Talking Window in Hindi Horror Stories by Desi Baba books and stories PDF | बोलती खिड़की

Featured Books
  • विलक्षण - 1

    विलक्षण १ जानेवारी २०२५जानेवारीचा महिना हवेत खुप गारवा होता....

  • आसरा

    आज त्याचा वाढदिवस होता अप्पाना माहित होते की, आज तो येणार भे...

  • पत्र सुमने..तुझी खास वाक्ये भाग ६

    प्रिय सोनाआपले शेजारी वर्षातील बरेच दिवस बाहेरगावी असतघरी आल...

  • मोफत मिळालं की महान

    मोफत मिळालं की महान: मानवी मानसिकतेवर एक शुद्ध विनोदी प्रहार...

  • Marine Drive

    आज Marine Drive ला भेटायचं ठरलं होतं. संध्याकाळी सात वाजता भ...

Categories
Share

बोलती खिड़की


एक अरसे बाद
मैंने फिर से कलम उठाई—
लिखने के लिए नहीं,
बल्कि इसलिए कि
खामोशी
अब ज़्यादा बोलने लगी थी।
दो–चार पंक्तियाँ लिखीं,
और वही खामोशी
फिर मुझ पर हावी हो गई।
अचानक
हाथ से कलम छूट गई।
वक़्त
शायद धीमा हो गया था,
या चलना ही भूल गया था—
पता नहीं।
रात बारह के पार थी।
सन्नाटा इतना गहरा
कि दीवारें
मेरी साँसें सुन रही थीं।
अक्सर जब जिंदगी इतनी खामोश 
हो जाती हैं,
तो चलती हुई सांसे भी हमारे
कानों को चुभने लगती है,
दुनिया मैं 8 अरब से ज्यादा इंसान है
फिर भी हम लोग इतने अकेले क्यों है 
आजकल ,
हर किसी के पास कोई न कोई कहानी है,
पर कोई सुनने वाला ही नहीं है,
और जब कोई चला जाए सब कुछ छोड़कर,
इतनी झूठी बाते इतना फेक अपनापन लोग न जाने
कैसे दिखा लेते है , 
पता नहीं मैं कितनी देर से खुद की दुनिया में ही 
खोया हुआ था तभी 
बाहर किसी के खिड़की मे होने की आहट आई।
अभी कितनी बड़ी बड़ी बाते मैं कर रहा था कोई नहीं है 
बाते करने को , दुनिया कितनी खराब है
पर जब रात के 12 बजे खिड़की पर कोई आहट हो
तो सारा अकेलापन उड़न छू हो जाता है 
ये मुझे आज पता चला।
एक अजीब से
डर ने बिना पूछे
मेरे अंदर जगह बना ली।
कलम खुद से चलनी बंद हो गई 
मैंने फिर लिखने की कोशिश की,
लेकिन एक शब्द भी मुझसे लिखा न गया,
न जाने कौन मेरा हाथ को पकड़ रहा था,
एक ठंडी सी लहर मेरे पूरे शरीर में दौड़ गई,
न जाने मेरा डर था या सच  पता नहीं ,
पर कोई मुझे
खिड़की से छुपकर
देख रहा है। 
मेरी साँसें रुक गईं।
मानो एक भारी सा पत्थर किसी ने उठाकर 
मेरे सीने पर रख दिया , और मैं निकलने को 
छटपटा रहा हूं।

नसों में मानो
खून नहीं,
डर बहने लगा।
ये मैं आज तक नहीं समझ पाया ,
मैं क्यों  उठा
और दरवाज़ा खोल दिया।
कमरे में
एक ठंडी लहर फैल गई।
मैं दरवाज़ा बंद करने लगा,
तभी पीछे से
एक आवाज़—
“उन्हें भी आने दो।”
मेरी रूह जैसे निकल कर मानो मेरे सामने बैठी हो,
आज पहली बार पता चला जब कोई बोलता है ,
भाई सब कुछ होता है भूत प्रेत और हम उनकी बातों पर 
हंस देते है और अपना ज्ञान की गंगा उन पर उड़ेल देते है ,
आज पता चला जब कोई बोले तो हमे उनकी बाते एक बार शांति से सुन लेनी चाहिए,
मेरे मुंह से कोई आवाज नहीं निकली ,,
बस मैं एकटक सामने बैठे उस( आदमी / औरत) न जाने क्या को बस देखता रहा , 
और बोला , "बताओ क्या बात करनी थी तुम्हे 
बड़ा बोल रहे थे कोई बात करने को नहीं है 
बोलो  क्या बोलना है हम बैठे है
यहां सब तुम्हे सुनने आए है " 
सब???
तो इसका मतलब वो अकेला नहीं था और भी 
वहां कोई मौजूद था ,
बोलो , बोलो ,, बोलो,,, 
बोलते क्यों नहीं ,
 और मैं एकदम से जाग कर बैठ गया,,
सामने मां मुझे जोर से हिला रही थी, 
" रात भर सोते नहीं अब 10 बजे तक बिस्तर पर पड़ा है 
पढ़ना लिखना है नहीं पूरा दिन फोन,,,
और न जाने क्या क्या मां बोलती रही ,,
मैं कसमसाकर सा उठा , और सोचने लगा तो ये सब एक सपना था ,  शुक्रिया ऊपरवाले का ।
मां सही कहती है ये फोन मेरी जान लेकर रहेगा , न जाने क्या भूत प्रेत की बाते देखता रहता हूं, पढ़ता रहता हूँ।
तभी ,
"अरे बोलो भाई क्या बोलना था रात तुम्हे , हम सब यहीं है" -