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चमत्कारी रेखाएं

जब मैं पांच साल का था तब मेरे घर एक नन्ही सी परी आई थी, मेरी बहन, कृतिका। मैं उसके साथ खेलता, बातें करता।

भले ही वो गोद ली हुई थी, लेकिन थी मेरे लिए सगी बहन से भी बढ़कर। वो कुछ बोलती नहीं थी। जब वो बड़ी होने लगी, तब भी वो चुप–चुप सी ही रहने लगी। मम्मी–पापा चिंतित थे।

मैं गेम्स खेलता और उन्हें उसको समझाता। वो बस मुझे अपनी बड़ी–बड़ी आंखों से घूरती रहती और मुझे लगता था वो समझ रही है। एक बार वो डॉक्टर के यहां से वापस आई तो मैंने उससे कहा कि – "मैं वादा करता हूं, तुझे कुछ नहीं होने दूंगा।"

मैं मम्मी और पापा को भी खुश रखने की कोशिश करता। एक दिन, जब वो पांच साल की हो चुकी थी, तब उसने मेरी तरफ देखा और कहा, "आज खाने में क्या है?"। मैने कहा, "आलू का पराठा और टमाटर की चटनी।" फिर मैं चौंकते हुए बोला, "अरे! तूने बात की!"

उसके बाद वो पूरे वाक्यों में बात करने लगी, बाकी पांच साल के बच्चों की तरह।

"ये रेखाएं कैसी हैं?", एक दिन उसने मुझसे पूछा। "कौनसी रेखाएं?", मैने उससे वापस पूछा।

उसने कहा वो कुछ चमकीली पीली रेखाएं देख सकती थी। उसने अपनी उंगली से उनकी तरफ इशारा भी किया, पर मैं कुछ नहीं देख सकता था।

जब मम्मी–पापा को यह बात पता चली तो वे तुरंत कृतिका को डॉक्टर के पास ले गए। वे चिंतित थे और सोच रहे थे कि कृतिका के दिमाग में कुछ गड़बड़ है, जैसे कोई ट्यूमर है।

तब मैं दस साल का हो चुका था और इतना समझदार भी कि ट्यूमर का मतलब समझ सकूं। तो मैं थोड़ा डर गया था। पर पता चला कि न कोई ट्यूमर है और न कोई बीमारी।

जो डॉक्टर ने बोला था, मेरे मम्मी–पापा ने मुझे बताया, कि मेरी बहन को एक प्रकार का "स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर" हो सकता है।

"स्पेक्ट्रम" शब्द सुनते ही मेरे दिमाग में एक प्रिज्म की तस्वीर आई।

"उसको उस नाम से क्यों बुलाते हैं?", मैने पूछा।

पापा का मुंह उतर गया। उन्होंने कहा, "उसका मतलब है कि वो अलग है। उसका दिमाग अन्य लोगों से अलग काम करता है। कुछ हिस्से ज़्यादा विकसित हैं और कुछ हिस्से..."

मैं उनके वाक्य का पूरा होने के इंतज़ार में था पर उन्होंने बस अपना मुंह मोड़ लिया।

"कम विकसित हैं।", मैने उनका वाक्य पूरा करते हुए कहा।

मुझे यकीन नहीं हुआ। मैं अपनी बहन को जानता था। वो सबसे बढ़िया थी। मेरे कुछ दोस्तों की छोटी बहनें शैतान थीं पर कृतिका कभी शैतानी नहीं करती थी। वो मेरी चीज़ें नहीं ले जाती थी। वो मुझे गेम्स खेलते हुए देखती थी पर बीच में नहीं घुसती थी।

जब भी मैं उससे कहता वो चली जाती थी और एक कोने में किताब पकड़ के बैठ जाती थी। वो सिर्फ पांच साल की थी पर हमेशा पढ़ती रहती। वो बड़ों की बातें भी सुनती थी। उसके मन में जो भी होता था वो बोल देती थी ताकि तुम जान सको कि वो क्या सोच रही है। साफ दिल की थी मेरी बहन।

पर मुझे उन रेखाओं की चिंता थी जो वो हवा में देख रही थी। इसका मतलब था, वो ऐसी चीज़ें देख रही थी जो वास्तविकता में थी नहीं।

एक दिन, जब हम टीवी देख रहे थे, मैने उससे उन रेखाओं के बारे में फिर पूछा।

"क्या वो रेखाएं अभी भी यहां हैं?", मैने पूछा।

"तुम अब भी उन्हें नहीं देख सकते?", वो बोली।

"नहीं, मैं नहीं देख सकता। यहां कोई रेखाएं नहीं हैं, कृतिका।", मैने कहा।

उसने मुझे घूरते हुए देखा। मेरी आंखों के सामने, उसने अपना हाथ उठाके अपनी उंगली से हवा छूने की कोशिश की... और उसकी उंगली गायब हो गई!

मैं सोफे के ऊपर कूदकर बैठ गया। मैंने अपनी आखें मली। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि मैने क्या देखा।

"मैंने अपना हाथ उन रेखाओं में से एक में डाल दिया।", वो बोली।

"यहां कुछ चीजें हैं।", कहते हुए उसने अपने गायब हुए हाथ को वापस लाया। पर इस बार उसके हाथ में एक पुरानी टॉर्च थी। "ये लो, एक टॉर्च।", उसने कहा।

मेरा मुंह खुला का खुला और आंखें फटी की फटी रह गई थीं और मैने यह जाना की मेरी बहन कृतिका सबसे अलग क्यों थी।