्रेमी व्यक्तित्व था कि उसने दिव्य और डॉली को अपने गले से ऐसे लगाया मानो वे उनके ही अपने बच्चे हों | इन्हें कम पढे-लिखे लोग कहते हैं ? तो अधिक पढे-लिखे कैसे होते हैं? लोग वही---- उनसे जुड़े प्रश्न वही, उत्तरों में बदलाव और उन उत्तरों से झाँकती खनखनाती हँसी या रुलाई ! जो भी था, सब सुखद था, ऐसा----जैसा होना चाहिए | सड़क पार के मुहल्ले में रहने वालों के जीवन की रफ़्तार अब सही गति पकड़ चुकी थी | अम्मा-पापा को लगता, उन्होंने कुछ ऐसा फ़तह कर लिया है जो उनके सपनों में था | शीला दीदी के परिवार के सुख का सपना केवल अम्मा-पापा का ही नहीं, दादी का भी था | वे जहाँ भी होंगी, अवश्य प्रसन्न होंगी | 

सब आसपास रहने आ गए थे, अम्मा-पापा का मनोबल बढ़ गया था | एक बेचैनी जो उनके चेहरे पर मैं देखा करती थी, उसमें आशा की एक चमक दिखाई देने लगी थी | लेकिन मैं तो अब भी उनकी समस्या बनी हुई थी | हालाँकि उनके मुख से कभी मेरे लिए समस्या तो निकलता ही नहीं था | वैसे भी बच्चे अपने माता’-पिता की समस्या नहीं होते, उनका प्यार होते हैं | अम्मा तो बच्चों को कभी ड्यूटी भी नहीं कहती थीं, हम बच्चे उनके  जान-प्राण थे जिन्हें वे दोनों मुस्कुराता, खिलखिलाता हुआ देखना चाहते | बेटा उनके पास से चला गया था लेकिन उसके लिए सब खुश थे | अकेलापन शीला दीदी और उनके परिवार ने बाँट ही लिया था अब---? ? 

कमाल कर रही थी ज़िंदगी भी मेरे लिए, कभी-कभी मेरे मन में प्रश्न बहुत ज़ोर से उमड़ता जैसे मैं कोई अनोखी सी ही थी | एक अदद साथी नहीं मिल पा रहा था मुझे जबकि कहने के लिए सामने न जाने कितने स्तरीय प्रपोजल्स आ चुके थे | कॉलेज के जमाने में भी प्रपोजल्स कितने थे, फिर भी कुछ फ़ाइनल तो हो ही नहीं पाया था | उस दिन जब मैं श्रेष्ठ के साथ गई थी, अम्मा-पापा को महसूस हो रहा था कि जहाँ तक होगा मेरी श्रेष्ठ के साथ पटरी बैठ ही जाएगी | हाँ, अपने सिंगापुर जाकर सैटल होने की योजना श्रेष्ठ पहले ही सबको बता चुका था वह ! कोई बात छिपाई नहीं थी उसने, यह भी कहा था कि अमी दोनों स्थानों पर आती-जाती रहेगी | जबकि सब जानते हैं कि यह इतना आसान भी नहीं होता फिर भी अपनी ओर से तो श्रेष्ठ ने अम्मा-पापा को हरी झंडी दिखा ही दी थी | अम्मा के पास कभी-कभी डॉ.पाठक का फ़ोन भी आ जाता किन्तु अम्मा स्पष्ट ही कहाँ थीं जो उनकी बातों का उत्तर दे पातीं | उनको भी कहाँ समझ में आ रहा था, आखिर मैं चाहती क्या थी? वैसे मुझे पता था क्या? 

मैं, दरसल बहुत परेशान हो उठी थी | कितनी भी मॉडर्न थी, कितने ही स्वतंत्र वातावरण में पली थी लेकिन श्रेष्ठ के व्यवहार ने मुझे बुरी तरह पशोपेश में डाल दिया था | उसके इतने खुले आमंत्रण ने मुझे बहुत कुछ सोचने के लिए विवश किया था | होटल के कमरे में प्रवेश करते हुए उसके साँसों की, होंठों की मेरी गर्दन पर छुअन मुझे अब तक महसूस हो रही थी | कमरे में प्रवेश करते समय उसने कब मेरी गर्दन के पास अपने होंठ छुआ दिए, पता भी नहीं चला था, केवल एक गर्म छुअन के जो मुझे असहज करने के लिए काफ़ी थी इसीलिए मैं उसके साथ कमरे में खाना खाने के लिए तैयार नहीं हो पा रही थी | कभी किसी ने मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार नहीं किया था---मुझे घबराहट होने लगी थी जबकि उत्पल की ऐसी हरकतों से मेरा दिल धड़कता | चाहत तो दोनों की एक ही थी किन्तु तरीका अलग होने से मुझे दोनों में बहुत फ़र्क लगता | 

मेरे घर पहुँचने पर अम्मा–पापा की उत्सुक दृष्टि जाने कितनी बार मेरे चेहरे पर फिसली लेकिन उनकी ओर एक दृष्टि फेंककर मैं अपने कमरे की ओर बढ़ रही थी | शायद उन दोनों को लगा कि मैं शरमा रही थी या फिर शायद सोचा  होगा कि अभी मुझे आराम करने दें, कल बात करेंगे | 

आगे बढ़ी तो हमेशा की तरह उत्पल के स्टूडियो में रोशनी फैली हुई थी | आगे बढ़कर मैंने उसके दरवाज़े पर धीमी से नॉक कर दिया | 

“यस, प्लीज़----”उसके वाक्य पूरा होने से पहले ही मैं अंदर प्रवेश कर गई | मैंने देखा, उसके हाथ में वही कुछ था जो वह मुझे देखते ही ड्रॉअर में सरका देता था | आज भी उसके हाथ में कुछ था। मैं जब तक उसके पास तक पहुँचती, उसके हाथ से वह चीज़ जल्दी से अंदर की ओर सरक जाती | आज मुझे उसके प्रति कुछ ज्यादा ही उत्सुकता हो आई | 

“आप---? आप इतनी जल्दी---? ”अपने हाथ की चीज़ को ड्रॉअर में सरकाते हुए उसके चेहरे पर जैसे कुछ खुशी सी पसर गई जैसे उसके सामने अचानक किसी ने  कुछ इतना मनपसंद रख दिया था कि वह अपनी प्रसन्नता पर कंट्रोल नहीं कर पा रहा था | 

“क्यों ? मैं वहाँ बसने गई थी क्या? ”मैंने उसके चेहरे पर दृष्टि गड़ा दी | 

उसे देखकर मैं कितनी प्रफुल्लित हो उठती हूँ, उसका साथ मुझे कितना प्यारा लगता है, किसी के साथ बाँट नहीं सकती लेकिन दिल पर किसका बस है | और वह –वह तो मुझे देखकर फूल सा ही नहीं खिलता जैसे उसके भीतर पूरा बगीचा खिल जाता है | 

हाँ, एक बात और याद आई, जिस दिन मैं उत्पल के साथ पुराने दोस्तों से मिलने जा रही थी श्रेष्ठ ने पूछा था कि उत्पल और तुम्हारी उम्र में इतना बड़ा अंतर है फिर वह कैसे तुम्हारे दोस्तों के साथ कंफरटेबल है? मैंने उसे बताया भी था कि हम पढे तो एक ही कॉलेज में हैं, इसलिए कई बार कैंटीन में जब मैं अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ मिलने आती थी, हम सब मिलते रहे हैं | 

“उत्पल आप लोगों के सामने तो बच्चा है---” उसकी इन सब बातों से एक अजीब महक आती रही थी मुझे | संवेदनाएँ कैसे जुड़ जाती हैं, कहाँ पता चलता है? 

“चलो, मैं चलती हूँ---” मैंने उठने की चेष्टा करते हुए कहा | 

“अभी से? बैठिए न !” उसने इसरार किया | 

“कुछ बताइए, कैसा रहा आपका---” मैं जानती थी वह पूछना चाहता था कैसी रही डेट? 

“ठीक ही था, कुछ खास नहीं—अब चलती हूँ, थकान सी हो रही है | कल मिलते हैं | ” अब तो उठ ही गई मैं | 

“ये देखना पड़ेगा, तुम मुझे देखते ही क्या छिपा लेते हो---? ” मैंने उसकी ओर एक मुस्कराहट उछाल दी | उसको देखकर मेरा मूड काफ़ी ठीक हो गया था लेकिन उठना बेहतर था | उत्पल के सामने मुझे कभी भी कमज़ोर पड़ने का भय लगा रहता था | दरअसल, इंसान दूसरे से कम डरता है, अपने आपसे अधिक भयभीत रहता है | तब---श्रेष्ठ के सामने मैं क्यों भयभीत हो गई थी? मन ने मुझसे ही प्रश्न किया जिसका सटीक उत्तर पाने में मेरा असमर्थ मन मुझे ही कठघरे में खड़ा कर देता था | 

श्रेष्ठ से जो भी मेरी उम्मीद थी, वह फीकी पड़ गई थी, दरअसल फीकी भी क्या मैं उसकी तरफ़ से निराश सी ही हो गई थी | आखिर क्या चाहती थी? मैं उस दिन पूरी रात भर यही सोचती रही। करवटें बदलती रही | क्या मुझे इन सब बातों को शीला दीदी और रतनी से साझा करना चाहिए? उत्पल से ? और अम्मा-पापा से? कुछ पता नहीं चल रहा था | अब कुछ भी अपने लिए निर्णय लेना आवश्यक भी था | आखिर कब तक ? मुझे बार-बार अपना व्यक्तित्व भ्रमित लगता |