Invisible Drink - 16 in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | अदृश्य पीया - 16

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अदृश्य पीया - 16

(दोपहर। हवेली के बाहर कुछ लोग काग़ज़ों पर साइन कर रहे हैं।
सुनीति और कौशिक पास खड़े हैं—अदृश्य।)

एक सेठ ने इस हवेली को गैरकानूनी तरीके से बेच दिया था।
उन्हें पता था… पर फर्क नहीं पड़ा।

सुनीति (शांत स्वर में) बोली - 
“अब ये घर भी हमारा नहीं रहा…”

कौशिक (मुस्कराकर) बोला - 
“हमारी बॉडी अब किसी जगह से एडजेस्ट होती ही नहीं।”

ना दीवारें उनकी थीं, ना छत… बस साथ अब भी उनका था।

(सुनीति खिड़की के पास खड़ी है।)

सुनीति बोली - 
“पर मैं देखना चाहती हूँ…कौन आएगा इस घर में।”

कौशिक बोला - 
“हाँ…शायद कोई कहानी फिर से शुरू हो।”

(कुछ दिन बाद। एक गाड़ी हवेली के सामने रुकती है। सामान उतारा जा रहा है।)

कई दिनों बाद इस हवेली ने इंसानी आवाज़ें सुनीं।

(एक मध्यम उम्र का आदमी उतरता है। साथ में उसकी पत्नी। पीछे दो बच्चे।)

ये थे राणा परिवार।

राणा जी (घर को देखते हुए) बोला - 
“थोड़ी पुरानी है…पर ठीक कर लेंगे।”

राधिका (पत्नी, हल्की चिंता में) बोली - 
“बस बच्चों को डर न लगे…लोग कुछ अजीब बातें करते हैं।”

(9 साल की लड़की, बड़ी-बड़ी आँखें। हवेली को ध्यान से देखती है।)
लड़की थी 9 साल की थी… नाम—आरुषि।

आरुषि (धीरे से) बोली - 
“मम्मी…यह घर…मुझे अजीब सा लग रहा है।”

(7 साल का लड़का था, उत्साहित।)
नाम—आरव।

आरव (हँसते हुए) बोला - 
“मुझे तो अच्छा लग रहा है!
बड़ा सा घर!”

(सुनीति और कौशिक परिवार को देखते हैं।)

सुनीति (नरम स्वर में) बोली - 
“बच्चे…”

कौशिक बोला - 
“हमें सावधान रहना होगा।
डराना नहीं है।”

(शाम ढलती है। घर के अंदर लाइटें जलती हैं।)

हवेली जो बरसों से अकेली थी… अब फिर से साँस लेने लगी।

(आरुषि अचानक सुनीति की तरफ देखती है।)

सुनीति (चौंककर) बोली - 
“कौशिक जी…क्या उसने…?”

कौशिक (धीमे स्वर में) बोला - 
“नहीं…या शायद…”

(आरुषि पल भर रुकती है, फिर मुस्कुरा देती है।)
कुछ आँखें बाकियों से ज़्यादा देख पाती हैं।

(दिन का समय। हवेली के आंगन में बच्चे खेल रहे हैं। खिलौनों की आवाज़ें, हँसी, दौड़।)

जिस हवेली को लोग भूतों का घर कहते थे… आज वहाँ चहल-पहल थी।

(आरुषि और आरव खिलौनों से खेल रहे हैं। सुनीति और कौशिक पास ही फर्श पर बैठे हैं—अदृश्य।)

सुनीति(बच्चों को देखते हुए, हल्की मुस्कान में उदासी के साथ) बोली - 
“देखिए…कितनी रौनक है आज इस घर में।”

(वो एक खिलौने की तरफ हाथ बढ़ाती है, पर हाथ खाली रह जाता है।)

सुनीति (धीरे से) बोली - 
“अगर वो केमिकल हमारी ज़िंदगी में न आया होता…
तो शायद आज हमारे भी छोटे-छोटे बच्चे होते।”

(उसकी आवाज़ भर्रा जाती है।)

सुनीति बोली - 
“पर उस केमिकल ने हमारी बॉडी की ग्रोथ ही रोक दी…
हम वहीं के वहीं रुक गए।”

(कौशिक बच्चों को देखता है। आरव हँसते हुए दौड़ता है।)

वक़्त आगे बढ़ गया था… पर सुनीति और कौशिक उसी पल में क़ैद हो गए थे।

कौशिक (हल्की मुस्कान के साथ, दर्द छुपाते हुए) बोला - 
“और अगर वो केमिकल न होता…तो शायद…”

(वो रुक जाता है।)

सुनीति बोली - 
“तो?”

कौशिक (धीरे से) बोला - 
“तो शायद तुम्हारी शादी अब तक किसी और से हो चुकी होती।”

(सुनीति उसकी तरफ देखती है। आँखों में हैरानी और अपनापन।)

सुनीति बोली - 
“आपको ऐसा क्यों लगता है?”

कौशिक (सच के साथ) बोली - 
“क्योंकि तब मैं तुम्हारी ज़िंदगी में आया ही ना होता।"

(वो हल्की हँसी हँसता है।)

कौशिक बोला कि 
“शायद तुम मुझे जानती ही ना होती।”

(सुनीति उसका हाथ पकड़ती है—अदृश्य।)

सुनीति (पक्के यक़ीन से) बोली - 
“नहीं, कौशिक जी।
अगर वो केमिकल न भी होता…
तो भी मैं तुम्हीं को चुनती।”

(दोनों पास-पास बैठे हैं। बच्चों की हँसी गूंजती है।)

कुछ प्यार किस्मत से नहीं…चुनाव से होते हैं।

(आरुषि खेलते-खेलते अचानक उसी जगह देखती है जहाँ सुनीति बैठी है।)

आरुषि (धीरे से) बोली - 
“मम्मी…यहाँ कोई अच्छा-सा है…”

(राधिका आवाज़ देती है।)

राधिका बोली - 
“क्या बोल रही हो, आरुषि?
खेलो।”

(आरुषि फिर खेलने लगती है।)

(सुनीति और कौशिक एक-दूसरे को देखते हैं।)

सुनीति (धीमे स्वर में) बोली - 
“कौशिक जी…क्या बच्चे हमें महसूस कर सकते हैं?”

कौशिक बोला कि 
“शायद… क्योंकि उनका दिल अब भी साफ है।”

(रात का समय। कमरे में हल्की पीली लाइट। आरुषि और आरव बिस्तर पर बैठे हैं।)

राधिका (कंबल ठीक करते हुए) बोली - 
“चलो… अब सो जाओ।
सुबह स्कूल भी जाना है।”

आरव(मासूम आवाज़ में) बोला - 
“मम्मी… आज हमें अपने पास सुला लो ना।
हमें आपके पास सोना है।”

आरुषि (धीरे से) बोली - 
“हाँ मम्मी…आज डर लग रहा है।”

(राधिका घड़ी देखती है, थोड़ी चिड़चिड़ी।)

राधिका बोली - 
“अरे नहीं, बड़े बच्चे हो गए हो।
अकेले सोना सीखो।”

(वो बिना पीछे देखे दरवाज़ा बंद कर देती है।)
(कमरे में सन्नाटा। बस बच्चों की साँसों की आवाज़।)

कुछ दरवाज़े लकड़ी के नहीं होते… वो दिल के होते हैं।

(कमरे के कोने में सुनीति और कौशिक बैठे हैं—अदृश्य।)

सुनीति  (आँखों में कसक लिए) बोली - 
“कैसी माँ है ये…अपने बच्चों को अपने पास भी नहीं सुला सकती।”

कौशिक(शांत स्वर में) बोला - 
“शायद थकी हुई है…या शायद प्यार जताना भूल गई है।”

(आरव करवट बदलता है। आरुषि अपने भाई का हाथ पकड़ लेती है।)

जब माँ की गोद न मिले… तो भाई-बहन एक-दूसरे का सहारा बन जाते हैं।

(धीरे-धीरे दोनों सो जाते हैं।)
(सुनीति बच्चों के सिरहाने बैठ जाती है। हल्के से आरुषि के बाल सहलाती है—अदृश्य।)

सुनीति (फुसफुसाकर) बोली - 
“सो जाओ…अब डरने की ज़रूरत नहीं।”

(कौशिक आरव के पास बैठता है।)

सुनीति(धीरे से, आँसू दबाते हुए) बोली - 
“कौशिक जी…अगर हमारे भी बच्चे होते ना…”

(वो रुक जाती है।)

कौशिक(आसमान की तरफ देखते हुए) बोला - 
“तो शायद हम भी यूँ ही उनके सिरहाने बैठे होते।”

सुनीति बोली - 
“मैं उन्हें अपनी छाती से लगाकर सोती।
कभी अकेला महसूस नहीं होने देती।”

कौशिक बोला - 
“और मैं… हर रात कहानी सुनाता।”

(दोनों मुस्कुराते हैं—दर्द भरी मुस्कान।)

(आरुषि नींद में हल्का-सा मुस्कुराती है।)

कुछ रिश्ते नाम के मोहताज नहीं होते। कुछ माँ-बाप बिना दिखाई दिए भी रक्षा करते हैं।

(सुनीति और कौशिक बच्चों के पास ही बैठे रहते हैं।)

सुनीति (दृढ़ स्वर में) बोली - 
“जब तक ये बच्चे इस घर में हैं… हम इन्हें अकेला महसूस नहीं होने देंगे।”

कौशिक बोला - 
“ये हमारा वादा।”

(कैमरा धीरे-धीरे सोते बच्चों और उनके सिरहाने बैठे अदृश्य माता-पिता पर टिकता है।)