Azmi sahab does not eat sweets. in Hindi Short Stories by Dr Sandip Awasthi books and stories PDF | आज़मी साहब मीठा नहीं खाते

Featured Books
Categories
Share

आज़मी साहब मीठा नहीं खाते

आज़मी साहब मीठा नहीं खाते -------------------------------------

 

कई बार लगता है कि धर्म को हम चलाते हैं। पर ऐसा है नहीं दरअसल धर्म, मजहब हमें चला रहा होता है। लेकिन कुछ लोग  अलग होते हैं।

 एक बड़े कम्युनिटी विद्यालय के सालाना जलसे में सैंकड़ों बच्चों,अभिभावकों,शिक्षकों के मध्य  मुख्य वक्ता कह रहे थे, "यह तो जगजाहिर  है कि मनुष्य पहले या धर्म पहले?  तो फिर कुछ लोग इसका उल्टा मतलब क्यों इस्तेमाल करते हैं? और साफ साफ कहें तो कठमुल्ला, बड़े पहुंचे हुए आलिम फाजिल, धार्मिक लोग इस अज्ञानता के बाद भी पूरे विश्वास से हमें गुमराह करते हैं। और हम ,  हम पढ़े लिखे होने के बाद भी कुछ नहीं कहते। अच्छे मजहब और लोकतंत्र में बहस, चिंतन, विवेचन के लिए जगह होनी चाहिए। तभी  हम अपने धर्म को आगे ले जा पाएंगे। अन्यथा  आधी सदी और बीत जाएगी परन्तु धर्म और उसकी क्रियाएं,जो हमें गाइड कर रहीं,वह सैकड़ों साल पीछे से ही चली आ रही। ऐसा धर्म बेड़ियों का काम करता है।कमोबेश यह स्थिति हर समुदाय में है। आधुनिक कहे जाने वाले समुदाय में तो और अधिक। पर हमें जागरूक रहना है।यह सोचना है कि हमें अपने बच्चों को बेहतर जिंदगी,देश प्रेम और अच्छी शिक्षा दिलानी है। न कि उनके बचपन,सपनों को छोटे मोटे कार्यों को पैसे के लिए करके बर्बाद कर देना है। आप सभी खूब पढ़ें और आगे जाकर अच्छे इंसान,बेहतरीन नागरिक बने",मुख्य वक्ता, शिक्षाविद  आज़मी साहब ने जैसे ही अपनी बात खत्म की,पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा।

              "आजमी साहब, आपके विचार यकीनन सच्चे हिन्दुस्तानी की आवाज हैं। मुझे लगता है भाषा,साहित्य और विचारों के स्तर पर और अधिक कार्य एकजुट होकर हमें करना होगा।" यह आजमी साहब के मित्र और साथी लेखक मनोज चारण थे।

"अजी साहब करना होगा ? नहीं जी,बल्कि यह प्रारंभ हो गया है। और अच्छी बात यह है कि हर वर्ग आदिवासी, किसान, मुसलमान,गरीब सभी शिक्षा और उसके महत्व को समझ रहे हैं। और इसमें सबसे अधिक योगदान परिवार की स्त्रियों का है।" नासिर साहब ने सहमति जताई और कहा,"हमारी बहु को तो कहना पड़ता है कि कभी कभी सूट के स्थान पर साड़ी भी पहन ले।"

इसी हंसी खुशी से सब लोकतंत्र की ताजी, खुली हवा और खुशहाल जिंदगी को जिंदाबाद कहते अपने घर रवाना हुए।

                 

             "...अल्लाह ने तुम्हे हमें सब को मकसद दिया है। काफिरों का नाश और अपने लोगों का पूरी दुनिया पर राज । यह प्रक्रिया पूरे जोर शोर से शुरू है। आज इस पूरे क्षेत्र में हर आदमी के परिवार में तीन से छह बच्चे हैं। जितने अधिक होंगे उतनी ही जल्दी हमें हमारा राज मिलेगा।ऊपर से यह भी देखें जितनी प्रसिद्ध हस्तियां हैं फिल्म सितारों से लेकर अफसर, प्रोफेसर तक सभी के तीन या अधिक बच्चे हैं। क्यों? जिससे  "

     "पर मौलवी साहब, मेरी एक जिज्ञासा है ।"   मुझे आमिर ने कोहनी से टोका भी ,पर मैं सवाल पूछना चाहता था,मासूम सी शक्ल बनाकर।

मौलवी एक धैर्यवान मुस्कान लिए घूमे।वह जानते थे मजहब की शराब के बाद भी अपार धन भी देना पड़ता है तब जाकर यह आजकल के लड़के तैयार होते हैं। इनका भविष्य अधिकतर एक साल होता है।उसके बाद तो यह छिपते,छिपाते कब गोली का शिकार हो जाते हैं यह तो हमें भी नहीं पता। पर फिक्र नहीं होती।क्योंकि जो समुदाय में जनसंख्या विस्फोट हम दशकों से करवा रहे वह इसी काम आता है।एक जाता है तो दस उसकी जगह लेने को तैयार होते हैं। सब पर निगाह होती है हमारी कि कौन कोम का बंदा कितना और कब हमारे काम का हो सकता है।

 "पूछो अपना सवाल मियां?"

     " मौलवी साहब,हमारा राज? राज तो अल्लाह मियां का है न कुल जहां पर? अगर नहीं है तो अल्लाह मियां का राज किसने छीना? और है तो हमें क्या जरूरत उसके लिए मरने मारने की? क्यों है न साथियों?"

     मौलवी से पहले दाएं बाएं खड़े तीन जालीदार टोपी पहने हट्टे कट्टे आदमी उसकी तरफ लपके। "अरे नहीं,नहीं ,पूछने दो। अल्लाह का बंदा है। यहां कैंप में पूछेगा तो कहां पूछेगा?"

     फिर मौलवी ने कुरान की आयतों,नबी के उसूलों, कुर्बानियों का विस्तार से जिक्र किया,जो उसके क्या किसी के पल्ले नहीं पड़ा। ....तो जब खुद अल्लाह मियां के बंदों ने हमारे लिए जान फना कर दी। तो क्या हम उनके कार्यों के लिए खुद को कुर्बान नहीं कर सकते?"

  अब आमिर के मन में सवाल था कि, इतनी सुंदर,रंगों से भरी,सपनों की उड़ान लिए आकाश में उड़ने को बुलाती दुनिया में हमें तो कोई भी नहीं मारता,तंग करता। हां,जब हमारे लोग दूसरों को बिना वजह मारते, तंग करते हैं तो स्वाभाविक है वह अपने बचाव और सुरक्षा के लिए कुछ तो करेंगे। तो फिर हम पहले आगे बढ़कर यह सब क्यों करते हैं?

    एकबारगी तो सन्नाटा छा गया। मौलाना का चेहरा गुस्से से पहले लाल फिर रोकने के प्रयास में बैगनी हो गया। कोने में खड़े इस कैंप में विशेष आमंत्रित दो भारतीय लेखक भी थे। जिनके लेख और किताबें इसी बात पर थी कि किस तरह भारतीय फौजें इन निर्दोष,मासूम लोगों पर कहर बरपा रही हैं। जबकि इसी बात को कितनी सहजता से आतंकी बनने की ट्रेनिंग लेने आए युवा ने स्पष्ट कर दिया था कि यह गलत हो रहा। जबकि उन दोनों ,ऐसे कुछ और हैं देश में ,की ऐसी किताबों को आतंकी संगठन लाखों रुपए देकर ,विदेशी ग्रांट,फलां देश का लाखों का पुरस्कार, स्कॉलरशिप इस्लामिक देशों से दिलवाकर खास लिखवाते थे। धन्य हैं वह लोग जो देश की दलाली करते हैं।लोकतंत्र का मजाक बनाते हैं। सोशल साइट्स पर रहकर कई छद्म नामों से युवाओं,स्त्रियों को बरगलाते हैं। उन्हीं किताबों को यह संगठन अपने युवाओं में भरपूर खरीदकर बांटते थे। इस उद्देश्य से की देखो,तुम्हारी कोम पर अत्याचार हो रहा।यह बात खुद हिन्दू बुद्धिजीवी ही अपनी किताब में लिखकर दे रहा। और क्या प्रमाण चाहिए? तो जो दो चार युवक संदेह करते उन्हें इन किताबों को पढ़कर अपने विचार बदलने पड़ते। पर इस बार ये दोनों फाजिल और आमिर, पढ़ें लिखे होने के साथ प्रेमचंद,इस्मत चुगदाई,मंटो को पढ़े थे। क्योंकि उनके पड़ोस में मुंबई से आकर एक सेवानिवृत प्रोफेसर कुछ वर्षों से रह रहा था ।जो अपने साथ ढेरों किताबें लाया था। जिनकी खुशबू गुलाब ,मोगरा, चमेली की तरह चारों ओर फैली थी। आते ही उसने अपने दो कमरों को पुस्तकालय का रूप दे दिया। बाहर लिखवा भी दिया कि,"साहित्य जीने का सहारा है। आप आएं और अपने सपनों को पूरा करें।"

रंग बिरंगी किताबें,नई पत्रिकाएं तो थी ही साथ में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और उनके प्रश्नपत्रों को लिए हर माह कई पत्रिकाएं आती। सरकारी नौकरी की भर्ती भारत में हर राज्य चाहे केरल से बिहार हो या राजस्थान से जम्मू कश्मीर समान है। कोई भी भारतीय फॉर्म भरके प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण कर रेलवे,बैंक,कोर्ट,पुलिस में नौकरी ले सकता है। वहां अनेक युवा आने लगे ।लेकिन एक नियम सख्त था कि तैयारी के साथ एक साहित्यिक किताब हर सप्ताह पढ़नी होगी।

उसे पढ़ने से बहुत से युवाओं के दिमाग में लगे जाले साफ हुए।उन्हें समझ आने लगा कि क्या सही है और क्या गलत?  पुस्तकों की उजास दिखती नहीं पर वह आपके दिल और दिमाग को रोशन कर देती है।

  यह दोनों पुस्तकालय और प्रोफेसर के संपर्क में अभी कुछ माह हुए ही आए थे। और अपने बड़े भाई जानो के कहने पर पंद्रह दिन की ट्रेनिंग पर यहां आ गए थे। सहसा उनकी तंद्रा भंग हुई,मौलवी साहब की आवाज से

"आपको यह सब हमेशा ध्यान देना होगा। और अब यह हमारे बीच आए लेखक महोदय बताएंगे कि सच कितना डरावना है।"  

दोनों,एक अधेड़ उम्र की औरत और एक काला सा,आंखों में धूर्तता लिए आदमी आगे आए।

दोनों हिन्दू थे।विस्तार से उन्होंने सबको झूठा बताना प्रारंभ किया। लड़के ने गोलियां चलाई या देश विरोधी कार्य  किए, यह तो छुपा गए पर उसके पकड़े जाने पर कार्यवाही हुई उसका बड़ा भयानक चित्र खींचा।

एक युवती पर तेजाब फेंक हमेशा के लिए उसकी जिंदगी बर्बाद करने वाले बंदे को पाक साफ बताया और उसको मिली सजा को अत्याचार। विश्विद्यालय,शिक्षा के मंदिर तक में मजहब का जहर घोल रहे,आतंकियों के जिंदाबाद के नारे लगाने वालों पर होने वाली कानूनी कार्यवाही का जिक्र किया पर उनकी ऐसी परवरिश,ब्रेनवाश किसने किया,यह नहीं बताया।

फिर कश्मीर में फौज की कार्यवाही को विस्तार से बताया कि किस तरह वह अखनूर,उरी, पहलगाम में घर घर तलाशी लेकर आप लोगों को बिला वजह गिरफ्तार कर रही। यह नहीं बताया कि इन्हीं लोगों ने सरेआम बिहार,पंजाब से काम करने आए  निर्दोष लोगों की हत्या की। निहत्थे पर्यटकों को गोलियों से भून डाला।उनकी नई नवेली दुल्हन लाश के पास बैठे विलाप करती रही ,इन बातों पर भूलकर भी वह नहीं गईं। उल्लेख यह जरूर किया कि कश्मीरी नेता और सरकार आपके साथ है। पक्ष,विपक्ष सब आपको बचाने और आपके लिए आवाज उठाते रहते हैं।तभी पिछले तीन दशकों से जितनी घटनाएं हुई हैं उनके एक चौथाई भी लोग पकड़े नहीं गए। क्योंकि राज्य सरकार आपको सपोर्ट करती हैं।पड़ोसी मुल्क भरपूर पैसा , ट्रेनिंग और असलाह देता है।  फिर वह ,पुरुष लेखक,मुस्कराया और बोला,हम जब तब गुजरात का जिक्र कर देते हैं जिससे कश्मीर में कड़ी कार्यवाही सरकार नहीं कर पाए। वह दब जाती थी।

"पर इन कुछ वर्षों से नहीं दब रही।सर्जिकल स्ट्राइक पर स्ट्राइक कर रही। वह तो इस बार सीधे अमेरिका के हमारे सदर साहब ने पैर पकड़ लिए तो हवाई हमला रुका,वरना आधा मुल्क तबाह हो जाता।"

यह पीछे बैठे,देर से सुन रहे दूसरे काले और सफेद चोगे वाले मौलाना थे।

  "मैं एक और किताब लिखने की तैयारी में हूं। जो यह बताएगी कि किस तरह भारत सरकार बेरोजगारी,विकास के मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए हमारे पड़ोसी पर बिना वजह आक्रमण करती है। आपको शिकायत है तो संयुक्त राष्ट्र संघ जाए। यह क्या एक देश पर आक्रमण कर रहे।" लेखक ने अपने चश्में को ठीक करते हुए पूरी मुस्तैदी से कहा।

पास में आकर कबसे खड़ा आईएसआई का मेजर मुस्कराया,"आपको हम चीन से एक फेलोशिप दस लाख रुपयों की दिलवाएंगे जनाब। आप लिखकर जो सेवा कर रहे हैं मुस्लिम जेहादी साथियों की यह सराहनीय है। पाकिस्तान यात्रा का जल्द आमंत्रण भेजेंगे आपको।"

"अरे नहीं नहीं,ऐसे नहीं भाई,"अब वह ओवररेटेड और भारत में गुट विशेष लेखक संघ की लाडली औरतानुमा अधेड़ लड़की बोली,_" ऐसे तो हमें मुश्किल होगी। और आपके बहाने मानवता की मदद हम आगे नहीं कर पाएंगे।क्योंकि हमारा एजेंडा खुल जाएगा।"

    यह तो है ।फिर क्या करें? अब पुरुष लेखक के खुराफाती दिमाग ने सोचा,जो पिछले ही महीने एक लिट फेस्ट में अपनी नई किताब में कश्मीर पर हो रहे अत्याचार पर बोलकर आया था।

"आप लाहौर,कराची में लिट फेस्ट आयोजित करने की शुरुआत करो। उसमें हमें बुलाओ तो भारत से हम आएंगे।"

   ",आपकी सरकार ने नहीं भेजा तो...",?मेजर का सवाल था।

  ",अरे ऐसा नहीं है।हमारी सरकार कला,साहित्य और संस्कृति पर बिना छानबीन के हमें अनुमति दे देती है।वैसे भी हम बुद्धिजीवियों को रोकना उसके बस की बात नहीं।"

   वह काली सी,अधेड़ पर समझती युवा बोली,",और रोका भी तो हमारे कुछ संगठन और ब्यूरोक्रेट्स लेखक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात कहके खूब हंगामा मचाएंगे और सरकार को झुकना पड़ेगा। कई नामचीन लेखक हैं,जो आधुनिक तकनीक के सहारे यूट्यूब और फेसबुक पर एक पूरी की पूरी पीढ़ी को निरंतर गुमराह कर रहे। देश की संस्कृति का मजाक बना रहे और युवाओं,महिलाओं को भड़का रहे। आपको तो हमें फंडिंग और अधिक करनी चाहिए। उन्हें भी धन राशि मिलनी चाहिए।" कहकर अपनी बड़ी बड़ी आंखों से इशारा करती उनकी खनखनाती  हंसी  गूंजी।

सारे ट्रेनी चुपचाप बैठे यह सब बातें सुन रहे थे।

"और गर रोका गया आपके मुल्क आने से तो यह भी आपके पक्ष में जाएगा।" वह लेखक कुछ अधिक ही चालाक था।

कैसे? यह कैसे होगा?",मौलाना अब रोक नहीं पाए पूछने से।

अब वह लेखक मुस्कराया और बोला, मेरी एक यूरोप ट्रिप और बीस प्रतिशत अतिरिक्त हो गया, तो सुनें ," हमारे कुछ साथी इस बात को संस्कृति और साहित्य के खिलाफ खड़ी एक तानाशाह सरकार ,इस नाम से लेखों,ब्लॉग से ऑनलाइन स्क्रीन्स को पाट देंगें। दस जगह हमारे ही मित्र टीवी पर हैं। वह भले ही न्यूज मजबूरी में सरकार की दिखाएं पर संस्कृति और साहित्य पर हमें ही बड़ा मानते और दिखाते हैं। तो वहां भी हमारे लोग बयान देगे, कि इन लोगों को पाकिस्तान में आयोजित साहित्य समारोह में नहीं भेजकर यह सरकार अपने आपको मानवता के विरोध में खड़ा कर रही है।"

  अब आईएसआई का मेजर रुक न सका, ",एक्सीलेंट, सुभान अल्लाह।बहुत खूब ।यानि दोनों हाथों में लड्डू। भाईजान,आपको तो हमारे मुल्क में होना चाहिए था।"

"फिर आपकी यह मदद कौन करता?"

एक जोर का ठहाका लगा।

   तो आप सभी समझ गए न कितना बड़ा और महत्वपूर्ण कार्य हम सभी कर रहे हैं अपनी कोम के लिए। तो अब आप सभी जाएं और हिंदुस्तान के कोने कोने में फैल जाएं। वहां पहले से ही मौजूद हमारे स्लीपर सेल और इनके जैसे बुद्धिजीवी आपकी मदद करेंगे। आप सभी को टीम हैंडलर का नम्बर मिलेगा। उससे आप सभी हमारे संपर्क में रहेंगे। धन की कोई कमी नहीं होगी।" कहकर मौलाना मुस्काते हुए आईएसआई एजेंट को देखा।

   "जी,नोटबंदी करके इस मुखिया ने सोचा था हमारी प्लानिंग फेल कर देगा। पर हुआ नहीं ऐसा। क्योंकि एक साल में ही भारत में मौजूद हमारे दोस्तों ने सारे फीचर्स बता दिए और आवश्यक कागज भी। अब यह वाले नोट भी खूब हैं। और असली से बेहतर हैं। बस कुछ अरब के नोटो की रद्दी आग सेंकने के काम आई।"

  "और हमारे लोगों ने भी सरकार की खूब जी भरके बुराई की।आम लोगों को भड़काया की नोट बंदी गरीबों के खिलाफ है। इतना दिखाया और आलोचना की इस सरकार को अब अगली नोटबंदी से पहले सौ बार सोचना होगा।" कहते हुए वह अधेड़ स्त्री खूब हंसी।

   "चलिए,फिर मुलाकात होगी। आप श्रीनगर में अपना स्टे एंजॉय करें। उम्मीद है कश्मीर में आपका मन लग गया होगा।और वह फ्लैट आपके मुस्लिम मित्र के  नाम पर हो गया है। बस आप अधिक से अधिक प्रबुद्ध लोगों को जोड़े। "

कहकर सारी जोंके देश का खून चूसने के लिए अलग अलग जगह के लिए तैयार हो गए।

युवाओं को उम्र और योग्यता के अनुसार देश के विभिन्न कॉलेज और विशेष झुकाव वाले विश्विद्यालयों में भेजा जा रहा।जहां वह पहले से ही  मौजूद सिंपेथाइजर और एजेंट के साथ काम करते हुए भारत विरोधी,संस्कृति का मजाक उड़ाते हुए अपने साथ लोगों का ब्रेनवाश करेंगे। उन्हें पूरे दो वर्ष मिले हैं और टारगेट मात्र पचास युवा। पैसा,हर इच्छा सब भरपूर।

दरअसल यह वैश्विक नीति है सदियों पुरानी,जो भारत के दुश्मन लगा रहे।देश को खत्म करना है तो उसके युवाओं के जहन में संदेह,भ्रम डाल दो।वह कुछ नया,मौलिक तो दूर वह अपना ही ज्ञान,विज्ञान लोगों का मजाक बनाएगा। रीति रिवाजों को कोसेगा। और सहज सुविधाओं मोबाइल, बाइक,महंगे ड्रेस की आड़ में अपने मूल्यों,फर्ज, कर्तव्य को भूलता जाएगा।

और जब किसी देश की भावी नस्ल खराब होने लगती है तो फिर उस देश को गुलाम आसानी से बनाया जा सकता है।

 

   **** "भाई,क्या किताब लिखी है,मजा आ गया। और इतनी जल्दी दूसरा संस्करण भी?"

वह मुस्कराते हुए बधाई लेते फोन पर बोले, "आजमी साहब,आप भी तो लिख रहे थे किताब? क्या हुआ उसका?"

   "अरे क्या बताएं,प्रकाशक ही नहीं मिल रहा।तो क्या लिखें आगे? बस बैठे हुए हैं।"

 जनाब मुस्कराए और बोले,"आपके लिए प्रकाशक हम खोज देंगे। रॉयल्टी भी अच्छी दिला देंगे।आप किताब पूरी तो करो।"

  "अरे भाई,बहुत शुक्रिया आपका फिर तो। बड़े दिनों से गंगा जमुनी संस्कृति पर उपन्यास अधूरा था अब पूरा होकर सामने आएगा। जल्द मिलता हूं आपसे आकर ।"

   अब अगली बारी युवा,मतलब पचास कबके पार कर चुके लोगो की थी।साहित्य में आधुनिक लोग इन्हें युवा ही कहते हैं साठ वर्ष तक।इन पर काफी मेहनत हो चुकी थी तो उनका तो बाकायदा एक व्हाट्सएप समूह भी था।यह पिछले पांच वर्षों में चुने , छांटे गए थे अपने असंतोष,शिकायतें लेकर। फेसबुक ,इंस्टा आदि सभी जगह यह थे। हर एक को निजी या जहां अपनी सरकार या कुलपति हुए वहां नौकरी, या फिर व्यवसाय।ऊपर से सम्मान और अवॉर्ड के नाम पर निशुल्क हवाई यात्राएं। बस इन्हें  नियमित रूप से  देश,संस्कृति विरोधी लेखन करते रहना था। कविता,ब्लॉग,कहानी के माध्यम से। इन्हें अब तो आप भी आसानी से पहचान लोगे। हर एक को यह समझाया और सिखाया गया था कि आपके साथी की पोस्ट को बेहतरीन,शानदार बताते हुए कायदे से तारीफ करनी है जिससे अन्य नए ,युवा लोग उस पोस्ट को ध्यान से पढ़ें और आगे भी उसकी पोस्ट पढ़ते रहें। फिर कब देश के युवा इन्हीं के जैसे देश विरोधी पोस्ट ही करने  लगेगे यह वह भी नहीं जानते।

यह करीब चार सौ इस समूह में और देश में न जाने कितने थे।

और लोकतंत्र की चुनी हुई सरकारों की भेदभाव पूर्ण ढंग से बुराई कर रहे थे। भेदभाव ऐसे की जो कार्य कम्युनिस्ट या विरोधी सरकारों वाले राज्य में वर्षों से हो रहा,वहीं राष्ट्रीय सरकार करे तो उसकी तुरंत आलोचना,बुराई। कुछ भी नया कदम उठाए देेश के लोगों के हित में तो उसकी आलोचना। सरकार में सुगबुगाहट हो तो उसकी आलोचना। विपक्ष की जगह यह लोग कब देश विरोधी हो गए पता ही नहीं चलता। फिर इन्हें चुनकर ऑफर दिया जाता और यह आसानी से बिक जाते।

कई बार लगता है कि पड़ोसी मुल्क में शत्रु कम हैं और हमारे घर में ज्यादा हैं। देश को अपने ही लोगों से खतरा है।

    "आइए,आइए,आजमी साहब,इनायत जो आप इस ब्राह्मण के दर आए।"

"बस मुलाकात करनी थी आपसे और कुछ गति मिले लेखन में यही ख्वाहिश लेके आया हूं।"

     "अरे आप इतने बड़े अज़ीम लेखक हैं। हम सीखते हैं आपसे।

लीजिए, यह कहवा  आ गया।अभी कश्मीर गया था तो वहीं से लाया हूं।"

  थोड़ी देर बातचीत चली आगे। उनकी दो किताबें प्रकाशित होने का अनुबंध और लाख रुपए की रॉयल्टी देने की बात प्रकाशक से  हो गई।

  "आपने बड़ी सहूलियत से मेरा कार्य कर दिया।समझो ,मनो बोझ दिल से उतर गया। वरना यह लग रहा था कि दोनों पांडुलिपियां मेरे मरने के बाद ही कोई देखेगा तो आएंगी, वरना नहीं।  अच्छा ,आप कुछ जरूरी कार्य मुझसे कह रहे थे।"

   "देखिए,आप देश विदेश तक में प्रसिद्ध लेखक हैं।कई जगह आपकी रचनाएं पाठ्यक्रम में हैं।पर आपको मिला क्या? कुछ भी नहीं............।

     "तो यह जरा सा काम  आप चाहते हैं मेरे से?"

"जी बिल्कुल।और कोई दिक्कत नहीं होगी आपको। मैंने बताया कि पहले से यह बड़े लेखक ,हर प्रांत के यही कर रहे।विदेश भी हो आते हैं हर साल दो साल में।"

    "ओह,  तभी ! तभी इनकी भी किताबों पर किताबें आती जा रही।"

आप तो सब समझते हैं,आजमी साहब।और आपका कहना बहुत स्वभाविक लगेगा।फिर असंख्य लोग आपकी कम्यूनिटी के आपके पक्ष में बोलेंगे।

     कुछ देर मौन रहा। आजमी जी अपनी बड़ी सी मौलाना आजाद जैसी टोपी को हाथ से ठीक करते कुछ विचार किए। उसके फ्लैट की दीवारों पर लगे बड़े बड़े सम्मान और विदेश यात्राओं के चित्र देखे। हर सुविधायुक्त उसकी जिंदगी को मानो रिवाइंड किया।

फिर मानो वह फैसले पर पहुंच गए ,मुस्कराए और अपने चश्में को उठाकर आंखों पर टिकाते हुए गंभीर आवाज में बोले," आपको धन्यवाद।पर मैं अपनी किताबें अपने जमीर,आत्मा बेचकर नहीं प्रकाशित करवाऊंगा। मुझे लगता है हम भूल जाते हैं कि देश के प्रति हमारा फर्ज सबसे बड़ा है।"

  वह कुछ देर हतप्रभ रहा,फिर उन्हें देखा और फिर हंसने लगा, "आप अभी भी उन्हीं दकियानूसी बातों और सोच में उलझे हैं? क्या दिया है देश ने आपको? उल्टे महंगाई,भ्रष्टाचार, अन्याय हर जगह?" फिर कुछ रुककर ,उन्हें सीधी निगाह से देखता वह बोला,"आप लोगों को संदेह की निगाहों से देखना। हर जगह आपकी कम्यूनिटी को निशाना बनाया जाना! मुझे तो लगता है मैं लड़ूं आपकी तरफ से इन लोगों से।"

   कुछ देर खामोशी रही। समय और शाम की सुनहरी धूप भी ठिठककर उस कमरे में आकर चुपचाप खड़े थे।

"और आपको कुछ ऐसा नहीं करना है जो प्रतिदिन अन्य लोग,हम आधुनिक हिंदू,भी रोज नहीं करते हैं। बस हम आपको पोस्ट और मुद्दे देंगे। आपको अपने सोशल साइट्स पर अपने नाम से पोस्ट कर देना है। बदले में आपकी आवाज,आपके शब्द किताबों,सम्मान और लाख दो लाख के अवॉर्ड आपको फाउंडेशन के द्वारा मिलेंगे। सोचिए, इतना कुछ कोई छोड़ता है भला? देश क्या है एक शब्द भर। कुछ किया इसने हमारे लिए? आइए ,और इन बड़े लेखकों की तरह हमारे साथ जुड़िए।"

  आजमी साहब सिर झुकाए अब कुछ सोच रहे थे। वातावरण में तीखा,तेज सन्नाटा था। घड़ी की टिक टिक गूंजती लग रही थी।

" आपकी बात सुनकर मुझे मेरे मरहूम अब्बा की बात याद हो आई। वह कहते थे ,"देश तुम्हे क्या देता है? वह तुम्हे जमीन,आकाश,हवा,पानी, आग,नाते रिश्ते,शिक्षा,बढ़ने के अवसर सब कुछ देता है।हिंदुस्तान हमारी सांसों में बसा है। हम इसी मिट्टी से पैदा हुए हैं। हमें यह सोचना चाहिए कि हम देश को क्या देते हैं? उसकी आत्मा,अस्मिता,गौरव को यदि हम बढ़ा नहीं पाए तो कम भी हमारी वजह से न हो।"

कहते हुए आजमी साहब ने अपनी आंखें पोंछी,मुस्कराए और बोले," हां,हम आधुनिक और सुलझे हुए हैं। धर्म उतना ही जरूरी है जितना वह जीवन को आगे बढ़ाए।कट्टरता तो हमारे घर में कभी नहीं रही।

और मियां,रही बात कम्युनिटी को संदेह या सख्ती की तो ऐसा है बरखुरदार,____वह रुके,उसे देखा जो मुंह बाये उनकी बात सुन रहा था,अपने मजबूत हाथों से चारों ओर इशारा किया," यह सब शोहरत,पैसों के लिए जब आप अपना जमीर बेच सकते हो तो ऐसे ही हमारे बीच भी बहुत लोग ऐसे हैं। जो मुल्क के खिलाफ जाते हैं,वतनपरस्त नहीं हैं तो उनके खिलाफ तो सख्त कार्यवाही होनी ही चाहिए। उनका कोई मजहब नहीं बल्कि वह तो देशद्रोही हैं। उनके गलत व्यवहार का खामियाजा पूरी कोम को भुगतना पड़ता है। पर मुझे मेरे हिंदुस्तान ने सब कुछ दिया नाम,नौकरी,मेरे बेटे बेटी भी सगर्व अपना अपना जॉब कर रहे। मुझे और मेरे जैसे लाखों हैं जिन्हें देश पर गर्व है। आप जैसे लोग उन्हें जबरन देश के विरुद्ध भड़काते हैं। मुझे नहीं पता था कि लेखन जगत में भी ऐसे लोगों की घुसपैठ हो गई है। आपसे मिलकर अच्छा नहीं लगा मुझे।" कहकर वह उठ खड़े हुए।

            तब तक दाल का हलवा, मालपुए, खीरमोहन  कांता बाई लगा चुकी थी। "शुक्रिया ,पर मैं मीठा नहीं खाता।"

कहकर वह मुख्य द्वार की तरफ सिर ऊंचा किए जा रहे हैं।

 

             ---------------------

 

(डॉ.संदीप अवस्थी, कथाकार,आलोचक,

कुछ किताबें,कुछ पुरस्कार

संपर्क :_ 804,विजय सरिता एनक्लेव,बी ब्लॉक, पंचशील,अजमेर,305004

मो7737407061 )