बारिश की बूँदें स्टेशन की पुरानी छत से टपक रही थीं। प्लेटफॉर्म पर लगी पीली लाइटें गीली ज़मीन पर अजीब सी चमक पैदा कर रही थीं। हवा में ठंडक थी, और भीड़ में भी एक अजीब सा सन्नाटा। इसी भीड़ के बीच, एक कोने में खड़ी थी स्वर्णा—भीगे हुए बाल, थकी हुई आँखें और हाथ में पकड़ा एक छोटा सा सूटकेस।
वह किसी ट्रेन का इंतज़ार नहीं कर रही थी।
वह अपनी ज़िंदगी से भाग रही थी । अपने अकेले पन के साथ स्वर्णा खुद को हौसला देते हुए लंबी लंबी साँसे ले रही थी।
कुछ ही घंटों पहले वह अपने घर से निकली थी। वही घर जहाँ हर दीवार ने उसे यह एहसास दिलाया था कि उसकी मर्जी का कोई मतलब नहीं। उसकी शादी तय कर दी गई थी—एक ऐसे आदमी से, जिसे उसने कभी देखा तक नहीं था। माँ ने कहा था, “लड़की का काम है समझौता करना।” पिता चुप थे, और वही चुप्पी उसके लिए सबसे बड़ा बोझ बन गई।
उसने बहुत कोशिश की थी समझाने की, रोने की, पर किसी ने उसकी नहीं सुनी। उस दिन उसने पहली बार अपनी ज़िंदगी अपने हाथों में लेने का फैसला किया। उसने अपने कुछ कपड़े, थोड़े पैसे और माँ की दी हुई छोटी सी तस्वीर बैग में रखी और बिना पीछे देखे निकल आई।
स्टेशन पर खड़ी स्वर्णा के मन में हज़ारों सवाल थे—
क्या उसने सही किया?
क्या वह अकेले जी पाएगी?
क्या दुनिया इतनी कठोर है जितना उसे बताया गया था?
भीड़ के बीच अचानक किसी ने उससे कहा,
“आप भी किसी को छोड़कर जा रही हैं?”
वह चौंक गई। सामने एक लड़का खड़ा था। उसके चेहरे पर भी थकान थी, आँखों में भी वही डर और उलझन। उसका नाम रोहन था। उसने बताया कि वह भी अपनी तयशुदा शादी से भाग रहा है। वह ज़िंदगी से नहीं, बल्कि एक झूठे रिश्ते से भाग रहा था।
दोनों के बीच बातें अपने आप बहने लगीं। जैसे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों। उन्होंने अपने डर, अपने सपने, अपनी टूटी उम्मीदें बाँट लीं। स्वर्णा ने महसूस किया कि वह पहली बार बिना डर के किसी से बात कर रही है।
ट्रेन की सीटी बजी।
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
रोहन ने मुस्कराकर कहा, “क्यों न हम किसी नए शहर में एक नई शुरुआत करें?”
स्वर्णा का दिल ज़ोर से धड़क उठा।
उसे लगा, शायद भगवान ने उसकी सुनी है।
वे ट्रेन में चढ़ गए। खिड़की से बाहर बारिश की धारियाँ बह रही थीं, और अंदर दो दिल अपने टूटे टुकड़ों को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे। स्वर्णा को पहली बार लगा कि शायद उसका भी कोई अपना हो सकता है।
पर ज़िंदगी इतनी आसान कहाँ होती है?
अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी। तभी एक लड़की दौड़ती हुई आई, भीगती हुई, रोती हुई—
“रोहन!”
स्वर्णा का दिल बैठ गया।
वह लड़की रोहन की मंगेतर थी। उसकी आँखों में टूटे सपने थे, और हाथों में शादी का कार्ड।
रोहन चुप खड़ा था।
स्वर्णा सब समझ चुकी थी।
धीरे से उसने उसका हाथ छोड़ा और कहा,
“तुम्हारी ज़िंदगी में मेरी जगह नहीं है।”
वह ट्रेन से उतर गई।
भीड़ के बीच अकेली खड़ी रही, पर अब वह कमज़ोर नहीं थी।
क्योंकि उसने सीख लिया था—
खुद से प्यार करना ही सबसे बड़ी जीत है।