behind the scenes in Hindi Moral Stories by ARTI MEENA books and stories PDF | पर्दे के पीछे

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पर्दे के पीछे

सुबह का समय था।
शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था, लेकिन सड़कों पर भागती जिंदगी की आहट सुनाई देने लगी थी। चाय की केतली से उठती भाप के साथ मिश्रा जी बरामदे में कुर्सी डालकर अख़बार पढ़ रहे थे।
अख़बार के पहले पन्ने पर बड़ी हेडलाइन छपी थी —
कॉलेजों में जाति आधारित भेदभाव खत्म करने के लिए नया नियम लागू।
मिश्रा जी ने चाय की चुस्की ली और खबर को दोबारा पढ़ा। चेहरे पर हल्की चिंता की लकीर उभर आई।
उन्होंने सोचा —
“समाज इतनी जल्दी बदल जाएगा क्या? लोग मान लेंगे क्या?”
अख़बार में नीचे लिखा था —
कुछ जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए। कुछ संगठनों ने कहा कि इससे “परंपरा” टूट जाएगी। मिश्रा जी कुछ देर तक चुप बैठे रहे।
उन्हें अपने बेटे का ख्याल आया — जो शहर के बड़े कॉलेज में पढ़ता था।
फिर उन्होंने खुद से ही सवाल किया —
“अगर सब बराबर हैं… तो डर किस बात का है?
और अगर डर है… तो शायद दिक्कत कहीं और है।”
अंदर से मिश्राइन की आवाज आई —
“जी सुनिए, नाश्ता ठंडा हो जाएगा।”
मिश्रा जी ने अख़बार मोड़ा, लेकिन खबर उनके दिमाग में खुली ही रह गई।मिश्रा जी नहाने चले गए थे और मिश्रा जी की पत्नी रसोई में खाना बनाने में व्यस्त थीं।
रसोई में सब्ज़ी की खुशबू फैल रही थी और साथ ही बच्चों के टिफिन तैयार किए जा रहे थे।
उधर दोनों बेटियाँ नहा-धोकर स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थीं।
माँ ने रसोई से आवाज़ लगाई —
“संगीता, वीणा… जल्दी आओ, अपना-अपना टिफिन ले लो।”
दोनों जल्दी से रसोई में आईं।
माँ ने उनके टिफिन बैग में रखे और पानी की बोतल भी दे दी।
दोनों बहनों ने अपना-अपना बैग उठाया, जूते पहने और जल्दी-जल्दी घर से बाहर निकल गईं।
वे रोज़ साइकिल से स्कूल जाती थीं।
उनका स्कूल घर से लगभग 2 किलोमीटर दूर था।
पास में और भी स्कूल थे, लेकिन यह स्कूल पढ़ाई और अनुशासन के लिए अच्छा माना जाता था, इसलिए मिश्रा जी ने वहीं दाखिला कराया था।
सुबह की सड़क पर हल्की धूप फैल चुकी थी।
दोनों बहनें साइकिल चलाते हुए स्कूल की तरफ बढ़ गईं —
अपने-अपने छोटे-छोटे सपनों के साथ।मिश्रा जी नहा-धोकर पूजा-पाठ करके बाहर आए।
मिश्राइन जी ने तब तक नाश्ता लगा दिया था।
उन्होंने जल्दी-जल्दी नाश्ता किया, क्योंकि उन्हें अस्पताल के लिए निकलना था।
मिश्राइन जी ने उनका टिफिन पैक करके उन्हें दे दिया।
मिश्रा जी रोज़ की तरह अपनी बाइक से अस्पताल के लिए निकल गए।
समाज में मिश्रा जी की अच्छी-खासी इज्जत और मान-सम्मान था।
पेशे से डॉक्टर होने की वजह से लोग उन्हें सम्मान से देखते थे।
बाहर से देखने पर उनका परिवार एक सुखी और व्यवस्थित परिवार लगता था।
मिश्रा जी के जाने के बाद मिश्राइन जी घर के कामों में व्यस्त हो जाती थीं —
साफ-सफाई, कपड़े, रसोई का काम।
घर के रोज़ के कामों में मदद करने के लिए पास की बस्ती से सीमा काम करने आती थी।
वह रोज़ सुबह बर्तन धोने और झाड़ू-पोंछा करने आती थी।
सीमा चुपचाप अपना काम करती थी।
घर में उसकी मौजूदगी सामान्य थी —
जैसे शहर के कई घरों में काम करने वाले लोग होते हैं।
लेकिन समाज की कई परतें ऐसी होती हैं —
जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखती तो हैं,
पर उन पर खुलकर बात कम होती है।सीमा पास की बस्ती से काम करने आती थी।
वह बस्ती शहर के उसी हिस्से में थी, लेकिन दोनों जगहों की ज़िंदगी में काफी फर्क था।
मिश्राइन जी शायद कभी उस बस्ती में खुद नहीं गई थीं।
उन्हें सीमा के बारे में तब पता चला था, जब वह पड़ोस के घर में काम करने आती थी।
पड़ोस की महिला ने ही एक दिन कहा था —
“अगर काम वाली चाहिए तो सीमा को बोल दूँ, वह अच्छा काम करती है।”
बस उसी दिन से सीमा इस घर में भी काम करने आने लगी।
धीरे-धीरे उसने इस घर का काम भी अपनी जिम्मेदारी में ले लिया।
वह रोज़ समय पर आती, चुपचाप अपना काम करती और फिर दूसरे घरों में काम करने चली जाती।
उसकी ज़िंदगी भी रोज़ की मेहनत और जिम्मेदारियों के बीच चलती रहती थी।
शहर में सब लोग एक ही जगह रहते तो थे —
लेकिन कई बार लोगों की दुनिया अलग-अलग बनी रहती थी।
कुछ दूरियाँ ऐसी होती हैं —
जो रास्तों से नहीं,
सोच से बनती हैं।
और अक्सर…
ये दूरियाँ ही
पर्दे के पीछे छुपी रह जाती हैं।सीमा की उम्र लगभग तीस साल के आसपास रही होगी।
वह पतली, लंबी कद की थी और गेहुआँ से थोड़ी साफ रंगत की लगती थी।
वह अक्सर साड़ी पहनकर ही काम पर आती थी।
सीमा चुपचाप अपना काम करती और फिर चली जाती।
उसे ज़्यादा बातें करने का शौक नहीं था।
शायद यही वजह थी कि मिश्राइन जी को उसका काम करने का तरीका पसंद था।
मिश्राइन जी पूजा-पाठ में बहुत विश्वास रखती थीं।
घर के मंदिर की सफाई वह खुद ही करती थीं।
रसोई की सफाई भी वह अपने हाथ से ही करती थीं —
उन्हें लगता था कि कुछ जगहों की सफाई खुद करने से मन को संतोष मिलता है।
घर का माहौल बाहर से बहुत व्यवस्थित और शांत लगता था।
हर काम का अपना समय था, अपनी जगह थी।
सीमा रोज़ आती, अपना काम करती और बिना ज्यादा बोले चली जाती।
जैसे वह इस घर का हिस्सा भी थी —
और कहीं न कहीं…
इस घर से अलग भी।
शायद समाज में कई रिश्ते ऐसे ही होते हैं —
जहाँ लोग एक-दूसरे की ज़िंदगी से जुड़े होते हैं,
लेकिन दूरी फिर भी बनी रहती है।मिश्रा जी जैसे ही अस्पताल पहुँचे, वहाँ रोज़ की तरह मरीजों की लंबी लाइन लगी हुई थी।
अस्पताल के बाहर हलचल थी — कोई पर्ची बनवा रहा था, कोई रिपोर्ट दिखा रहा था, कोई अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था।
मिश्रा जी सीधे अपने केबिन में चले गए।
नर्स ने दरवाज़ा खोला और मरीजों को अंदर भेजना शुरू किया।
एक-एक करके मरीज अंदर आते गए।
मिश्रा जी ध्यान से उनकी बात सुनते, जांच करते और उनकी समस्या के हिसाब से दवा और सलाह देते।
किसी को बुखार था,
किसी को पुरानी बीमारी की परेशानी,
कोई दूर गाँव से सिर्फ इसलिए आया था क्योंकि उसे भरोसा था कि मिश्रा जी सही इलाज करेंगे।
मिश्रा जी अपने काम में पूरी तरह लगे हुए थे।
उनके लिए हर मरीज पहले एक इंसान था — फिर कुछ और।
बाहर इंतज़ार करती भीड़ बढ़ती जा रही थी।
अंदर मिश्रा जी लगातार काम कर रहे थे।
अस्पताल में सब कुछ सामान्य लग रहा था —
लेकिन समाज की कई कहानियाँ, कई सच्चाइयाँ
यहीं आकर मिलती थीं।मरीजों की लाइन तो लंबी थी ही,
लेकिन अस्पताल की हालत भी किसी से छुपी नहीं थी।
बैठने की ठीक से व्यवस्था नहीं थी।
कई लोग दीवार के सहारे खड़े थे, कुछ फर्श पर बैठकर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे।
अस्पताल के बरामदे में इधर-उधर आवारा कुत्ते घूमते दिख जाते थे।
कहीं छत से पानी टपक रहा था, तो कहीं बाथरूम की हालत खराब थी।
दीवारों पर जगह-जगह पान के दाग और पुराने पोस्टर चिपके हुए थे,
जैसे समय के साथ सब कुछ बस चलता ही चला गया हो —
बिना ठीक हुए।
यह दृश्य किसी एक शहर का नहीं था।
ऐसा माहौल देश के कई सरकारी अस्पतालों में देखा जा सकता था।
मिश्रा जी मूल रूप से आगरा के रहने वाले थे,
लेकिन नौकरी की वजह से कानपुर में काम कर रहे थे।
वह रोज़ इस माहौल में काम करते थे।
भीड़, कम संसाधन, और लगातार आते मरीज —
यह सब अब उनकी रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका था।
फिर भी…
मरीजों के लिए वह डॉक्टर थे — उम्मीद थे।
अस्पताल की इमारत भले पुरानी लगती थी,
लेकिन अंदर इलाज की उम्मीद लेकर आने वालों की भीड़ हर दिन नई होती थी।शाम होते-होते Mishra ji ने बहुत से मरीजों का इलाज कर लिया था।
अब वो दूसरे डॉक्टरों के साथ बैठकर चाय पी रहे थे। अस्पताल के बाहर हल्का अंधेरा होने लगा था, लेकिन अंदर अभी भी भीड़ कम नहीं हुई थी।
चाय की चुस्कियों के बीच सुबह अख़बार में आई खबर की बात छिड़ गई।
Mishra ji बोले —
“Gupta ji, आपके हिसाब से सरकार ने सही किया है क्या ये नया नियम लाकर?”
Gupta ji ठहरे पुराने ख्यालों वाले और पूरे Kanpur वाले अंदाज़ में बोले —
“अरे का डॉक्टर साहब, सरकार भी ना… अब सब बराबरी की बात करेगी। पर जमीन पर चीज़ें इतनी आसान कहाँ होती हैं? लोग मानेंगे का? गाँव-कस्बों में आज भी लोग साथ बैठकर खाना खाने में सौ बार सोचते हैं।”
Mishra ji चुप रहे।
Gupta ji आगे बोले —
“देखो, किताब में सब अच्छा लगता है, पर समाज बदलने में टाइम लगता है। एकदम से नियम बना देने से सोच थोड़े ना बदल जाती है।”
पास बैठे एक और डॉक्टर धीरे से बोले —
“पर अगर नियम नहीं बनेंगे तो बदलाव शुरू भी कैसे होगा?”
कुछ पल के लिए वहाँ खामोशी छा गई।
सिर्फ चाय के कप रखे जाने की आवाज आ रही थी।
Mishra ji खिड़की से बाहर देखने लगे।
उन्हें याद आया — उनके घर काम करने आने वाली Seema…
जो हर दिन घर साफ करती है, लेकिन रसोई और मंदिर से दूर रहती है…
कभी खुद से नहीं — बल्कि इसलिए क्योंकि उसे पता है उसकी जगह कहाँ तय कर दी गई है।
Mishra ji ने धीरे से कहा —
“शायद… दिक्कत नियम में नहीं… सोच में है।”तभी पास बैठे एक और डॉक्टर, जो अब तक चुप थे, थोड़ा तेज स्वर में बोले —
“देख लेना… कल को यही लोग हमारे सिर पर बैठेंगे। जो आज तक हमारे पैरों के पास खड़े रहते थे, वो बराबरी की बात करेंगे।”
उनकी बात सुनकर कुछ लोग हल्का सा मुस्कुरा दिए, कुछ चुप रहे।
कमरे में अजीब सा माहौल बन गया।
Mishra ji ने कप टेबल पर रख दिया।
उन्हें ये बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन वो तुरंत कुछ बोले भी नहीं।
पास बैठे वही डॉक्टर फिर बोले —
“समाज ऐसे थोड़ी बदल जाता है… हर चीज़ की एक जगह होती है।”
इस बार Gupta ji भी उतने विश्वास से नहीं बोले —
“बात तो है… पर समय बदल भी तो रहा है।”
चाय खत्म हो चुकी थी।
लेकिन बात वहीं अटक गई थी —
पुरानी सोच और बदलते समय के बीच।
Mishra ji उठे और बाहर निकल आए।
अस्पताल के बरामदे में खड़े होकर उन्होंने गहरी सांस ली।
उन्हें लगा —
बीमारी सिर्फ शरीर में नहीं होती…
कुछ बीमारियाँ समाज की सोच में भी होती हैं… जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं।शाम ढलने लगी थी।
Mishra ji अपनी ड्यूटी खत्म करके अस्पताल से निकले। रोज की तरह वो घर जाते समय बाज़ार रुक गए। सब्ज़ी और फल लेकर बैग में रखवाए और बाइक स्टार्ट करने ही वाले थे कि उनकी नज़र सामने सड़क की तरफ चली गई।
सड़क किनारे कुछ मज़दूर लोग काम खत्म करके वापस जा रहे थे।
किसी के हाथ में पुराना टिफिन था, कोई गमछे से पसीना पोंछ रहा था।
दो-तीन लोग पान चबा रहे थे और चलते-चलते सड़क किनारे थूक भी रहे थे।
उनके कपड़े धूल और पसीने से भीगे हुए थे।
चेहरों पर थकान साफ दिखाई दे रही थी — जैसे पूरा दिन शरीर से ज्यादा जिंदगी से लड़ते हुए निकला हो।
पास से गुजरते लोग नाक सिकोड़कर निकल रहे थे।
कोई धीमे से बोल रहा था —
“पूरा रास्ता गंदा कर देते हैं…”
Mishra ji कुछ पल वहीं खड़े रहे।
उन्होंने उन मज़दूरों को देखा —
थके हुए…
लेकिन फिर भी हँसते-बोलते घर की तरफ जाते हुए।
अचानक उनके दिमाग में सुबह की खबर और अस्पताल की बातचीत दोनों एक साथ घूम गई।
उन्होंने सोचा —
“दिन भर ये लोग शहर बनाते हैं…
और शाम को… यही लोग शहर के लिए बोझ बन जाते हैं?”
Mishra ji ने बैग बाइक में रखा और धीरे से घर की तरफ चल पड़े।
लेकिन आज रास्ता उन्हें रोज जैसा नहीं लग रहा था।