भारत के एक भीड़भाड़ वाले शहर में, जहाँ सपने रोज़ जन्म लेते हैं और रोज़ ही टूट जाते हैं, वहीं से इस कहानी की शुरुआत होती है। इस शहर में रहने वाले लोग अलग-अलग ज़िंदगियाँ जी रहे थे, लेकिन एक बात सबमें समान थी—कर्ज़, मजबूरी और हार की थकान।
अर्जुन वर्मा कभी एक अच्छा कबड्डी खिलाड़ी हुआ करता था। चोट लगने के बाद उसका करियर खत्म हो गया। अब वह कर्ज़ में डूबा था और साहूकार रोज़ दरवाज़े पर खड़ा मिलता।
सीमा यादव एक घरेलू कामगार थी, जिसने अपने पति का इलाज कराने के लिए ज़मीन गिरवी रख दी थी।
इमरान शेख बेरोज़गार इंजीनियर था, जिसने नौकरी की तलाश में सब कुछ खो दिया था।
कमला देवी एक बुज़ुर्ग महिला थी, जिसने अपने बेटे के लिए लोन लिया था, लेकिन बेटा भाग गया।
राघव सिंह एक छोटा व्यापारी था, जिसका बिज़नेस धोखे में बर्बाद हो गया।
एक दिन इन सबको एक रहस्यमय कॉल आया। सामने वाले ने सिर्फ इतना कहा—
“अगर आप अपने सारे कर्ज़ से छुटकारा चाहते हैं, तो एक खेल खेलिए। इनाम—पचास करोड़ रुपये।”
शुरुआत में सबको यह मज़ाक लगा, लेकिन जब अगले दिन एक काले रंग की कार आकर उन्हें एक-एक करके उठाने लगी, तो हालात बदल गए। आँखों पर पट्टी बाँधी गई। जब पट्टी खुली, तो सब एक विशाल मैदान में खड़े थे। सभी ने एक जैसे हरे कपड़े पहन रखे थे। सामने लाल कपड़ों में नकाबपोश लोग खड़े थे।
एक बड़ी स्क्रीन पर आवाज़ गूँजी—
“स्वागत है। यहाँ खेले जाने वाले खेल वही होंगे, जो आपने बचपन में खेले हैं। नियम सरल हैं—जीतो या बाहर हो जाओ।”
पहला खेल था “लाल बत्ती, हरी बत्ती”, लेकिन भारतीय अंदाज़ में—
“लाल झंडा, हरा झंडा।”
एक लकड़ी की विशाल गुड़िया मैदान के एक सिरे पर खड़ी थी। नियम समझाए गए। जैसे ही गुड़िया पीठ घुमाएगी, खिलाड़ी चल सकते हैं। जैसे ही वह देखेगी, सबको रुकना होगा।
खेल शुरू हुआ। लोग हँस रहे थे, सोच रहे थे कि यह तो बच्चों का खेल है। लेकिन जैसे ही पहले खिलाड़ी ने हिलने की गलती की, गोली चली। उसका शरीर ज़मीन पर गिर पड़ा। चीखें गूँज उठीं।
अब सब समझ चुके थे—यह खेल नहीं, मौत का सौदा है।
अर्जुन ने दाँत भींचे और आगे बढ़ता रहा। सीमा डरते हुए चल रही थी। इमरान का शरीर काँप रहा था। कई लोग गिरते गए, मरते गए। आखिरकार कुछ ही लोग अंत तक पहुँचे।
रात को सबको एक बड़े हॉल में बंद कर दिया गया। कुछ लोग रो रहे थे, कुछ चुप थे। तभी स्क्रीन पर फिर आवाज़ आई—
“अगर आप चाहें, तो अभी खेल छोड़ सकते हैं। लेकिन याद रखिए—बाहर वही ज़िंदगी आपका इंतज़ार कर रही है, जिससे आप भागे थे।”
कई लोग बाहर चले गए। अर्जुन भी गया, सीमा भी, इमरान भी। लेकिन बाहर निकलते ही वही साहूकार, वही गरीबी, वही बीमारी उनका इंतज़ार कर रही थी। दो दिन बाद, ज़्यादातर लोग वापस लौट आए।
दूसरा खेल था “कंचे”।
हर खिलाड़ी को दस कंचे दिए गए। सामने बैठा दूसरा खिलाड़ी ही उसका प्रतिद्वंद्वी था। नियम साफ था—जिसके पास अंत में सारे कंचे होंगे, वही बचेगा।
अर्जुन के सामने एक नौजवान लड़का था। वह रोते हुए बोला,
“भैया, मेरे घर में माँ है।”
अर्जुन का दिल काँप गया, लेकिन उसे अपनी माँ की दवा याद आ गई। खेल खत्म हुआ। लड़का हार गया। उसे वहीं ले जाया गया, जहाँ से कोई वापस नहीं आता।
सीमा के सामने कमला देवी थीं। दोनों एक-दूसरे को देखती रहीं। अंत में सीमा जीत गई। कमला देवी ने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा—
“बेटी, जीतकर जीना… हारकर नहीं।”
तीसरा खेल था “पुल”। काँच के पुल पर चलकर दूसरी तरफ पहुँचना था। कुछ शीशे मज़बूत थे, कुछ टूटने वाले। नीचे गहरी खाई थी। लोग एक-एक करके गिरते गए। इमरान ने अपने इंजीनियर दिमाग से अनुमान लगाया और बच गया।
खेलों के बीच नकाबपोश पहरेदार खिलाड़ियों पर नज़र रखते। उनके लिए ये लोग इंसान नहीं, सिर्फ़ नंबर थे।
आख़िरी खेल था “कबड्डी”, लेकिन यह कबड्डी जीवन-मरण की थी। दो टीमें बनीं। अर्जुन को कप्तान बनाया गया। सामने वाली टीम में राघव था।
मैदान में उतरते ही अर्जुन को अपने पुराने दिन याद आ गए। साँस रोकी, “कबड्डी… कबड्डी…” और दौड़ा। उसने एक को छुआ, दूसरे को गिराया। लेकिन तभी राघव ने उसे जकड़ लिया।
दोनों ज़मीन पर गिरे। कुछ सेकंड का फर्क था—जीवन और मृत्यु के बीच। आख़िरकार अर्जुन ने खुद को छुड़ा लिया। राघव हार गया।
खेल खत्म हुआ।
अर्जुन अकेला विजेता था।
उसे एक आलीशान कमरे में ले जाया गया। सामने वही आवाज़ गूँजी—
“बधाई हो। यह धन आपका है।”
अर्जुन के सामने पचास करोड़ रुपये थे। लेकिन उसके दिमाग में सीमा की आँखें थीं, इमरान की खामोशी थी, कमला देवी के शब्द थे।
अर्जुन पैसे लेकर बाहर आया। उसने कर्ज़ चुकाया, माँ का इलाज कराया। लेकिन चैन नहीं मिला।
एक रात वह उसी मैदान के पास खड़ा था। उसकी जेब में विजेता का कार्ड था। उस पर एक नंबर लिखा था।
अर्जुन ने फोन उठाया।
अब अगली बार,
वह खिलाड़ी नहीं—
आयोजक बनने वाला था।
क्योंकि भारत में भी,
कुछ खेल ऐसे होते हैं
जहाँ जीतने के बाद भी
इंसान हार जाता है।