Mahabharat ki Kahaani - 212 in Hindi Spiritual Stories by Ashoke Ghosh books and stories PDF | महाभारत की कहानी - भाग 212

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महाभारत की कहानी - भाग 212

महाभारत की कहानी - भाग-२१६

भीष्म द्वारा वर्णित दान के अपात्र और वशिष्ठादि के लोभ संवरण की कथा

 

प्रस्तावना

कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने महाकाव्य महाभारत रचना किया। इस पुस्तक में उन्होंने कुरु वंश के प्रसार, गांधारी की धर्मपरायणता, विदुर की बुद्धि, कुंती के धैर्य, वासुदेव की महानता, पांडवों की सच्चाई और धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुष्टता का वर्णन किया है। विभिन्न कथाओं से युक्त इस महाभारत में कुल साठ लाख श्लोक हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने इस ग्रंथ को सबसे पहले अपने पुत्र शुकदेव को पढ़ाया और फिर अन्य शिष्यों को पढ़ाया। उन्होंने साठ लाख श्लोकों की एक और महाभारत संहिता की रचना की, जिनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक में, पंद्रह लाख श्लोक पितृलोक में, चौदह लाख श्लोक ग़न्धर्बलोक में और एक लाख श्लोक मनुष्यलोक में विद्यमान हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने उस एक लाख श्लोकों का पाठ किया। अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय और ब्राह्मणों के कई अनुरोधों के बाद, कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने अपने शिष्य वैशम्पायन को महाभारत सुनाने का अनुमति दिया था।

संपूर्ण महाभारत पढ़ने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। अधिकांश लोगों ने महाभारत की कुछ कहानी पढ़ी, सुनी या देखी है या दूरदर्शन पर विस्तारित प्रसारण देखा है, जो महाभारत का केवल एक टुकड़ा है और मुख्य रूप से कौरवों और पांडवों और भगवान कृष्ण की भूमिका पर केंद्रित है।

महाकाव्य महाभारत कई कहानियों का संग्रह है, जिनमें से अधिकांश विशेष रूप से कौरवों और पांडवों की कहानी से संबंधित हैं।

मुझे आशा है कि उनमें से कुछ कहानियों को सरल भाषा में दयालु पाठकों के सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आएगा।

अशोक घोष

 

भीष्म द्वारा वर्णित दान के अपात्र और वशिष्ठादि के लोभ संवरण की कथा

युधिष्ठिर के अनुरोध पर भीष्म श्राद्धकर्म के विधि को विस्तार से वर्णन करते हुए बोले, दैव और पितृकर्म में दान के पहले ब्राह्मणों का कुल, शील, विद्या आदि का विचार करना उचित है। जो ब्राह्मण धूर्त, भ्रूणहत्याकारी, यक्ष्मारोगी, पशुपालक, विद्याहीन, कुसीदजीवी या राजभृत्य है, जो पिता से झगड़ा करता है, जिसके घर में उपपत्नी है, जो चोर, परस्त्रीगामी, शूद्रयाजक या शस्त्रजीवी है, जो कुत्ते लेकर मृगया करता है, जिसे कुत्ता काटा हैं, जो बड़े भाई से पहले विवाह कर चुका हैं, जो अभिनय करता, जो कृषिजीवी हैं, जो हस्तरेखा और नक्षत्रादि देखकर शुभाशुभ निर्णय करता हैं, ऐसा ब्राह्मण अयोग्य है, इनको दान नहीं करना चाहिए। इनके पास से दान ग्रहण करना भी दोषजनक है। जो ब्राह्मण गुणवान का दान ग्रहण करता है वह अल्पदोषी होता है, जो निर्गुण का दान लेता है वह पाप करता है। मैं एक प्राचीन इतिहास कह रहा हूँ सुनो –

कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, भारद्वाज, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि और वशिष्ठपत्नी अरुंधती ब्रह्मलोक प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करते हुए पृथ्वी पर परिभ्रमण कर रहे थे। गंडा नामक एक दासी और उसके स्वामी पशुसख नामक शूद्र ऋषियों की सेवा करते थे। इसी समय अनावृष्टि के फलस्वरूप खाद्याभाव से लोग अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। शिबिपुत्र शैब्य-वृषादर्भ ने एक यज्ञ किया और ऋत्विकों को अपने पुत्र को दक्षिणास्वरूप दिया। वह पुत्र अकाल में प्राण त्याग कर गया तो महर्षिगण अपने जीवनरक्षा के लिए उसके शरीर को पकाने लगे। उसे देखकर शैब्य बोले, आपलोग इस अभक्ष्य वस्तु को त्याग दें, आपकी पुष्टि के लिए जो चाहें वह मैं दूँगा। ऋषियों ने कहा, राजाओं का दान ग्रहण करने से आभात सुख तो मिलता है किन्तु परिणाम में वह विषतुल्य होता है, दान प्रतिग्रह से समस्त तपस्या नष्ट हो जाती है। जो याचक हैं उन्हीं को तुम दान दो। यह कहकर ऋषिओं अन्यत्र चले गये, जो वे पका रहे थे वह पड़ा रहा।

राजा शैब्य के आदेश पर उनके मन्त्रियों ने वन से डुमुर फल संग्रह करके ऋषियों को देने लगे। कुछ दिनों बाद राजा ने फलों में सोना भरवाकर भेज दिया। महर्षि अत्रि ने वह फल गुरुभार देखकर कहा, हम निर्बोध नहीं हैं, यह सोना से भरे हुए फल हम नहीं ले सकते। ऋषियों ने वह स्थान त्यागकर अन्यत्र चले गये। दान प्रत्याख्यात होने पर शैब्य क्रुद्ध होकर एक यज्ञ करने लगे। यज्ञाग्नि से यातुधान नामक एक भयानक पिशाचिनी का आविर्भाव हुआ। राजा ने उस पिशाचिनी से कहा, तुम अत्रि आदि सात ऋषि, अरुंधती, उनके दास पशुसख तथा दासी गंडा के पास जाओ। उनके नाम जानकर सबको विनष्ट करो।

ऋषिओं ने एक वन में फलमूल खाकर विचरण कर रहे थे। एक दिन उन्होंने देखा एक मोटा शरीर वाली परिव्राजक कुत्ता साथ लेकर उनकी ओर आ रही है। अरुंधती ने ऋषियों से कहा, आपलोगों का शरीर इतना पुष्ट नहीं है। ऋषियों ने कहा, हम खाद्याभाव से क्षीण हो गये हैं, हमारा नित्यकर्म भी नहीं कर पाते। इस परिव्राजक को अभाव नहीं हैं इसलिए वह और उसका कुत्ता मोटे हैं। तब वह परिव्राजक निकट आकर ऋषियों का हाथ स्पर्श करके बोली, मैं आपकी सेवा करूँगी। एक दिन सब सरोवर के निकट पहुँचे, यातुधान उसकी रक्षा कर रही थी। ऋषि पद्म मृणाल लेने गये तो यातुधान ने कहा, पहले तुमलोग अपने नाम और उनका अर्थ बताओ फिर मृणाल लो। ऋषिगण, अरुंधती, गंडा और पशुसख ने अपना-अपना नाम और अर्थ बताया तो यातुधान ने प्रत्येक से कहा, तुम्हारे नाम का अर्थ समझा नहीं, जो भी हो, तुम सरोवर में उतर सकते हो। अन्त में परिव्राजक बोली, इनलोगों ने जिस प्रकार नाम बताया है मैं वैसा नहीं कर सकता। मेरा नाम शुनःसख (यम या धर्म का सखा) है। यातुधान बोली, तुम्हारा वाक्य संदेहजनक है, अपना नाम फिर बताओ। परिव्राजक बोली, मैंने एक बार नाम कहा फिर भी तुम समझी नहीं अतएव इस त्रिदण्ड के आघात से तुम्हें मार डालूँगा। यह कहकर उसने यातुधान के मस्तक पर प्रहार किया तो वह भूमिपतित होकर भस्म हो गयी।

ऋषियों ने तब मृणाल लेकर तट पर रखा और फिर जल में उतर कर तर्पण करने लगे। जल से उठकर उन्होंने मृणाल नहीं देखा। तब उन्होंने शपथ लेकर अपहरणकर्ता को अभिशाप दिया। अन्त में शुनःसख ने यह शपथ की - जो चोरी की है वह वेदज्ञ या ब्रह्मचर्यसम्पन्न ब्राह्मण को कन्यादान करे और अथर्ववेद अध्ययन करके स्नान करे। ऋषियों ने कहा, तूमने जो शपथ लीया वह सब ब्राह्मणों की अभिलाषा है, तूमने ही हमारा मृणाल चुराया। शुनःसख बोले, आपलोगों की बात सत्य है, आपकी परीक्षा के लिए ही ऐसा किया। यह यातुधान राजा शैब्य-वृषादर्भ के आदेश से आपलोगों का वध करने आयी थी। मैं इन्द्र हूँ, आपलोगों की रक्षा की। आपने सर्वविध प्रलोभन का इन्कार करके क्षुधा सहन किया इसलिए सर्वकामना दायक अक्षय लोक प्राप्त करोगे। तब सभी ने आनन्दित होकर इन्द्र के साथ स्वर्गलोक गये।

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(धीरे-धीरे)