Live-in relationship. in Hindi Short Stories by Jeetendra books and stories PDF | लिव इन का रिश्ता।

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लिव इन का रिश्ता।

"चाय में चीनी कम है, या शायद आज मेरा ही मूड ठीक नहीं," माधव ने खिड़की के बाहर उड़ते कबूतरों को देखते हुए कहा।

प्रेरणा ने बालकनी की रेलिंग पर रखे अपने मग को देखा, फिर माधव को। "चाय तो मैंने रोज़ जैसी ही बनाई है, माधव। शायद तुम्हारा मूड ही बिगड़ा हुआ है।"

माधव मुस्कुराया, पर उस मुस्कान में पिछले कुछ हफ़्तों की अनकही उदासी थी। "मूड बदलता है या हम उसे बदलना चाहते हैं, प्रेरणा?"

"तुम आज बहुत गहरी बातें कर रहे हो। आज ऑफिस के लिए देर नहीं हो रही?" प्रेरणा ने बात बदलने की कोशिश की।

"आज रविवार है, प्रेरणा। हम दोनों घर पर हैं," माधव ने उसे याद दिलाया।

प्रेरणा कुछ पल के लिए ठिठक गई। उसे सच में याद नहीं था। पिछले चार महीनों से दिन और तारीखें जैसे एक धुंध में खो गई थीं। जब से उन्होंने इस किराए के फ्लैट में साथ रहना शुरू किया था, समय की गति ही बदल गई थी। वह गति जो कभी तेज़ भागती थी, अब धीमी और बोझिल लगने लगी थी।

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आठ महीने पहले।

"क्या हम सच में यह कर रहे हैं?" प्रेरणा ने कैफे में बैठे माधव का हाथ थामते हुए पूछा था। उनकी आँखों में चमक थी, जैसे किसी नए सपने की शुरुआत हो रही हो।

माधव ने उसके हाथ को हल्के से दबाया। "प्रेरणा, हम एक-दूसरे को जानते हैं। प्यार करते हैं। शादी से पहले यह देखना ज़रूरी है कि क्या हम एक छत के नीचे, बिना किसी सामाजिक दबाव के, अपने रिश्ते को आगे बढ़ा सकते हैं।"

"मम्मी-पापा को क्या कहूँगी?"

"वही, जो तय हुआ था। कि तुम अपनी दोस्त के साथ पीजी शिफ्ट कर रही हो, अपनी नई नौकरी के पास। प्रेरणा, यह झूठ नहीं है, यह बस सच को थोड़ा संभाल कर कहना है। यह मॉडर्न तरीका है," माधव ने समझाया था।

प्रेरणा उस वक्त खुशी से फूली नहीं समाई थी। उसे लग रहा था जैसे वह किसी बड़े रोमांटिक फ़िल्मी सीन का हिस्सा बन रही है। लेकिन वह 'रोमांस' अब गत्तों के डिब्बों में सिमटा हुआ इस लिविंग रूम के कोने में पड़ा था। डिब्बे जिन पर लिखा था 'प्रेरणा - स्मृतियां', और वे कभी खुले नहीं थे।

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वर्तमान।

"ये डिब्बे कब खुलेंगे?" माधव ने लिविंग रूम के कोने में रखे उन दो बड़े बॉक्स की तरफ इशारा किया जिन पर धूल की एक पतली परत जम गई थी।

"खुल जाएंगे। वैसे भी यहाँ इतनी जगह कहाँ है, माधव? तुम्हारा गिटार केस और वर्कआउट इक्विपमेंट ने आधी जगह तो घेरी हुई है," प्रेरणा ने चिढ़ते हुए कहा।

"ओह, तो अब बात जगह की है? या नीयत की?" माधव के स्वर में एक हल्की सी कड़वाहट थी। यह वो कड़वाहट थी जो धीरे-धीरे उनके रिश्ते में घुल रही थी।

"माधव, प्लीज़। सुबह-सुबह बहस नहीं।" प्रेरणा ने आँखें मूंद लीं।

"मैं बहस नहीं कर रहा, प्रेरणा। मैं बस यह कह रहा हूँ कि चार महीने हो गए, और तुमने अभी तक अपनी सबसे प्यारी तस्वीरें, अपने पसंदीदा नोवेल्स बाहर नहीं निकाले। ऐसा लग रहा है जैसे तुम अभी भी भागने की तैयारी में हो। जैसे तुमने अपना बोरिया-बिस्तर पूरी तरह खोला ही नहीं।"

प्रेरणा ने मग टेबल पर पटका। आवाज़ थोड़ी तेज़ हुई। "भागने की तैयारी? मैंने अपना घर छोड़ा, अपनी आज़ादी छोड़ी और यहाँ आई। और तुम्हें लगता है मैं भाग रही हूँ?"

"आज़ादी? क्या मेरे साथ रहना कैद है?" माधव अब उसकी तरफ देख रहा था, उसकी आँखों में सवाल तैर रहे थे।

"तुम शब्दों को पकड़ रहे हो, माधव! मेरा मतलब वो नहीं था।"

"तो तुम्हारा मतलब क्या था? प्रेरणा, हम यहाँ एक 'रिश्ते' में हैं, किसी होटल के कमरे में नहीं जहाँ तुम सिर्फ अपना हैंडबैग लेकर आई हो और किसी भी पल चेक-आउट कर सकती हो।"

प्रेरणा कमरे से बाहर जाने लगी, पर दरवाज़े पर रुक गई। "तुम्हें पता है दिक्कत क्या है? दिक्कत ये डिब्बे नहीं हैं। दिक्कत वो उम्मीदें हैं जो तुम बिना बताए मुझ पर थोप देते हो। तुमने कब मुझसे पूछा कि क्या मुझे रोज़ सुबह चाय बनाना पसंद है? तुमने बस मान लिया कि सुबह की चाय मैं ही बनाऊँगी, क्योंकि मैं लड़की हूँ और 'साथ रहने' का मतलब यही होता है।"

माधव निरुत्तर रह गया। उसने सच में कभी नहीं पूछा था। उसे लगा था कि यह 'स्वाभाविक' है, कि रिश्ते में ऐसी छोटी-मोटी चीज़ें बिना कहे तय हो जाती हैं।

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डेढ़ महीना पहले।

देर रात के एक बज रहे थे। प्रेरणा अपने दोस्त से फ़ोन पर बात कर रही थी। माधव सो चुका था, या सोने की कोशिश कर रहा था। अचानक माधव की नींद खुली और उसने चिढ़कर कहा, "प्रेरणा, क्या तुम सुबह बात नहीं कर सकती? मुझे नींद नहीं आ रही है।"

प्रेरणा ने फुसफुसाते हुए कहा, "पाँच मिनट और, माधव। इंपॉर्टेंट बात है।"

"तुम्हें अपने दोस्तों से ऑफिस के टाइम में बात करनी चाहिए। यहाँ हमारी प्राइवेसी खराब होती है। मुझे आराम चाहिए," माधव ने तकिया अपने सिर पर रखते हुए कहा।

प्रेरणा की हँसी रुक गई। 'हमारी' प्राइवेसी या 'उसकी' सुविधा? उसे महसूस हुआ कि 'साथ रहने' का मतलब सिर्फ प्यार और खुशी बाँटना नहीं, बल्कि अपनी आदतों और अपनी पहचान को भी कहीं पीछे छोड़ना है। क्या वह इसके लिए तैयार थी? क्या यह रिश्ता उसे आज़ादी दे रहा था, या उसे एक नए तरह के बंधन में बांध रहा था?

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वर्तमान।

लिविंग रूम में सन्नाटा था। माधव ने जाकर उन डिब्बों में से एक को छुआ। उस पर जमी धूल अब और भी गहरी लग रही थी।

"सॉरी," माधव ने धीमी आवाज़ में कहा।

प्रेरणा ने उसे मुड़कर देखा। उसकी आँखों में गुस्सा कम और नमी ज़्यादा थी। "किसलिए?"

"चाय के लिए। और शायद उन डिब्बों के लिए भी। मुझे लगा था साथ रहना आसान होगा। जैसे सोशल मीडिया पर कपल्स की तस्वीरें होती हैं—हमेशा मुस्कुराते हुए, एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए, परफेक्ट लाइफ जीते हुए।"

प्रेरणा उसके पास आई और डिब्बे पर जमी धूल को अपनी उंगली से साफ किया। "माधव, सोशल मीडिया पर सिर्फ हाइलाइट्स होते हैं। क्रेडिट्स के बाद की कहानी नहीं दिखाई जाती। वहां झाड़ू-पोछा, बिजली का बिल, रात को नींद न आने पर दोस्तों से बात न कर पाने की घुटन और ये अनखुले डिब्बे नहीं होते।"

माधव ने उसे गले लगाना चाहा, पर प्रेरणा एक कदम पीछे हट गई। "अभी नहीं। मुझे थोड़ा वक्त चाहिए।"

"कितना वक्त?"

"पता नहीं, माधव। शायद जब तक मैं ये डिब्बे खोलने की हिम्मत न जुटा लूँ। या जब तक यह न समझ लूँ कि क्या ये डिब्बे कभी खुलने भी चाहिए या नहीं।"

माधव ने खिड़की की ओर देखा। धूप तेज़ हो रही थी, पर कमरे में एक अजीब सी ठंडक थी। बाहर ट्रैफ़िक का शोर बढ़ गया था। उसे अहसास हुआ कि प्यार करना एक बात है, और एक-दूसरे की मौजूदगी को उसकी सारी अच्छाइयों और कमियों के साथ स्वीकार करना बिल्कुल दूसरी। 'लाइव इन' का रिश्ता सिर्फ एक छत साझा करना नहीं था, बल्कि अपनी व्यक्तिगत दीवारों को तोड़ना और फिर उन्हें फिर से बनाना भी था। और शायद, उनकी दीवारें अभी तक गिरी नहीं थीं, बल्कि और ऊंची हो गई थीं।

"चलो, आज बाहर नाश्ता करते हैं? कुछ नया खाते हैं?" माधव ने माहौल हल्का करने की कोशिश की।

"माधव, मैं थक गई हूँ। इन सब से। तुम हो आओ," प्रेरणा ने सपाट लहजे में कहा और बेडरूम की तरफ बढ़ गई। दरवाज़ा हल्के से बंद होने की आवाज़ आई, जो एक भारीपन छोड़ गई।

माधव खड़ा देखता रह गया। वह घर, जो कुछ हफ़्तों पहले तक उनके सपनों का महल लग रहा था, अब बस चार दीवारों और अनखुले डिब्बों का एक गोदाम जैसा लग रहा था। क्या वे वाकई एक-दूसरे के लिए बने थे? या यह सिर्फ एक एक्सपेरिमेंट था, जो अब अपने अंत की ओर बढ़ रहा था?

उसने हाथ में पकड़ा खाली मग देखा। चाय वाकई बेस्वाद लग रही थी। शायद सिर्फ चाय ही नहीं, पूरा रिश्ता ही फीका पड़ गया था। वे साथ तो रह रहे थे, पर असल में कभी एक साथ हुए ही नहीं थे। उन अनखुले डिब्बों की तरह, उनके दिल भी अभी तक बंद थे, और उनके भीतर का सामान बिखरा पड़ा था।

समाप्त

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