chaar dost in Hindi Horror Stories by Ajitrf books and stories PDF | चार दोस्त

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चार दोस्त

कहानी
चार दोस्त





सभी पाठकों से निवेदन है की ये कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है और लेखक के मन में हुई अकस्मात उपज है।।
पूर्णिमा की रात थी। एक नदी के ऊपर बने एक सुनसान से पुल पर बैठकर चार दोस्त राहुल, सतनाम, सुधीर और नरेश पार्टी कर रहे थे और रात को बह रही ताजी हवा खा रहे थे। हर और चांदनी बिखरी हुई थी। नदी का पानी पूरी तरह से शांत नज़र आ रहा था मानो किसी ने उसे बर्फ की तरह जमा दिया हो। पूरे पुल पर उन चार दोस्तों को छोड़कर और कोई भी नज़र नहीं आ रहा था मानो हर कोई उस पुल पर आने से डरता हो। एक जानलेवा और खौफनाक सन्नाटा हर और पसरा हुआ था जो की किसी के भी दिल को उछालकर मुंह में ला दे।
वाइन का एक पैग लगाते हुए राहुल बोला " यार ऐसी डरावनी रात में तो कोई भूतिया कहानी सुनने का मजा ही आ जायेगा।"
सब दोस्तों ने इस बात पर सहमति जताई।
तभी नरेश बोला " मैं एक खौफनाक घटना सुनाता हूं।"
इतना कहकर नरेश ने अपनी भूतिया कहानी सुनानी शुरू कर दी " विजय एक टैक्सी ड्राइवर था। वो गांव और शहर के बीच में अक्सर चक्कर लगाता था। आसमान काले बादलों से गिरा हुआ था। शाम का वक्त था। लेकिन ऐसे लग रहा था की जैसे आज अमावस्या की रात हो। कहीं पर भी प्रकाश की कोई किरण नज़र नहीं आ रही थी। विजय अपने गांव से टेक्सी लेकर सड़क पर कोई यात्री की तलाश में चले जा रहा था लेकिन उसे दूर दूर तक कोई भी नज़र नहीं आ रहा था। विजय ने सड़क के एक किनारे अपनी टेक्सी रोक दी और किसी यात्री का इंतजार करने लगा। तभी एक बूढ़ा व्यक्ति धीरे धीरे चलकर उसके पास आ रहा था। उसका काला चेहरा, डरावनी लाल आंखे, बड़ी बड़ी ढाड़ी मूंछ थी जो किसी को भी डरा दे। वो आकर सीधा ही विजय की टेक्सी की खिड़की खोल कर पीछे की सीट पर बैठ गया। विजय थोड़ा सा हैरान रह गया लेकिन उसने कुछ हिम्मत झुटाते हुए उससे पूछा " चचा कहां जाना है आपको?"
वो बूढ़ा सामने लगे शीशे में विजय को ही घूरे जा रहा था और कुछ नहीं बोला। विजय मन में बोला " कितना बोरिंग आदमी है कोई जवाब ही नहीं दे रहा।"
तभी वो बूढ़ा शीशे में उसे घूरते हुए बोला " जहां उतरना होगा वहां पर बता दूंगा अब चलो।"
वो इतनी भयानक आवाज में बोला कि विजय डर गया और चुपचाप टेक्सी चलाने लगा। वो बूढ़ा शीशे में से अभी भी विजय को घूर रहा था। वो बिलकुल हिल भी नहीं रहा था और ना ही पलकें झपका रहा था जैसे कोई मुर्दा लाश बैठी हो। विजय डर गया और बोला " चचा आज तो मौसम काफी खराब है लगता है बारिश तो हर हाल में होकर रहेगी।"
लेकिन उस बूढ़े ने विजय की बात का कोई ज़बाब नहीं दिया और उसे बस घूरे जा रहा था।
विजय ने फिर से पूछा " चचा आपकी तबियत तो ठीक है ना?"
ये सुनकर वो बूढ़ा हंसने लगा। ये देखकर विजय डर गया। वो बूढ़ा बोला " मुझे भला क्या होगा? लेकिन तुमने अमावस्या की रात जहां आकर गलती कर दी। भारी कीमत चुकानी पड़ेगी तुम्हे।"
ये सुनकर विजय थर थर कांपने लगा और कुछ बोलने ही वाला था की तभी वो बूढ़ा फिर बोल पड़ा " यहीं गाड़ी रोको।"
डर के मारे विजय ने अचानक से ब्रेक लगा दिए और गाड़ी वहीं जाम होकर रह गई। विजय ने आसपास नज़र दौड़ाई। एक घना जंगल चारों और था। कोई घर , कोई गांव वहां पर नज़र नहीं आ रहा था। विजय हैरान रह गया की इस सुनसान इलाके में ये बूढ़ा जायेगा कहां? तभी विजय ने डरते हुए कहा " चचा अगर आपके पास पैसे नहीं है तो कोई बात नहीं। आप बैठे रहिए मैं आपको शहर तक छोड़ दूंगा। इस सुनसान जगह उतरना ठीक नहीं। ऊपर से रात भी बहुत हो चुकी है।"
लेकिन वो बूढ़ा टेक्सी से उतरते हुए बोला " मुझे यहीं पर उतरना है।"
इतना कहकर वो बूढ़ा जंगल की और कदम बढ़ाने लगा तभी विजय पीछे से बोला " अरे ओ चचा पैसे तो देकर जाओ।"
ये सुनकर वो बूढ़ा वहीं पर रुक गया और पीछे मुड़कर विजय के पास आया और बोला "तुम्हे मालूम नहीं की पीछे से किसी को आवाज नहीं देते। तुम्हे पैसे चाहिए ना। रुको अभी देता हूं तुम्हे पैसे।"
इतना कहकर उस बूढ़े ने एक पांच सौ का नोट निकाला और विजय के हाथ में थमा दिया।
विजय बोला " लेकिन चचा ये तो बहुत ज्यादा है।"
लेकिन इस बूढ़े एक न सुनी और जंगल की और जाने लगा।
विजय अपने आप से बोला " बड़ा अजीब आदमी है।"
तभी विजय ने उसके पैरों की और नज़र दौड़ाई और उसकी एक भयानक चीख निकल गई। उसके पैर उल्टे थे और खून से लथपथ थे। वो बूढ़ा पीछे मुड़ा और हंसते हुए बोला " तो तुमने देख ही लिया।"
इतना कहकर वो बूढ़ा तेजी से विजय की और बढ़ने लगा। उसका चेहरा खून से लथपथ था। विजय की आंखे फटी की फटी रह गई और वो बूढ़ा इस पर झपट पड़ा। विजय बेहोश हो गया और फिर सब कुछ शांत हो गया।।
अगली सुबह विजय की नींद खुली। वो अस्पताल में एक बिस्तर पर लेटा पड़ा था। उसके बगल में ही किसी व्यक्ति का शायद ऑपरेशन किया जा रहा था। विजय तेजी से खड़ा हुआ और कमरे से बाहर आ गया। उसने बाहर आकर देखा तो हॉस्पिटल पूरी तरह से सुनसान पड़ा था। कहीं पर कोई भी नज़र नहीं आ रहा था। विजय ने फिर से उस कमरे की और नज़र दौड़ाई और कमरे के ऊपर लगे बोर्ड को देखकर दंग रह गया। ऊपर लिखा था " पोस्टमार्टम रूम।"
विजय तेजी से उस कमरे के अंदर गया। बिस्तर पर एक लाश पड़ी थी जिसका पोस्टमार्टम किया जा रहा था। वो धीरे धीरे उस लाश के पास गया और दंग रह गया। वो थर थर कांपने लगा। शरीर सुन हो गया। लकवा मार गया और उसका दिल उछलकर उसके मुंह में आ गया क्योंकि वो लाश उसी की थी।।
राहुल बोला " नरेश बाबू तुम्हारी कहानी में वो दम नहीं है। ऐसी कहानियां तो बचपन से ही सुनते आ रहे हैं। कोई और डरावना किस्सा सुनाओ।"
सुधीर बोला " हां यार ये कहानी उतनी डरावनी नहीं है।"
तभी सतनाम बोला " ओ पाजी मैं सनोना हैं एक तकड़ी जी कहानी।"
इतना कहकर सतनाम ने अपनी कहानी सुनानी। शुरू कर दी।
सतनाम बोला " मनोहर एक कॉलेज का विद्यार्थी था। वो अपनी बाइक से कॉलेज जाता और वापिस आता था। जाते वक्त उसे जंगल के एक सुनसान से रास्ते से गुजरना पढ़ता था जो पूरी तरह से सुनसान रहता था। आते वक्त मनोहर को रात हो जाती थी। इसी तरह वो एक रात अपनी बाइक से चला आ रहा था। तभी एक बाइक उसे ओवरटेक करते हुए आगे निकल गई। वो बाइक कोई आदमी चला रहा था और उसके पीछे एक महिला बैठी थी जो शायद उसकी पत्नी थी जिसने लाल साडी पहन रखी थी। उसका पल्लू नीचे लटक रहा था जो किसी भी वक्त पहिए के बीच आ सकता था। मनोहर ये देखकर डर गया और उसने अपने बाइक की गति तेज कर दी और दूसरी बाइक के बराबर ले गया। पीछे बैठी महिला बहुत ही डरावनी लग रही थी। रात के खौफनाक अंधेरे में वो ऐसे लग रही थी जैसे की कोई डायन बैठी हो?"
मनोहर ने उस बाइक वाले से कहा " हेलो भाई बाइक रोको। सुन रहे हो क्या? बाइक रोको।"
उस आदमी ने अचानक से ब्रेक लगा दिए और मनोहर की और घूरने लगा।
मनोहर ने डरी दबी आवाज में कहा " भाई मैडम जी से कहिए की पल्लू ऊपर कर ली नहीं तो ये टायर में आ जायेगा।"
मनोहर की बात सुनकर वो आदमी हक्का बक्का रह गया और बोला " भाई लगता है तुम पागल हो गए हो। मैं तो अकेला ही जा रहा हूं। मेरे साथ कोई नहीं है।"
ये सुनकर मनोहर डर गया और बाइक के पीछे नज़र दौड़ाई लेकिन पीछे कोई नहीं था। वो आदमी वहां से तेजी से चला गया। मनोहर वहां खड़ा कुछ देर सोचता रहा की क्या ये उसका वहम था या फिर कुछ और?
लेकिन मनोहर ने इस बात को नजरंदाज कर दिया और अपने घर चला गया। इसी तरह कई दिन बीते। एक दिन मनोहर बाइक लेकर उसे रास्ते से होते हुए घर आ रहा था। उसे काफी रात हो गई थी। तभी मनोहर एक बाइक वाले को ओवरटेक करके आगे निकल गया। तभी वो बाइक वाला फिर से मनोहर के बराबर आया और चिल्ला उठा " अरे भाई जल्दी से बाइक रोको।"
मनोहर ने वहीं पर बाइक के ब्रेक लगा दिए और हैरानी से उस आदमी की और देखा।
वो आदमी बोला " मैडम जी से कहिए की पल्लू ऊपर उठा लें।"
ये सुनकर मनोहर के पसीने छूट गए। वो दंग रह गया। उसने डरते हुए अपनी नजर पीछे दौड़ाई। एक महिला लाल साडी में उसके पीछे बैठी थी और अपना हाथ मनोहर के कंधे पर रख रखा था। वो महिला तेजी से मनोहर पर झपट पड़ी। वो आदमी भी अचानक से गायब हो गया। मनोहर सड़क पर औंधे मुंह गिर गया जैसे उसमे प्राण ही न हो और पास खड़ी वो डायन जोर जोर से हंस रही थी।।
राहुल - " वा पाजी तुसी की कहानी सुनाई है मन गए थोनू।"
सुधीर - " हां यार वाकई डरावना किस्सा था। मैं तो सच में डर गया।"
तभी नरेश ने आसमान की और देखा और फिर अपनी घड़ी में नजर दौड़ाते हुए बोला " रात के दो बज चुके हैं अब हमे भी घर चलना चाहिए और वैसे इस पुल के बारे में तो तुम सब जानते ही हो।"
सुधीर - " हां यार कहते है इस पुल से कूदकर एक लड़की ने आत्महत्या कर ली थी। रात को तो बड़े बड़े सिकंदर भी जहां आने से डरते हैं। कहते है की उस लड़की की आत्मा जहां भटकती है।"
राहुल - " अरे यार ये सब फालतू की बकवास है। मुझे किसी से डर नहीं लगता।"
इतना कहकर राहुल ने अपने दोनों हाथ फैलाए और नीचे पानी की और देखते हुए बोला " अरे ओ पानी की भूतनी मैं तुझसे नहीं डरता। तूं मेरे सामने तो आ मैं तेरे टुकड़े टुकड़े कर डालूंगा। मैं किसी भूतनी से नही डरता किसी से भी नहीं।"
राहुल जोर जोर से चिला रहा था। तभी नदी के शांत पानी में हलचल होने लगी। पूरा आसमान काले बादलों से गिर पड़ा और ऐसे लगने लगा जैसे अमावस्या की रात हो। नदी में से एक काली परछाई निकली और राहुल पर झपट पड़ी और वो बेहोश हो गया और इसके बाद सब कुछ शांत हो गया।
अगले दिन राहुल की नींद खुली। वो अस्पताल में पड़ा था। उसने धीरे धीरे अपनी आंखें खोली। उसके सामने उसके पिता और डॉक्टर खड़े थे।
डॉक्टर ने राहुल की और देखते हुए कहा " अब तबियत कैसी है?"
राहुल - " अब ठीक हूं डॉक्टर साहब।"
उसका पिता और डॉक्टर दोनो कमरे से बाहर निकले। डॉक्टर ने राहुल के पिता से पूछा " आखिर हुआ क्या था?"
राहुल के पिता ने परेशान होते हुए कहा " क्या बताऊं डॉक्टर साहब मेरे बेटे राहुल , सतनाम , सुधीर और नरेश इन चारों में बड़ी पक्की दोस्ती थी। ये चारों हर पूर्णिमा की रात को उस सुनसान पुल पर पार्टी करने के लिए जाते थे। एक दिन राहुल का बाइक पंक्चर हो गया। इसलिए ये थोड़ी देरी से पहुंचा। जब इसने जाकर देखा तो वहां पर उसके दोस्त नहीं थे। अगले दिन उसके तीनों दोस्तों की लाशे नदी में तैरते हुए पाई गई। मेरे बेटे का मानना है की इसके वे तीनों दोस्त अब भी जिंदा है। और ये अब भी हर पूर्णिमा की रात को उस पुल पर जाकर न जाने किससे बातें करता हैं। पता नहीं ये सब कब सही होगा।"
राहुल के पिता की ये बात सुनकर डॉक्टर सुन हो गया जैसे उसे किसी बिच्छू ने डंक मार दिया हो।।

सतनाम वाहेगुरु।।