इंतजार सबसे खतरनाक हथियार होता है.
और यह बात तारा जानती थी.
उसने खुद को शांत रखा. अगर डर दिखा, तो वह हार जाएगी.
करीब पंद्रह मिनट बाद दरवाजा खुला.
मीरा देसाई अंदर आई.
आज के बाद, उसने कहा, तुम सीधे मेरे लिए काम करोगी।
यह प्रमोशन नहीं था.
यह निगरानी थी.
तारा ने सिर हिलाया. ठीक है।
मीरा बाहर चली गई.
तारा ने धीरे से सांस ली.
उसे नहीं पता था कि इस वक्त नीचे, उसी इमारत के बाहर, कबीर खडा है. सादे कपडों में, बिना पहचान के, लेकिन पूरी तैयारी के साथ.
अगर ऊपर कुछ भी गलत होता.
तो वह अंदर घुसने वाला था.
चाहे कीमत कुछ भी हो.
मीरा देसाई के केबिन से निकलते समय तारा को साफ समझ आ गया था कि अब यह सिर्फ निगरानी नहीं रही. अब यह चयन था. सहयोग फाउंडेशन में कई लोग काम करते थे, लेकिन हर कोई उस दायरे में नहीं जाता था जहाँ से वापस लौटने का रास्ता नहीं होता. मीरा का“ सीधे मेरे लिए काम करोगी” कहना उसी दायरे का संकेत था.
अगले तीन दिन तारा के लिए असामान्य रूप से शांत रहे. कोई क्लोज्ड Meeting नहीं, कोई अचानक बुलावा नहीं, कोई सीधा सवाल नहीं. लेकिन यही शांति सबसे ज्यादा परेशान करने वाली थी. वह जानती थी कि उसे देखा जा रहा है. कौन उससे बात करता है, किससे वह बात करती है, वह Kiss समय कहाँ जाती है—सब कुछ नोट किया जा रहा था.
बेस में कबीर को भी यही चिंता खाए जा रही थी. सिया लगातार ट्रस्ट के इंटरनल नेटवर्क को मॉनिटर कर रही थी, लेकिन कोई साफ मूवमेंट नहीं दिख रही थी. यह क्लीनअप से पहले का साइलेंस था.
चौथे दिन दोपहर में तारा को मीरा का Call आया. कोई भूमिका नहीं, कोई औपचारिकता नहीं.
आज शाम मेरे साथ चलना है, मीरा ने कहा.
कहाँ? तारा ने पूछा.
वो तुम्हें रास्ते में पता चलेगा।
फोन cut गया.
तारा ने उसी पल बेस को एक छोटा सा कोड मैसेज भेजा. सिर्फ एक लाइन.
टेस्ट शुरू हो रहा है।
कबीर ने मैसेज पढते ही कुर्सी से उठकर जैकेट उठा ली. उसे पता था कि अब सब कुछ तारा के दिमाग और संयम पर टिका है.
शाम को मीरा की गाडी ट्रस्ट के पीछे वाले गेट से निकली. ड्राइवर बदला हुआ था. रास्ता भी बदला हुआ. यह कोई आम विजिट नहीं थी.
गाडी मुंबई के उस हिस्से में जा रही थी जहाँ चमक धीरे- धीरे खत्म हो जाती है और साये गाढे होने लगते हैं. तारा खिडकी से बाहर देख रही थी, लेकिन दिमाग पूरी तरह अंदर काम कर रहा था. हर मोड, हर ब्रिज, हर सिग्नल वह याद रख रही थी.
करीब चालीस मिनट बाद गाडी एक पुराने गोदाम के सामने रुकी. बाहर से यह जगह बंद लगती थी, लेकिन अंदर हलचल साफ दिख रही थी.
मीरा ने उतरते हुए कहा, अब ध्यान से देखना और सुनना. सवाल बाद में पूछना।
अंदर का माहौल ट्रस्ट से बिल्कुल अलग था. यहाँ कोई समाजसेवी पोस्टर नहीं थे. कोई बच्चों की तस्वीरें नहीं थीं. यहाँ सिर्फ लकडी के क्रेट्स, कंप्यूटर स्क्रीन और हथियारबंद लोग थे.
तारा समझ गई. यही वह जगह थी जहाँ ट्रस्ट का असली चेहरा काम करता था.
एक आदमी उनके पास आया. सब तैयार है।
मीरा ने सिर हिलाया और तारा की तरफ देखा. आज तुम्हें साबित करना है कि तुम भरोसे के काबिल हो।
कैसे? तारा ने पूछा.
मीरा ने बिना भाव बदले जवाब दिया, एक डिलीवरी है. गलत जगह नहीं जानी चाहिए।
डिलीवरी का मतलब तारा समझ गई थी. यह पैसा नहीं था. यह लोग भी नहीं थे. यह जानकारी थी. ऐसी जानकारी, जिसके गलत हाथों में जाने का मतलब किसी की मौत हो सकता था.
तारा को एक पेन ड्राइव दी गई और एक पता. कोई गाडी नहीं, कोई सुरक्षा नहीं. अकेले जाना था.
अगर पकडी गई तो? तारा ने पूछा.
मीरा ने सीधा जवाब दिया, तो तुम हमें कभी जानती ही नहीं थीं।
यही फाइनल टेस्ट था.
रास्ते में तारा ने कोई Call नहीं किया. कोई गलती नहीं की. लेकिन उसके दिमाग में कबीर की आवाज गूंज रही थी—“ खुद को मत भूलना।
वह तय पते पर पहुँची. एक रिहायशी बिल्डिंग. ऊपर की मंजिल. दरवाजा पहले से खुला था.
अंदर एक आदमी बैठा था. चेहरा साधारण, लेकिन आँखें बेहद सतर्क.
मीरा देसाई ने भेजा है, तारा ने कहा.
आदमी ने हाथ आगे बढाया. ड्राइव।
तारा ने पेन ड्राइव उसकी हथेली पर रख दी. उस पल उसे लगा कि वह एक रेखा पार कर रही है. एक ऐसी रेखा, जिसके बाद लौटना मुश्किल होता है.
आदमी ने ड्राइव लैपटॉप में लगाई, कुछ सेकंड देखा और सिर हिलाया. ठीक है।
तारा उठी और बिना पीछे देखे बाहर निकल गई.
लेकिन बाहर निकलते ही उसे अहसास हुआ कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है.
गली के दूसरे सिरे पर दो लोग खडे थे. उन्होंने रास्ता रोक लिया.
कहाँ जा रही हो? एक ने पूछा.
तारा समझ गई. यह टेस्ट का दूसरा हिस्सा था. रिएक्शन.
उसने डर नहीं दिखाया. काम हो गया है।
और अगर हम कहें कि वापस चलो?
तारा ने जेब से फोन निकाला और मीरा का नंबर दिखाया. तो उससे बात कर लो।
दोनों ने एक- दूसरे को देखा और रास्ता छोड दिया.
तारा शांत चाल से आगे बढ गई, लेकिन उसके भीतर एड्रेनालिन तेजी से दौड रहा था.
उसी समय बेस में सिया ने स्क्रीन पर कुछ देखा. कबीर, तारा की लोकेशन पर अनऑथराइज्ड मूवमेंट है।
कबीर ने तुरंत जवाब दिया, नजर रखो. जब तक वह खुद सिग्नल न दे, हम नहीं बढेंगे।
यह सबसे मुश्किल फैसला था. इंतजार करना.
गोदाम लौटने पर मीरा और एक और शख्स तारा का इंतजार कर रहे थे. वह शख्स कोई और नहीं, रुद्राक्ष शेखावत था.
उसकी नजर तारा पर टिकी थी. इस बार ठंडी नहीं, जाँचती हुई.
काम हो गया? उसने पूछा.
हाँ, तारा ने कहा.
रुद्राक्ष कुछ सेकंड चुप रहा. फिर बोला, डर नहीं लगा?
लगा, तारा ने सच कहा. लेकिन काम ज्यादा जरूरी था।
रुद्राक्ष के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई. डर को काबू में रखना हर किसी के बस की बात नहीं।
उसने मीरा की तरफ देखा. इसे रहने दो. यह काम आएगी।
यही था फैसला.
रात को जब तारा बेस पहुँची तो कबीर वहीं खडा था. इस बार उसने कुछ नहीं पूछा. बस उसकी ओर देखा.
टेस्ट पास हो गया, तारा ने कहा.
कबीर ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में राहत साफ थी.
लेकिन अब, तारा ने आगे कहा, मैं और अंदर जा चुकी हूँ।
कबीर जानता था.
और यही बात उसे सबसे ज्यादा डराती थी.