Mahabharat ki Kahaani - 210 in Hindi Spiritual Stories by Ashoke Ghosh books and stories PDF | महाभारत की कहानी - भाग 210

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महाभारत की कहानी - भाग 210

महाभारत की कहानी - भाग-२१४

भीष्म वर्णित च्यवन और कुशिक की कहानी

 

प्रस्तावना

कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक में उन्होंने कुरु वंश के प्रसार, गांधारी की धर्मपरायणता, विदुर की बुद्धि, कुंती के धैर्य, वासुदेव की महानता, पांडवों की सच्चाई और धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुष्टता का वर्णन किया है। विभिन्न कथाओं से युक्त इस महाभारत में कुल साठ लाख श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस ग्रंथ को सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया और फिर अन्य शिष्यों को पढ़ाया। उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और महाभारत संहिता की रचना की, जिनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख श्लोक पितृलोक में, चौदह लाख श्लोक ग़न्धर्बलोक में और एक लाख श्लोक मनुष्यलोक में विद्यमान हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने उस एक लाख श्लोकों का पाठ किया। अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय और ब्राह्मणों के कई अनुरोधों के बाद, कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का अनुमति दिया था।

संपूर्ण महाभारत पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश लोगों ने महाभारत की कुछ कहानी पढ़ी, सुनी या देखी है या दूरदर्शन पर विस्तारित प्रसारण देखा है, जो महाभारत का केवल एक टुकड़ा है और मुख्य रूप से कौरवों और पांडवों और भगवान कृष्ण की भूमिका पर केंद्रित है।

महाकाव्य महाभारत कई कहानियों का संग्रह है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कौरवों और पांडवों की कहानी से संबंधित हैं।

मुझे आशा है कि उनमें से कुछ कहानियों को सरल भाषा में दयालु पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आएगा।

अशोक घोष

 

भीष्म वर्णित च्यवन और कुशिक की कहानी

युधिष्ठिर ने भीष्म से कहा, पितामह, परशुराम ब्रह्मर्षि के वंश में जनम लेकर क्षत्रधर्मी क्यों हुए? फिर, क्षत्रिय कुशिक के वंश में जन्मे विश्वामित्र ब्राह्मण कैसे हुए? भीष्म ने कहा, भृगुनंदन च्यवन जानते थे कि कुशकवंश से उनके वंश में क्षत्रिय का आचरण संक्रामित हो जाएगा, इसलिए उन्होंने कुशिकवंश का विनाश करने की इच्छा की। च्यवन कुशिक के पास जाकर बोले, महाराज, मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ। कुशिक ने उन्हें सम्मानपूर्वक ग्रहण करके कहा, मेरा राज्य, धन, गाय सब आपका। च्यवन बोले, मैं वह सब नहीं चाहता, मैं एक व्रत का अनुष्ठान करूँगा, तुम और तुम्हारी स्त्री निश्चिंत होकर मेरी सेवा करो। कुशिक प्रसन्न होकर सहमत हुए और उन्हें एक सुसज्जित शयनकक्ष में ले गए। सूर्यास्त होने पर च्यवन भोजन के बाद शय्या पर लेटे हुए बोले, तुम मुझे जगाना मत, निरंतर पादसेवा करो। कुशिक और उनकी स्त्री भोजन-निद्रा त्यागकर च्यवन की पादसेवा करने लगे। इक्कीस दिन बाद च्यवन शय्या से उठे और शयनकक्ष से बाहर निकले, कुशिक और उनकी स्त्री अत्यंत थके और क्षुधित होने पर भी पीछे-पीछे गए। कुछ क्षण बाद च्यवन अदृश्य हो गए।

स्त्रीके साथ कुशिक ने खोजा तो कहीं च्यवन को नहिं पाया, तब वे शयनकक्ष में आकर देखा, महर्षि शय्या पर लेटे हैं। कुशिक और उनकी स्त्री आश्चर्यचकित होकर फिर च्यवन की पादसेवा में लग गए। और इक्कीस दिन बाद च्यवन फिर उठे और बोले, मैं स्नान करूँगा, मेरे शरीर पर तेल मल दो। कुशिक और उनकी स्त्री च्यवन के शरीर पर महँगा शतपाक तेल मलने लगे। फिर च्यवन स्नानघर में जाकर स्नान किया और फिर अंतर्धान हो गए। फिर प्रकट होकर वे सिंहासन पर बैठे और भोजन लाने का आदेश दिया। अन्न, मांस, शाक, पिठा, फल आदि लाए गए तो च्यवन अपनी शय्या-आसन आदि के साथ सारे भोज्यद्रव्य में आग लगा दी और फिर अंतर्धान हो गए और अगले दिन प्रकट हुए।

इस प्रकार कई दिन बीत गए, किंतु च्यवन को कुशिक में कोई त्रुटि न दिख पाए। एक दिन वे बोले, तुम और तुम्हारी स्त्री मुझे रथ पर बिठाकर ले चलो। रास्ते पर जो प्रार्थी आएँ उन्हें मैं प्रचुर धन-रत्न दूँगा, तुम उसका आयोजन करो। कुशिक और उनकी स्त्री रथ खींचने लगे, राजभृत्य धन-रत्न लेकर पीछे चले। च्यवन के कोड़े के आघात से त्री के साथ कुशिक क्षत-विक्षत हो गए, नगरवासी शोकाकुल होकर भी शाप के भय से मौन रहे। अजस्र धन दान करने पर च्यवन रथ से उतरे और बोले, महाराज, तुम दोनो से मैं संतुष्ट हूँ, वर माँगो। यह कहकर उन्होंने कुशिक और उनकी स्त्री के शरीर को हाथ से स्पर्श किया। कुशिक बोले, महर्षि, आपके प्रसाद से हमारी थकान और दर्द दूर हो गई। च्यवन बोले, अब तुम प्रासाद में लौट जाओ, मैं कुछ काल इस गंगातीर पर रहूँगा, तुम कल फिर आना। दुखी न हो, शीघ्र ही तुम्हारी सभी कामनाएँ पूरी होंगी।

अगले दिन सुबह कुशिक और उनकी स्त्री गंगातीर पर आए तो देखा, वहाँ गंधर्वनगर के तुल्य कांचनमय प्रासाद, रमणीय पर्वत, पद्मशोभित सरोवर, चित्रशाला, तोरण, बहु पेड़पौधा युक्त उद्यान आदि सृष्टि हो गया है। कुशिक सोचने लगे, क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ, या सशरीर स्वर्गलोक प्राप्त कर लिया, या उत्तरकुरु या अमरावती आ गया? कुछ काल बाद वह कांचन प्रासाद आदि अदृश्य हो गया, गंगातीर पूर्वावस्था में लौट आया। कुशिक ने अपनी स्त्री से कहा, तपोबल से ही यह सब हो सकता है, त्रिलोक का राज्य की तुलना से तपस्या श्रेष्ठ है। महर्षि च्यवन की क्या आश्चर्यजनक शक्ति है! ब्राह्मण सब विषयों में पवित्र होकर जन्म लेते हैं। राज्य आसानी से प्राप्त हो जाता है, किंतु ब्राह्मणत्व अति दुर्लभ है।। कुशिक और उनकी स्त्री को बुलाकर च्यवन बोले, महाराज, तुमने इन्द्रिय और मन जित लिया, अब कठोर परीक्षा से मुक्त हो। मैं संतुष्ट हूँ, वर माँगो। कुशिक बोले, आपके निकट रहकर भी अग्नि के मध्य में रहने वाले की तरह हम जल नहिं गए यह ही पर्याप्त है। यदि संतुष्ट हैं तो बताइए, आपने जो अनेक विचित्र कार्य किए उनके पीछे उद्देश्य क्या था? च्यवन बोले, महाराज, मैंने ब्रह्मा के निकट सुना था कि ब्राह्मण-क्षत्रिय के विवाद से कुलसंकर होगा, तुम्हें एक तेजस्वी बलवान पुत्र जन्मेगा। तुम्हारे वंश का विनाश करने ही मैं यहाँ आया था, किंतु बहुत अत्याचार करने पर भी तुम्हें क्रुद्ध न कर सका, अभिशाप देने के लिए कोई त्रुटि न पाई। तुम्हारी प्रसन्नता के लिए ही यह कांचन सृष्टि की थी, उससे तुम कुछ काल सशरीर स्वर्गसुख भोगे। राजन्, तुम ब्राह्मणत्व और तपस्या की आकांक्षा रखते हो यह भी मैं जानता हूँ। ब्राह्मणत्व अति दुर्लभ है, ऋषित्व और तपस्वित्व और भी दुर्लभ। फिर भी तुम्हारी कामना पूरी होगी, तुम्हारे अधस्तन तृतीय पुरुष विश्वामित्र ब्राह्मणत्व प्राप्त करेंगे। क्षत्रिय भृगुवंशीयों के यजमान हैं, तथापि दैव के कारण वे भृगुवंशीयों का वध करेंगे। उसके बाद हमारे भृगुवंश में और्व नामक एक महातेजस्वी पुरुष जन्म लेंगे, उनके पुत्र ऋचीक समस्त धनुर्वेद आयत्त करेंगे और पुत्र जमदग्नि को दान करेंगे। जमदग्नि के साथ तुम्हारे पुत्र गाधि की कन्या का विवाह होगा। उनके पुत्र महातेजस्वी परशुराम क्षत्रिय के आचारी होंगे। गाधि के पुत्र विश्वामित्र ब्राह्मणत्व प्राप्त करेंगे। यह भविष्यवाणी करके च्यवन तीर्थयात्रा पर चले गए।

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(धीरे-धीरे)