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तिरंगा हमारी शान
✍️ लेखक: विजय शर्मा एरी
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प्रस्तावना
भारत का राष्ट्रीय ध्वज, तिरंगा, केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं है। यह उन बलिदानों, संघर्षों और सपनों का प्रतीक है जिन्होंने इस देश को स्वतंत्र बनाया। यह कहानी एक छोटे गाँव के लड़के आरव की है, जो तिरंगे से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को देश और समाज की सेवा में समर्पित करता है।
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भाग 1: बचपन का सपना
पंजाब के अजनाला क्षेत्र के एक छोटे से गाँव में आरव नाम का लड़का रहता था। उसका घर मिट्टी का बना था, आँगन में नीम का पेड़ और खेतों में गेहूँ की सुनहरी बालियाँ। हर साल 15 अगस्त को गाँव के स्कूल में तिरंगा फहराया जाता था।
आरव की आँखें उस झंडे पर टिक जातीं। उसे लगता कि यह झंडा कोई जादुई शक्ति है, जो सबको जोड़ देता है।
एक दिन उसने अपने पिता से पूछा –
आरव: “पापा, यह तिरंगा इतना खास क्यों है?”
पिता: “बेटा, इसमें हमारे देश की आत्मा बसती है। केसरिया रंग साहस और बलिदान का प्रतीक है, सफेद शांति और सत्य का, और हरा रंग समृद्धि और जीवन का। बीच का चक्र हमें आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है।”
उस दिन आरव ने ठान लिया कि वह तिरंगे की रक्षा करेगा और उसके आदर्शों को अपने जीवन में उतारेगा।
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भाग 2: संघर्ष की आहट
समय बीतता गया। आरव कॉलेज में पढ़ने लगा। देश में कई सामाजिक समस्याएँ थीं – भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, और सीमाओं पर खतरे।
कॉलेज में उसने एक समूह बनाया – “तिरंगा युवा दल।”
इस दल का उद्देश्य था –
- गाँवों में शिक्षा फैलाना
- गरीब बच्चों को पढ़ाना
- महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना
- लोगों को देशभक्ति का महत्व समझाना
आरव कहता –
“तिरंगे का सम्मान केवल झंडा फहराने से नहीं, बल्कि उसके आदर्शों को जीने से है।”
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भाग 3: सीमा पर बलिदान
एक दिन खबर आई कि सीमा पर तनाव बढ़ गया है। आरव का बड़ा भाई, विक्रम, जो सेना में था, देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गया।
घर में मातम छा गया। माँ रोती रही, पिता मौन हो गए। लेकिन जब शहीद भाई का तिरंगे में लिपटा शव गाँव पहुँचा, तो सबकी आँखों में आँसू के साथ गर्व भी था।
आरव ने उस दिन तिरंगे को छूकर प्रण लिया –
“भैया ने अपना जीवन देश के लिए दिया है। अब मैं तिरंगे के आदर्शों को अपने जीवन में उतारूँगा।”
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भाग 4: सामाजिक क्रांति
आरव ने गाँव में शिक्षा अभियान शुरू किया।
- उसने बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।
- महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई केंद्र खोला।
- किसानों को नई तकनीकें सिखाईं।
हर कार्यक्रम की शुरुआत वह तिरंगे को सलामी देकर करता।
धीरे-धीरे गाँव बदलने लगा। लोग समझने लगे कि तिरंगे का अर्थ केवल युद्ध नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाना भी है।
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भाग 5: चुनौतियाँ और संघर्ष
गाँव में कुछ लोग आरव के काम का विरोध करने लगे। उन्हें लगता था कि यह सब दिखावा है।
एक दिन पंचायत में एक बुज़ुर्ग ने कहा –
“बेटा, तिरंगे की रक्षा करना सेना का काम है। तुम क्यों इतना परेशान होते हो?”
आरव ने शांत स्वर में उत्तर दिया –
“बाबा जी, तिरंगे की रक्षा केवल सीमा पर नहीं होती। जब हम ईमानदारी से काम करते हैं, जब हम शिक्षा फैलाते हैं, जब हम शांति और भाईचारे को बढ़ावा देते हैं – तब भी हम तिरंगे की रक्षा करते हैं।”
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भाग 6: राजधानी का मंच
कुछ साल बाद आरव एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता बन गया। उसे राजधानी में स्वतंत्रता दिवस पर भाषण देने का अवसर मिला।
मंच पर खड़े होकर उसने कहा –
“तिरंगा हमें केवल गर्व नहीं देता, यह हमें जिम्मेदारी भी देता है।
- केसरिया हमें साहस सिखाता है।
- सफेद हमें सत्य और शांति का मार्ग दिखाता है।
- हरा हमें जीवन और विकास की ओर ले जाता है।
यदि हम इन आदर्शों को अपने जीवन में उतार लें, तो भारत दुनिया का सबसे महान राष्ट्र बन सकता है।”
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उपसंहार
आरव की कहानी यह बताती है कि तिरंगा केवल झंडा नहीं, बल्कि जीवन जीने की प्रेरणा है। यह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है।
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