Shakral ki Kahaani - 10 in Hindi Detective stories by Ibne Safi books and stories PDF | शकराल की कहानी - 10

Featured Books
Categories
Share

शकराल की कहानी - 10

(10)

"हा- मैं अपने आपको तुमसे बड़ा नहीं समझता । यह तुम्हारी ही मेहरवानी थी कि आज मैं जिन्दा हूँ--वर्ना मरखर गया होता।" सरदार बहादुर ने कहा।

"हां---अब कहो-क्या कह रहे थे? "

"मैं यह कह रहा था कि यह कोई महामारी या आस्मानी बला नहीं है।"

"फिर क्या है?"

"हरामियों का हरामीपन है" राजेश ने कहा ।

"क्या मतलब?”

"यह कुछ हरामियों के दिमाग का कारनामा है-वह आदमियों को वनमानुष बना रहे हैं।"

"मगर क्यों ?"

"वह उन शकरालियों में आतंक फैलाना चाहते हैं जो मीरान वाटी - से गुजरते रहते हैं।"

आतंक फैलाने का कारण क्या हो सकता है?"

“यहीं कि कोई शकराली डर के कारण उधर से न गुजरे। " राजेश ने कहा।

“अब देखना यह है कि वह शकरालियों के लिये मीरान घाटी वाला रास्ता क्यों बन्द करना चाहते हैं?"

“विश्वास नहीं होता—”

"अगर उस अजनबी औरत का मामला सामने न होता तो शायद मुझे भी विश्वास न होता।"

सरदार बहादुर कुछ नहीं बोला।

"अब बताओ ! उस रास्ते के बारे में क्या खयाल है? और फिर तुम उसे दूसरों से छिपाये क्यों रखना चाहते हो?"

"बस वैसे ही।" सरदार बहादुर ने हँसकर कहा। "दूसरे होने वाले सरदार को चुपके से बता जाऊंगा और इस तरह यह मध्यती आबादी सरदारों का रहस्य बन जायेगा।"

"इससे लाभ क्या होगा ?"

"बहस न करो सूरमा।" सरदार बहादुर ने कहा, "अच्छी बात -हम उसी नये रास्ते ही से चलेंगे — मगर यदि हम दोनों भी खुशहाल ही की तरह हो गये तो क्या होगा?"

"बस्ती के लोग दूसरा सरदार चुन लेंगे और मेरे बाप को बहुत खुशी होगी क्योंकि उसने आज तक मुझे आदमी ही नहीं समझा ! अब तक मारने को दौड़ता है।"

"तो तुम नहीं मानोगे?"

"नहीं।" राजेश ने दृढ़ स्वर में कहा, "अगर तुम न जाओगे तो में खुशहाल को लेकर अकेला ही जाऊंगा-"

"अच्छी बात है—वही होगा जो तुम कह रहे हो।" सरदार बहादुर ने कहा फिर पूछा "क्या आज रात ही को रवानगी होगी ?"

"पहले यही सोचा था मगर अब स्कीम में थोड़ा सा परिवर्तन करना पड़ेगा--" राजेश ने चिन्ता भरे स्वर में कहा। "तुम यहीं मेरा इन्तजार करो। मैं खुशहाल से कहता आऊं कि आज रात को मेरा इन्तजार न करे।"

********

और फिर राजेश की संलग्नता में वृद्धि हो गई थी। उसने सरदार बहादुर से बड़े बड़े बालों वाली कुछ खालें तलब की थीं और मकान के एक ऐसे कोने में जा बैठा था जहां सरदार बहादुर के अतिरिक्त कोई दूसरा कदम नहीं रख सकता था।

"आखिर तुम यह क्या कर रहे हो?" सरदार बहादुर ने पूछा। "मैं चाहता हूँ कि जब हम सफर पर रवाना हों तो हम में और खुशहाल में कोई अन्तर न रहे ।" "तो क्या हम भी ?"

"हा "

"राजेश बात काट कर बोला, “इसके लिये काले रंग की बड़े बालों वाली खालें हमारे काम आयेंगी।"

"मैं वनमानुस नहीं बन सकता।" सरदार बहादुर ने मुंह बिगाड कर कहा। "इस तरह तुम्हारे शरीर पर यह खाले मढूगा कि खुश हो जावोगे बहादुर—'' राजेश ने कहा फिर हंस कर बोला "तुम में और खुशहाल में कोई असर नहीं रह जायेंगा।"

"मैं खुश हो जाऊंगा- बहादुर आंखें निकाल कर बोला। "न बुखार न शरीर में ऐंठन- न भुजा में पीड़ा-मुफ्त में बन बैठे बनमानुष – क्या यह खुशी की बात न होगी?"

"तुम कहना क्या चाहते हो?"

"केवल इतना सा उपाय कि सचमुच हम भी वनमानुष न बन जायें ।”

"मैं समझा नहीं?"

"अगर हम आदमियों की शक्ल में वहां पहुँचे तो सचमुच ही वनमानुष बनना पड़ेगा।"

"बात अब भी मेरी समझ में नहीं आई साफ साफ कहो।"

"में पहले ही बता चुका हूँ कि न यह आस्मानी बला है न कोई बीमारी और खुशहाल के बयान से यह साबित होता है कि पहले उसे बेहोश किया गया और फिर उसकी भुजा में इन्जेक्शन लगाया गया। तुमने खुद अपनी आंखों से देखा था— अर्थात खुशहाल की बदलती हुई हालत-मुझे पूरा पूरा यकीन है कि उसी इन्जेक्शन ही से वह वनमानुष बना है।"

बहादुर खामोश रहा और राजेश कहता रहा। "

"अगर अब भी तुम्हें यकीन न हुआ हो तो रजबान जाओ और उन ग्यारहों से तस्दीक कर लो। यह भी वहीं कहानी सुनायेंगे जो खुशहाल सुना चुका है--" बहादुर इस बार भी मौन ही रहा। वह किसी सोच में पड़ गया था।

राजेश अपना काम करता रहा। थोड़ी थोड़ी देर बाद बहादुर के शरीर के विभिन्न भागों की नाप भी लेता जा रहा था।

"तो फिर मैं जाऊं रजवान -?" बहादुर ने बड़े सोच विचार के बाद सवाल किया। "क्यों अकारण अपने आप को थकाना चाहते हो—वैसे भी अब उन्हें छेड़ना ठीक न होगा ।"

"तुम कभी कुछ कहते हो और कभी कुछ- "वह तो मैंने अपनी बात में जोर पैदा करने के लिये कहा था—

"लेकिन इसे गलत न समझो। उन्हें भी वैसे ही हालात से गुजरना पड़ा होगा जिनसे खुशहाल गुजरा था - " राजेश ने कहा फिर बोला, "बहादुर ! क्या यह संम्भव नहीं कि कुछ दिनों के लिये मीरान घाटी में दाखिले पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये---?"

वह शकराल के रहने वाले तमाम लोगों के बुनियादी हरु का मामिला है—" दहादुर ने कहा "मैं बड़ा सरदार होने के बावजूद ऐसा कोई प्रतिबन्ध लगाने का हक नहीं रखता ।"

राजेश कुछ नहीं बोला- बहादुर ने पूछा ।

"क्या यह जरूरी है?"

"बहुत ही जरूरी।" राजेय ने कहा, "मैं नहीं चाहता कि अब कोई और शकराली भी वनमानुष बने – क्या यह हक किसी को भी नहीं -?"

"है—बड़े उपासक को—अगर वह चाहें तो यह प्रतिबन्ध लगा सकते हैं ।"

"तो फिर कह सुन कर बड़े उपातक ही से हुकम जारी करा दो।"

"मैं कोशिश करूंगा―" बहादुर ने कहा ।

"तो फिर अभी चले जाओ वक्त कम है-" राजेश ने कहा मगर इसका भी ख्याल रखना कि हम तीनों को हर हाल में मीरान घाटी में दाखिल होना है।"

"भला यह कैसे हो सकता है-" बहादुर ने कहा "अगर प्रतिवन्ध लगाया जायेगा तो सब पर लगाया जायेगा—हम तीन उससे वंचित कैसे रह सकेंगे?"

''तुम बड़े उपासक को समझा देना कि मैं क्या चाहता हूँ राजेश ने कहा “तुमने बड़े उपासक को खुशहाल की विपदा से आगाह तो कर दिया होगा मगर उसका कारण न बताया होगा ।"

"कैसे बताता कारण अब जो तुम बता रहे हो-"

“जाओ–कोशिश करो—उन्हें अब सब कुछ बता देना ।"

"अच्छी बात है—मैं जा रहा हूँ — मगर क्या तुमने खुशहाल को बता दिया है कि हम दोनों किस हुलिये में उसके साथ सफर करेंगे?"

"नहीं-अभी नहीं बताया और न बताने की जरूरत समझता हूँ ।"

"वह क्यों?"

"वक्त आने पर वह खुद ही देख लेगा ।"

आधे घन्टे के अन्दर ही अन्दर बहादुर अकेला ही गुलतरंग की ओर रवाना हो गया था।

राजेश निश्चिन्त होकर काम करता रहा। सरदार बहादुर से कह गया था कि कोई भी सूरमा से मिलने की कोशिश न करे। दूसरी ओर जहां वह काम कर रहा था वहां दूसरे तो अलग रहे खुद सरदार बहादुर का सौतेला भाई आदिल भी कदम नहीं रख सकता था इसलिये वह निश्चिन्त था ।

रात गये सरदार बहादुर की वापसी हुई मगर उसके चेहरे पर थकावट के लक्षण नहीं थे बल्कि वह काफी प्रफुलित नजर आ रहा था।

"क्या खबर है--?" राजेश ने उत्सुकता से पूछा।

"बड़ी अच्छी- "

" बहादुर ने हंसकर कहा “जो तुमने चाहा था वह हो गया।"

"अर्थात ?"

"बड़े उपासक ने प्रतिबन्ध लगाने वाली बात मान ली है और कल सवेरे ही वह तमाम बस्तियों के सरदारों तक प्रतिबन्ध वाला आदेश भिजवा देंगे ।"

"यह तो सचमुच बड़ा अच्छा हुआ-मगर हम तीनों?" राजेश ने कहा।

"हमें मीरान घाटी जाने की आज्ञा है-।"

"ठीक है— मैं तो डर रहा था कि कहीं वह भी तुम्हारी ही बात न दुहरा दें।"

“कौन सी बात---?" सरदार बहादुर ने चकित होकर पूछा ।

"वही कि अगर प्रतिबन्ध लगाया जायेगा तो सब पर हम तीनों उस प्रतिबन्ध से मुक्त कैसे हो सकेंगे।”

बहादुर हंस पड़ा फिर बोला । "पहले उन्होंने भी यही कहा था मगर जब मैंने उनसे खुल कर तुम्हारी कही हुई बातें बताई तो उन्होंने खुशी से हमें जाने की आज्ञा दे दी।"

"इसका मतलब यह हुआ कि उन्हें मेरी बात और मेरे सन्देह पर विश्वास हो चुका है।"

"हां" बहादुर ने कहा, "उन्होंने यह भी कहा था कि वह इस अभियान की सफलता के लिये दुआयें करते रहेंगे-"

"तो फिर यकीन रखो सब ठीक हो जायेगा ।" राजेश ने कहा। "तुम्हारे काम का क्या हुआ है?"

“वह भी ठीक है—तुम्हारा जानवरों वाला लिबास तैयार हो गया है।"

"और तुम्हारा?" बहादुर ने पूछा ।

"आसान काम नहीं है-" राजेश ने कहा, "एक ही लिबास तैयार करने में रात हो गई— अब मेरा वाला लिबास कल तैयार हो सकेगा। "

"इसका मतलब यह हुआ कि कल भी हमारी रवानगी न हो सकेगी।"

“नहीं—” राजेश ने कहा, “कल सन्ध्या होते होते मैं तैयार कर लूंगा और कल ही रात में हम यहां से रवाना हो जायेंगे।"

"खुशहाल का क्या रंग है-?" बहादुर ने पूछा ।

"वह भी बहुत उतावला हो रहा है-"

"किसलिये ?"

"सफर के लिये-"

"बड़ी अजीब बात है-"

"कुछ भी अजीब बात नहीं है-" राजेश ने कहा, "बन्द कोठरी में उसका दम घुट रहा है-वह ताजी हवा चाहता है-".

बहादुर कुछ नहीं बोला।

"अब जरा अपना कपड़ा पहनो—देखूं कि कैसे लगते हो -" राजेश ने कहा।

"पहनाओ।"

राजेश ने खालों वाला वस्त्र पहना दिया और बहादुर भी खुशहाल ही जैसा वनमानुष नजर आने लगा । "वाह....वाह ।" बहादुर हर्षित होकर बोला, "कपड़े पहनने की जरूरत ही नहीं। आंखों के अलावा और कुछ नजर आता ही नहीं।"

"देखेगा तो खुशहाल चकरा कर रह जायेगा" राजेश आंख मार कर बोला । "हां मगर एक मुसीबत है-"

"वह क्या?"

अगर हमारे घोड़े भड़के तो—?"

“तुम्हारा घोड़ा तुम्हारी गंध से परिचित है इसलिये तुम्हें कोई खतरा नहीं—खुशहाल को उसका घोड़ा ही वस्ती तक लाया था- बच गया मैं — पता नहीं मेरी हड्डी पसली टूटेगी या बचेगी—क्योंकि मैं जिस घोड़े पर बैठूंगा वह मुझे जानता पहचानता न होगा।"

"हां यह तो हैं—वह भड़क कर तुम्हें पटक सकता है।" बहादुर ने चिन्ता भरे स्वर में कहा,

"तब फिर क्या करना चाहिये?"

"परेशान होते की जरूरत नहीं है" राजेश ने मुस्कुरा कर कहा  "तुम इसी वक्त उस थोड़े से मेरी मुलाकात करा दो जिसकी पीठ पर मुझे बैठना होगा ।"

“इससे क्या होगा?” बहादुर ने पूछा ।

"सफर करने से पहले ही मैं उसे अपना दोस्त बनाना चाहता हूँ ताकि वह मुझे पटकने न पाये। "

"अगर यह बात है तो फिर वह घोड़ा भी मेरे ही अस्तबल में मौजूद एक है जिस पर बैठ कर तुम सरहदी वस्ती से यहाँ तक आये थे।"

"तब तो मेरे लिये वही मुनासिब रहेंगा" राजेश ने कहा "वैसे चलो — मैं इसी वक्त उससे मिलना चाहता हूँ ।"

"किससे खुशहाल से -?"

"नहीं-उस घोड़े से जिस पर मुझे सफर करना है-"

"आओ चलें-" बहादुर उठता हुआ बोला।

दूसरे दिन कठिन परिश्रम से सन्ध्या होने से पहले ही राजेश ने अपने लिये भी बड़े बालों वाली खालों से लिबास तैयार कर लिया और फिर खुशहाल से मिलने के लिये रवाना हो गया ।

खुशहाल ने उसकी आवाज सुनते ही कोठरी का दरवाजा खोल दिया फिर राजेश के अन्दर पहुँचते ही बोला । “आपने बहुत देर कर दी, सूरमा भाई।"

"अब देर नहीं है-" राजेश ने कहा "सब तैयारी पूरी हो चुकी है। हम आज ही रात में यहां से रवाना हो जायेंगे तैयार रहना-"

"मैं तैयार हूँ" खुशहाल ने कहा "अपने अस्तबल में मौजूद रहूँगा –"

"ठीक है-" कह कर राजेश बाहर निकल आया और खुशहाल ने दरवाजा बन्द कर दिया ।

फिर शायद रात के दो बजे थे कि दो लम्बे तडगे बनमानुष बहादुर के अस्तबल में दाखिल हुये थे । उन्होंने दो घोड़ों की सुगों पर चमड़े की गद्दीदार जुर्रावें पढ़ाई और रात के अन्धेरे में घोड़ों समेत अस्तबल से बाहर निकले थे ।

खुशहाल अपने अस्तबल में उनकी प्रतीक्षा कर रहा था । अन्धरे में शायद उसने यही समझा था कि उन्होंने काले रंग के कपड़े पहन रखे हैं-"

मगर फिर जैसे ही वह घोड़ों पर सवार होकर खुले आकाश के नीचे तारों की छांव में आये थे--खुशहाल भयपूर्ण स्वर में बोला था। "त....त तुम कौन हो?"

"बनमानुष -- '' राजेश ने आवाज बदल कर कहा ।

खुशहाल ने अपना घोड़ा रोक लिया फिर कुछ कहने ही जा रहा था कि राजेश ने अस्ली आवाज में कहा।

"चलते रहो- हम सूरमा और बहादुर हैं-"

"त...त  तो ....तुम भी -- ?"

"हां हम भी वनमानुष बन गये हैं-" राजेश ने कहा । "खुशहाल ने सरदार बहादुर की ओर गर्दन मोड़ी और पूछा ।

"यह कैसे हुआ सरदार -?"

"सूरमा से पूछो मैं कुछ नहीं जानता-" बहादुर ने कहा । खुशहाल ने राजेश की ओर गर्दन मोड़ी और कुछ कहने ही जा रहा था कि राजेश ने कहा।

"बस किसी तरह गया- तुम इस चक्कर में न पड़ो-" बस्ती में तो घोड़े दहलाये जाने वाली चाल से चलते रहे मगर बस्ती से बाहर निकलते ही उनकी चाल में तेजी आ गई।

"आधे घन्टे बाद उन्होंने घोड़े रोक कर उनकी सुमों से जुर्रावें उतार दी ताकि घोड़े और तेज दौड़ सकें और फिर सचमुच थोड़े हवा से बातें करने लगे ।