Me and my feelings - 83 in Hindi Poems by Darshita Babubhai Shah books and stories PDF | में और मेरे अहसास - 83

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में और मेरे अहसास - 83

आँखों की बारिश में भीगना चाहते हैं
यादों की बारिश में भीगना चाहते हैं

राह ए जिंदगी में कहानी दिल में दबी
वादों की बारिश में भीगना चाहते हैं

इश्क़ ए आरज़ू है चांदनी नितरती
रातों की बारिश में भीगना चाहते हैं

बड़ी फुर्सत में आए हैं महफिल में
रागों की बारिश में भीगना चाहते हैं

हुश्न की मौजूदगी में सुकून से आज
साज़ों की बारिश में भीगना चाहते हैं

सखी खूबसूरत और सच्चे प्यार के
तानों की बारिश में भीगना चाहते हैं
१६-७-२०२३


मोगरे की कली सी कमसिन हो
मुहब्बत की नगरी का पुलिन हो

मिलन की ख्वाहिश करते हैं रोज
फूल से भी ज़्यादा तुम हसिन हो

राहें टेड़ी मेड़ी भी हो सकती है
सभ्लकर चला करो क़मसिन हो

बिना मिले उम्रभर चाहते रहे हो
आज किसके ख्यालों में लिन हो 

खटखटाने की आवाज़ नहीं सुनते
बड़े चुपचाप होकर कहाँ तल्लिन हो
१७-७-२०२३

ग्रंथ पढ़ने से कोई पंडित नहीं होता
प्यार साजिशों से खंडित नहीं होता

कुछ भी इत्तफाक से नहीं होता है
कोई कर्म फल से रहित नहीं होता

यादों की गिरफ़्त से निकल कर
इंतजार मिलन सहित नहीं होता

दिल में रखो तबतक ठीक है
लहू में बसाना हित नहीं होता

दो चार दिनों की मुलाकात में
मिलने वाला चहित नहीं होता
१८-७-२०२३

शंकर ने विष का प्याला था पिया
गले में सर्पों की माला संग जिया

देवो के देव महादेव ने हिमाचल में
लोगों में डर रखने तांडव किया
१९-७-२०२३

किसी के लिए मोह नहीं रखना चाहिए
दूर ही से सब को प्रणाम करना चाहिए

सुकून और चैन से जीने की कोशिश करो
गाढ ताल्लुक़ का दम नहीं भरना चाहिए

और भी कई सारे ग़म है जिंदगी में सुन
मुहब्बत की ख़ातिर नहीं मरना चाहिए

खुली आँखों से ख्वाब देखते रहते हो
हर रोज़ गहरी नीद में सरना चाहिए

कभी कभी मौन भी जरूरी होता है
यूँ ख़ामोशियों से नहीं डरना चाहिए


मोह ही सारे दुःखों की जड़ है
जिंदगी इच्छाओं का बड़ा थड़ है

तरसते रहे ताउम्र न जाने क्या?
देख छुपी गहरी भीतर ही गड़ है

कोई नहीं जान पाया आजतक
दिमाग में कितने छुपे हुए पड़ है

सब कुछ जानकर ही आगे बढ़े हो
क्यूँ खुद ही ख़ुद के साथ लड़ है?

अकेले हो अकेले जीना सीख लो
किसकी यादों में बार बार रड़ है
२०-७-२०२३

देख रूप सम्मोहित नहीं होना चाहिये
मुकम्मल सुधबुध नहीं खोना चाहिये

खामोशी जब आहट बन जाए तो
रिस्तों में मौन नहीं बोना चाहिये

बेकली तबाही मचा देती है सुनो
वक़्त बेवक्त में नहीं सोना चाहिये

हो सके तो आंसुओं को समेट लो
बेकार का बोझ नहीं ढोना चाहिये

जिंदगी सुकून से जिनी है तो सखी
बेवफा के लिए नहीं रोना चाहिये
२१-७-२०२३

इतना तो आसाँ नहीं मुहब्बत भूल जाना
लाज़मी है सावन के महिने में याद आना

मेरा न होते हुए भी मेरी रूह में है बसा
साँसों का तो लगा रहता है आना जाना

सखी मेरे होने ही ने मुझको है डुबोया
हर वक्त नशा करने का चाहिये बहाना

एक तो तेरे प्यार ने दिवाना है बनाया
कहीं मार ही न डाले ये मौसम सुहाना

जो बेनाम रिसते बंधे हुए हैं दुनिया वाले
वो हमारे प्यार को बना देगे अफ़साना
२२-७-२०२३


सुहाना मौसम और ये तन्हाई हैं
ख़ुदा ने कैसी किस्मत बनाई है

हाथों में जाम आँखों में प्यास हैं
पिया के विरह में गज़ल सुनाई है

एक से बढ़कर टूटे दिल वालो की
आज भरी महफिल में सुनवाई है

दिन सुहाने रात नशीली हो गई
जब से नज़र से नज़र मिलाई है

वफ़ा का दम भरने वाले बेवफा हुए
प्यारी लग रहीं ख़ुद की परछाई है


जलाई है
२३-७-२०२३

रिमझिम बारिस की बूँदों ने भिगो दिया
गरजते चमकते बादलों से धड़के जिया

बार बार नहीं आते एसे सुहाने लम्हें
मौसम का मज़ा लेले आ जाओ पिया

शमा जल रहीं हैं परवाने के लिए देख
दिन में बैठे हैं आश का जलाके दिया

इतने सस्ते हो गये हैं मुहब्बत में कि
कई दफ़ा खुद से ज्यादा प्यार किया

सखी किस गली किस महफ़िल में ढूंढे
छुपकर कहाँ जाकर जा बैठे हैं मिया
२४-७-२०२३

बिजुरिया चमके है रात दिन क्यूँ यहाँ?
बताओ भला कौन आने वाला है यहाँ?

याद बनकर दिल में इस तरह बसेंगे
कि मेरे जिंदा होने का एहसास रहे वहाँ

तेरी खामोशियों में मेरी आवाज़ होगी
दिल और दिमाग वहाँ है तू रहेता जहाँ

जब भी सोचता हूँ सुन हो जाता हूँ
कहाँ से आए हैं और जाना हैं कहाँ?

जब से पता चला है हमारे नहीं है
जिगर का दर्द आंसूं बनकर है बहॉ
२५-७-२०२३  

सारी दुआएँ तुम्हारे इश्क़ के नाम
हमारे प्यार का ठिकाना तेरे नाम

जिंदगी की कश्ती को पार लगाना है
पाने को मंज़िल हौसलों को मनाना है

ख़ुलूस ए जिगर को हाथों में थाम के
आज सोए हुए अरमानों को जगाना है

ज़ज्बात छोटे बच्चों की तरह होते हैं
मनचाहे तोहफ़े की लालच दे पटाना है

जिस की जैसी सोच वैसा लगता है
हमारा तो सब से अलग अफ़साना है

लाजवाब रिसते को दिल से निभाएंगे
सुन जिंदगी ने दिल से गाया तराना है

हक़ीक़त को खुशी से गले लगाकर
अब सारी गलतफहमीयों को हराना है
२६-७-२०२३

यह सैलाब क्या तबाही करके जायेगा?
जान से मारकर वो क्या सुकून पायेगा?

न दिशा तय है न उसकी गति मालूम
किसीको पता नहीं किस वक्त आयेगा?

आसमान के होकर पर्वतो को छूकर
साथ अपने वो क्या बहाकर लायेगा?

पानी में सुनामी का उफान मचाकर
वो साहिल से टकराकर क्या गायेगा?

बर्बादी का मंजर देख पेट नहीं भरा क्या?
लोगों की जिंदगियों को क्या खायेगा ?
२७-७-२०२३

जिंदगी के समन्दर की गहराई कोई समझ नहीं पाया
मोहब्बत के हादसों की तन्हाई कोई समझ नहीं पाया


निगोड़ी जो सच है वहीं सामने लाकर खड़ा कर देती है 
आईने जैसी तकदीर बनाई कोई समझ नहीं पाया


ये हादसा रोज गुज़रता है जिंदगी के साथ संभलना
हर मुलाकात के बाद जुदाई कोई समझ नहीं पाया

पास थी मेरे फ़िर भी दूर लगती है ये कैसी प्रीत है
ख़ुदा ने जोड़ी क्यूँ मिलाई कोई समझ नहीं पाया

सखी टूट के बिखर गये हैं सारे ख्वाब गुलों की तरह
प्यारी शै क्यूँ होती है पराई कोई समझ नहीं पाया
२८-७-२०२३

फ़िर यादों का सैलाब लेके आई है ये बारिस
भीगी रातों का सैलाब लेके आई है ये बारिस

मुद्दतों के बाद मुलाकात का मोका आया आज
प्यारी बातों का सैलाब लेके आई है ये बारिस

दिल रखने के लिए और तबीयत के वास्ते
जूठे वादों का सैलाब लेके आई है ये बारिस

आते ही छोड़कर जाने की बात करते हो सखी
गहरी आहों का सैलाब लेके आई है ये बारिस

फिझाओ ने भी साथ देकर दिल बहलाने को
सुरीले रागों का सैलाब लेके आई है ये बारिस
२९-७-२०२३

सुनाई देती है चारऔर तेरी आवाज़
साथ साथ बजता है मनचाहा साज

रूठे पिया को रिझाने के लिए सुनो
आज महफिल में गूँजता है पखवाज

बेआरजु हो चले थे दिल के अरमान
सम्भल गये जब से बने हो हमराज़

बेचैनियों और उदासी को हटाकर
दिल बहलाने का जानते हो इलाज

आँखों ने चुना है क़ायनात देखकर
सखी पाक वफाओ पर पूरा है नाज़
३०-७-२०२३


हवाओं की साज़िश दिये को बुझाने की थी  मिलन के आतुर दिलों को मिलाने की थी

बंध दरवाजो का खुलने का इंतज़ार करते रहे
बात तो मुहब्बत के रस्मों को निभाने की थी

वो लम्हे मिले हैं जिसकी चाहत बरसों से थी
जो चंद घड़ियाँ खुशी से साथ बिताने की थी

तकदीर में नहीं, हाथ की लकीर में लिखा
सखी ख्वाहिश तो कुछ कर दिखाने की थी

परवाह करते है उसकी गवाही नहीं देते सुना
कोशिश जिंदगी हर बाझि को जिताने की थी
३१-७-२०२३
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह