From compromise to peace in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | किराए का पति समझौते से सुकुन तक

Featured Books
Categories
Share

किराए का पति समझौते से सुकुन तक

किराए का पति: समझौते से सुकून तक
अध्याय 1: पटना की शाम और माँ की ज़िद
पटना की गलियां शाम होते ही शोर और धूल से भर जाती हैं। बोरिंग रोड के एक छोटे से फ्लैट की बालकनी में खड़ी नेहा अपनी चाय का कप थामे डूबते सूरज को देख रही थी। शहर की रोशनी जगमगा रही थी, लेकिन उसके मन में एक अंधेरा सा था। तभी फोन की घंटी बजी—'माँ'।
नेहा ने एक गहरी सांस ली और फोन उठाया। "हाँ माँ, नमस्ते।"
"नमस्ते-वमस्ते छोड़, ये बता शादी कब कर रही है?" माँ की आवाज़ में हमेशा की तरह वही तेज़ी और चिंता थी। "देख नेहा, तेरी उम्र 28 हो गई है। पड़ोस की रानी की बेटी को देख, कल ही उसकी गोद भराई थी। लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या तुम्हारी बेटी को कोई पसंद नहीं आता? या उसमें कोई कमी है?"
"माँ, मैं एक प्राइवेट कंपनी में सीनियर अकाउंटेंट हूँ। अपना खर्च खुद उठाती हूँ। क्या ये काफी नहीं है?" नेहा ने झुंझलाकर कहा।
"दुनिया के लिए नहीं है बेटा। अगर इस महीने तूने कोई फैसला नहीं लिया, तो मैं और तेरी चाची अगले हफ्ते पटना आ रहे हैं। हमने एक लड़का देखा है, बस तुझे हाँ कहनी है।"
फोन कट गया। नेहा का सिर चकराने लगा। वह जानती थी कि चाची का आना मतलब एक ऐसा रिश्ता थोपना जिससे उसकी आज़ादी छिन जाएगी। उसे प्यार चाहिए था, एक ऐसा इंसान जो उसे समझे, न कि सिर्फ एक शादी का सर्टिफिकेट।
अध्याय 2: एक अजीब विज्ञापन
उस रात नेहा को नींद नहीं आ रही थी। वह फेसबुक स्क्रॉल कर रही थी कि अचानक एक 'स्पॉन्सर्ड ऐड' पर उसकी नज़र ठहरी।
"किराए का साथी उपलब्ध: बॉयफ्रेंड, पति या मंगेतर। शादी की मीटिंग, फैमिली डिनर या दोस्तों की पार्टी के लिए पेशेवर सेवा। गोपनीयता हमारी गारंटी है।"
नेहा पहले तो ज़ोर से हंसी। "लोग अब रिश्तों को भी किराए पर देने लगे हैं?" उसने सोचा। लेकिन अगले ही पल माँ की धमकी याद आई। "अगर मैं किसी को पति बताकर पेश कर दूँ, तो कम से कम ये रोज़ का ड्रामा तो खत्म होगा।"
बिना ज्यादा सोचे, उसने उस नंबर को 'प्रोफेशनल हेल्प' के नाम से सेव कर लिया। अगले दिन जब चाची का मैसेज आया कि वे परसों दोपहर की ट्रेन से आ रही हैं, तो नेहा के हाथ कांपने लगे। उसने कांपती उंगलियों से उस नंबर पर मैसेज किया— "हेलो, क्या आपकी सर्विस अभी उपलब्ध है? मुझे एक हफ्ते के लिए पति की भूमिका निभाने वाला चाहिए।"
अध्याय 3: राहुल से मुलाकात
अगले दिन शाम को मौर्य लोक के एक कैफे में नेहा उस 'किराए के पति' का इंतज़ार कर रही थी। उसे लग रहा था कि कोई अजीब सा, उम्रदराज या लालची दिखने वाला आदमी आएगा।
लेकिन जब एक 30 साल का युवक, जिसने सफेद शर्ट और ब्लू जींस पहनी थी, उसकी मेज की तरफ बढ़ा, तो नेहा देखती रह गई। उसकी चाल में आत्मविश्वास था और चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान।
"नमस्ते, मैं राहुल। आपने ही मैसेज किया था?"
नेहा ने हकलाते हुए कहा, "हाँ... मैं नेहा। आप... आप ये काम करते हैं?"
राहुल कुर्सी खींचकर बैठ गया और कॉफी ऑर्डर की। "मैं मूल रूप से लखनऊ का हूँ, यहाँ फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइनर हूँ। पटना में अकेला रहता हूँ। ये 'सर्विस' मैंने बस साइड इनकम और थोड़ा मजे के लिए शुरू की थी। लोगों की मदद हो जाती है और मुझे एक्टिंग का शौक पूरा हो जाता है।"
नेहा ने अपनी समस्या बताई। "मेरी माँ और चाची आ रही हैं। वे मेरी शादी किसी ज़बरदस्ती के लड़के से करना चाहती हैं। मुझे बस एक हफ्ते के लिए दिखाना है कि मेरी शादी हो चुकी है।"
राहुल ने गंभीरता से सुना। "ठीक है। डील सरल है—10 हजार रुपये। रूल्स ये हैं: कोई फिजिकल टच नहीं (सिवाय हाथ पकड़ने के, अगर ज़रूरत हो), कोई किसिंग नहीं। मैं आपका पति बनूँगा, आपकी पसंद का ख्याल रखूँगा, और आपकी फैमिली को इम्प्रेस करूँगा। डील?"
नेहा ने हाथ आगे बढ़ाया, "डील।"
अध्याय 4: रिहर्सल और झूठ का जाल
अगले दो दिन 'ट्रेनिंग' में बीते। नेहा ने राहुल को अपने घर की हर छोटी चीज़ दिखाई। "ये मेरी अलमारी है, यहाँ तुम्हारे कुछ कपड़े रख दिए हैं। ये किचन है। याद रखना, हमें दिखाना है कि हम दो महीने से साथ रह रहे हैं।"
राहुल ने हंसते हुए एक पुरानी प्लास्टिक की अंगूठी अपनी उंगली में डाल ली। "तैयार रहो मिसेज नेहा, आज से आपका पति ड्यूटी पर है।"
शाम को माँ और चाची का आगमन हुआ। नेहा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। जैसे ही वे अंदर आईं, उन्होंने देखा कि एक स्मार्ट लड़का किचन में चाय छान रहा है।
"नमस्ते आंटी, नमस्ते चाची जी। आइए, बैठिए," राहुल ने इतनी शालीनता से पैर छुए कि दोनों महिलाएं हैरान रह गईं।
"नेहा... ये कौन है?" माँ ने चश्मा ठीक करते हुए पूछा।
नेहा ने राहुल का हाथ पकड़ते हुए झूठ बोल दिया, "माँ, ये राहुल हैं। मेरे पति। हमने दो महीने पहले कोर्ट मैरिज कर ली थी। काम की वजह से और आपकी नाराज़गी के डर से बताया नहीं था।"
राहुल ने तुरंत मोर्चा संभाला, "आंटी, गलती मेरी थी। मैंने नेहा से कहा था कि जब मैं थोड़ा और सेटल हो जाऊँगा, तब आपसे बात करेंगे। नेहा बहुत मेहनती है, मैं नहीं चाहता था कि शादी के शोर में उसका प्रमोशन रुक जाए।"
माँ की आँखों में आंसू आ गए। "इतना नेक लड़का! पर बेटा, कम से कम बताया तो होता।"
अध्याय 5: एक्टिंग या हकीकत?
अगले तीन दिन राहुल ने अपनी भूमिका ऐसे निभाई जैसे वह सच में उसी घर का हिस्सा हो। वह सुबह उठकर न्यूज़पेपर पढ़ता, नेहा के लिए नाश्ता बनाता (भले ही वो सिर्फ टोस्ट होता), और चाची के तीखे सवालों के जवाब हंसकर देता।
"बेटा राहुल, कमाते कितना हो?" चाची ने डिनर पर पूछा।
राहुल ने नेहा की तरफ प्यार से देखा, "चाची जी, इतना कमा लेता हूँ कि नेहा की हर ख्वाहिश और घर की ज़रूरतें पूरी हो सकें। पर सच कहूँ तो, नेहा की मुस्कान से ज्यादा कीमती मेरे लिए कुछ नहीं है।"
नेहा राहुल को देख रही थी। उसे पता था कि ये सब एक्टिंग है, लेकिन राहुल की आवाज़ में एक ऐसी सच्चाई थी जो उसे बेचैन कर रही थी। रात को जब सब सो जाते, तो दोनों बालकनी में बैठते।
"तुम एक्टिंग बहुत अच्छी करते हो, राहुल," नेहा ने धीरे से कहा।
राहुल ने आसमान की तरफ देखा, "कभी-कभी एक्टिंग करते-करते इंसान भूल जाता है कि असली क्या है। वैसे नेहा, तुम्हारी माँ सच में बहुत अच्छी हैं। वे बस तुम्हारी सुरक्षा चाहती हैं।"
उस रात पहली बार नेहा को लगा कि काश ये सब सच होता।
अध्याय 6: अतीत का साया और रक्षक
चौथे दिन कहानी में मोड़ आया। नेहा का पूर्व प्रेमी, विवेक, अचानक उसके फ्लैट पर पहुँच गया। विवेक एक धोखेबाज इंसान था जिसने दो साल पहले नेहा को छोड़ दिया था, लेकिन अब उसकी नौकरी जाने के बाद वह फिर से नेहा के पास वापस आना चाहता था।
"नेहा! ये क्या सुन रहा हूँ? तुमने शादी कर ली? कौन है ये?" विवेक ने चिल्लाकर कहा।
नेहा घबरा गई। माँ और चाची अंदर वाले कमरे में थीं। इससे पहले कि नेहा कुछ कहती, राहुल कमरे से बाहर आया। उसने नेहा के कंधे पर हाथ रखा और विवेक की आँखों में आँखें डालकर बोला, "मैं इसका पति हूँ। और अगर तुमने एक शब्द भी और ऊँचा बोला, तो पटना पुलिस को बुलाने में मुझे दो मिनट भी नहीं लगेंगे।"
विवेक राहुल की पर्सनालिटी देखकर दब गया। "नेहा, तुम पछताओगी," कहकर वह भाग खड़ा हुआ।
नेहा की आँखों में आंसू थे। वह कांप रही थी। राहुल ने धीरे से उसे गले लगा लिया। "शांत हो जाओ, मैं हूँ न।"
नेहा को उस गले लगने में कोई 'किराया' या 'डील' महसूस नहीं हुई। उसे सिर्फ सुकून महसूस हुआ।
अध्याय 7: पंडित जी और आखिरी इम्तिहान
पाँचवें दिन चाची ने अपनी चाल चली। वे एक पंडित जी को घर ले आईं। "अगर शादी हो गई है, तो क्या हुआ? हम रीति-रिवाज से दोबारा शादी की तारीख निकलवाएंगे।"
पंडित जी ने कुंडली मांगी। राहुल और नेहा के पास कोई कुंडली नहीं थी। राहुल ने चतुराई दिखाई, "पंडित जी, हम आधुनिक लोग हैं, पर विश्वास पूरा रखते हैं। आप बस हाथ देख लीजिए।"
पंडित जी ने दोनों के हाथ देखे और मुस्कुराए। "अद्भुत! ऐसा मेल मिलना मुश्किल है। लड़का रक्षक है और लड़की लक्ष्मी। अगले महीने की 15 तारीख शुभ है।"
माँ और चाची खुश होकर मिठाई बांटने लगीं। राहुल ने नेहा के कान में धीरे से कहा, "अब क्या करोगी? पंडित जी ने तो हमें सच में बांध दिया।"
नेहा ने राहुल की तरफ देखा, उसकी आँखों में एक सवाल था, "क्या तुम भी यही चाहते हो?"
अध्याय 8: सच का सामना
छठे दिन की रात। अगले दिन माँ और चाची को लखनऊ वापस जाना था। राहुल का सामान पैक था। नेहा के हाथ में 10 हजार रुपये का लिफाफा था।
"ये लो राहुल, तुम्हारी फीस। तुमने बहुत अच्छा काम किया," नेहा ने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ कांप रही थी।
राहुल ने लिफाफा नहीं लिया। "नेहा, डील के हिसाब से मुझे ये लेना चाहिए। लेकिन पिछले कुछ दिनों में जो मैंने महसूस किया, उसकी कोई कीमत नहीं है। मैं लखनऊ से यहाँ भागकर आया था क्योंकि मुझे लगा था कि रिश्तों में सिर्फ धोखा होता है। पर तुम्हें देखकर, तुम्हारी फैमिली का प्यार देखकर... मेरा इरादा बदल गया।"
बाहर बारिश शुरू हो गई थी। पटना की बारिश हमेशा कुछ नया संदेश लाती है।
राहुल ने नेहा का हाथ थामा। "मैं ये पैसे नहीं ले सकता। क्योंकि अब मैं तुम्हारा किराए का पति नहीं, बल्कि हमेशा का हमसफर बनना चाहता हूँ। क्या तुम एक 'फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइनर' को अपनी ज़िंदगी में जगह दोगी?"
नेहा रो पड़ी। उसने सारा सच अपनी माँ को बताने का फैसला किया। "माँ! राहुल किराए का पति है। मैंने आप लोगों के डर से इसे पैसे देकर बुलाया था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। माँ ने राहुल की तरफ देखा और फिर नेहा की तरफ। माँ धीरे से मुस्कुराईं, "बेटा, हम बूढ़े ज़रूर हैं पर अंधे नहीं। पहले दिन ही पता चल गया था जब इसने चाय में चीनी ज्यादा डाल दी थी, जैसा तुम पीती हो, पर खुद फीकी चाय पी। किराए का आदमी इतनी बारीकी से ख्याल नहीं रखता। हम बस इंतज़ार कर रहे थे कि तुम दोनों कब एक-दूसरे को पहचानोगे।"
उपसंहार: एक नई शुरुआत
दो महीने बाद।
पटना के प्रसिद्ध महावीर मंदिर में शहनाइयां गूंज रही थीं। कोई किराए का नाटक नहीं था, कोई समझौता नहीं था। नेहा लाल जोड़े में सजी थी और राहुल अपनी असली मुस्कान के साथ मंडप में बैठा था।
जब राहुल ने नेहा की मांग में सिंदूर भरा, तो नेहा ने धीरे से कहा, "किराए की चीज़ें अक्सर वापस करनी पड़ती हैं, लेकिन तुम तो मेरी सबसे कीमती संपत्ति बन गए।"
राहुल हंसा, "और तुम मेरी सबसे खूबसूरत असाइनमेंट।"
पटना की गलियों में फिर सूरज ढल रहा था, लेकिन आज नेहा अकेली नहीं थी। उसके पास उसका अपना 'हमेशा का सहारा' था।