Prem Gali ati Sankari - 69 books and stories free download online pdf in Hindi

प्रेम गली अति साँकरी - 69

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“क्या रहा उस दिन---श्रेष्ठ जी से मीटिंग---” शीला दीदी ने कॉफ़ी का आखिरी सिप लेते हुए पूछा | 

क्या मुझे सब कुछ खुलकर बता देना चाहिए? मन में उथल-पुथल थी | एक तरफ़ सब कुछ शेयर करना ज़रूरी लग रहा था तो दूसरी ओर न जाने एक प्रकार की झिझक सामने मुँह फाड़े खड़ी हो जाती थी | मैं खुद भी तो कब से सोच रही थी, बात करने की लेकिन न जाने कौन और क्या मुझे रोक देता? जैसे एक दीवार सी खड़ी थी मेरे सामने, उसको हटाना तो होगा ही किन्तु कैसे ? यही तो सबसे बड़ी समस्या थी | 

“बात कुछ बढ़ी श्रेष्ठ जी से ? ” शीला दीदी ने फिर से अपने अधिकार से पूछा | 

क्या और कैसे बताऊँ उन्हें? और जब अम्मा-पापा को बताना पड़ेगा तब? मन के पशोपेश को संभालना, बैलेंस करना इतना कहाँ आसान होता है | ये सारे मन में एक आशा लेकर बैठे हुए थे जो इनके कुछ न कहने के बावज़ूद भी ‘बॉडी लैंग्वेज’से समझ आ ही रहा था |  सबको महसूस हो रहा था कि श्रेष्ठ के साथ ही मेरा भाग्य जुड़ेगा |  उत्पल की बात तो कोई मन में भी नहीं सोच सकता था, उसका मज़ाकिया स्वभाव, खिलंदड़ापन सबको एक किशोर बच्चे सा लगता | ये दो ही थे जिनमें से कौन मेरे भाग्य में था, ऊपर वाला ही जानता था | कौन, कब, किसके भाग्य से जुड़ जाए, कुछ पता ही नहीं चलता |  कहाँ जान पाते हैं हम सब? एक झौंका सा चला आता है और हम उसमें बहते चले जाते हैं | 

“भई, बहुत देर हो गई है, जल्दी ले लो जो भी डिसीज़न लेना हो | अगर मुझे अकेले में नहीं बताना तो चलते हैं न सर-मैडम के पास ही | ”

शीला दीदी ने जैसे अपने तरकश से तीर निकाला | हाँ, बताना था सबको लेकिन इतनी जल्दी और अचानक ही? मन में कुछ उमड़-घुमड़ ज़्यादा ही होने लगी | वैसे अचानक कहाँ था, क्या था? तीन दिनों से अम्मा मुझसे बात करने की प्रतीक्षा कर रही थीं लेकिन मेरे पास समय ही नहीं था उनके साथ बैठकर बात करने का | लगता था, शीला दीदी को भेजना एक चाल के तहत ही था |  एक उम्र में आकर कितना मुश्किल हो जाता है अपने आपको खोल पाना | मैं नतमस्तक थी शीला दीदी और रतनी के साहस पर | एक आदमी ने उन सबके जीवन को नर्क बना रखा था और उसके जाते ही वे दोनों कैसे अपने आपको और परिवार को ट्रैक पर लेकर आए थे | जीवन की सकरात्मकता का कितना सुन्दर प्रमाण था | दोनों के पति भी उनके साथ हर चीज़ में सहयोग करते | मुझे तो लग रहा था कि अम्मा अब उन सबके कंधों पर ही संस्थान के महत्वपूर्ण कार्यों का भार डाल देंगी | काम भली-भाँति होना चाहिए, किसी की हानि न हो, संस्थान में कोई ऐसा काम न हो जिससे किसी को असंतुष्टि हो, वह अपने सपनों को मरते हुए देखता रहे और ताउम्र पीड़ा से मरता रहे | 

“चलें? मैडम को कुछ तसल्ली हो जाएगी—”शीला दीदी ने फिर से कहा | 

मैं कुछ बोलती कि दरवाज़े पर नॉक हुई | 

“ज़रूर विनोदिनी होगी---”मेरे चेहरे पर एक चैन की रेखा सी पसर गई | 

“विनोदिनी? क्यों? इस समय? ” शीला दीदी ने पूछा | 

“आ जाओ, दरवाज़ा खुला है | ”विनोदिनी ही थी | 

आज विनोदिनी मेरे कपड़ों के ड्राअर्स ठीक करने आने वाली थी | कबसे कह रही थी कि आप जो कपड़े पहन नहीं रही हैं, उन्हें निकाल दीजिए न, अम्मा आपकी पसंद के और कपड़े खरीदती जाती हैं और इतने सारे कपबर्डस होते हुए भी ठीक से सिमट नहीं पा रहे हैं |  मैंने कॉफ़ी का सिप लेते लेते यूँ ही कहा | 

मैंने चैन की साँस ली और शीला दीदी से कहा, 

“मैं काम करवाकर आती हूँ | आप चलिए----” मुझे सोचने के लिए थोड़ा और समय मिल गया था | 

शीला दीदी वहाँ से उठ तो गईं लेकिन आगे जाकर मुड़ीं और अपनी आँखों से एक भेद भरी दृष्टि मुझ पर डालकर मुझे जता गईं कि अब चली आऊँ वरना देख लेना---

विनोदिनी मेरे कपड़ों के सैक्शन की ओर मुड़ रही थी, उसने ठिठककर हम दोनों की ओर देखा और मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गई---!!