adhuri Chitti in Hindi Short Stories by kajal jha books and stories PDF | अधुरी चिट्ठी

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अधुरी चिट्ठी

अधूरी चिट्ठीगांव के किनारे बसे एक छोटे से घर में राधा मैया रहती थीं। उम्र हो चली थी उनकी – साठ के पार। चेहरे पर झुर्रियां थीं, लेकिन आंखों में आज भी वही चमक जो बचपन में बेटे को गोद में लोरी सुनाते हुए जगमगाती थी। बेटा, रामू, शहर चला गया था दस साल पहले। नौकरी लग गई थी मुंबई में। "मैया, मैं कमाऊंगा, बड़ा घर बनवाऊंगा, फिर तुम्हें बुला लूंगा," कहकर चला गया था। लेकिन साल बीतते गए, फोन कम होते गए, और चिट्ठियां तो कभी आई ही नहीं।राधा मैया रोज शाम को चौपाल पर बैठतीं। हाथ में पुरानी डायरी, जिसमें रामू की बचपन की तस्वीर चिपकी थी। "रामू आज फोन करेगा," सोचतीं। लेकिन फोन नहीं आता। पड़ोसनें ताने मारतीं, "अरे राधा, तेरा शहर का राजकुमार भूल गया तुझे।" राधा मुस्कुरा देतीं। "नहीं रानी, मेरा रामू कभी नहीं भूलेगा।"एक दिन, बारिश की रात थी। बिजली गिरी, ठनका। राधा मैया घर के आंगन में खड़ी थीं, जब अचानक सीने में तेज दर्द हुआ। पड़ोसी लाए उन्हें अस्पताल। डॉक्टर ने कहा, "दिल का दौरा। अभी तो संभाल लिया, लेकिन बेटे को बुला लो।" राधा ने फोन किया रामू को। "बेटा, आ जा मैया के पास।" रामू ने कहा, "मैया, अभी प्रोजेक्ट चल रहा है। दो-चार दिन में आऊंगा।" राधा का दिल बैठ गया, लेकिन मुंह से बोलीं, "ठीक है बेटा, तू अपना ध्यान रखना।"अगले दिन राधा मैया ने एक चिट्ठी लिखनी शुरू की। पुरानी स्याही की कलम से, कांपते हाथों से। "मेरे प्यारे रामू, तू जब छोटा था, तो तेरी हर शरारत मेरी जान ले लेती। एक बार तू खेत में गिर गया, घुटना छिल गया। मैंने रात भर तेरी मरहम-पट्टी की। तू रोता रहा, मैं रोई नहीं। आज मैया की हालत वैसी ही है बेटा। आ जा।"चिट्ठी अधूरी रह गई। दूसरे दिन फिर दर्द हुआ। इस बार ज्यादा तेज। राधा मैया ने आखिरी सांस लेते हुए पड़ोसी को कहा, "इस चिट्ठी को रामू को भेज देना।" और फिर चली गईं। गांव में सन्नाटा छा गया। लोग रोए, लेकिन रामू को खबर कैसे पहुंचे?दूसरी तरफ, मुंबई का चकाचौंध भरा फ्लैट। रामू अपनी पत्नी सीमा और बेटे छोटू के साथ रहता था। नौकरी में प्रमोशन मिला था। पार्टी चल रही थी। फोन आया – गांव से। "भैया, मैया नहीं रहीं।" रामू का फोन हाथ से गिर गया। दुनिया काली पड़ गई। "नहीं... मैया!" चीखा वो। सीमा ने संभाला, "जाओ रामू, कल सुबह पहली ट्रेन से।"रामू ट्रेन में बैठा था। आंखों से आंसू बह रहे थे। यादें घेर रही थीं। बचपन की। मैया की गोद। "रामू बेटा, पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना। मैया का सपना है तू।" रामू ने गांव छोड़ा तो मैया ने आंसू नहीं बहाए। बस हाथ हिलाया। लेकिन रामू ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। शहर की चमक ने आंखें चौंधिया दीं। फोन करना भूल गया। पैसे भेजे, लेकिन प्यार नहीं।गांव पहुंचा रामू। मैया का शव देखा। चेहरा शांत था, लेकिन होंठों पर अधूरी मुस्कान। रामू उनके पैरों पर गिर पड़ा। "मैया, माफ कर दे! मैं आ गया!" रोता रहा रात भर। अंतिम संस्कार हुआ। अगले दिन सामान समेट रहा था तो एक पुरानी डायरी मिली। खोली तो चिट्ठियां। दर्जनों। सब रामू को। "बेटा, आज तेरा जन्मदिन है। मैया ने हलवा बनाया। खा लेना।" "बेटा, बारिश हो रही है, तू भीग मत जाना।" "बेटा, मैया को तेरी याद आ रही। फोन कर दे।"रामू की सांसें थम गईं। हर चिट्ठी के नीचे लिखा था – "पोस्ट नहीं की, बेटा व्यस्त होगा।" रामू का दिल फट गया। मैया ने कभी पोस्ट ही नहीं कीं। डर थीं कि व्यस्त बेटे का समय बर्बाद न हो जाए। रामू ने एक चिट्ठी खोली – आखिरी वाली, अधूरी। "मेरे प्यारे रामू, तू जब छोटा था..." बस इतना। आंसू टपक पड़े कागज पर।फिर रामू को याद आया। बचपन का एक किस्सा। पिता गुजर गए थे। घर की जिम्मेदारी मैया पर। रामू स्कूल जाता, मैया खेत में। एक दिन रामू बीमार पड़ा। बुखार। मैया ने रात भर जागकर सेवा की। सुबह हो गई, खेत जाना था। लेकिन मैया न गईं। रामू ठीक हो गया तो बोला, "मैया, खेत?" मैया हंस दीं, "बेटा ठीक तो हो गया न। खेत तो चलता रहेगा।" उसी दिन खेत सूख गया। फसल बर्बाद। लेकिन मैया ने एक शब्द नहीं कहा।रामू रोया। "मैया, तूने सब कुछ त्याग दिया मेरे लिए। और मैं... मैंने क्या किया?" सीमा ने कंधा पकड़ा। "रामू, अब क्या होगा?" रामू ने कहा, "मैं यहीं रहूंगा। मैया का घर, मैया का गांव।"लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। रामू शहर लौटा। छोटू को स्कूल भेजा। लेकिन मन उदास। एक रात, छोटू बीमार पड़ा। बुखार। रामू जागा। सीमा सो रही थी। रामू ने छोटू की सेवा की। सुबह हो गई। ऑफिस जाना था। लेकिन रामू न गया। सीमा बोली, "रामू, मीटिंग?" रामू ने कहा, "बेटा ठीक तो हो गया न। मीटिंग तो चलती रहेगी।" सीमा हैरान। "ये क्या?" रामू ने मैया की चिट्ठियां दिखाईं। सीमा रो पड़ी।रामू ने फैसला किया। नौकरी छोड़ी। गांव लौट आया। मैया का घर संवारा। पड़ोसियों को रोज खाना खिलाया। छोटू को गांव में पढ़ाया। साल बीत गए। रामू खुश था। लेकिन एक दर्द हमेशा रह गया – अधूरी चिट्ठी का।एक दिन, रामू ने खुद चिट्ठी लिखी। खुद को। "मेरे प्यारे रामू, तूने मैया को खो दिया। लेकिन मैया का प्यार कभी न खोना। त्याग करना सीख।" चिट्ठी पूरी की। पोस्ट किया – खुद के नाम।गांव वाले कहते, "रामू बदल गया। मैया की कृपा।" लेकिन रामू जानता था – मैया कभी चली ही नहीं। वो हर सांस में है। हर आंसू में।(कहानी जारी...)रामू अब स्कूल चलाता था गांव में। गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाता। छोटू बड़ा हो गया। कहता, "पापा, मैया दादी जैसी बनोगे?" रामू मुस्कुराता। "बेटा, मैया जैसा कोई नहीं। लेकिन कोशिश तो करनी है।"एक शाम, चौपाल पर बैठा रामू। वही जगह जहां मैया बैठती थीं। हवा में मैया की आवाज गूंजी। "रामू बेटा..." रामू की आंखें नम हो गईं। आसमान में इंद्रधनुष। रामू बोला, "मैया, मैं आ गया। माफ कर दे।"लेकिन असली दर्द तो छोटू के साथ आया। छोटू प्रेमिका से मिलने शहर गया। लौटा तो उदास। "पापा, वो चली गई। शादी नहीं करेगी।" रामू ने गले लगा लिया। "बेटा, दर्द होता है न। लेकिन वक्त सब ठीक कर देगा।" छोटू रोया। "पापा, तुम्हें कैसा लगा जब दादी गईं?" रामू चुप। आंसू बहने लगे। "बेटा, वो दर्द शब्दों में नहीं बयां होता।"रामू ने छोटू को मैया की डायरी दी। "पढ़ ले। समझ जाएगा।" छोटू ने पढ़ी। रात भर रोता रहा। सुबह बोला, "पापा, मैं कभी आपको अकेला नहीं छोड़ूंगा।" रामू हंस पड़ा। "बेटा, मैया ने भी यही कहा था।"समय बीता। रामू बूढ़ा हो गया। छोटू की शादी हुई। पोते हुए। एक दिन रामू बीमार पड़े। छोटू ने सेवा की। नौकरी से छुट्टी ली। रामू बोले, "बेटा, जा नौकरी पर।" छोटू बोला, "पापा, आप ठीक तो हो जाओगे न। नौकरी तो चलती रहेगी।" रामू की आंखों से आंसू। "मैया, तूने सुना? चक्र पूरा हो गया।"रामू ठीक हो गए। लेकिन एक रात, नींद में चले गए। छोटू रोया। डायरी में चिट्ठी लिखी – अधूरी नहीं, पूरी। "दादाजी, आप जैसा बनूंगा।"गांव में कहानी फैल गई। लोग कहते, "राधा मैया का प्यार अमर है।" चौपाल पर अब छोटू बैठता। डायरी हाथ में। हवा में आवाज – "बेटा..."