Kisan Puran Aada Time - Pratibha Pandey in Hindi Book Reviews by राज बोहरे books and stories PDF | किसान पुराण आड़ा वक्त -प्रतिभा पाण्डेय

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किसान पुराण आड़ा वक्त -प्रतिभा पाण्डेय


समीक्षा लेख
किसान पुराण :आड़ा वक़्त
प्रो0 प्रतिभा पाण्डेय

प्रेमचंद के पहले किसान से जुड़े उपन्यास बहुत कम संख्या में पाए जाते हैं। स्वयं प्रेमचंद ने भी शुरू में किसानों पर ध्यान केंद्रित नहीं किया, बल्कि मध्यवर्ग के कथानक अपनी कृतियों के लिए चुने। निर्मला व गबन जैसे उपन्यासों के बाद उन्होंने किसानों पर अपना ध्यान केंद्रित किया और गोदान जैसा अनूठा उपन्यास अस्तित्व में आया। इसके बाद प्रेमचंद केवल किसानों व ग्रामीणों तथा खेतिहर मजदूरों के कथानकों का चयन करने लगे। चूंकि हिंदी कहानी में प्रेमचंद के पूर्व किसानों से जुड़ी कथा की कोई परंपरा नहीं थी, इसलिए आज जब किसानों के कथानक पर केंद्रित कथा साहित्य की बात होती है, तो प्रेमचंद की परंपरा कहीं जाती है। प्रेमचंद के बाद की तत्काल बाद की पीढ़ी ने यह परंपरा कायम रखी, लेकिन छठे दशक से नवें दशक तक हिंदी कहानी से किसान लगभग गायब हो गया। हंस के पुनर्प्रकाशन यानी सन् 1987--88 के बाद हिंदी में छुटपुट रूप से किसान का पुनरागमन हुआ। सृंजय,महेश कटारे और संजीव ऐसे लेखक हैं, जो सन् 1990 से 2000 तक की अवधि में अनेक कृषक आधारित कहानियां लिखते रहे हैं,लेकिन उपन्यासों की संख्या तब भी नगण्य थी । नयी सदी के आरम्भ होने के बाद ऐसे अनेक कहानीकार प्रकाश में आए, जिन्होंने किसानों पर आधारित कहानियां व उपन्यास लिखना शुरू किया। इसी अवधि में पंकज सुबीर का "अकाल में उत्सव" जैसा बहचर्चित उपन्यास आया, जिसमें अकाल से बदतर हुए किसानों के हालात और लापरवाह व्यवस्था के दर्दनाक किस्से सामने आते हैं। बीच में आए छुटपुट उपन्यासों के बाद सन् 2022 में किसानों के जीवन के समस्त पक्षों को समेटे हुए एक बेहद सशक्त उपन्यास आड़ा वक्त सामने आया है । इसके लेखक राजनारायण बोहरे का यह उपन्यास लिटिल बर्ड पब्लिकेशन से प्रकाशित है और उनका लिखा हुआ दूसरा उपन्यास है।
इसका कथानक मूलतः किसान जुगल किशोर उर्फ दादा का है। दादा के भाई स्वरूप और बहन सुभद्रा की अंतर कथाओं पर उपन्यास की विन्यास योजना बनाई गई है । मूल कथानक के नायक जुगल किशोर अपनी जमीन को अपने प्राणों से ज्यादा प्यार करते हैं और उसे किन्ही भी विपरीत स्थितियों में बेचने की कल्पना नहीं करते, इसके लिए उनका तकिया कलाम है कि "जमीन तो आड़े वक्त के लिए होती है!" जुगल किशोर की यह जिद इस हद तक है कि वे घर की सबसे खतरनाक स्थिति को भी आड़ा वक्त नहीं मानते। उनकी यह धारणा भी है कि खेती की जमीन हमारे उपयोग करने के वास्ते विरासत में मिली है , जो कि ज्यों की त्यों हमे अपनी अगली पीढ़ी को सौंप देना है, हम इसे नष्ट करने के हकदार नहीं हैं, इसलिए दादा खेत का एक टुकड़ा भी बेचने के लिए तैयार नहीं होते। उनका छोटा भाई स्वरूप भवन एवम पथ महकमे में ओवरसियर की नौकरी करता है । वह बड़ी ईमानदारी से अपना काम करता है, इस कारण वह अपने वर्ग के दूसरे अधिकारियों की तुलना में आर्थिक रूप से विपन्न है। विभाग के भ्रष्ट अधिकारी उसे छोटी मोटी साजिशों में फंसा कर तंग करते रहते हैं। रात दिन के तनाव से बढ़ते ब्लड प्रेशर की वजह से अंततः उसे किडनी की बीमारी हो जाती है। दोनों भाइयों की बहन सुभद्रा पास के एक गांव में ब्याही गई है, जहां बांध बनने के कारण उनके खेत और जमीन डूब में आ गई है और उसे विस्थापन का दर्द भोगना पड़ रहा है ।
उपन्यास के आरंभ में ही दादा जुगल किशोर जब स्वरूप को नौकरी ज्वाइन कराने छत्तीसगढ़ के लवाकेरा गांव में गए हैं । तब वे पीडब्ल्यूडी के स्टोर के लिए आदिवासी के खेत का अधिग्रहण किए जाने का विरोध करते हैं और स्वरूप से कहते हैं सरकारी जमीन यहां वहां बहुत सी पड़ी हुई है, इस के खेत से क्या हरा रंग लगा है?
इस उपन्यास में गरीबी और मध्यवर्ग के सीमांत पर टिके हुए किसान की तकलीफें है, उसकी जिजीविषा है,उसके छोटे-छोटे सुख-दुःख और खेती करने के अपने अलग अंदाज हैं।
यह उपन्यास आधुनिक किसान और उसके इर्द-गिर्द के परिवार जनों पर केंद्रित है ।उपन्यास के अंतिम भाग में की कथा यह है कि किसान जुगल किशोर अस्पताल में भर्ती हैँ। शासन द्वारा दादा सहित उनके पूरे गांव की जमीन अधिग्रहण करने का निर्णय ले लिया गया है क्योकि वहां अब इंडस्ट्रियल एरिया बनाया जाएगा । अपनी जमीन के चले जाने के सदमे में किसान जुगल किशोर बेहोश होकर गिर जाते हैं, जिन्हें भोपाल में गैस पीड़ितों वाले अस्पताल में दाखिल कराया गया है। वहां उन्हें देखने के वास्ते सुभद्रा पहुंचती है । सुभद्रा को यह भी पता लगता है कि दादा जुगल किशोर के छोटे भाई स्वरूप के देहावसान के बाद गुस्सा हो गए स्वरूप के परिवार ने एक हौलनाक काम किया है- स्वरूप के बेटे टिंकू ने बिना हिस्सा पटा किए अपने हिस्से की जमीन इलाके के एमएलए को औने पौने दाम में भेज दी है और पैसा अंटी में दबाकर भाग गया है। उसी वक़्त टिंकू भी अपने ताऊ को देखने अस्पताल आता है, तब सुभद्रा और टिंकू के संवाद बहुत रोचक हैं ।
सुभद्रा जहां पिछली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं किसानों की अगली पीढ़ी का प्रतिनिधि टिंकू जमीन को खास महत्व नहीं देता, बल्कि यह कहें कि वह किसी खास जमीन और गाँव विशेष को महत्व नहीं देता। वह कहता है कि यहां की जमीन बेचकर हम कहीं और ले लेंगे या यहां की जमीन अधिग्रहण हो जाने के बाद मिले मुआवजे से हम कहीं दूर जमीन ले लेंगे। टिंकू यह भी कहता है कि ताऊ जिस जमीन को बुरे से बुरे वक्त में रोके रहे क्योंकि वे कहते थे कि जमीन आड़े वक्त के लिए होती है, अब उसी जमीन पर आड़ा वक्त आ गया है । इस तरह अपने अनूठे शीर्षक , सशक्त कथानक और क्षिप्र संवादों के साथ यह उपन्यास बड़े यत्न पूर्वक और पूरी दक्षता व सावधानी से लिखा गया है।
गाँव के किसान से जुड़ी हर समस्या को उपन्यास में न केवल व्याख्यायित किया गया है, बल्कि उससे जूझने की कथा भी आती है। विदेशी खाद और बीज उपयोग करने की गलती से फसल बरबाद होने से किसान बरबाद होते जा रहे हैँ, दादा यह नही करते। वे हमेशा आजमाए हुए बीज ही काम मे लाते हैं और कम्पोस्ट खाद को बापरते हैँ। बच्चे पढ़ने के वास्ते बाहर शहर में जाते हैं तो उनके खर्च पर नियंत्रण रखना जरूरी है अन्यथा उनके पर निकल आते हैँ,कर्ज पे कर्ज होता जाता है तो अंत मे खेत बेचना ही पड़ता है। किसान क्रेडिट कार्ड भी एक समस्या बन गयी है, यह दिया तो गया था खेती के जरूरी खर्च के वास्ते लेकिन घर खर्च में ही इसका उपयोग हो रहा है, जरा सी जरूरत आन पड़ी तो लोग इस कार्ड को बिना हिचक ए टी एम में जा के फंसा देते हैं औऱ मनमानी राशि निकाल लेते हैं जो अनदेखा कर्ज होता है इसलिए फसल बेचने के बाद आये पैसे में से सबसे पहले किसान क्रेडिट कार्ड से निकाले रुपए की कटौती की जाती है जो किसानों को बहुत अखरती है क्योंकि किसान तो फसल का मीर है,फसल आने पर वह बहुत से अटके काम करना चाहता है,शादी ब्याह भी इसी समय करना चाहते हैं ,पर सारे अरमान धराशायी हो जाते हैं क्योकि बच्चों द्वारा जरूरत बेजरूरत निकाले रुपये फसल की बिक्री में से आए धन से कट जाते हैँ।किसान ठगा सा रह जाता है ।
उपन्यास से पता लगता है कि कुँआ खुदवाने की कसरत बड़ी लम्बी होती है। कुँआ गुनवाने की प्रक्रिया, खनवरियों ( कुँआ खोदने वाले खास मजदूरों) के काम करने की प्रक्रिया,जल आते ही मिठाई बंटवाने की प्रथा,कर्ज लेने की मशक्कत और कुँआ बंध जाने के बाद उसके डोरा(उद्घाटन)के कर्मकांड किसान को फिजूलखर्ची के भँवर में उलझा देते हैँ।
उपन्यास में रीति रिवाजों का खूब वर्णन है,सुभद्रा की विदाई पर वह अपने हाथों में भर कर खील बताशे पीछे उछालते हुए दरवाजे से निकलती है,इन बताशों को भाभियां अपने पल्लू में सुरक्षित करती रहती हैँ।
साल दर साल अकाल पड़ते हैँ तो अच्छे खासे किसानों की हालत भी खराब हो जाती है। जुगल किशोर के गाँव मे भी तीन साल अकाल पड़ता है तो सोलह साल का जुगलकिशोर घर की इमदाद के वास्ते अकाल राहत केंद्र में मजदूरी करने जाना चाहता है लेकिन उसका पिता उसे रोकता है क्योंकि सवर्ण कृषक का मजदूरी करना डीक्लास होना होता है, जिसे सामान्य घटना नहीं माना जाता है। दबंग जुगलकिशोर पिता को मना के मजदूरी करने निकलता है। वहां भी जबरदस्त शोषण है , जिसमें कम मजदूरी देने के अलावा स्त्री मजदूरों का शारीरिक शोषण भी किया जाता है। जुगलकिशोर की बांह फड़क उठती है।वह श्रमिकों को संगठित करने लगता है।अन्त में एक किशोरी मजदूर को खन्ना के पास पहुंचाने की बजाय वह वापस उसके गाँव पहुँचा के घर लौट आता है।यह उसके द्वारा अपनी सीमा में रह कर शोषण के खिलाफ किया गया विद्रोह और विरोध है। लेखक एक किशोर के भीतर भी विद्रोह के बीज अंकुरित होते हुए देखते हैँ।
बडे भाई के संस्कार सदैव छोटों पर भी प्रभाव स्थापित करते हैं।दादा की ईमानदारी का असर उनके भाई पर भी पड़ता है तो वह ओवरसियर की नौकरी भी पूरी ईमानदारी से करता है इसीलिए रिश्वतखोरी में लिप्त साथी इंजीनियर उसे कांस्पिरेसी करके उस पर जुर्माना लगवा देते हैँ।तनाव की वजह से सरूप के रक्त चाप में वृद्धि हो जाती है और इसका असर उसकी किडनियों पर होता है।वह प्राणघातक बीमारी का शिकार हो जाता हैं।
जिद और जुनून की इस आदत के चलते दादा भयंकर चूक कर बैठते हैं कि वे सरूप की खतरनाक बीमारी की इलाज के लिए भी जमीन नही बेचते और सरूप की अकस्मात मृत्यु हो जाती है। सरूप के परिवार का गुस्सा इस कदर बढ़ता है कि छोटा बेटा टिंकू चुपचाप ही अपनी जमीन को बेच देता है। यह खबर सुन दादा को गहरा आघात होता है। फिर सरकार द्वारा गांव की सारी जमीन अधिग्रहण की जा कर इंडस्ट्रियल एरिया बनाने का निर्णय दादा को असहनीय झटका देता है और वे मूर्छित हो जाते हैँ। जमीन को पुरखो की तरह प्यार करते दादा के हाथ से जमीन चले जाने से गहरा आघात भला क्या हो सकता है।
खेती की जमीन को सरकार अपने संस्थान स्थापित करने से लेकर सड़क बनाने,फेक्ट्री लगवाने त्तथा अपना नाम कमाने के वास्ते सहसा बाँध बनवाने तक के लिए आँख मूंद कर अधिग्रहीत करती जा रही हैं और खेती के लिए जमीन कम होती जा रही हैँ, इस मुद्दे को लेखक ने बड़ी शिद्दत से उठाया है।
लम्बे अरसे बाद हिन्दी में ऐसा उपन्यास देखने में आया है जो किसान महाकाव्य कहा जा सकता है, जो रोचक भी है,ज्ञान वर्धक भी।
यह उपन्यास खूब पसंद किया जायगा और किसानों पर लिखी बेहद सशक्त कृत्ति के रूप में इसे याद किया जायेगा।
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पुस्तक- आड़ा वक्त उपन्यास
प्रकाशक-लिटिल वर्ड पब्लिकेशन दिल्ली
लेखक-राजनारायण बोहरे
पृष्ठ-148
मूल्य-280₹