Prem Gali ati Sankari - 74 books and stories free download online pdf in Hindi

प्रेम गली अति साँकरी - 74

74

===============

अम्मा-पापा से बात कुछ और करना चाहती थी लेकिन उत्पल को देखकर अपने डाँस को शुरू करने की बात फिर कई बार दोहराती रही| क्या इसका कोई खास कारण रहा होगा? कोई ऐसी वजह जिसके लिए मैं उत्पल को तकलीफ़ में देख पाने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी फिर भी स्वयं आहत होकर उसे भी आहत करना चाहती थी, क्यों ऐसा? एक ओर उसकी बात सुनकर भीतर से झुलसता दिल और दूसरी ओर उसकी बात से खुद कष्ट पाकर उसको भी शायद पीड़ा देना| दो विरोधी बातें ! क्या मैं उसकी बात जानकर उससे पीछा छुड़ाना चाहती थी या केवल उससे कोई बदला लेना चाहती थी? क्या मैं अपमानित महसूस कर रही थी लेकिन यदि ऐसा था तो मुझे उसके विचार को भी झटक देना चाहिए था लेकिन नहीं, वह मेरे मन में गहरी छाप बनकर ऐसा छपा था जैसे किसी के मनोमस्तिष्क में कभी न समाप्त होने वाली किसी दुर्घटना का प्रभाव ! दोनों में मुझे घुसना था यानि दो नावों में पैर ! ठीक था क्या? क्यों नहीं समझ पा रही थी कि ज़रा सा इधर से उधर हुई कि गड़प---नीचे और सब कुछ समाप्त !

किसी को जीवन-दर्शन के बारे में व्याख्यान देना और खुद को ----? ? 

अगले दिन सुबह से जल्दी उठकर मैडिटेशन के लिए बैठी लेकिन यह क्या? आँखें बंद करते ही मुस्कुराता चेहरा सामने आ जाता | दो चेहरों के बीच में त्रिशंकु बना एक बेचारा सा चेहरा जिसे पहचानने के मेरे सारे प्रयत्न व्यर्थ होते जा रहे थे| उस चेहरे पर लेयर चढ़ती जा रही थी और मैं उसमें नीचे और नीचे घुसती जा रही थी| वजह ? अनजानी, नामालूम सी ! अक्सर लगता है, ये हो रहा है---वो हो रहा है। साँसें ऊपर-नीचे चढ़ रही हैं फिर बिलकुल बैठ ही गई हैं---लेकिन वजह--? ? ढूंढते रह जाओ | 

सुबह की पहली नृत्य की कक्षा का समय हो गया था, पैर कमरे का दरवाज़ा खोलने के लिए आगे बढ़े किन्तु ठिठक गए| मैडिटेशन में तो बैठ नहीं पाई, अब नृत्य क्या खाक कर सकूँगी| करना ही है तो अपने कमरे से ही क्यों न दुबारा प्रैक्टिस शुरू करूँ | सबके सामने कहाँ कर पाऊँगी? ये बेकार ही नर्वस होना, सब पिछले कुछ दिनों में ही तो डैवलप हुआ था| 

न जाने कितने लंबे समय से अलमारी में एक खूबसूरत नक्काशी के डिब्बे में कैद हुए अपने घुँघरू निकालकर मैंने अपने माथे से लगाकर दिल के करीब चिपका लिए और म्यूज़िक शुरू करके उन्हें अपने दिल के करीब समेटे खिड़की के पास वाली कुर्सी पर जैसे चिपकी रह गई | मेरे पास सब रेकार्डेड था| न जाने कितने वर्षों पहले मैंने अपने नृत्य-गुरु मृत्युंजय मिश्र जी महाराज से निवेदन करके  नृत्य की कई शैलियों व बहुत से बोलों के लिपिबद्ध रेकार्ड्स अपने पास अलग से ले लिए थे| नृत्य में बहुत रुचि होने के कारण मैं खूब मेहनत करती थी  मुझे ताल का कितना ज्ञान था इतनी अच्छी लयकारा थी मैं ! अपनी एकाग्रता पर बहुत ध्यान देती मैं जो किसी भी कला के लिए सबसे महत्वपूर्ण है | संतुलन, तान का संचार, अंग संचालन के लिए मैं घंटों दर्पण के सामने अपने आपको माँजती रहती थी| जब भी कभी मंच पर जाती थी दर्शक पूरे वातावरण को तालियों से गुंजा देते | नृत्य में मेरा अभिनय और मुद्राओं को देखकर मेरे गुरु इतने प्रसन्न होते  कि जब मैं कुछ परफ़ॉर्म करने की तैयारी करती तब वे मेरे साथ प्रैक्टिस करने वालों को इशारे से मेरे चेहरे के भावों व मुद्राओं को ध्यान से देखने के लिए कहते और बाद में बताते कि अभिनय ऐसा होना चाहिए कि ‘कथा करोति कत्थक’ के अनुसार दर्शक नृत्य भंगिमाओं से, घुँघरुओं की छनकार से कथा का विस्तार जान लें और  नृत्यकार के साथ उसके भाव में खो जाएँ| 

उन दिनों मेरे गुरु अम्मा से कहा करते थे कि मैं उनका और अम्मा का नाम ऐसा रोशन करूँगी और कला की दौड़ में उनसे भी आगे निकल जाऊँगी| आज न आगे, न पीछे बस---ज़िंदगी की ढलान के ठहराव पर आकर अटक गई थी| मौसम बदलते देर कहाँ लगती है और मेरे जीवन के मौसम तो ऐसे बदल रहे थे मानो कोई अंधियारी गुफ़ा जिसमें चारों ओर कोरी कालख, कहीं झिर्री में से रोशनी पल भर को झाँक भी ले तो अगले ही पल प्रताड़ना पक्की ! अब फिर से मन में घुमड़ने लगा और विवश हो गई थी सोचने के लिए, शर्मसार भी थी खुद पर शायद इसीलिए एक नई कोशिश का मन हो आया था| 

न जाने कितनी देर तक म्यूज़िक चलता रहा और मैं बिना हिले-डुले, घुँघरुओं को अपने सीने से चिपकाए उस कुर्सी पर ऐसे बैठी रह गई जैसे किसी ने मुझे फैविकोल से चिपका दिया हो| मेरी गर्दन जाने कब कुर्सी पर टिक गई और आँखें मुँद गईं | जाने कब तक मैं इसी स्थिति में बैठी रही, नहीं जानती कब मेरा म्यूज़िक बंद हो गया और कुर्सी की पीठ पर सिर टिकाए मेरी आँखें मुँद गईं |             -

हाथों से घुँघरू गिरने की आवाज़ से मैं चौंक उठी और हड़बड़ाकर कुर्सी से खड़ी हुई तो दूसरा घुँघरू भी ज़मीन पर गिर गया| अपने इस कृत्य पर मैं शर्मिंदगी से भर उठी| मैंने पल भर में अपने घुँघरुओं को झपटकर नीचे से उठा लिया और अपने सीने से दबा लिया| हमारे यहाँ हर कला माँ वीणापाणि थीं और उनसे जुड़ी हुई किसी भी वस्तु का अपमान हमें कभी मंजूर नहीं हुआ था | हमारा संस्थान एक पवित्र मंदिर था जिसमें कला के प्रत्येक देवी-देवता को शीष पर रखकर सम्मान दिया जाता था | न जाने अचानक कौनसा दौरा पड़ गया मुझे, मैं फिर से अपने पलंग पर जाकर पड़ गई | 

क्यों बनाई गई है ये ज़िंदगी ? आखिर इसका अर्थ क्या है? इस जीने की वजह क्या है? क्यों साँसें हर पल चलती रहती हैं? जब भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा हो तो वर्तमान की घड़ियों में जीने की, साँस लेने की स्थिति कितनी हास्यास्पद है ! अपने पलंग पर पड़ी मैं जल बिन मछली सी तड़प रही थी, क्यों? 

हाल ही में तो मैंने रश्मि को याद किया था कि वह किस प्रकार प्रेम में विफल होकर मरने जा रही थी कि मैंने उसे संभाल लिया था| मुझे याद है, बहुत सारी और बातों के अलावा मैंने उसे यह डायलॉग भी सुनाया था;

“रश्मि!ज़िंदगी चाहे एक दिन की हो या फिर जैसे सब कहते हैं न कि ‘चार दिन की ज़िंदगी है’ ऐसे चाहे चार दिन की हो लेकिन यार उसे ऐसे जीना चाहिए कि जैसे ज़िंदगी हमें नहीं मिली बल्कि ज़िंदगी को हम जैसा ज़िंदादिल बंदा मिला है, ऐसे जीयो कि ज़िंदगी भी तुम्हारे सामने ताली बजाकर तुम्हारा स्वागत करे, धन्यवाद दे तुम्हें कि भई तुम जैसे बंदे मिलें तो मैं निहाल हो जाऊँ---सो, बी ग्रेटफुल यार---” और मैंने उसे एक फ़िल्म के  गाने की वह पंक्ति सुनाई थी जो मुझे बेहद सच्ची और अच्छी लगती थी—

‘जियो तो ऐसे जियो जैसे सब तुम्हारा है, मरो तो ऐसे कि जैसे तुम्हारा कुछ भी नहीं ----‘

मुझे वह दृश्य आज भी ऐसे याद आ जाता है जैसे कल की ही बात हो| मैंने उसकी कमर ठोक दी थी| जब तक उसकी खास सहेली रागिनी स्वस्थ होकर नहीं आ गई थी मैं उसकी जीवन-गुरु बनी रही थी| जब मैंने यह डॉयलॉग मारा था उस समय हम तीनों ही कैंटीन में बैठे कॉफ़ी का लुत्फ़ ले रहे थे| 

“और---अभी तो हमने ज़िंदगी के दो दिन भी कहाँ देखे हैं, अभी तो उसका एक ही दिन चल रहा है| अभी से इतने कमज़ोर पड़ जाएंगे तो आगे के तीन दिन क्या रोते-रोते काटेंगे? ”मैंने यह भी तो कहा था उससे---यह उन दिनों की बात है जब हम कॉलेज में थे और अपने आपको तीसमारखाँ समझते थे---अब? ऐसे ही होता है आदमी किसी दूसरे के लिए भाषण झाड़ने में पंडित बन जाता है और जब उसके खुद के ऊपर पड़ती है ---तब उसकी असली परीक्षा होती है| 

“जीवन इतना सस्ता समझा है क्या? ”मैंने उससे यह भी कहा था| 

अब, जब मेरे जीवन के चार दिनों में से तो लगभग ढाई /पौने तीन दिन खत्म हो गया था, मैं अभी भी त्रिशंकु की भाँति लटक रही थी जिसे मैंने ज्ञान बाँटा था, वह तो मेरी समझदार चेली बन चुकी थी और मैं? कुछ----कुछ भी तो समझ में नहीं आ रहा था मुझे !

हमारे परिवार में प्रात:का समय बर्बाद करने की किसी की भी आदत नहीं थी, मैं इस उम्र में ऐसी होती जा रही थी ---और साफ़ सी बात थी कि इस उम्र में न तो किसी को कुछ कहना अच्छा लगता है और न ही  किसी को सुनना ! आजकल का समय तो छोटों से भी कुछ कहने का नहीं रहा गया है | मेरे जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन हो गया है, होता जा रहा है|