मुंबई की रात बाहर से जितनी चमकदार दिखती है, भीतर से उतनी ही बेरहम होती है.
ट्रस्ट की इमारत से निकलते समय तारा ने पीछे मुडकर नहीं देखा.
आकृति मेहता अब भी वही थी—
थकी हुई, साधारण, काम से लौटी एक लडकी.
लेकिन जैसे ही उसने टैक्सी बदली,
फोन स्विच ऑफ किया
और एक तंग गली में उतरकर पैदल चलने लगी—
वह आकृति नहीं रही.
अब वह तारा थी.
उसका सीक्रेट बेस शहर के उस हिस्से में था
जहाँ कोई बिना वजह नहीं जाता.
एक पुरानी, बंद पडी मिल.
सरकारी रिकॉर्ड में वह इमारत सालों पहले असुरक्षित घोषित हो चुकी थी.
बाहर से जर्जर दीवारें, टूटी खिडकियाँ.
अंदर—
टेक्नोलॉजी, निगरानी और खामोशी.
तारा ने एक खास पैटर्न में दीवार पर हाथ रखा.
हल्की सी आवाज के साथ दरवाजा खुला.
अंदर घुसते ही लाइट्स ऑन हो गईं.
यह उसका दूसरा घर था.
और शायद.
आखिरी भी.
कमरे के बीचोंबीच एक बडी डिजिटल स्क्रीन लगी थी.
उसके सामने तीन लोग बैठे थे.
इंस्पेक्टर कबीर राणा—
रणविजय मेहता का सबसे भरोसेमंद अफसर.
डेटा एनालिस्ट सिया—
जिसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर चलती थीं
तो दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी सामने आ जाती थी.
और फील्ड सपोर्ट ऑफिसर अर्जुन—
जिसकी मौजूदगी का मतलब होता था
कि हालात कभी भी बिगड सकते हैं.
तारा ने जैकेट उतारी,
कुर्सी खींची
और सीधे मुद्दे पर आई.
सहयोग फाउंडेशन सिर्फ एनजीओ नहीं है,
उसकी आवाज में थकान थी, लेकिन हिचक नहीं.
ये एक कवर है।
कबीर ने सिर हिलाया.
हमें अंदाजा था. अब तक क्या मिला?
तारा ने स्क्रीन पर फाइलें खोल दीं.
डोनेशन पैटर्न फर्जी है.
हर महीने बडी रकम आती है—
लेकिन प्रोजेक्ट्स जमीन पर नहीं दिखते।
सिया तुरंत डेटा स्कैन करने लगी.
ये शेल कंपनियाँ हैं,
उसने कहा,
सब एक ही नेटवर्क से जुडी हैं।
तारा ने अगली स्लाइड खोली.
और ये नाम—
R. S. Group।
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया.
कबीर ने गहरी सांस ली.
रुद्राक्ष शेखावत।
हाँ,
तारा बोली,
वह सीधे सामने नहीं आता.
लेकिन पैसा उसी का है।
अर्जुन ने कुर्सी से आगे झुकते हुए कहा,
मतलब एनजीओ उसकी लॉन्ड्री है।
सिर्फ लॉन्ड्री नहीं,
तारा ने जवाब दिया,
यह उसका शील्ड है.
कोई भी सीधे हाथ नहीं डाल सकता।
तारा ने सबको एक- एक करके देखा.
ट्रस्ट में हर महीने एक क्लोज्ड Meeting होती है.
कुछ लोग आते हैं.
कुछ फाइलें बाहर जाती हैं.
और मैं उसमें शामिल नहीं हूँ।
कबीर ने भौंहें सिकोड लीं.
मतलब अंदर एक और लेयर है।
और वहीं से हम उसे पकड सकते हैं,
तारा बोली.
अगले कुछ घंटों तक बेस में सिर्फ काम हुआ.
सिया ने ट्रस्ट के पिछले पाँच साल के फंड्स खंगाल डाले.
अर्जुन ने दानदाताओं के नामों को अंडरवर्ल्ड नेटवर्क से जोडा.
कबीर ने पुराने केस फाइल्स निकालीं.
धीरे- धीरे तस्वीर साफ होने लगी.
सहयोग फाउंडेशन सिर्फ पैसा सफेद नहीं कर रहा था—
वह अंडरवर्ल्ड के लिए
नई भर्ती,
सूचना आदान- प्रदान
और सुरक्षित Meeting पॉइंट भी था.
तारा ने स्क्रीन पर एक खास एरिया दिखाया.
यहाँ,
उसने कहा,
हर बार जब कोई बडा लेनदेन होता है,
उसके तीन दिन बाद
किसी न किसी पुलिस ऑपरेशन की जानकारी लीक होती है।
कबीर का चेहरा सख्त हो गया.
मतलब सिस्टम के अंदर से भी सपोर्ट है।
तारा ने सिर झुका लिया.
पापा पर हमला.
इसी वजह से हुआ था।
कमरे में किसी ने कुछ नहीं कहा.
सिर्फ स्क्रीन की हल्की आवाज गूंजती रही.
अब अगला कदम क्या है?
अर्जुन ने पूछा.
तारा ने जवाब देने से पहले कुछ सेकंड सोचा.
हमें ट्रस्ट के भीतर और गहराई से जाना होगा,
उसने कहा.
मुझे उनकी भरोसेमंद बनना होगा।
कबीर ने तुरंत कहा,
खतरा बढेगा।
मैं जानती हूँ,
तारा की आवाज शांत थी.
लेकिन यही रास्ता है।
सिया ने एक फाइल आगे बढाई.
हम एनजीओ के कुछ प्रोजेक्ट्स की ऑन- ग्राउंड जांच करेंगे.
अगर फर्जी निकले—
तो हमारे पास ठोस सबूत होगा।
तारा ने स्क्रीन बंद की.
और मैं अंदर से सब कुछ देखूँगी,
उसने कहा.
हर मीटिंग, हर चेहरा, हर इशारा।
बेस से निकलते समय
तारा कुछ देर के लिए रुकी.
दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर के सामने.
रणविजय मेहता—
वर्दी में, सीधा खडा,
आँखों में वही पुरानी सख्ती.
तारा ने मन ही मन कहा—
मैं आपको इंसाफ दिलाकर रहूँगी.
बाहर निकलते ही
उसने फिर से अपना मासूम चेहरा ओढ लिया.
आकृति मेहता
अब फिर से मुंबई की सडकों पर थी.
लेकिन अब Mission साफ था.
दुश्मन सामने था.
और खेल शुरू हो चुका था.
सहयोग फाउंडेशन की गहराई में
एक ऐसा सच छुपा था
जो पूरे अंडरवर्ल्ड को हिला सकता था.
और तारा.
उसी सच की ओर बढ रही थी.
सहयोग फाउंडेशन में काम करते हुए तारा को एक हफ्ता हो चुका था.
बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता था—रोज की भागदौड, फाइलें, कॉल्स, बच्चों की क्लासेस, महिलाओं के Training सेशन. लेकिन इस सामान्यता के नीचे एक अजीब सा सन्नाटा था, जैसे कोई चीज जानबूझकर छुपाई जा रही हो.
तारा ने खुद को उस सन्नाटे का हिस्सा बना लिया था.
वह समय पर आती, समय पर जाती.
किसी से ज्यादा सवाल नहीं करती.
किसी बहस में नहीं पडती.
लेकिन वह देखती सब कुछ थी.
कौन किससे धीरे बात करता है.
कौन सी फाइल Kiss अलमारी में जाती है.
और कौन से लोग सिर्फ महीने में एक बार आते हैं—बिना रजिस्टर Sign किए.
उस दिन भी सब कुछ वैसा ही था.
दोपहर का समय था. दफ्तर में हलचल कम थी.
तारा फाइलें सॉर्ट कर रही थी, तभी मीरा देसाई का पर्सनल असिस्टेंट उसके पास आया.
आकृति, मैडम ने आपको बुलाया है।
तारा के हाथ एक पल के लिए रुक गए.
उसने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया.
अभी?
उसने सामान्य स्वर में पूछा.
हाँ।
बस एक शब्द.
लेकिन उसी शब्द ने उसके भीतर अलार्म बजा दिया.
मीरा देसाई का केबिन ट्रस्ट के बाकी हिस्सों से अलग था.
काँच की दीवारें, लेकिन परदे हमेशा गिरे रहते थे.
अंदर घुसते ही हल्की सी इत्र की खुशबू आती थी—साफ- सुथरी, लेकिन भारी.
मीरा अपनी कुर्सी पर बैठी थी.
टेबल पर एक फाइल रखी थी, बंद.
बैठो, आकृति।
उसकी आवाज शांत थी, लेकिन आँखें तेज.
तारा बैठ गई.
मीरा ने कुछ सेकंड उसे देखा.
जैसे किसी किताब का कवर नहीं, अंदर का पन्ना पढने की कोशिश कर रही हो.
तुम्हारा काम अच्छा है,
मीरा ने कहा.
तुम ज्यादा बोलती नहीं हो. ये बात मुझे पसंद है।
मैं अपना काम करने आई हूँ, मैडम।
तारा ने जवाब दिया.
मीरा के होंठों पर हल्की मुस्कान आई.
कभी- कभी काम.
कागजों से आगे भी होता है।
उसने फाइल को टेबल पर सरकाया.
आज शाम एक Meeting है,
मीरा बोली.
कुछ खास लोगों की।
तारा ने फाइल की ओर देखा, लेकिन खोली नहीं.
और.
उसने पूछा.
मीरा आगे झुकी.
आज से तुम भी उसका हिस्सा हो।
वही पल था.
जिसका इंतजार तारा कर रही थी.
और जिससे वह डर भी रही थी.
क्यों मैं?
तारा ने पूछा.
मीरा ने जवाब देने से पहले थोडी देर ली.
क्योंकि जो सुनता है, कम बोलता है.
वह ज्यादा भरोसेमंद होता है।
शाम होते- होते ट्रस्ट का माहौल बदल गया.
जो स्टाफ आमतौर पर छह बजे निकल जाता था,
आज रोका गया.
कुछ लोग भेज दिए गए.
कुछ दरवाजे बंद कर दिए गए.
तारा को तीसरी मंजिल पर बुलाया गया—
वह मंजिल जहाँ आम कर्मचारियों का आना मना था.
लिफ्ट नहीं चली.
सीढियों से जाना पडा.
सीढियाँ संकरी थीं.
कैमरे नहीं थे.
यह जगह जानबूझकर छुपाई गई थी.
कमरे के बाहर दो आदमी खडे थे.
साधारण कपडे, लेकिन चाल- ढाल से साफ था—बॉडीगार्ड.
मीरा ने दरवाजा खोला.
अंदर एक लंबा टेबल था.
टेबल के चारों ओर छह लोग बैठे थे.
सब अलग- अलग दुनिया के लगते थे.
लेकिन एक बात समान थी—
उनकी आँखों में इंसान नहीं, सिर्फ फायदे की गिनती थी.
तारा सबसे आखिर में बैठी.
किसी ने उसका नाम नहीं पूछा.
किसी ने परिचय नहीं दिया.
जैसे उसका होना पहले से तय था.
Meeting शुरू हुई.
बात बच्चों या समाज सेवा की नहीं थी.
बात नंबरों की थी.
रूट्स की थी.
टाइमिंग की थी.
एक आदमी बोला,
अगला ट्रांसफर इसी ट्रस्ट के नाम से होगा।
दूसरा बोला,
पुलिस मूवमेंट की जानकारी पहले चाहिए।
तीसरे ने कहा,
पिछली बार की तरह कोई गलती नहीं होनी चाहिए।
तारा शांत बैठी रही.
हर शब्द उसके दिमाग में दर्ज होता गया.
और तभी एक आवाज आई—
शांत, भारी, नियंत्रित.
नई लडकी कौन है?
कमरा अचानक चुप हो गया.
तारा ने सिर नहीं उठाया.
लेकिन उसे पता था—
यह सवाल उसी के लिए है.
मीरा बोली,
आकृति मेहता.
हमारी नई स्टाफ.
भरोसेमंद है।
कुछ सेकंड की खामोशी.
फिर वही आवाज—
भरोसा समय से बनता है।
तारा ने पहली बार सिर उठाया.
वह आदमी कोने में बैठा था.
चेहरे पर कोई भाव नहीं.
लेकिन आँखें.
वह सब देख रही थीं.
रुद्राक्ष शेखावत.
Meeting खत्म हुई.
लोग एक- एक करके बाहर गए.
कोई जल्दी में था.
कोई इत्मीनान से.
तारा सबसे आखिर में उठी.
जैसे ही वह दरवाजे तक पहुँची,
रुद्राक्ष की आवाज फिर आई.
आकृति।
एक शब्द.
लेकिन उसके भीतर बिजली सी दौड गई.
वह रुकी.
मुडी.
हाँ, सर?
रुद्राक्ष ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा.
इस जगह पर सच ज्यादा दिन नहीं टिकता,
उसने कहा.
जो टिकते हैं.
वो या तो बहुत ईमानदार होते हैं,
या बहुत चालाक।
तारा ने उसकी आँखों में देखा.
बिना झिझक.
मैं सिर्फ अपना काम करती हूँ।
रुद्राक्ष के होंठों पर हल्की मुस्कान आई.
देखेंगे।
उस रात जब तारा बेस पहुँची,
उसने बिना समय गँवाए टीम को सब कुछ बताया.
मीटिंग असली थी,
उसने कहा.
और अब मैं उनके घेरे में हूँ।
कबीर ने गहरी सांस ली.
अब से हर कदम सोच- समझकर।
तारा ने सिर हिलाया.
वह जानती थी—
अब खेल बदल चुका है.
अब वह सिर्फ बाहर से नहीं देख रही थी.
वह अंदर पहुँच चुकी थी.
और अंदर.
गलती की कोई जगह नहीं होती.
सहयोग फाउंडेशन का असली चेहरा
अब उसके सामने था.
और यह सिर्फ शुरुआत थी.