Wo Maya he - 10 in Hindi Adventure Stories by Ashish Kumar Trivedi books and stories PDF | वो माया है.... - 10

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वो माया है.... - 10



(10)

कमरे में शांति थी। सिर्फ नीचे से पाठ की आवाज़ें आ रही थीं। पुष्कर जैसे अभी भी अतीत में मोहित के साथ था। दिशा आगे की कहानी जानना चाहती थी। पर पुष्कर को उसकी यादों से बाहर लाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी। कुछ क्षणों में पुष्कर ने दिशा की तरफ देखा। वह अब वर्तमान में आ गया था। उसने आगे कहा,
"मैं मोहित को कितना चाहता था इस बात का एहसास उसके जाने के बाद अधिक हुआ। ऐसा लगा था जैसे कि सबकुछ छिन गया है। मैं सारा दिन घर में पड़ा रोता रहता था। स्कूल भी नहीं जाता था। उस साल मैं ग्यारहवीं क्लास में था। स्कूल से नोटिस आया तब पापा ने समझाया और जबरदस्ती स्कूल भेजा। मुझे सामान्य होने में बहुत समय लगा।"
दिशा जानना चाहती थी कि कुसुम और मोहित की मौत कैसे हुई। उसने कहा,
"तुम्हारा कहना है कि भाभी और मोहित की मौत अचानक हो गई। क्या कोई हादसा हुआ था ?"
पुष्कर एकबार फिर उसी झरोखे से अतीत में झांकने लगा। उसने उस हादसे के बारे में बताया......
मोहित का चौथा जन्मदिन था। इससे पहले उसके तीनों जन्मदिन ननिहाल में मनाए गए थे। सिन्हा परिवार भी उसमें शामिल होने चला जाता था। लेकिन चौथे जन्मदिन पर कुसुम और विशाल ने तय किया कि जन्मदिन की पार्टी उनकी तरफ से दी जाएगी। इसके लिए भवानीगंज से कोई आठ किलोमीटर दूर एक रेस्टोरेंट में सारा इंतज़ाम किया गया। सारा सिन्हा परिवार वहाँ था। मोहित के नाना नानी भी आए थे। इसके अलावा विशाल के दो दोस्त अपने परिवार के साथ आए थे।
मोहित बहुत खुश था। वह जानता था कि आज उसका दिन है। सब उसे गोद में उठाकर चूम रहे हैं। हाथ में उपहार दे रहे हैं। कुसुम और विशाल उसके जन्मदिन के लिए खास ड्रेस लाए थे। उसे पहन कर वह बहुत सुंदर लग रहा था। केदारनाथ की बेटी सोनम तब महज़ पाँच साल की थी। वह उसके साथ किलकारियां मारते हुए खेल रहा था।
पार्टी में केक काटा गया उसके बाद थोड़ा बहुत नाच गाना हुआ। सबके खाना खाने के बाद पार्टी खत्म हो गई। मोहित के नाना नानी वहीं से अपने घर लौट गए। विशाल के दोस्त अपने साधनों से आए थे। वो सब भी लौट गए। सिन्हा परिवार ने दो गाड़ियां किराए पर ली थीं। सब उनमें बैठकर भवानीगंज आ गए। केदारनाथ सुनंदा और सोनम के साथ अपने घर चले गए।
सब बहुत थके हुए थे। इसलिए सोने चले गए। विशाल ने अपने और कुसुम के लिए छत पर कमरा बनवाया था। वह दोनों ऊपर कमरे में सोने चले गए। किशोरी अक्सर मोहित को अपने पास सुलाती थीं। उस दिन भी उन्होंने मोहित को अपने पास ही छोड़ने को कहा।
कुछ देर में पूरे घर में शांति छा गई। सब थके हुए थे इसलिए लेटते ही सो गए। अभी कुछ देर ही बीती होगी कि किशोरी के चिल्लाने से सब लोग जाग गए। सब आंगन में आए जहाँ मोहित खून की उल्टियां कर रहा था। सब घबरा गए। उमा ने देखा कि विशाल तो नीचे आ गया है पर कुसुम अभी भी ऊपर है। जब वह ऊपर गईं तो उनकी चीख निकल गई। सीढ़ियों के पास बैठी कुसुम भी मोहित की तरह उल्टी कर रही थी।
बद्रीनाथ और विशाल ने उन दोनों को अस्पताल पहुँचाने की व्यवस्था की। पुष्कर को उमा और किशोरी का खयाल रखने को कहकर दोनों कुसुम और मोहित को अस्पताल ले गए। आस पड़ोस के लोग शोर सुनकर आ गए थे। केदारनाथ भी सुनंदा और सोनम के साथ भागकर आए। सब सोच रहे थे कि अचानक कुसुम और मोहित को क्या हो गया। पार्टी में तो ठीक ठाक थे। किशोरी रो रो कर कह रही थीं कि कहा था होटल में जाकर जन्मदिन मत मनाओ। हर तरह के लोग आते हैं वहाँ। किसी ने नज़र लगा दी। वह रोती जा रही थीं और भगवान से मना रही थीं कि सब ठीक रहे। उमा का भी बुरा हाल था। सब लोग तसल्ली दे रहे थे कि सब ठीक हो जाएगा। लेकिन केदारनाथ के मोबाइल पर बड़ी मनहूस खबर आई।
पुष्कर फिर रुक गया। सब बताते हुए भावनाओं का जो सैलाब मन में उमड़ रहा था वह उसे शांत करने की कोशिश कर रहा था। पुष्कर ने कहा,
"गला सूख रहा है। पानी रखना भूल गए। नीचे से पानी पीकर आता हूँ।"
दिशा को याद आया। खाना खाने के बाद पुष्कर ने कहा था कि जग खाली हो गया है। नीचे से पानी ले आता हूँ। लेकिन दोनों बातों में लग गए और भूल गए। पुष्कर जग लेकर नीचे चला गया। उसने पानी पिया। जग भरकर ऊपर आ रहा था जब कानों में सुनाई पड़ा।
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
उसके बाद जय बजरंगबली का नारा लगा। इसका मतलब था कि पाठ खत्म हो गया था। पुष्कर को लगा कि कहीं कोई उसे नीचे देखकर सवाल ना करे। इसलिए वह जल्दी से ऊपर चला गया। दिशा के कानों में भी जय बजरंगबली का नारा सुनाई दिया था। उसके बाद आवाज़ें आना भी बंद हो गई थी। उसने पुष्कर से पूछा,
"क्या पाठ खत्म हो गया है ?"
"हाँ इसलिए मैं जल्दी से ऊपर आ गया।"
दिशा ने उससे कहा कि उसे भी थोड़ा सा पानी पिला दे। पुष्कर ने उसे पानी पिलाया। उसके बाद खुद भी पालथी मारकर बिस्तर में बैठ गया। दिशा ने कंबल उसके पैरों पर भी डाल दिया। पुष्कर ने कहा,
"यह ब्रेक लेना ज़रूरी था दिशा। सब बताते हुए ऐसा लगने लगा था कि जैसे मैं उसी दिन में पहुँच गया हूँ। आंगन में मम्मी और बुआ रो रही थीं। सब उन्हें तसल्ली दे रहे थे। मैं एक कोने में खड़ा था। मेरे दिमाग में खून की उल्टियां करते मोहित की तस्वीर घूम रही थी। मैं लगातार भगवान से कह रहा था कि भाभी और मोहित की रक्षा करें। जब चाचा जी ने वह मनहूस खबर सुनाई तो मैं ज़मीन पर बैठकर ज़ोर ज़ोर से रोने लगा था।"
पुष्कर एकबार फिर भावुक हो गया था। दिशा ने उसका हाथ पकड़ कर यह जतलाया कि सब जानकर उसे भी बहुत दुख हुआ है। उसने पूछा,
"पुष्कर भाभी और मोहित को अस्पताल ले जाया गया था। डॉक्टर्स ने कुछ तो बताया होगा कि उन दोनों को क्या हो गया था जिसके कारण उनकी मौत हो गई।"
"बाद में पापा ने बताया था कि अस्पताल पहुँचने से पहले ही दोनों की मौत हो गई थी। डॉक्टर्स ने सब सुनने के बाद कहा था कि उनके खाने में कुछ ज़हरीली चीज़ थी। जिसके कारण ऐसा हुआ।"
दिशा कुछ सोचकर बोली,
"ऐसा था तो पुलिस केस बना होगा। पोस्टमार्टम हुआ होगा। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में क्या था ?"
पुष्कर ने आँखें झुका लीं। इस बार दुख नहीं शर्मिंदगी थी। दिशा समझ गई कि उसके ससुराल वालों ने मामला ऐसे ही निपटा दिया। उसने कहा,
"तुम्हारी चुप्पी कह रही है कि ना तो पुलिस केस हुआ ना पोस्टमार्टम। पर ऐसा कैसे हो सकता है। जब भी ऐसा कोई केस होता है तो पुलिस को अस्पताल की तरफ से सूचना दी जाती है।"
पुष्कर अभी भी चुप था। दिशा ने कहा,
"पुष्कर कुछ तो बोलो...."
पुष्कर ने कहा,
"मैं अधिक नहीं जानता हूँ। पर जो सुना था उसके हिसाब से पापा और भइया ने इस मामले में पुलिस को शामिल करने से मना कर दिया था। अस्पताल ने भी भाभी और मोहित की भर्ती दर्ज़ नहीं की थी। भाभी और मोहित की लाश घर लाई गई। अगले दिन उनका अंतिम संस्कार हो गया।"
दिशा आश्चर्य से पुष्कर का मुंह देख रही थी। उसने कहा,
"भाभी और मोहित ने सबके साथ रेस्टोरेंट में ही खाया होगा। बाद में तो कुछ खाया नहीं था।"
"मुझे तो नहीं लगता कि कुछ खाया था।"
"पर बीमार केवल वो दोनों हुए। ऐसा कैसे ?"
पुष्कर कुछ नहीं बोला। दिशा ने कहा,
"तुम तब ग्यारहवीं में थे। इतना तो समझते होगे कि उन दोनों के साथ गलत किया गया था। फिर भी तुमने अपने घरवालों से कुछ नहीं कहा। चुपचाप सब हो जाने दिया।"
दिशा के इस आरोप से पुष्कर को बहुत तकलीफ हुई। उसने कहा,
"यह केस बारह साल पुराना है। मैं सत्रह साल का था। मेरी मानसिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। भाभी और मोहित का इस तरह चले जाना सह नहीं पा रहा था। तब दिमाग काम ही नहीं कर रहा था। दूसरी बात यह है कि जो कुछ मैंने तुम्हें बताया वो सारी बातें बाद में सामने आईं। उस समय तो विशाल भइया ने चाचा के मोबाइल पर फोन करके बताया था कि दोनों बच नहीं पाए। उन्हें घर ला रहे हैं। यह सुनते ही शोक का माहौल हो गया था। कोई कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। अड़ोस पड़ोस के लोगों के मन में कुछ आया भी होगा तो उन्होंने तब कुछ कहा नहीं। सारे अंतिम संस्कार हो जाने के बाद पापा ने वह बात मम्मी को बताई थी। इत्तेफाक से मेरे कानों में पड़ गई थी। पर उस समय मैं कुछ कह नहीं पाया था।"
पुष्कर ने यह कहकर फिर नज़रें झुका लीं। दिशा के मन में अब बहुत सारे सवाल खड़े हो गए थे। सबने इतने बड़े हादसे को इतनी आसानी से कैसे नज़रअंदाज़ कर दिया। पुलिस को खबर तक नहीं दी। घरवालों के साथ साथ मोहल्ले में भी सबने चुप्पी साध ली‌। सबसे बड़ी बात कुसुम के माता पिता ने भी सच जानने की कोशिश नहीं की।
अभी तक वह जानना चाहती थी कि हुआ क्या था। अब वह परेशान थी कि घर के दो सदस्य अचानक बीमार होकर मर गए। सबने शोक मनाया पर कारण जानने की कोशिश नहीं की।