Prem n Haat Bikaay - 25 in Hindi Love Stories by DrPranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 25

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 25

25--

    यदि विवेक शहर में होते तब  शाम के समय चाय पीने शीनोदा रोज़ाना आ ही जाता | विवेक अँग्रेज़ी बोलते-बोलते हिन्दी में बात करने लगते और शीनोदा हिन्दी में बोलता हुआ अँग्रेज़ी में !  जब यह बात पकड़ में आती तब खूब ठठाकर हँस पड़ते सब |बहुत अच्छी हिन्दी बोलने लगा था शीनोदा ! बस, थोड़े उच्चारण में स्वाभाविक बदलाव होता | बात समझने में कोई परेशान नहीं होती थी, कोई ‘कम्युनिकेशन गैप’ नहीं था | विवेक को उसके साथ खूब आनंद आने लगा था |इन दोनों के पीछे शीनोदा और बच्चों ने एक-दूसरे को भाषा का खूब ज्ञान दिया था |  

"एक गर्ल-फ्रेंड चाहिए ----" एक दिन चाय पीते-पीते अचानक बोला शीनोदा | 

       अनामिका का चाय का प्याला हाथ में ही पकड़ा रह गया | क्या बोल रहा है भाई, वो भी विवेक के सामने !और गर्ल फ्रेंड कोई चीज़ है क्या जो बाज़ार से खरीद लाएगा ?

"तो ढूँढ लो ----" विवेक ने मुस्कुराकर कहा | 

"नो--नो --मई कहाँ से ढूंढेगा ----" कहकर वह शरमाकर लाल हो आया | 

"तो गर्ल फ्रेंड कौन ढूंढेगा ?तुम्हारी पसंद तो तुम्हारी है न ---?" अनामिका ने हँसकर उसीसे पूछा |

"मैं जौइंट फैमिली में रहना चाहता हूँ --आपके जैसे---आप अपने जैसी लड़की ढूँढ दीजिए| "

     उसने विवेक की ओर देखकर कहा और एक सम्मिलित ठहाका वातावरण में गूँज गया |

उसे कुछ समझ में नहीं आया कि आख़िर सब उसकी बात पर क्यों हँसे? उन दिनों विवेक की सबसे बड़ी बहन व उनके पति आए हुए थे, जीजाजी की शरारती आँखों ने विवेक की ओर कटाक्ष करने शुरू कर दिए | 

     शीनोदा देखता था इस परिवार में विवेक के भाई-बहन आते रहते थे जो कई-कई दिनों तक रहते थे | दरसल, विवेक एक बड़े परिवार के थे और उनके भाई-बहन अधिकतर उम्रदराज़ थे इसलिए वो जब भी उत्तर-प्रदेश से आते महीने-बीस दिन तो रुकते ही थे | शीनोदा को बड़ा मज़ा आता, वह लगभग सभी से परिचित होता जा रहा था, अपनी सरलता व सहज मिश्रित भाषा बोलकर उसने सबके दिल में घर बना लिया था|

     पिछले दिनों जब विवेक की बड़ी बहन व जीजाजी आए थे, उनसे वह इतना घुलमिल गया था कि शाम के समय वे चाय पर उसकी प्रतीक्षा करते रहते और उसके आने पर कच्चे-पक्के ठहाकों की लंबी महफ़िल  जमती | 

       विवेक के बड़े जीजाजी रिटायर्ड कलेक्टर थे, खूब हँसोड़ प्रकृति का व्यक्तित्व था उनका हर बात में खूब ठठाकर हँसते, अपने कार्य-क्षेत्र से जुड़ी कहानियाँ सुनाकर वे खुद भी हँसते और सबको खूब हँसाते | 

    समय की बात है जब जीजा जी अपनी किसी कुलीग की कहानी सुना रहे थे तभी शीनोदा को गर्ल-फ्रेंड की याद हो आई और सबके सामने उसने अपने दिल की बात कह डाली, वो भी विवेक को देखकर|

“भई, विक्कू बाबू आपमें कबसे लड़कियों के गुण पैदा होने लगे ?”उन्होंने विवेक को निशाना बनाया |

“मई –आना के जैसा बोला ---आप भी किया बोलते हैं ----” शीनोदा खिसिया गया | लेकिन विवेक अपने जीजाजी का स्वभाव जानता ही था, वो मुस्कुराते रहे फिर बोले ;

"इनके जैसी ---ह-ह-ह ---" विवेक ने अपना मुँह खोलकर अपनी आफ़त मोल ले ली | 

'इसमें ह --ह--क्या हुई ---?"अनामिका का मुँह फूल गया---"

"शी इज़ सो गुड --कितना अच्छी, कितना अँडर्स्टेंडिंग ---मुझको आपके जैसी दोस्त चाहिए"

"अभी देखा नहीं, विवेक कैसे हँसे ?मतलब --मैं अच्छी नहीं हूँ ----"उसने विवेक की ओर से चेहरा घुमा लिया|

"अरे ! वो आपको मज़ाक करते हैं ---आप जानते हैं न  ! ---"शीनोदा बड़े प्यार और सहजता  से मुस्कुराया और उधर जीजा जी ने ठहाका लगाया ;

“लो, विक्की बाबू, मुहर लग गई हमारी आना की अच्छाई पर ----सही तो है, हमारे यहाँ की बेस्ट बहू है आना हमारी -----”अनामिका को अपने ससुराल के पारिवारिक सदस्यों का सदा ही साथ व प्रशंसा मिली थी |पाँच भाईयों की पत्नियों  में से उसे हर चीज़ में  सबसे अधिक नंबर मिलते थे पूरे परिवार के सदस्यों से ! 

“हाँ, जी तो मैंने कब आना की बुराई की है ---जीजा जी, आप नारद मुनि का रोल प्ले करने के मूड में हैं ?”विवेक हँसने लगे | 

“यार! साले साहब, तारीफ़ किया करिए ---हमारी आना है ही काबिलेतारीफ़ ----”फिर शीनोदा की ओर मुखातिब होकर बोले ;

“शीनोदा!यू नो शी इस मैरीड टू विवेक एंड शी इज़ द ओनली गर्ल चाइल्ड टू हर पेरेंट्स”  

“मुजको मालूम है न –आइ डोंत मीन ---” बेचारा सीधा-सादा लड़का खिसिया सा गया |

     भाषा के कारण शीनोदा की समझ में बातें ज़रा देर से ही आतीं थीं, जिसमें विशेष रूप से मज़ाक !कुछ बातों के लिए तो उसे इधर-उधर चेहरा घुमाकर सबके चेहरे पढ़ने पड़ते थे |उसे कहीं न कहीं यह भी भय रहता था कि कहीं वह कोई गलत बात न बोल बैठे | 

      जीजा जी उसकी परेशानी समझते थे, उन्होंने शीनोदा को अँग्रेज़ी में समझाया कि विवेक आना को चिढ़ा रहे हैं ---और शीनोदा ज़ोर से हँस पड़ा | 

“ये तो सब जगहे होता है न, पति-पत्नी के बीच में ! हमारे जापान में भी तो एक-दूसरे को चिड़ाते हैं न, दिस रिलेशनशिप इज़ लाइक दिस ओनली ----” अब तक वह जीजाजी के साथ भी बहुत कंफर्टेबल हो गया था |  

“पर, तुम तो यार गर्ल-फ्रेंड की खोज में हो ----” जीजाजी ने शीनोदा से चुटकी ली|

“पहले डेटिंग तो  करनी पड़ती है न, समजना पड़ता है एक-दूसरे को | अगर पार्टनर हमारे विचार का न हो तो मुश्किल होगा न ?”उसने बड़ी सहजता से अपनी बात खोलकर बताई | जीजा जी मुस्कुराए ;

“बेटा ! यह भारत है ----” और फिर अपनी आदत के अनुसार ठठाकर हँस पड़े| 

     इस बार बड़े जीजा जी व बीबी (विवेक की सबसे बड़ी बहन को सब बीबी कहते थे )

लगभग एक माह अहमदाबाद में रहे और लगभग रोज़ ही शीनोदा शाम का समय सबके साथ व्यतीत करता रहा | 

     एक दिन शीनोदा के साथ एक अजनबी, गुमसुम सा चेहरा था |

“वी आर टुगेदर ! हम, रूम-मेट्स हैं --ही इज़ अनिल, अनिल  ---फ़्रौम कोटा, राजस्थान| ”

शीनोदा ने अनिल का परिचय कराया, उसने धीरे से हाथ जोड़कर नमस्ते की और चुप्पी ओढ़े बैठा रहा | शायद वह वातावरण व लोगों को समझने की कोशिश कर रहा था|उस दिन तो वह बहुत चुप था बाद में कई बार शीनोदा के साथ आने पर वह कुछ खुलने सा लगा | 

      कुछ समय बाद उसने अपने व अपने परिवार के  बारे में बताया लेकिन मूल रूप से वह चुप प्रकृति का लड़का था | अनामिका इतनी बोलने वाली, चुप्पी कैसे  बर्दाश्त हो? वह कोशिश करती रही और आख़िर अनिल को मुँह खोलना ही पड़ा|अब वह भी शाम के समय शीनोदा के साथ अक्सर अनामिका के घर पर आ जाता |अनामिका के शोध-प्रबंध के जमा करने के दिन थे, वह इन चुहलबाज़ियों में अधिक समय न दे पाती किन्तु ये बैठकें यूँ ही गुलेगुलज़ार रहतीं |    

       शीनोदा को किसी काम के लिए गोआ जाना पड़ा, उसके अहमदाबाद में न रहने से अनिल का आना भी बंद हो गया|वैसे भी वह उसके साथ ही आता था | चुप्पी लगाए, होठों को सिलकर बैठा रहता | पता नहीं क्यों आना को बड़ी बेचैनी होती, ये क्या बात हुई भला ---चार लोग एकसाथ बैठकर चुप्पी ओढ़े बैठे रहें !इससे तो आदमी अकेला ही न बैठे ! क्या ज़रूरत है हर शाम सबसे मिलने की ?जीजा जी और वह जब मिलते तो ठहाकों की एक नई दुनिया बस जाती और सब खिलखिलाते रहते |खिलखिलाता घर जीवंत लगता !

    इस चुप से बंदे को बुलवाना तो पड़ेगा ही, मुँह पर टेप चिपकाए बैठा रहता है| भला हो उसका, आना दीदी तो मुँह में  हाथ डालकर बुलवाना जानती हैं, अभी बेचारा समझा कहाँ है उसे !

        इस बीच जीजाजी और बीबी वापिस अपने घर लौट गए |शीनोदा गोवा में ही था जब अनामिका ने अपना शोध-प्रबंध प्रस्तुत कर दिया था | शीनोदा का गोआ से अनामिका को बधाई देने के लिए फ़ोन आ गया था | 

एक दिन एक और अजनबी सा फ़ोन आया ;

“दीदी ! काँग्रेचुलेशन्स ----”

“कौन ?” अनामिका आवाज़ नहीं पहचान पा रही थी | 

“अनिल दीदी, अनिल—एस.पी.आई  ----”उसकी आवाज़ में भी एक चुप्पी सी जैसे पसर रही थी |कुछ पलों बाद आना को याद आया कि वह कौन है?कमाल है यार ! सामने तो चुप्पी है ही, फ़ोन

“ओहो ! अनिल ---तुम तो शीनोदा के गोआ जाते ही गायब हो गए ! कहाँ हो ?”

“आऊँगा दीदी ! शीनोदा आ रहा है न होली पर दो दिन के लिए ---”उसके मुँह से निकल तो गया लेकिन अनामिका ने महसूस कर लिया कि उसने एकदम चुप्पी ओढ़ ली थी | ज़रूर शीनोदा ने उसे बताने के लिए  मना किया होगा | लेकिन वह चुप रही|

“ओ.के --- –” अनामिका के चेहरे पर मुस्कान फैल गई| 

“इस बंदे को बोलना सिखाना पड़ेगा ---”फ़ोन रखते हुए आना के मुँह से निकल ही तो गया | 

“अनिल था ?”विवेक भी समझ गए थे किसके बारे में बोल रही है उनकी पत्नी !

वे भी मुस्कुरा दिए |