आपने परियों की कहानी सुनी होगी, राजा रानी की कहानी सुनी होगी, आपने कई लोगों की संघर्ष भरी कहानी सुनी होगी , पर क्या आप ने कभी राज घराने की संघर्ष भरी कहानी सुनी है। चलिए शुरू करते हैं। रामेश्वरम के राजा देवेंद्र नाथ का राज्य बहुत ही समृद्ध था। दूर दूर से लोग उसके राज्य में भ्रमण करने के लिए आते थे। राज्य में बहुत से सुंदर बाग, मन्दिर, आदि दर्शनीय स्थल थे, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बनते थे। राजा का महल बहुत आलीशान था। महल चारों तरफ से बागों से घिरा था। इन बागों के लिए विशेष माली रखे गए थे। यह फूल राज्य की शान थे।राजा, रानी तथा राजकुमारी सभी के कक्ष हमेशा फूलों से सजे रहते थे। रामेश्वरम से बड़े बड़े राज्य फूलों का सौदा करते थे। फूलों की भरमार होने की वजह से राजा ने अपने बच्चों के नाम भी फूलों के आधार पर ही रखे थे। जैसे सबसे बड़ी बेटी का नाम फुलर, उससे छोटी का नाम पुष्पा रखा। राजा का एक बेटा भी था, वह नवजात था। उसका नाम नहीं रखा गया था, राजा ने उसका नाम विचित्र रखने का सोचा। उसने बड़े बड़े ऋषियों को राज कुमार का नाम रखने के लिए बुलाया। उन्होंने राजा को कई नाम बताए। किन्तु राजा को कोई नाम पसंद नहीं आया। काफी सोच विचार करने के बाद राजा ने एक ब्रम्ह ऋषि को आमंत्रित किया। ऋषि ने एक अजीब सी चाल चली। उन्होंने राज यौवन को एक टोकरी में रखा, और टोकरी के चारों तरफ़ फूल सजा दिए। वह कुछ मंत्र पढ़ने लगे। राजा को लगा, कि ऋषि राज कुमार को क्षति पहुंचना चाहता है। उन्होंने तुरंत ही माचिस और मिट्टी के तेल का प्रबंध करवाया। राजा को पता था, की यदि राजा की तपस्या को भंग किया जाए तो, उसके बेटे को क्षति पहुँच सकती है। राजा ने जल्द ही सारे महल को खाली करवा दिया। राजा के राज्य में पांच किले थे। राजा ने सभी को दूसरे किले में जाने का आदेश दिया। राजा ने राज कुमार को एक दासी के साथ भेज दिया। इसके बाद राजा ने ऋषि के उपर मिट्टी का तेल छिड़क कर उसे महल समेत जला दिया। सभी चीज ऋषि समेत जलकर राख हो गई। एक सप्ताह बीत गया। राज कुमार और दासी ना आए। राजा चिंतित हो उठा। उसने उन दोनों को ढूँढने के कई प्रयत्न किए। एक दिन राजा को एक बुरा सपना आया। राजा को वह ऋषि अपने सपने में दिखाई दिया। वह ऋषि राजा से कह रहा था, कि राज्य के सारे फूल नष्ट हो जाएंगे और उसके साथ ही तुम भी बिखर जाओगे। अगली सुबह जब राजा उठा तो उसने पाया कि राज्य के सारे फूल नष्ट हो चुके थे। राज्य तबाह हो गया। जो लोग फूलों के आधार पर जी रहे थे, उनका सारा व्यापार नष्ट हो गया। राजा को अपने किए पर पछतावा हो रहा था। पर अभी तो राजा को अपने बेटे की चिंता थी। अब राज्य नष्ट होता जान पड़ रहा था। सभी फूल नष्ट होने की वजह से फूलों पर निर्भर व्यक्तियों को रोज़गार नहीं मिल रहा था। कर ना मिल पाने की वजह से प्रशासन सही ढंग से कार्य नहीं कर रहा था। सभी चीजें अ व्यवस्थित थी। अब वे धीरे धीरे गरीब हो गए। जब दूसरे राजा को यह पता चला तो उन्होंने इसका लाभ उठाया। उन्होंने राज्य पर आक्रमण शुरू कर दिए। अंत में देवेंद्र नाथ ने घुटने टेक दिए। उसने एक संधि की और राज्य अपने पड़ोसी राजा को सौंप दिया। वह उसी राज्य में एक छोटी सी कुटिया में रहने लगे। वह एक कृषक बन कर अपना जीवन व्यतीत करने लगा। एक दिन उसके पास राजा के सिपाही आए और उन्होंने कहा, "यह जमीन महल के हिस्से में आती हैं, इसलिए तुम्हें यह खाली करनी होगी"। वह दुखी हो गया। वह राजा के पास गया। राजा ने कहा मुझे लगा, कि वह जमीन महल के हिस्से में आती है, किंतु यदि तुम वहाँ रहते हो तो तुम वहाँ रह सकते हो। तभी उसने वहाँ उस दासी को देखा। देवेंद्र ने कहा, "तुम यहाँ हो तो मेरा बेटा कहाँ है? दासी- मुझे क्षमा कर दो, मैंने एक साल तक आपका इंतज़ार किया पर आप वहाँ नहीं आए, इसलिए मैं राज कुमार को यहाँ लेकर आई थी। देवेंद्र ने राजा से प्रार्थना की, पर राजा ने उसकी एक ना सुनी और राज कुमार को देने से इंकार कर दिया। देवेंद्र दुःखी होकर वहाँ से अपने घर चला गया।