अनुस्वार anuswaar in Hindi Love Stories by prabha pareek books and stories PDF | अनुस्वार

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अनुस्वार

अनुस्वार
अति चचंल उछल कूद करती रहने वाली सीमा जिसे सहेलियों के साथ मस्ती और खाना खेलना ही अपनी दुनियाँ लगता था। किसी के भी टोकने पर सीमा अकसर माँ के मुंह से सुनती रहती थी.... अभी उम्र ही क्या है समझदार हो जायेगी। यह बात अकसर वह तब कहती. जब सीमा से घर आकर अपने साथ वाले लड़के लड़कियों के किस्से उनकी हरकतें बता बता कर हँसती, खिलखिलाती थी। मां सदा उसकी बात सुनती भर थी प्रतिक्रिया उन्होंने कभी नहीं दी।
सीमा कहाँ जानती थी कि मां की यह लाड़ली बेटी एक दिन में ही समझदार व सयानी हो जायेगी। सीमा कुछ दिनों के लिये परिवार के साथ शहर से बाहर विवाह में गई थी। पिजाजी के आर्मी में होने के कारण ही उसे फार्म भरने की अन्तिम तारीख के बाद भी फार्म भरने की अनुमती मिल पाई थी। इसलिये सोमवार को स्कूल की आधी छुटटी में वह बाहरवीं कक्षा की परीक्षा का फार्म भरने के लिये गई थी। पास ही आफिस की दूसरी विंड़ो पर सुरेश खड़ा अपना चरित्र प्रमाण पत्र बनवा रहा था। क्लर्क के आनाकानी करने के और कल आने केा कहने पर सुरेश ने कहा था ’’दे दे यार चरित्र तो साफ सुथरा ही है कहाँ स्कूल की किसी लड़की को पटाया है दे देते यार... आज ही.’’..। कहते हुये वह झटके से पीछे घूमा और जा टकराया पीछे से आती हुई सीमा से... संभलते संभलते भी कठिन पलों का सामना हो ही गया था। सीमा सुरेश की बाहों का सहारा लेकर ही तो संभल पाई थी.... कहना न होगा की आज भी सुरेश की बाहों का सहारा दिल दिमाग में ताजा सा घरा हैं जैसे कोई ताजा फूल संजों कर बक्से में धरा हो।
शर्म से आरक्त हुये गालों में पुरूष स्पर्श की लाज तो थी ही साथ ही आस पास देख रहे लोगों का भय संकोच भी था । सुरेश था की एकटक उसे देखे जा रहा था । र्क्लक से एक बार फिर उलझने के बाद सुरेश उसकी और आ रहा था । सुरेश को आता देख कर सीमा सकपका गई ’’अब क्यों आ रहा है इधर’’...बचने की अभी सोच ही रही थी कि सुरेश ने उसका भरा हुआ फार्म उठा लिया। फार्म को पूरा पढने के बाद, उसके पिता का आर्मी में होना, इस जानकारी के बाद उसने एक जोरदार हुंकार भरी मानेा चुनौति स्वीकार कर रहा हो। सीमा का फार्म भरा जा चुका था| बस फोटो चिपकाना बाकी थी। आफिस का गोंद काम नहीं कर रहा था फोटो थी कि चिपक ही नहीं रही थी । सुरेश ने मदद करने के अंदाज से उसके हाथ से फोटो ली और अपने बैग से गोंद निकाल फोटो हाथ में लेकर पूछा था ’दिल पर चिपका लूं या फार्म पर ही चिपकानी जरूरी है’ सीमा बस देखती रह गई। सुरेश ने मजाक ही के अंदाज में फिर कहा ’चिपकानी तो फार्म पर ही पडेगी...इतनी सुन्दर लडकी अनपढ़.. मजे नहीं आयेगे यार’ ...और तड़ाक से फोटो फार्म पर चिपका दी। फार्म सीमा को पकडाते हुये कहा था जाओं फीस के साथ जमा करा दो। उसने मेरे हाथ में पर्स देख लिया था। जाते जाते कुछ सोच कर बोला.....’ सुनो मजा आ गया यार मुझे नहीं पता था लड़कियों को छूने मात्र से तरंग उठने लगती है’। ऑखे तरेरी थी सीमा ने और सुरेश अदा से कान पकड़ता हुआ मोटर साईकिल स्टार्ट करके फुर्र हो गया।
करीब सप्ताह लगा सीमा को अपनी भावनाओं को समझने में और सुरेश के कहे शब्दों का अर्थ समझने में । उसका मन यह मानने को कतई तैयार नहीं था कि कभी उसे भी किसी से इतना लगाव हो जायेगा कि उसकी नजरों में चौबीसों घंटे समाया रहे। दिल और दिमाग उसके ही बारे में सोचे और फिर यह सब सीमा जैसी दबंग लड़की के साथ हो रहा था। सुरेश को देखने को आतुर उसका मन कहीं नहीं लगता। बेताब मन सुरेश को सामने पा कर बल्ल्यिां उछलने लगता।
माता पिता के संसकारों में बंधी सीमा अभी किसी निर्णय की स्थिती में नहीं थी। उस दिन स्कूल से निकलते समय सुरेश को सामने खडा पाया न केवल खड़ा था हाथ में थांमा गुलाब भी तो छुपाया नहीं था।
धड़कते दिल से साईकिल तक पहुँचने की उतावली में कदम उठा रही थी। कनखियों से सुरेश को देख भी रही थी। सहेलियों की नजरो से सावधान चुपचाप साईकिल चलाती रही कुछ दूर निकल कर पीछे देखा तो सुरेश गुलाब को मंुह में दबाये पीछे पीछे आ रहा था सीमा चाहती थी आज सहेलियों से पीछा छुडाकर सुरेश को बता दे की सावधान उसकी इस हरकत की जानकारी उसके पिता को होते ही कितना बडा तूफान उठेगा पर मोका नहीं मिला और अचानक सीमा ने जूते में फसे कंकर को निकालने के बहाने साईकिल रोकी ही थी कि सुरेश गुलाब उसके बैग पर रखकर फर्राटे से निकल गया। किसी को कुछ पता नहीं चला। सखियों को ईशारा भी किया था तुम चलती रहो पर वह आगे जा कर रूकी रहीं सीमा को सुरेश की शालीनता भा गई । धड़कते दिल पर काबु पाने का अवसर उसे मिल गया था।
बाहरवी कक्षा की परीक्षा की तैयारियां जोर शोर से थीं, सीमा मन लगाकर पढने का प्रयास कर भी रही थी सुरेश याद भी आता पर स्कूल में छुिट्टयो ंके कारण बाहर निकलना संभव न था और पढाई की प्राथमिकता जानती थी सीमा।
अन्तिम परीक्षा के दिन सुरेश आतुरता से स्कूल के दरवाजे के सामने खड़ा नजर आया। स्कूल का अन्तिम दिन, पता नहीं सखियों से अब कब मिलना होगा। सब सखियां अपनी अपनी कह सुन रहीं थी। सीमा का मन कहीं और अटका था। पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार साथ पिक्चर देखने जाने का कार्यक्रम तय हुआ और सभी सखियेां ने हॅसते खिलखिलाते विदा ली। सीमा का पूरा ध्यान सुरेश पर ही था। आतुरता से राह देख रहे सुरेश का चैहरा देखने लायक था। स्कूल के निकट दरवाजे तक आकर चुपके से पर्ची पकड़ाकर गायब हो गया । सखियों से छुपकर पर्ची देखी उसमें फिल्म का नाम लिखा था
सीमा को परीक्षा खतम होने से ज्यादा खुशी सुरेश से मिलने की हो रही थी कल्पनाओं के घोडे अविरल दौड रहे थे मां का निर्देश था अब धर के काम में भी ध्यान देा। लगे हाथ बता भी दिया था मां को कि आज सब सखियां मिलकर पिक्चर देखने जाने वाली हैं। मां के मौन का अर्थ सहमती ही था पर भाई ने शंकित निगाहों से टटोला था। कौनसी पिक्चर. कितने बजे. किसके साथ आदि आदि, कितने बजे का शो में जाना है ?ये तो उसने जानना ही नहीं चाहा था सहेलियों से और न ही सुरेश ने भी कुछ नहीं लिखा था। शाम पॉच बजे ही सहेलिया उसे बुलाने आ गई उलझन ये थी कि यदि सुरेश छः से नौ बजे वाले शो में मिला तो क्या करेगी? सोचने का समय नहीं था। घर से निकलने का अच्छा खासा मौका हाथ आया था।
धडकते दिल को राहत मिली जब सुरैश सामने ही खड़ा मिल गया। ंसीमा वह फिल्म ’वो लम्हे’ कभी नहीं भूल सकती। पूरी फिल्म अंदर बाहर करते ही निकली । फिल्म पूरी होने से पहले सुरेश को जाने का कह कर उसने राहत की सांस ली सहेलियों को भी कुछ पता नहीं चला और सुरेश से मिलना भी हो गया।
अभी कुछ दिन ही बीते थे रिजल्ट आने में अभी समय था। समय था यह निर्णय करने का कि किस टयुशन में प्रवेश लेना है कालेज के लिये आगे किस प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करनी है। सीमा का निर्णय था उसे डाक्टरी की पढाई करनी है। सब कुछ उसके अंको पर निर्भर था। किससे बात करे सोच ही रही थी। पिता की जानपहचान भी थी और सीमा स्वयं भी बहुत होशियार रही थी। मैडीकल की प्रवेश परीक्षा के लिये स्वयं को तैयार करे बेठी थी।
उस दिन एक सहेली के साथ किसी दूसरी सहेली के घर जाने का कार्य क्रम बना था। सीमा के पास सुरेश का कोई नम्बर भी नहीं था यह भी नहीं पता कि वह रहता कहाँ हैं। सोचा अब मिलने पर फोन नम्बर जरूर ले लेगी। तैयार होकर घर से निकली तो सामने सुरेश को खड़ा पाया। उसके आन्नद मिश्रीत आश्चर्य का ठीकाना नहीं था। उसने चहक कर कहा था। ’सच जहॉ चाह है वहॉ राह है’। और सुरेश की रहस्यमई मुस्कान को निहारती ही रह गई थी सीमा।
घर से कुछ दूरी पर आकर सीमा ने सुरेश को एक घंटे बाद मिलने का स्थान बता कर विदा ली थी। सहेली से मिलने के बाद सीमा सुरेश से मिली अपनी आगे की पढाई के बारे में बताया। सीमा को सुरेश द्वारा बहुत से उपयोगी टिप्स मिले। दोनों के बीच अनेक प्यार भरी बातें हुई। और विदा होते समय सीमा ने फोन नम्बर और पता मांगा तब उसने कहा था। बस मन से याद करती रहो बंदा हाजिर रहेगा। घर जाने की जल्दी और डर के कारण सीमा चुप रह गई। घर आकर सुरेश के ख्यालों के खोती रहकर भी पढाई के बारे में सोचती रही।
उसने मैडिकल की प्रवेश परीक्षा में अच्छा स्थान प्राप्त कर लियां और उसे एक प्रतिष्ठित कालेज में एडमिशन भी मिल गया। झोली भर के खुशियाँ उसके आंचल में थी। कालेज भी जाने लगी थी पर करीब चार महिनेां से सुरेश उसे नहीं मिला किस से समाचार ले वह तो किसी से पूछ भी नहीं सकती। मन डरता रहा अकसर उदास रहने लगी थी। सीमा से मां भी कारण पूछ कर थक चुकी थी।
एक दिन उसने अपनी मन की पीड़ा अपनी अंतरंग सखी उषा को बताई। सारी बाते जानने के बाद उसने सुरेश की तलाश का वादा किया। बहुत मैहनत करने के बाद वह सुरेश के बारे में पता लगा पाई जो जानकारी उसे मिली वह अपनी सहेली सीमा को देने के लिये उसको अपना मन बहुत कड़ा रखने की आवश्यक्ता था। उषा जानती थी ये प्रेम समाज परिवार से छुपा कर हुआ था। प्रेम कितना भी पवित्र हो यदि समाज परिवार उससे अनभिज्ञ है तो वह छल की क्ष््रेाणी में ही गिना जाता हैं।
किसी को कुछ बताये बिना उसने अपनी सहेली सीमा के साथ दो दिन के लिये एक पर्यटन स्थल जाने का कार्यक्रम बनाया। सीमा ने अपने माता पिता से इसकी सहमती ले ली और दोनों सखिया पर्यटन स्थल के लिये बस में बैठी, बस कें पहुचते ही सीमा की नजरे सुरेश को तलाशने लगी। सीमा तो यही मान कर चल रही थी कि उषा इस लिये प्रसन्न है कि उसने मेरे लिये सुरेश का पता पा लिया है। जब सीमा ने सुरेश को नहीं देखा तब उसने सखी से अपनी बत स्पष्ट कह दी। उसके पूछने पर एक बार तो उषा सकपका गई पर अगली बार उसने द्रढ शब्दों में कहा था सीमा सुरेश को लेकर तुम्हारे लिये कोई अच्छा समाचार मैं नहीं ला सकी और शायद अब जीवन भर न ला सकुं मुझे माफ कर देना। सीमा की प्रश्न भरी नजरों का सामना करते हुये उषा ने उसे सारी घटना की जानकारी दी। कैसे उस दिन तुम से मिलने के बाद सुरेश घर के लिये निकला, मिलने के खुशी में मोटर साईकिल की स्पीड पर नियंत्रण नहीं रखा और सामने से आती कार से जा टकराया। दो दिन अस्पताल में भी रहा अपने दोस्त को बार बार कहता रहा ’’सीमा को पता पहीं चलना चाहिये वह टूट जायेगी’’।
सुरेश के अंन्तिम शब्द थे ’’सीमा एक डाक्टर बनेगी और मुझ जैसे घायल लोगों की जान बचा कर वह प्रेमी जोडों को अलग होने से बचा लेगी’’। सीमा ने अपने सारे आसूओं को उषा के सामने बह जाने दिया उसकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा की और कुछ समय बाद सीमा ने कहा था ’’मां सच कहती है अभी उम्र ही क्या है उम्र आने पर सब समझ जायेगी। आज उनकी बेटी सब समझ गयी है’’ सुरेश का प्रेम उसे नई प्रेरणा व उत्साह देगा। दोनोें सखिया पर्यटन स्थल पर गई भी पर दिन भर उषा सुरेश की बातें सुनती रही इन दो दिनों में सीमा ने सुरेश के प्रेम को ही ओढा, बिछाया और अपना सारा दुःख व्यथा अपनी सखी के सामने सुना कर मन में एक एैसा कभी न भरने वाला अव्यक्त घाव लेकर आई, जिसे उसकी मां जीवन भर नहीं देख पाई और सीमा, अपने इस घाव को भरने के पक्ष में नहीं थी। जानती थी जीवन इसी तरह चलता है पर सच्चा प्रेम किसी उचित अवसर की क्या कभी राह देखता है।
         प्रेषक प्रभा पारीक