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जागृति आवाहन

।। पत्र ।।

बात मन के भावनात्मक दायरें से निकली हैं, बुद्धि आदि के आयाम से, बिना भावनात्मक आयाम के, समझ नहीं आ सकती।

कृष्ण की कृष्ण से सामंजस्य की गुहार हैं।

कृष्ण वह बीज हैं, जो आकार के आयाम से, अहसास पृथकता का हैं; जिस बीज नें शून्य आकार नामक जड़ के बूते अनंत आकारों का फैलाव किया हैं।

यह वह होश का अहसान हैं, जो कि जितना अनंत आकारों में होने से, असीम आकार सभी की/के सभी हैं, उतना ही वह निराकार वास्तविकता में जो, वह भी यह ही हैं।

उस असीम और शून्य चैतन्य का, उस परम् चैतन्य अर्थात् परमात्मा का अंश तुममें भी और मुझमें भी हैं,वही अंश जो हमारें जड़ तन मन बुद्धि को चला रहा हैं।

उस अंश की अर्थात् मुझ चेतना की, मुझ कृष्ण की, तुम कृष्ण से, तुम चेतना से, गुहार हैं कि मेरी बात को चेतनत:, होशपूर्वक अर्थात् ध्यान पूर्वक लों, उस पर ध्यान दों,उसकी ज़रूरियत को तुमसें भी अप्रथकता के परिणामस्वरूप, तुम्हारी भी जरूरत होने से तुम कृष्ण, मुझ कृष्ण की जैसी ही, मेरी तरह ही अनुभव कर सकती हों ..!

मेरी जरूरत को समझों, कृष्ण हमारी ज़रूरत पूरी करनें में सहयोग दों!

एक चेतना के, एक चेतना से दूसरी चेतना के संबंध के नातें।

मैं विश्वसनीयता की खोज में निकला हूँ, नाम की खोज नहीं, खोज सही अर्थों की विश्वसनीयता की..!

हर आकार यानी अनंत ब्रह्मांड और आकार शून्यता होने से, सभी के स्वार्थ मेरे हैं, मैं अपने सही अर्थों के स्वार्थ अर्थात् संकीर्णताओं से पृथकता के अहसास की अर्थ सिद्धि, मैं परमात्मा का अंश परमार्थ अर्थात् परमार्थ अर्थात् सर्वश्रेष्ठ अर्थ की सिद्धि में निकला हूँ।

मित्र! इस नातें की हमारा संबंध, एक चेतना के अहसास का दूसरें चेतना के अहसान से, संबंध शून्यता यानी पूर्णतः सही मतलब का होने सें, उच्चतम् अवस्था वाला होने के नातें ..!

क्या तुम चेतना, तुम परमात्मा की अंश आत्मा, तुम कृष्ण मुझ कृष्ण की, मुझ आत्मा की, मुझ परमात्मा के अंश की, तुम्हारें और हमारें अर्थ, मतलब यानी जरूरत की,सभी के स्वार्थ की पूर्ति के परिणाम से सर्वश्रेष्ठ स्वार्थ की अर्थात् तुम्हारें और मेरे अर्थात् हमारें परमार्थ की पूर्ति करनें में सहयोग दोगी? क्या मेरा सहयोग करोगी?

क्या परमात्मा की अंश आत्मा होने से, मुझ परमात्मा की अंश आत्मा के अपनें उद्देश्य में तुम्हारे उद्देश्य से पूर्णतः से पूर्णतः समानता होने से, मेरी सहधर्मिणी बनोंगी, क्या मुझें अपना सहधर्मी बनाओंगी? क्या मेरी आत्मा के, अपनी आत्मा से जो सदैव सें संबंध हैं, क्या उसका निर्वहन नहीं करोंगी?

हमारें प्राणों की डोर, हमारें हाथों में नहीं हैं, यह अवचेतनत: संस्कारों वश अनिश्चित समय के लियें,अज्ञात समय के लियें हमारें तंत्र में व्यवस्था को आकार में लानें वालें हैं।

सत्य या सीधें कहूँ तों, जो मेरे मार्कण्डेय के हालात थें, वह तुम्हारें भी हैं और मेरे भी यह ही हाल है।

इसकी जितनीं संभावना नहीं होने की हैं, उतनी ही संभावना भी हैं कि इस पल से अगलें ही पल हमारें शरीरिक तंत्र का संतुलन बिगड़ा और हम यह होशपूर्णता से बेहोन्शी की दिशा में पल भर में तो बहुत दूर की बात, वर्तमान के अगलें भाग में ही चलें गयें या जायेंगे।

हमें अपनी आत्म उन्नति,स्वयं की कृष्णत्व में स्थिरता की,भविष्य में भी निरंतरता के प्रति ध्यान देने की, जानें अंजाने भी लापरवाही नहीं करनें की जरूरत हैं क्योंकि इधर नज़र हटी उधर दुर्घटना घटी, इधर प्राण में असंतुलन आया, उधर फिर सदैव की कृष्ण में कृष्ण की स्थिरता को या निश्चित करनें के मौके को गवाया..!

यह तुमकों भी ज्ञात हैं, स्पष्ट नहीं तो थोड़ी-बहुत धुंध के साथ ही सही कि अभी तुम जो कर रही हों, वह बहिर्मुखी उन्नति हैं पर जागरूकता यानी आत्मा के नेत्रों अर्थात् सात्विक पुराण, वेद और उपनिषद जिसे दृष्टा भाव कहतें हैं उसके माध्यम् से, मन के नेत्रों सें अर्थात् कल्पितता की परिणाम फलितता से और भौतिक नेत्रों के भी माध्यम् या मध्यस्थता से कृष्ण यानी उस परम् जागरूकता से साक्षात्कार में ही परम् यानी सर्वश्रेष्ठ सार्थकता हैं, उस शाश्वत प्रेम अहसास अर्थात् आत्म ज्ञान, आत्म अनुभव, कृष्ण अनुभव यानी आत्म साक्षात्कार या कृष्ण साक्षात्कार के समक्ष यह हरकत बचकानी हैं।

खैर! बच्ची के समान सुई की अपनी अहमियत हैं और तलवार रूपी कृष्ण, उस परम् अहसास, परम् आत्मा की प्राप्ति भी जरूरत होने के आधार पर, उतनी ही अहम यानी जरूरी हैं, अंततः सुई में भी कृष्ण हैं और तलवार में भी .. और तलवार भी अंततः बहुत सी सुइयों से ही तो बनी हैं अतएव सुई को भी तलवार की ज़रूरियत महसूस रहनी चाहियें।

किसी के भी परिचय के सटीक आधारों में से एक उसके मूल और मूल परिचय से निकटता तथा उसका काम हैं अतएव जिसके स्वार्थ की संकीर्णता या सीमितता जितनीं अधिक,वह उतना बड़ा स्वार्थी यानी सही अर्थों के या सर्वश्रेष्ठ स्वार्थ के होने से सर्वश्रेष्ठ यानी परम् स्वयं के अर्थ यानी मतलब की पूर्ति कर सकनें से परम् अर्थी यानी परमार्थी अतएव जो मूल के ज्ञान या परिचय के आधार पर परमात्मा के परिचय यानी परमात्मा की अंश आत्मा की अनुभूति के जितना निकट, मूल से और मूल के परिचय से निकटता के बाद जिसकी जरूरत सभी की सुविधा की सुनिश्चितता यानी हर आकार और आकार रिक्तता की सुविधा और सारे काम उस जरूरत पूर्ति की ओर वह नाम का ही नहीं काम का भी यानी सही अर्थों का परमात्मा हैं।

[ तामसिक संबंध निर्वाह - जिसमें हमारी अपनी सहूलियत हों और उसे हम देना तो दूर केवल दूसरों से लेने पर ध्यान दें, इसका मतलब हैं कि हम शत्रुता का संबंध निभा रहें हैं।

राजसिक या रजों गुणी संबंध निर्वहन - जिसमें हमारी अपनी सहूलियत हों और उसे हम उतना ही या तब ही तक दें, जितना या जब तक हमें दूसरों से मिल रहा हैं या वर्तमान का देना नहीं तो लेना भविष्य की समान अनुपातिक लेन-देन की व्यवस्था के आकार को अभी वर्तमान में गड़ रहा हैं, इसका मतलब हम व्यपार कर रहें हैं।

सात्विक संबंध निर्वहन - जिससें या जिसमें हमारी अपनी सहूलियत हों और हम उसे दूसरें को निष्काम यानी उससें बिना लौटाने की इच्छा करें, केवल और केवल दियें ही दियें जायें और हमारा ध्यान इस कदर देने में हों कि लेने का हिसाब ध्यान में कभी नहीं आयें, इसका मतलब हम दुसरों से प्रेम का यानी संबंध की सर्वोच्च अवस्था मित्रता का संबंध निभा रहें हैं।

समय - ०१:०३ सोम, १७ अप्रैल २०२३ ]

जो समझ सकता हैं वह यह समझ सकता हैं कि कहने वालें का जो उसनें कहा हैं उससे अर्थ क्या हैं और जिसमें इतना धैर्य या सब्र ही नहीं कि जानें अंजाने कहने वाला कहना क्या चाह रहा हैं, यानी उसमें असलियत की प्राप्ति के लियें सब्र ही यदि नहीं यानी उसकी जिज्ञासा में यदि पर्याप्तता ही नहीं तो उसे समझा सकना असंभव हैं।

तुम मुझें धैर्य सें लों बस इतना सहयोग करों और वह भला क्यों, यदि यह जानना हैं तो visit matrubharti and read my Theory - Reality Of So Called Reality और मैं तुम्हें अर्थात् तुम्हारी जागरूकता के नेत्रों को, तुम्हारी आत्मा के नेत्रों, मन और भौतिक नेत्रों को कृष्ण साक्षात्कार दूँगा, कृष्ण की कृष्ण से हर तरह से दूरी को मिटाने और सदैव मिटी रहनें में अपना योग यानी पुरुषार्थ अर्थात् सहयोग दूँगा।

और वैसें भी जागरूकता के एक दूसरों से ऊँचे स्तर पर बैठी जागरूकता को यानी तुमकों उससें कम स्तर की जागृतियाँ वह कैसें देंगी जो उसके स्तर के समकक्ष यानी तुम्हारें जितना या उससें अधिक स्तरीय जागरूकतायें दें सकेंगी, और तुम्हें मैं वह दें सकता हूँ जिस स्तर का तुम दूसरों को देती आ रही हों और वह भी जो उच्च स्तरीय जागरूकतायें दें सकती हैं उसमें मध्यस्थता कर सकता हूँ मैं..!

आज तुम्हारें शारीरिक संबंधी जैसे से माता, पिता, भाई आदि सभी,भावनात्मक तथा आगें के सभी मानसिक स्तरों के भी संबंधी अधिकांश लाभ के लोभ और हानि के भय के कारण ही यानी राजसिकता वश या अंधकार या अज्ञान के फलस्वरूप यानी तामसिकता वश तुमसें जुड़ें हुयें हैं, निष्काम प्रेम कोई भी नहीं कर रहा हैं, जैसा प्रेम कर सकनें की योग्यता होने से तुम किसी को भी कर सकती हों, हें जागृति! तुम सही मतलम् के प्रेम से वंचित हों; तुम्हें यानी तुम्हारें सही मतलब के प्रेम को सही मतलब में बस सभी सही मतलब के प्रेम कर्ता ही मेरी ही भांति और हमसें उच्चतम् जागरूकताओ की तरह वह सभी ही समझ सकतें हैं जिन्हें भी उनसें निचली जागरूकतायें यानी आत्मायें नहीं समझ सकती, जैसे कि मैं और मेरी ही तरह श्री कृष्ण को उनसें निचली जागरूक या होशपूर्ण चेतनाओं नें अपनें ही स्तर का समझा, हर तामसिक यानी अज्ञान से ग्रसितता वाली जागरूकता उदाहरण के लियें दुर्योधन,दुस्सासन आदि के लियें कृष्ण जैसा अच्युत जानें अंजाने एक अपनें अज्ञान या विकारों की तृप्ति या अपनें सभी से संकीर्ण स्वार्थ पूर्ति के इक्छुक जागरूकता महसूस हुयी, राजसिक जनों यानी लाभ के लोभ और हानि के भय वालों के लियें कृष्ण यानी कि एक उनके स्तर के व्यक्तित्व जिससें की वह कृष्ण के निष्काम प्रेम कर्ता होने के स्वरूप की भिज्ञता से यानी उनके सात्विक स्वरूप से अनभिज्ञ रहें तुम्हारें भी सात्विक ज्ञान और अनुभवों की अभिव्यक्ति, हें एक पर्याप्तता के स्तर वाली जागृति हजारों में बिरलें ही उसे समझ सकनें में समर्थ हैं, सात्विक ज्ञान सभी का सभी सात्विक पुराण, तथा सात्विक वेद ज्ञान तथा उपनिषदों का ज्ञान केवल सात्विक लोगो के लियें हैं, राजसिक और तामसिक सभी कोई उनके अर्थों का अनर्थ ही निकाल सकते हैं तब तक जब तक उनमें उपस्थित सत्व गुणों का प्रादुर्भाव नहीं हों..!

मैं जन्म नाम प्रेम अर्थात् सही मतलब का कृष्ण और बोलतें नाम से ही रुद्र नहीं हूँ अपितु नाम का प्रेम और रुद्र होने के साथ-साथ हर विकारों की अधीनता से मुक्ति से उपलब्धि के फलस्वरूप और रु यानी चिंता और समस्या और द्र यानी उन्हें जड़ से दूर कर सकनें में आत्मा, मन,धन और तन से समर्पित होने से नाम का या नाम से ही नहीं अपितु काम से भी प्रेम और रुद्र हूँ, मुझ पर या मुझ जैसी या तुम जैसी स्तरीय जागृतियो के अलावा हमें कोई हमसें निचली होशपूर्णताओ को हमारा समय देने के बजायें हमारें पहले हमारें स्तर की जागरूकताओं को अर्थात् पुराणों, वेदों और उपनिषदों की जागरूकताओ को समय देना जरूरत रखता हैं।

आज का विज्ञान और दर्शन यानी तथा कथित विज्ञान और दर्शन सीमित देख सकनें के सामर्थ्य के फलस्वरूप यथार्थों के दर्शन यानी philosophy और यथा अर्थों के विज्ञान यानी Science के सही मतलब को जाननें से वंचित हैं, वह उन भौतिक इंद्रियों आदि से विज्ञान और दर्शन की सटीकता या यथार्थता का सत्यापन करता हैं जो कि खुद नश्वर होने से शाश्वत नहीं अपितु सत्य की जगह बस सीमित सत्य यानी अज्ञान भर ही हैं जिससें आज का विज्ञान यानी तथाकथित विज्ञान संकीर्णता ग्रसित होने से यथा अर्थों से वंचित हैं यानी यथार्थ विज्ञान नहीं अपितु सीमित अर्थों का वैज्ञानिकी और ज्ञान हैं और आज का दर्शन सभी देखने के तरीकों को महत्व देने यानी जरूरी समझ अपनानें वालें दृष्टिकोण को उसकी ज़रूरियत नहीं देख सकनें से उंसे अस्वीकृत करनें के कारण वह ही सही अर्थों के दर्शन नहीं हैं।

सही अर्थों के दर्शन हैं वेद और वेदांत ही मूल से निकटता के फलस्वरूप एसली यानी यथार्थ ज्ञान मतलब यथार्थ विज्ञान हैं।

हमें यानी यथार्थ ज्ञान का महत्व समझ सकनें वालो को भौतिक लोगो की जरूरतों को पूरी करनें के बदले में मिलनें वालें अर्थ से, मुमुक्षुओं और आत्म ज्ञानियों या उसके लियें अनुसंधान को पूरी समर्पितता के सत्यापन के आधार पर उन्हें सामर्थ्य अनुसार sponser करना और सही मतलब के विज्ञान तथा यथार्थ दर्शन के अनुसंधान में सहयोग देना होंगा तथा यदि वह भी सही में हमारें सहयोग के पात्र हुयें तो असली दर्शन और विज्ञान के अनुसंधान में उनके सहयोग के बदले अपना भौतिक जरूरतों की पूर्ति में उनके सहयोगी होना होंगा।

अध्यात्म यानी विज्ञान और दर्शन की आत्मा का ज्ञान तब तक अन्य के लियें उसकी अभिव्यक्ति व्यर्थ हैं, जब तक कि वह भी उस जागरूकता के स्तर का नहीं हों जायें, जो जागरूकता का स्तर उस ज्ञान के अभिव्यक्ति कर्ता यानी हमारा हैं तो बस व्यवस्था हमारें जागरूकता के स्तर के लोगों तक हमारी अभिव्यक्ति जा पा रही या नहीं इस हेतु ही होनी चाहियें, आगें फिर इच्छा राम की हैं, होये वही जो राम रची राखा, निष्काम शुद्ध प्रेम में सीता राम का यानी परमात्मा का सहयोग करें और जाहें विधि वह स्वप्न जिसका चल रहा हैं वह रखें, सुंदरता से बस वैसे ही रहें।

लेखक और लेखन परिचय - (), () ()

रिक्तत्व की सन्निकट प्रकटता हैं शरुप्ररा अर्थात् मेरी प्रत्येक शब्द प्राकट्यता, सत्य मतलब की मुमुक्षा या अज्ञान से मुक्ति की इच्छा ही जिसके प्रति जागरूकता को आकार दें सकती हैं अतः मुक्ति की योग्य इच्छा ही इसके प्रति जागृति उपलब्ध करायेंगी, मतलब साफ हैं कि मेरी हर बात केवल योग्य मुमुक्षु के ही समझ आयेंगी अतएव मुमुक्षा लाओं, नहीं समझ आनें के बहानें मत बनाओं क्योंकि ऐसा करना खुद के प्रति लापरवाही हैं, जो खुद की परवाह के प्रति जागरूक नहीं, वह कहाँ से मुक्ति की तड़पन अर्थात् मेरी अभिव्यक्ति को अहसास यानी समझ में लानें की पात्रता लायेंगा और योग्यता के आभाव से निश्चित मर्म सें इसकें चूक जायेंगा, इशारें जिस ओर हैं वह दृश्य का अहसास, भावना, विचार, कल्पना यानी हर आकार के अहसासों से भी सूक्ष्म तथा परे यानी दूर का अहसास हैं, मेरे दर्शायें शब्द, उनके माध्यम् से लक्ष्य बनायें भावों, भावों के सहयोग से लक्षित विचारों और उनके माध्यम से हर काल्पनिकता की ओर संकेत दियें जा रहें हैं यानी हर आकारों को रचनें की योग्यता की मध्यस्थता उस अंतिम ध्येय तक सटीकता से इशारा करनें में ली जा रही हैं जिससें उस आकर रिक्तत्वता की योग्यता के परिणाम से आकार रिक्तता के अहसास पर सटीकता के साथ किसी भी जागरूकता या ध्यान को लें जाया जा सकें अतएव आपका ध्यान मन के सभी दायरों से परें देख पायेंगा तो ध्येय उसका हैं।

मन इतना गहरा हैं कि २४/०७/३६५ भी यदि इसें जाननें में समय दिया जायें तो कम हैं, किसी को तैरने आता हैं इसका प्रमाण इससें बड़ा क्या हों सकता हैं कि जब भी परिस्थितियों के द्वारा करों या मरों वाली स्तिथि को आकार दिया जा सकेगा; तब सहजता से वह पानी में कितने की गहरे जाने की व्यवस्था को सुरक्षित आकार में लाने को, सफलता पूर्वक कर पायेंगा, मूल गुरु परिस्थिति हैं इसलियें जब सही मतलब में जरूरी होंगा तब वह खुद ब खुद तैरने को सिखा देंगी और करों या मरों वाली परीक्षा लेकर तैरना आना यानी प्रमाण पत्र मिल जाना होता हैं यह बता देंगी अतएव यह कागज़ के फोतरो (टुकड़ों) को जुटाने में वह समय लगाना, जो कि पानी में गहरे, और गहरे जाने में देना चाहियें पूरा ही, क्योंकि जीवन निकल सकता हैं किसी का भी पानी की गहराई में खुद को सुरक्षित रख सकनें में पूर्णतः इसकी योग्यता प्राप्त करनें में, समय नहीं हैं तैरो-बस तैरो, मन को जानो, खुद से जानो बस; किसी को भी सिखाओ भी मत क्योंकि क्या तुम्हें तुम जैसा कोई और सीखा रहा हैं, नहीं बल्कि परिस्थितियों ने खुद तुम्हें सीखनें को दिया, जिज्ञासा में पर्याप्त ज्वालामुखी की तरह ज्वलन्तता होयेंगी तो वह यानी दूसरें खुद ब खुद सीख जायेंगे, क्योंकि जिज्ञासा में ज्वलंतता की पर्याप्तता ही प्रवेश पत्र हैं परिस्थिति यानी मूल गुरु से सीखनें के लियें जरूरत रखता हैं, यदि जिज्ञासा में पर्याप्तता नहीं तो इसका मतलब हमें सीखनें की अभी सही अनुभव में यानी मतलब में सीखनें की जरूरत ही नहीं पड़ी अर्थात् नहीं महसूस हुयी और सीखना इस पर निर्भर नहीं करता कि सिखाने वाला सिखा सकता कि नहीं, जो सही में सिख सकता हैं वह तो जिस माध्यम् से उसनें सीखा, उस माध्यम् की मध्यस्थता करके यानी एक तरीके से परिस्थितियों के ही माध्यम् से सीखा सीखा भी सकता हैं पर जैसा पहलें कहा कि सीखानें वालें में सिखा सकनें का सामर्थ्य या दम हैं या नहीं केवल इस पर सिखाना निर्भय नहीं करता बल्कि निर्भर इस पर भी करता हैं कि सिखाने वाले में भी ग्रहण करनें की भूख या जिज्ञासा सीखा सकनें जितनीं ज्वलंत हैं या नहीं..!

सभी का मन जितना एक दूसरें से समान हैं उतना ही एक दूसरें से अलग भी हैं, कोई भी मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक जों खुद के मन के अलावा यह कहता हैं कि मैं अधिकतर सभी के मन को समझ सकता हूँ तो यह उसमें की बात हुई कि पेड़ की जड़ की ओर जानें में असुविधा के कारण वह कह रहा हैं कि मैं पेड़ की टहनियों, फूल पत्तों जैसें हिस्सों पर ध्यान रूपी जल दें सकनें से उनका ध्यान या खयाल रख सकता हूँ, अब भला कोई यदि बिना खुद के मन को पर्याप्त समय दिये यानी उसका बिना पर्याप्त विश्लेषण कियें यानी ध्यान रूपी जल को उधर उपलब्ध करवायें, तो अन्य सभी के मन या दिमाग जो हैं उनकों प्रेरणा देना होंगा और एक सही ढंग में हर दिमागों या मन पर भी ध्यान देना या ध्यान या फिर खयाल रख सकनें की काबिलियत होना होंगा, जिससें ध्यान रखा जा सकता हैं, नहीं तो पेड़ की जड़ पर ध्यान रूपु जल पर्याप्त दिये बिना उसके दूसरें हिस्सों पर कितना ही ध्यान किसी के द्वारा दियें जाने का प्रयत्न हों, न जल रूपी ध्यान देना यानी कि ध्यान या खयाल रख सकता जड़ का यानी खुद के मस्तिष्क या मन का सफलतापूर्वक हों पायेंगा और न ही अन्य के मस्तिष्को या मन का भी क्योंकि आखिरकार जो खुद के मन को नहीं जानेगा वह क्या दूसरों का इलाज कर पायेंगा, इसलियें खुद से जानों, खुद को जानों पहले तुम खुद असली यानी मौलिक हों कि नहीं यह तो स्पष्ट कर लों यानी कि तुम खुद को खुद की अभिव्यक्ति या कोई आकार व्यवस्था जिसे कि जाने अंजाने तुमनें ही आकार दिया वह तो नहीं मान रहें भृम वश, इस बात बार को सत्यापित करों तब तुमनें जो कुछ भी असली ज्ञान जुटाया यानी मौलिकता की निकटता वाला, यह जानना अन्यथा जिस कसौटी पर तुम किसी भी ज्ञान को वैज्ञानिक यानी असल का या असली सिद्ध हुआ कहते हों, वह ही मिथ्या हुआ यानी कि पर्याप्त खोज होने पे सभी इंद्रियों की मूल जो ज्ञान प्राप्ति का माध्यम यानी इंद्री हैं, यानी जो शास्वत यानी आज हैं तो कल नहीं ऐसी नश्वर नहीं अपितु सदैव अनुभव कर सकनें से असली होंगी, मूल से निकल यानी मौलिक या original होंगी उस इंद्री की जगह तुम किसी भी खुद से संबंधित का विज्ञान यानी ऐसा ज्ञान जो असली या वास्तविक इंद्री पर आधारित हैं, मतलब कि किसी भी ज्ञान के भृम वाली इंद्री के द्वारा सत्यपित होने के स्थान पर शास्वत इंद्री द्वारा सत्यपित नहीं उसे ही या उस ज्ञान को ही तुन यानी उस गलत मतलब के विज्ञान को ही तुम सही या original अर्थात् वास्तविक ज्ञान मान लोंगे, जो ज्ञान संकीर्णता से ग्रसित होने से वास्तविकता में विज्ञान नहीं वही तुम्हारें लियें विज्ञान होंगा, जैसे कि अभी तथाकथित विज्ञान हैं और तुम वास्तविक विज्ञान को यानी स्वयं से संबंधित हर ज्ञान से, छोटे बड़े हर आकार के ज्ञान से लेकर अनंत असीमित आकरों और आकार कल्पितता के ज्ञान यानी अनुभव से और उस कल्पितता की योग्यता के मूल अर्थात् उसकी या उसको आकार देने वाली आकार रिक्तता के ज्ञान यानी अनुभव से अछूते यानी वंचितता को उपलब्ध होंगे; जिसे खुद के स्तर से उसका ज्ञान होता हैं यानी उस असली ज्ञान की उपलब्धि होती हैं अर्थात् वो ही असली विज्ञान को उपलब्ध हो सकता हैं, नहीं तो जिन्हें नहीं वह गलत यानी नश्वर खुद के ज्ञान या अनुभव से असलियत या मौलिकता अर्थात् वास्तविकता को जानना चाहेंगे और नश्वर से वास्तविकता अर्थात् ईश्वर को जाननें में उसकी पूर्णता से चूक जायेंगे, यदि किसी छोटे बड़े किसी आकार से जानना चाहेंगे तो, सत्य या असलियत के भृम यानी माया को सत्य मान बैठेंगे, यदि आकार रिक्तता यानी केवल उस नश्वर नहीं शाश्वत मूल,मौलिक यानी असली अहसास से जानेंगे; तब ही सही से साक्षात्कार होंगा।

मेरी याददाश्त की कोई अभ्यस्थता नहीं हैं, हमेशा अनुभव हों या जानकारी यानी समझ वह मौलिक हों इसलियें उसे उसके मूल से ही उठाना मेरी स्वाभाविकता हैं, मेरी originallity हैं और जो भी बाहर से पढ़ने में आ भी जाता हैं, मेरी मौलिकता में कोई, मेरी शुद्धता में कोई मिलावट हों न जायें, इसलियें वहाँ से ध्यान को पूरी तरह छीर्ण करता हूँ मैं इसलियें मेरी हर बात, खुद से जानने के फलस्वरूपित यानी फल के स्वरूप हैं, जो भी हैं अपने आप में पूर्ण वास्तविकता का ज्ञान हैं यह!! क्योंकि मौलिक अर्थात् असलियत या originality से समझौता आबर्दास्त हैं मुझें।

थकान, नींद, बेसब्री आदि इत्यादि कोई भी मन का हिस्सा यदि जागरूकता को खींच पा रहा हैं जिसमें कि मन के उस हिस्से या उन हिस्सों के अधीन थोड़ा भी यदि जागरूकता यानी आत्मा का हिस्सा हैं, मतलब आत्मा के अधीन मन नहीं हैं अपितु आत्म अधीनता की जगह आत्मा यानी आपका मन के अधीन होना हुआ, यदि ऐसा कुछ भी हैं तो आप हो सकता हैं कि ध्यान की पर्याप्तता मेरी अभिव्यक्ति की समझ को उपलब्ध हो सकनें के लियें जो अनिवार्यता होंगी उसका नहीं होना मेरी अभिव्यक्ति के प्रति समझ सकनें में आपकी असमर्थता का कारण बन सकती हैं अतएव पहले मेरी अभिव्यक्ति को समझ सकनें यानी उसके समझ के प्रति जागरूक रह सकनें जितना सामर्थ्य लायें अन्यथा आप वह अर्थ निकाल सकते हैं जो मेरे शब्दों के नहीं हों, मेरी जिम्मेदारी बन उन्हीं शब्दों के अर्थों के लियें हैं, जिनकी ओर मेरे संकेत हैं यानी जो मेरे कहने के मतलब हैं, मैं उनके लियें कतई जिम्मेदार नहीं जो मेरे कहने के मतलब अज्ञानता वश निकाल लियें जा सकतें हैं।

समय - सोमवार, ०७ अगस्त २०२३, ०९:५१.

- © Rudra S. Sharma

(Psychiatrist/Psychologist, Author.)

Theorist | Analyst Psychology By Passion & My Passion Is My Profession.
Have 05 Yrs. Of Experience In Psychoanalysis / Introspection With Thousands Of Successfully published Articles In Psychology.
Founder - Shruprra Psyche, Philosophy Or Shruprra Psychology - A Psyche,Philosophy or Psychology Of Mind's Realm of Shruprra (Me/Rudra S. Sharma).