Vruksh Vaani - 2 in Hindi Spiritual Stories by Prashanth B books and stories PDF | वृक्ष वाणी : पर्यावरण सिद्धों का उदय - 2

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वृक्ष वाणी : पर्यावरण सिद्धों का उदय - 2

किरण की पलकें धीरे-धीरे खुलीं। शुरुआत में सब कुछ धुंधला और अस्पष्ट था। फिर धीरे-धीरे अर्जुन का चिंतित चेहरा साफ दिखाई देने लगा।

"किरण! होश आ गया?" अर्जुन की आवाज़ में राहत की सांस थी।

किरण धीरे से उठकर बैठ गया। उसका सिर अभी भी थोड़ा भारी था, लेकिन वह भयानक दर्द गायब हो चुका था। "क्या हुआ था? मुझे... मैं अब ठीक हूँ," उसकी आवाज़ में आश्चर्य था।

अर्जुन ने अपने दोस्त के चेहरे को गौर से देखा। "तू बेहोश हो गया था। मैंने... मैंने तुझे पानी दिया। उसमें कुछ पत्तियां मसलकर मिलाई थीं।"

"पत्तियां?" किरण भ्रमित हो गया। "कौन सी पत्तियां?"

"मुझे नहीं पता," अर्जुन की आवाज़ धीमी हो गई। "मुझे कैसे पता चला, यह मैं खुद नहीं जानता। लेकिन... बस मुझे लगा कि मुझे ऐसा करना चाहिए।"

किरण ने गहरी सांस ली और अपने व्यावहारिक (Practical) दिमाग से स्थिति का विश्लेषण करने की कोशिश की। "पानी की कमी (Dehydration) की वजह से हुआ होगा। तूने सही समय पर दिमाग लगाया, अर्जुन।" उसने खड़े होने की कोशिश की। "चल, अब घर चलते हैं। बहुत-बहुत शुक्रिया, भाई।"

अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। किरण अपने तार्किक स्पष्टीकरण से संतुष्ट था। लेकिन अर्जुन जानता था—यह केवल पानी की कमी नहीं थी। यह कुछ और था। कुछ असाधारण। वह शक्ति जिसने उसे उस पौधे की ओर खींचा था। वह सुनहरी आभा (Aura)।

उसने अपने हाथों को देखा। दिखने में साधारण हाथ। लेकिन उनमें कोई शक्ति छिपी थी। ऐसी शक्ति जो उसकी अपनी समझ से परे थी।

वे धीरे-धीरे घर की ओर चल पड़े। किरण पूरी तरह से ठीक हो चुका था और हमेशा की तरह बातें कर रहा था। लेकिन अर्जुन का मन अभी भी उसी घटना में अटका हुआ था। वह निःशब्द पुकार। वह धड़कती हुई रंगीन रोशनी। वह सब क्या था? क्या ऐसा फिर होगा?

अगली सुबह जब स्कूल की घंटी बजी, तो अर्जुन अपनी जगह पर जा बैठा। खिड़की के पास वाली सीट—जहाँ से स्कूल के पीछे के पेड़-पौधे साफ दिखाई देते थे। उसकी स्केचबुक हमेशा की तरह मेज पर थी।

लेकिन आज उसका मन कहीं और था। कल की घटना उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी।

"अर्जुन, सुन रहा है?" किरण की आवाज़ ने उसके विचारों को तोड़ा। "हं? क्या कहा?"

"आज सीनियर्स (Seniors) का प्रेजेंटेशन है। सुना है विक्रम भैया औषधीय पौधों के बारे में बात करने वाले हैं," किरण ने कहा।

"विक्रम?" अर्जुन ने पूछा।

"हाँ, वही सीनियर। बहुत शांत रहता है, हमेशा किताबों में डूबा रहता है। उसे पेड़-पौधों में बहुत दिलचस्पी है," किरण ने सिर हिलाया। "लेकिन उसके दोस्त कम हैं। हमेशा अकेला रहता है।"

अर्जुन ने खिड़की से बाहर देखा। दूर, स्कूल के मैदान के एक कोने में, एक दुबला-पतला लड़का पेड़ की छांव में बैठकर कुछ पढ़ रहा था। चश्मे के पीछे उसकी आँखें किताब पर टिकी थीं। उसके पास कुछ कागज बिखरे थे—जो पौधों के रेखाचित्र (Sketches) लग रहे थे।

और तभी, वह दिखाई दिया।

उस लड़के के आसपास के पौधों से... एक मंद आभा (Dim Aura)। हरे, नीले और बैंगनी रंगों की एक सूक्ष्म चमक। वह बहुत हल्की थी—इतनी कि दूसरों को दिखाई न दे। लेकिन अर्जुन को स्पष्ट दिखाई दी।

"मैंने सुना है उसे इनहेलर (Inhaler) की समस्या है," किरण ने बात जारी रखी। "हमेशा उस इनहेलर को साथ रखता है।"

अर्जुन ने और ध्यान से देखा। विक्रम ने अपनी किताब से नज़र हटाई और पास के एक पौधे को बारीकी से परखा। उसकी उंगलियों ने पत्ती को छुआ, उसके आकार का अध्ययन किया। फिर उसने अपनी नोटबुक में कुछ लिखा।

विक्रम की जेब से एक नीला इनहेलर बाहर झांक रहा था। वह उसकी सुरक्षा का प्रतीक था। हमेशा साथ रहने वाला आत्मविश्वास।

"अर्जुन, तू क्या सोच रहा है?" किरण ने पूछा।

"कुछ नहीं," अर्जुन ने जल्दी से उत्तर दिया। लेकिन उसकी नज़रें अभी भी विक्रम पर थीं। उन पौधों के चारों ओर की आभा अभी भी टिमटिमा रही थी।

ಖಂಡಿತ, ಕಥೆಯ ಅತ್ಯಂತ ರೋಚಕವಾದ ಭಾಗ ಇಲ್ಲಿದೆ. ವಿಕ್ರಮ್ ಪಾಠ ಮಾಡುವುದು, ಆಸ್ತಮಾ ಅಟ್ಯಾಕ್ ಆಗುವುದು ಮತ್ತು ಅರ್ಜುನನಿಗೆ ಎರಡನೇ ಬಾರಿಗೆ ಆ 'ಕರೆ' ಬರುವ ದೃಶ್ಯಗಳನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ಅನುವಾದಿಸಲಾಗಿದೆ.

ಹಿಂದಿಯಲ್ಲಿ **'ಆಡುಸೋಗೆ'** ಗಿಡಕ್ಕೆ **'ಅಡೂಸಾ' (Adusa)** ಅಥವಾ **'ವಾಸಾ' (Vasa)** ಎಂದು ಕರೆಯುತ್ತಾರೆ. ಹಿಂದಿ ಓದುಗರಿಗೆ ಅರ್ಥವಾಗಲು ನಾನು 'ಅಡೂಸಾ' ಎಂದು ಬಳಸಿದ್ದೇನೆ.

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दोपहर के अवकाश (Lunch break) में, अर्जुन अपनी स्केचबुक लेकर खिड़की के पास बैठ गया। दूर, विक्रम अभी भी उसी पेड़ की छांव में बैठा था। अब वह अपनी नोटबुक में विभिन्न पौधों के रेखाचित्र बना रहा था।

अर्जुन ने अपनी पेंसिल उठाई और विक्रम का चित्र बनाना शुरू किया। पेड़ की छांव, बैठा हुआ लड़का, आसपास के पौधे... और वह **आभा (Aura)**।

उसका हाथ अपने आप चलने लगा। पौधों के चारों ओर धुंधली रंगीन लकीरें। हरा, नीला, बैंगनी... विभिन्न रंगों का प्रकाश।

"क्या बना रहा है?" एक सहपाठी ने पीछे से आकर पूछा।
अर्जुन ने झटपट किताब बंद कर दी। "कुछ नहीं, बस ऐसे ही।"

लेकिन उसके मन में सवाल उठ रहे थे। यह आभा क्या है? दूसरों को क्यों नहीं दिखती? और विक्रम के आसपास के पौधे इतने अधिक चमकदार क्यों थे?

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दोपहर का आखिरी घंटा। सीनियर छात्र अपनी कक्षा में प्रेजेंटेशन के लिए तैयार थे। अर्जुन और किरण सहित कुछ जूनियर छात्रों को भी इसे सुनने की अनुमति दी गई थी। शिक्षकों ने इसे एक शैक्षिक अनुभव माना था।

कक्षा खचाखच भरी थी। विक्रम अगली मेज के पास खड़ा था, अपने नोट्स और कुछ पौधों के नमूने जमा रहा था। उसका नीला इनहेलर मेज के कोने पर रखा था।

"छात्रों, शांत हो जाइए," मल्लप्पा सर ने घोषणा की। "आज विक्रम हमारे मलनाड के औषधीय पौधों के बारे में बात करेगा। यह हमारे विरासत का बहुत महत्वपूर्ण ज्ञान है।"

विक्रम ने अपना चश्मा ठीक किया और आगे आया। उसके हाथ थोड़े कांप रहे थे—लोगों के सामने बोलना उसके लिए आसान नहीं था। लेकिन पौधों के बारे में बात करते समय वह एक अलग ही व्यक्ति बन जाता था।

"नमस्कार," विक्रम ने शुरू किया। उसकी आवाज़ कोमल थी लेकिन स्पष्ट थी। "आज हम अपने चारों ओर मौजूद अद्भुत खजाने के बारे में बात करेंगे। हमारे मलनाड के औषधीय पौधे।"

अर्जुन पिछली पंक्ति में बैठकर ध्यान से सुन रहा था।

"हमारे दादा-दादी को इन पौधों की शक्ति पता थी," विक्रम ने अपनी बात जारी रखी, अब वह अपने विषय में खो गया था। "नीम, तुलसी, पीपल, होन्ने... हर पौधा अपने आप में एक औषधालय है। लेकिन हम इस ज्ञान को भूल रहे हैं..."

उसकी आवाज़ में उत्साह बढ़ रहा था। उसने एक-एक पौधे का नमूना दिखाया और उसके गुणों का वर्णन किया।

"यह तुलसी का पत्ता," उसने एक पत्ता उठाकर दिखाया। "यह केवल पूजा के लिए नहीं है। यह फेफड़ों की समस्याओं और खांसी के लिए बेहतरीन औषधि है। हमारे पूर्वजों..."

तभी अर्जुन को वह दिखाई दिया। विक्रम के हाथ में पकड़े तुलसी के पत्ते से एक मंद हरी आभा निकल रही थी। लेकिन दूसरों को कुछ नहीं दिखा।

"...और यह **अड़ूसा (Adusa/Adusoge)** का पत्ता," विक्रम ने दूसरा नमूना उठाया, "यह सांस की तकलीफों के लिए चमत्कारी है। जिन्हें अस्थमा है..." वह थोड़ा रुका।

उसकी सांसें थोड़ी तेज़ हो रही थीं। उत्साह से बोलते समय, उसे सांस लेने में कठिनाई होने लगी।

"विक्रम, तुम ठीक हो?" सर ने पूछा।
"जी सर," विक्रम ने चश्मा ठीक किया। "मैं... मैं ठीक हूँ।"

लेकिन अर्जुन को पता चल रहा था। विक्रम की सांसें भारी हो रही थीं। उसका हाथ अनजाने में जेब की ओर गया—इनहेलर की सुरक्षा के लिए।

"तो, हमारी विरासत के इस ज्ञान को..." विक्रम ने जारी रखने की कोशिश की। उसकी आवाज़ थोड़ी खरखराती हुई निकली।

*
विक्रम अचानक रुक गया। उसका हाथ जेब में गया और उसने इनहेलर निकाला। उसे मुंह पर लगाया, दबाया।
*फिस्स...*
केवल हवा। दवा नहीं थी।

विक्रम की आँखें फैल गईं। डर।
"मुझे... मुझे..." वह फुसफुसाया। उसने फिर से इनहेलर दबाया। फिर से खाली।

उसकी सांसें तेजी से उखड़ने लगीं। सीना ऊपर-नीचे होने लगा। हाथों ने गला पकड़ लिया।
"मुझे... सांस..."

विक्रम मेज को पकड़ने की कोशिश करने लगा, लेकिन अपना संतुलन खो बैठा। वह मेज के पीछे गिर पड़ा, सांस के लिए तड़पने लगा।

"विक्रम!" सर उसकी ओर दौड़े।
कक्षा में शोर मच गया। छात्र खड़े हो गए, कुछ डर के मारे चिल्लाए।

"कोई मेडिकल रूम जाओ!" सर चिल्लाए। "जल्दी!"
"सर, वो कमरा 500 मीटर दूर है!" एक छात्र चिल्लाया।
"और वहां अक्सर ताला लगा रहता है!" दूसरे ने जोड़ा।

विक्रम जमीन पर संघर्ष कर रहा था। उसका चेहरा पीला पड़ रहा था। होंठ नीले होने लगे थे। हर सांस एक जंग थी।

"कोई कुछ करो!" एक लड़की रोने लगी।

अर्जुन अपनी सीट पर बैठा विक्रम का संघर्ष देख रहा था। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
तभी वह फिर से शुरू हुआ।
**वह पुकार (The Call)।**
ध्वनिहीन, लेकिन बेहद स्पष्ट पुकार।

अर्जुन के कानों में वह नि:शब्द पुकार गूंज उठी। यह कल जैसी ही थी, लेकिन उससे कहीं अधिक तीव्र। अधिक आग्रहपूर्ण।

उसकी नज़र खिड़की के बाहर गई। स्कूल के पीछे की झाड़ियाँ, पौधे... वे सब अचानक विभिन्न रंगों की आभा से टिमटिमाने लगे। हरा, नीला, बैंगनी, पीला... रंगों का संगीत।

लेकिन एक विशेष झाड़ी... वह गहरे **हरे-नीले (Green-Blue)** प्रकाश से प्रज्वलित हो रही थी। बाकी सबसे अधिक चमकदार।

वहां। वह पौधा। वे पत्तियां। अभी।

पुकार इतनी स्पष्ट थी कि अर्जुन के मन में उस पौधे का चित्र बन गया। उसे पता चल गया कि कौन सी पत्तियां तोड़नी हैं।

"सर!" अर्जुन अचानक खड़ा हो गया। "मैं... मैं पानी लाता हूँ!"
"अर्जुन, रुको—" सर चिल्लाए।

लेकिन अर्जुन पहले ही कक्षा से बाहर भाग चुका था। उसके पैर अपने आप चल रहे थे। वह पुकार उसे रास्ता दिखा रही थी।

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अर्जुन स्कूल के पीछे भागा। वहां आमतौर पर छात्र नहीं आते थे। जंगली पौधे और झाड़ियां बेतरतीब ढंग से उगी थीं।
लेकिन उसे ठीक-ठीक पता था कि कहां जाना है।

वह झाड़ी। तीव्र हरे-नीले प्रकाश से चमक रही थी। वह रोशनी जो किसी और को नहीं दिखती थी, लेकिन अर्जुन के लिए दिन के उजाले की तरह साफ थी।

वह झाड़ी के सामने खड़ा हुआ। इस बार उसे डर नहीं लगा। इस बार यह अधिक स्वाभाविक (Natural) लगा।

उसके हाथ अपने आप चले। उसने ऊपर की टहनी से **तीन विशेष पत्तियां** तोड़ीं। वे उसकी हथेली में गर्म थीं, एक नरम रोशनी से स्पंदित हो रही थीं।

उसने पत्तियों को हथेलियों के बीच रखा और मसल दिया। वे आसानी से एक हरे लेप (Paste) में बदल गईं। एक तीखी, सुगंधित गंध—और उसमें कुछ और भी मिला हुआ था।

उसने अपनी पानी की बोतल खोली और उस हरे पेस्ट को उसमें मिला दिया। बोतल को हिलाया। पानी हल्का हरा हो गया। और वह आभा... बोतल के भीतर से ही मंद-मंद चमक रही थी।

अर्जुन तेजी से कक्षा की ओर भागा। गलियारे में ही उसे अंदर का शोर सुनाई दिया। और विक्रम की सांसों के संघर्ष की आवाज़।

---

*
सने कक्षा का दरवाजा खोला। दृश्य भयानक था। विक्रम जमीन पर पड़ा था, सर ने उसे पकड़ रखा था। उसका चेहरा अब पूरी तरह पीला पड़ चुका था, होंठ नीले थे। सांस लगभग रुक चुकी थी।

"सर!" अर्जुन चिल्लाया। "मैं पानी लाया हूँ!"

सर ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में हताशा थी। "पानी? लेकिन... ठीक है, लाओ! शायद कुछ मदद मिले!"

अर्जुन विक्रम के पास घुटनों के बल बैठ गया। "यह... यह मदद कर सकता है," उसने धीरे से कहा।

सर ने विक्रम का सिर ऊपर उठाया। विक्रम की आँखें आधी बंद थीं, वह बेहोश होने की कगार पर था।
अर्जुन ने बोतल उसके होंठों के पास लगाई। "कृपया, पी लीजिए," वह फुसफुसाया।

विक्रम के होंठ थोड़े खुले। अर्जुन ने धीरे-धीरे पानी उसके मुंह में डाला। हरे रंग का वह द्रव, जो एक मंद आभा के साथ चमक रहा था।

विक्रम ने अनजाने में निगला। फिर थोड़ा और। और थोड़ा और।
कक्षा में पूर्ण सन्नाटा था। सब देख रहे थे।

कुछ सेकंड बीते...
फिर... विक्रम के सीने ने एक बड़ी सांस ली। एक गहरी, पूरी सांस।

उसकी आँखें खुलीं। पहले भ्रम से, फिर स्पष्टता से। उसके चेहरे पर रंग लौटने लगा। होंठ फिर से गुलाबी होने लगे।
एक और सांस। अब आसानी से, स्वाभाविक रूप से।

"क्या हुआ?" विक्रम बड़बड़ाया, बैठने की कोशिश करते हुए।
कक्षा में राहत की लहर दौड़ गई। कुछ ने तालियां बजाईं।

"विक्रम! तुम ठीक हो?" सर ने उसका चेहरा जांचा।
"जी सर," विक्रम ने अपने सीने को छूते हुए आश्चर्य से कहा। "मैं अब ठीक हूँ। सांस लेना आसान लग रहा है।"

उसकी नज़रें अर्जुन की ओर मुड़ीं। उन आँखों में कृतज्ञता थी... और कुछ और भी। **संदेह। जिज्ञासा।**

तभी उसे एहसास हुआ। उस पानी का स्वाद। बहुत ही विशिष्ट स्वाद। कड़वा और मीठा, ठंडे और गर्म का मिश्रण।

"उस पानी में क्या था?" विक्रम ने धीरे से पूछा, उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन तीव्र थी।

अर्जुन पीछे हट गया, उसके हाथ कांप रहे थे। "कुछ... केवल पानी।"

"नहीं," विक्रम ने सिर हिलाया। उसकी आँखें अर्जुन पर गड़ गईं, चश्मे के पीछे तीखी थीं। "उस पानी में जड़ी-बूटियां (Herbs) थीं। मैं स्वाद पहचान सकता हूँ... और कुछ और भी... कुछ ऐसा जिसे मैं नहीं जानता।"

तभी स्कूल की नर्स दौड़ती हुई आईं।
"क्या हुआ? मैंने सुना विक्रम को अस्थमा अटैक आया है—"
वे रुक गईं। विक्रम पूरी तरह से ठीक बैठा था। नर्स ने स्टेथोस्कोप से जांच की।
"यह... यह तो असाधारण है," नर्स बड़बड़ाईं। "सांस बिल्कुल सामान्य है। कोई घरघराहट नहीं। यह कैसे हुआ?"

"इस छात्र ने पानी दिया," सर ने अर्जुन की ओर इशारा किया।

घंटी बजी। छात्र बाहर जाने लगे। अर्जुन ने अपना बस्ता उठाया और भागने की कोशिश की।
"अर्जुन," विक्रम की आवाज़ ने उसे रोक दिया।

"तुमने मेरी जान बचाई। मुझे पता है। बहुत-बहुत शुक्रिया।"
"वह... वह कुछ नहीं था," अर्जुन संकोच से बोला।

विक्रम थोड़ा पास आया। "उस पानी में... कुछ खास था, है न?" उसने धीरे से पूछा। "मैंने चखा था। जड़ी-बूटियों का स्वाद।"

अर्जुन पीछे हट गया। "मुझे... मुझे जाना है।"

वह चला गया, लेकिन विक्रम खिड़की से उसे जाते हुए देखता रहा।
उसने अपने सीने को छूआ। सांस बिल्कुल सामान्य।
वह पानी। वह अजीब स्वाद। और वह लड़का—अर्जुन—उसे कैसे पता चला?

विक्रम धीरे से मुस्कुराया। "दिलचस्प (Interesting)."
उसकी नज़रें बाहर के पौधों पर गईं। सामान्य पौधे। लेकिन उनमें कुछ तो असामान्य था।
एक रहस्य। और विक्रम को रहस्य पसंद थे।