एपिसोड 2 खामोश दूरियाँ और बेनाम खटक
ज़ोया की गाड़ी जैसे-जैसे दरिया से दूर जा रही थी, उसे लग रहा था जैसे वह खुद का एक हिस्सा वहीं छोड़ आई है। वह अपनी मखमली सीट पर पीछे झुककर बैठ गई और आँखें मूंद लीं। उसे रह-रहकर अज़ीम का वह चेहरा याद आ रहा था—सादा, पर बेहद गहरा।
ज़ोया का घर: एक आलीशान कैद
बंगले में कदम रखते ही नौकरों की कतार और "जी मैम, हाँ मैम" का शोर शुरू हो गया। ज़ोया ने बिना किसी की तरफ देखे सीधा अपने कमरे का रुख किया। उसने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया और उस पुरानी पीतल की चाबी को अपनी मेज़ पर रख दिया।
रात के खाने पर उसके पिता, मिस्टर खन्ना, अपनी बड़ी डील्स और करोड़ों के मुनाफे का ज़िक्र कर रहे थे। ज़ोया सामने बैठी थी, चम्मच से प्लेट में रखे खाने को बस घुमा रही थी। उसके पिता की आवाज़ उसके कानों तक पहुँच तो रही थी, पर समझ नहीं आ रही थी। उसे याद आ रहा था अज़ीम का वह छोटा सा अनाज का कटोरा और वह सुकून, जो अज़ीम के चेहरे पर परिंदों को खिलाते वक्त था।
उसने मन ही मन सोचा— "मेरे पिता के पास इतनी दौलत है कि वह पूरा शहर खरीद लें, फिर भी उनकी आवाज़ में हमेशा एक तनाव रहता है। और वह लड़का... जिसके पास शायद कल के लिए पर्याप्त पैसे भी न हों, उसकी आवाज़ में वो ठहराव कहाँ से आया?" वह चाबी मेज़ पर रखी चमक रही थी, जैसे उसे चिढ़ा रही हो कि 'असली राज़' तो अभी बाकी है।
दरिया का किनारा: अज़ीम की तन्हाई
उधर, रात के सन्नाटे में दरिया की लहरों की आवाज़ और तेज़ हो गई थी। अज़ीम अपनी दुकान के बाहर लकड़ी के छोटे से बेंच पर बैठा था। उसने लालटेन की रोशनी में अपनी हिसाब वाली डायरी खोली। उसे आज की बिक्री का हिसाब लिखना था, पर कलम कागज़ पर चलते-चलते रुक गई।
उसने गौर किया कि जहाँ ज़ोया खड़ी थी, वहाँ उसकी सैंडल के निशान मिट्टी पर अब भी हल्के से उभरे हुए थे। अज़ीम ने एक ठंडी सांस ली। वह जानता था कि वह और ज़ोया दो अलग दुनिया के लोग हैं। वह 'आसमान' थी और वह 'ज़मीन'।
अज़ीम ने खुद से बुदबुदाया, "अज़ीम, तूने उसे वह चाबी लौटा तो दी, पर क्या तूने अपनी उलझन कम की या बढ़ा ली? उसकी आँखों में जो डर था, वह उस तिजोरी के लिए नहीं था... वह डर अपनी ही ज़िंदगी की सच्चाई से भागने का था।" अज़ीम को रह-रहकर यह 'खटक' हो रही थी कि उस चाबी का ज़ोया के पास होना उसे किसी बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। उसने दुकान के शटर को हाथ लगाया, पर उसका मन बार-बार उसी सड़क की तरफ देख रहा था जहाँ से ज़ोया की गाड़ी गुज़री थी।
आधी रात का सन्नाटा
रात के दो बज रहे थे। ज़ोया अपनी फाइल्स अधूरी छोड़कर बालकनी में आ गई। शहर सो चुका था, पर उसकी बेचैनी जाग रही थी। वहीं, अज़ीम भी अपनी चटाई पर लेटा छत को ताक रहा था।
दोनों के बीच मीलों का फासला था, दोनों अपने-अपने कामों में डूबे होने का दिखावा कर रहे थे, लेकिन एक 'अदृश्य धागा' उन दोनों को खींच रहा था। वह चाबी सिर्फ एक धातु का टुकड़ा नहीं थी, वह उन दोनों की तकदीर के टकराने का पहला संकेत थी।
ज़ोया ने तय किया कि वह इस चाबी का राज़ अज़ीम से पूछकर ही रहेगी। और अज़ीम जानता था कि कल सुबह जब वह दुकान खोलेगा, तो उसकी नज़रें ग्राहकों में नहीं, बल्कि उस पेस्टल पिंक रंग के सूट वाली लड़की की तलाश करेंगी।
एपिसोड 2 (नया मोड़): धुंधली याद और अचानक दस्तक
उस शाम के बाद, ज़ोया की ज़िंदगी फिर से अपनी उसी तेज़ रफ़्तार में लौट आई। फाइल्स, मीटिंग्स, बिजनेस ट्रिप्स और पिता की उम्मीदों का बोझ—इन सब के बीच वह दरिया का किनारा और अज़ीम का चेहरा धीरे-धीरे धुंधला होने लगा।
भूलने का सिलसिला...
कई हफ्ते बीत गए। ज़ोया अब उस चाबी को भी भूल चुकी थी, जो उसने अपनी दराज़ के सबसे पिछले हिस्से में डाल दी थी। उसे लगा कि वह बस एक इत्तेफाक था, एक कमज़ोर पल जब उसे किसी अजनबी में सुकून दिखा था। उसने खुद को समझा लिया कि उसके जैसी लड़की और उस दुकानदार के बीच कोई मेल नहीं हो सकता। वह अपनी 'परफेक्ट' और महंगी दुनिया में वापस रम गई।
अज़ीम का इंतज़ार और ठहराव...
दूसरी तरफ, दरिया के किनारे अज़ीम ने पहले कुछ दिन तो हर गाड़ी की आहट पर सिर उठाकर देखा, पर फिर उसने भी एक ठंडी सांस लेकर अपनी उम्मीदों को समेट लिया। उसने सोचा— "शायद वह कोई परी थी जो रास्ता भटक कर यहाँ आ गई थी, और अब अपने आसमान में वापस लौट गई है।" अज़ीम ने फिर से अपनी सादगी भरी ज़िंदगी अपना ली, पर उसके दिल के किसी कोने में वह 'खटक' अब भी एक शांत टीस की तरह बाकी थी।
याद का अचानक लौट आना...
एक दिन ज़ोया अपने घर के पुराने कागज़ात ढूँढ रही थी। अलमारी की सफाई करते वक्त उसका हाथ उस पुरानी दराज़ के कोने में पड़ी चीज़ से टकराया। उसने बाहर निकाला तो देखा—वही पुरानी पीतल की चाबी।
जैसे ही उसकी उंगलियों ने उस ठंडी धातु को छुआ, उसके ज़हन में बिजली की तरह वो शाम कौंध गई। उसे याद आया अज़ीम का वो चेहरा, वो नीली कमीज़, वो परिंदे और उसकी कही वो बात— "कुछ चाबियाँ तकदीर के बंद दरवाज़े खोल देती हैं।"
ज़ोया का दिल ज़ोर से धड़का। उसे अपनी 'भूल' पर एक अजीब सी शर्मिंदगी महसूस हुई। उसे याद आया कि उसने वादा किया था कि वह पैसे देने आएगी, पर वह तो अपनी रईसी के गुरूर में सब भूल बैठी।
वापसी का रास्ता...
तभी बाहर तेज़ बारिश शुरू हो गई। ज़ोया ने खिड़की से बाहर देखा और उसे ख्याल आया— "इस बारिश में उस दरिया का क्या हाल होगा? और वह दुकान... क्या वह लड़का अब भी वहीं बैठा परिंदों का इंतज़ार कर रहा होगा?"
बिना कुछ सोचे, ज़ोया ने वह चाबी उठाई और अपनी कार की तरफ भागी। आज वह 'भूल' को सुधारने नहीं, बल्कि उस 'सुकून' को फिर से तलाशने जा रही थी जिसे उसने अनजाने में खो दिया था।
अधूरा वादा और शर्मिंदगी
ज़ोया दुकान के करीब पहुँची, तो उसकी धड़कनें तेज़ थीं। जैसे ही अज़ीम ने उसे देखा, उसकी आँखों में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक सादगी भरी पहचान थी।
ज़ोया ने बिना कोई भूमिका बनाए अपने पर्स से कुछ नोट निकाले और कांपते हाथों से अज़ीम की तरफ बढ़ा दिए।
ज़ोया: "ये... ये पिछले हफ़्ते के पैसे हैं। मैंने वादा किया था कि मैं अगले दिन आऊँगी, पर मैं..."
वह रुक गई। उसे अपनी महँगी गाड़ी और अपने रुतबे के सामने अपनी यह 'भूल' बहुत छोटी और शर्मनाक लगी।
ज़ोया: "मुझे माफ़ कर देना अज़ीम। मैं अपनी मसरूफ़ियत में भूल गई थी कि किसी का उधार मुझ पर बाकी है।"
अज़ीम ने उन पैसों की तरफ देखा, फिर ज़ोया की तरफ। उसने बहुत ही शालीनता से पैसे पकड़ लिए, जैसे वह कोई बहुत बड़ी रकम नहीं, बल्कि ज़ोया का खोया हुआ 'वकार' (self-respect) उसे वापस लौटा रहा हो।
अज़ीम: "शुक्रिया साहिबा। वैसे उधार पैसों का नहीं था, उधार तो उस वादे का था जो आपने उस शाम किया था। पैसे तो आज नहीं तो कल मिल ही जाते, पर अच्छा हुआ कि आपकी याददाश्त ने वक़्त पर साथ दे दिया।"
अज़ीम के इन सीधे शब्दों ने ज़ोया को अंदर तक हिला दिया। उसे एहसास हुआ कि अज़ीम के लिए उन चंद रुपयों की उतनी अहमियत नहीं थी, जितनी ज़ोया के 'लौट आने' की थी।
ज़ोया: "तुम्हें बुरा नहीं लगा? कि मैं इतना लेट आई?"
अज़ीम: (एक छोटा सा सिक्का गल्ले में डालते हुए) "बुरा तो तब लगता साहिबा जब आप आती ही नहीं। अब जब आ गई हैं, तो हिसाब बराबर हुआ।"